लेखक की और रचनाएं

Latest

अकाल के काल विलासराव सालुंके की जबानी उनकी कहानी

एक कथा ऐसी भी...


"एक-दो नहीं, पसीने से लथपथ चालीस हजार लोगों को तपती दुपहरिया और झुलसाती लू को झेलते हुए एक साथ पत्थरों को तोड़ते देख मैं अवाक् रह गया। हरियाली का एक तिनका नहीं। कहीं-कहीं से छोटे बच्चों के बिलखने की आवाज और उन पर खीजतीं, चुप कराती मजदूर माताएं। चालीस हजार छोटी, हथौड़ियों की आवाज-ठक, ठड़ाक, ठक, ठक और पास की पहाड़ियों से वापस लौटती उनकी प्रतिध्वनियां। मेरा मस्तिष्क तो किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया।' 1972 में महाराष्ट्र के पुणे शहर से मात्र 36 किलोमीटर की दूरी पर सासवड़-नेजरी के बीच, मध्याह्न में, उन्हीं सूखे पहाड़ों के बीच खड़े होकर एक पत्रकार को विलासराव सालुंके बीस वर्ष पुरानी वह घटना सुना रहे थे, जिसने उनके एवं कई अन्य लोगों के जीवन की दिशा मोड़ दी थी।

"शहरों में जाकर बसा हर कोई किसी न किसी गांव से आया है। मैं भी मूलत: तो गांव का ही हूं। 1953 में पुणे में विद्युत यांत्रिकी का स्नातक बनते-बनते मैं भी पूरे का पूरा शहरी बन गया था। मैंने "एक्युरेट इंजीनियरिंग कम्पनी' के मालिक के रूप में अपना कारोबार इतना बढ़ाया था कि कारोबार के सिलसिले में एक सप्ताह न्यूयार्क जाता था तो दूसरे सप्ताह टोक्यो। एक सुबह अपने बंगले के हरे-भरे उद्यान में बैठा अखबार पढ़ रहा था। उस समय महाराष्ट्र का अकाल प्रथम पृष्ठ की सुर्खियों में था। मन में विचार आया अकाल कैसा होता है? खुद जाकर देखना चाहिए। बस, अपनी मोटर निकाली और अकाल देखने चल पड़ा। आज से बीस वर्ष पूर्व यहीं आकर रुका था।

एक साथ चालीस हजार लोगों को पत्थर तोड़ते देख गुमसुम हो गया। यह क्या? पुणे से केवल 36 किलोमीटर दूर यह हालत! और अपने धंधे में लीन पुणे में बैठा मैं। मुझे इसका पता ही नहीं कि यहां हजारों आदमी बेवजह पत्थर तोड़ रहे हैं?' उस दिन विलासराव बेचैन रहे। दिमाग में हथौड़ों की आवाज गूंज रही थी। कार से वापस लौट रहे विलासराव वह विलासराव नहीं थे, जिनका पुणे में तीस करोड़ का कारोबार था। अपने बंगले पर जाने के बजाय विलासराव एक प्रतिष्ठित उद्योगपति के नाते सीधे जिलाधिकारी के घर पहुंचे।

"ये हजारों लोग बिना किसी प्रयोजन के पत्थर क्यों तोड़ रहे हैं आपके जिले में?' उन्होंने जिलाधिकारी से पूछा।
"यह तो अर्से से चल रहा है। महाराष्ट्र में जगह-जगह पत्थर तोड़े जा रहे हैं।' उत्तर मिला।
"मगर क्यों'?
"अकाल है, इसलिए।'
"लेकिन पानी की तंगी का पत्थर तोड़ने से क्या सम्बंध?'
"यह तो मैं भी नहीं जानता।' जिलाधिकारी ने कहा, "अकाल की स्थिति में रोजगार देने की वचनबद्धता है, इसलिए रोज के तीन रुपए के हिसाब से पत्थर तुड़वा रहे हैं। आपके पास कोई अन्य विकल्प है?'

विलासराव के पास उस समय इसका विकल्प नहीं था। उद्योगों में आवश्यक सूक्ष्म नाप-जोख के उपकरण तब भारत को आयात करने पड़ते थे। विलासराव ऐसे उपकरण बनाना जानते थे, परन्तु पानी के अभाव में बिलखते लोगों के पास पत्थर तोड़ने के अलावा कुछ और करने का विकल्प नहीं था। वे भारी मन से अपने निवास लौटे। रातभर बेचैन रहे। दूसरे दिन सूर्योदय के पहले वे पत्थर तोड़ने वाले अकाल पीड़ितों के बीच पहुंच गए। उपकरण बनाने वाले अपने लाभदायी कारखाने की तरफ से उनका ध्यान हट गया था। पत्नी कल्पना सालुंके चिन्ता में पड़ गईं।

विलासराव बता रहे थे, "मेरे और जिलाधिकारी के पास यदि विकल्प नहीं, तो संभव है इन अनपढ़ गंवारों के पास होगा। मैं उनके बीच घूम-घूम कर उनसे बतियाने लगा।
गांववालों ने कहा विकल्प क्यों नहीं है? अकाल तो इसी वर्ष पड़ा है आने वाले वर्ष में तो वर्षा होगी। उस समय पानी को व्यर्थ बह जाने के स्थान पर उसे संग्रहीत करें तो...।
' विलासराव के मस्तिष्क में प्रकाश हुआ। अकाल के दिन भी दुबारा आएंगे परन्तु जल का अभाव न रहेगा और इन्हें पत्थर तोड़ने का दुष्कर कार्य नहीं करना पड़ेगा। इतनी सीधी सी बात हम पढ़े-लिखों के बजाय इन ग्रामीणों को पता है। अपने कारखाने को भूल विलासराव अपने वाहन से तुरत-फुरत पुणे लौट कर वहां अपने जैसे अभियन्ताओं से मिले। पूछा,
"बरसात का पानी कैसे रोका जाता है?' उनके जवाब से विलासराव को एक और झटका लगा। अभियन्ता बने इन मित्रों को घर, पुल, रास्ते, नालियां, पानी की टंकी, सिंचाई के लिए बांध इत्यादि बनाने की तो शिक्षा दी जाती है लेकिन वर्षा जल संग्रहण प्रणालियों का प्रशिक्षण उस समय नहीं दिया जाता था। जल संग्रहण एवं सिंचन तो संस्कृति का पर्याय है और विलासराव जान गए कि इससे इन अभियन्ताओं का जरा भी सम्बंध नहीं।

विलासराव अकालग्रस्त क्षेत्र में घूमते-भटकते रहे। गांववालों से पूछ-पूछ कर तालाब बनाने के पूर्व क्या और कैसे निरीक्षण एवं तैयारियां करनी पड़ती हैं, इसका अभ्यास किया। सप्ताह भर में ही उस क्षेत्र में पांच तालाबों को बनाने की योजना जिलाधिकारी को थमा दी गई। पत्थर तोड़ने के स्थान पर तालाबों, छोटे-छोटे चैक-डैम, छोटे प्राकृतिक नालों को छोटे बांधों से मोड़कर तालाबों की तरफ मोड़ने की योजना का पालन शुरू हो गया।

1972 के अकाल के दिन तो बीत गए। गांववाले भूल गए, जिलाधिकारी भी भूल गए, महाराष्ट्र भी भूल गया लेकिन विलासराव नहीं भूले।

बीस वर्ष बाद भी नहीं भूले। अपनी मोटर, बंगला, न्यूयार्क और टोक्यो की यात्राएं और जमे हुए कारोबार को पत्थरों को तोड़ने की ठक-ठक आवाजों को सुनकर विलासराव ने जब छोड़ा तो छोड़ ही दिया। पत्नी और बच्चों को लेकर विलासराव सूखे भट्ठ पहाड़ों में पुरंधर तालुके के बलद गांव से तीस किलोमीटर की दूरी पर नाइगांव आ गए और टेकरी पर स्थित एक मंदिर के नीचे 16 हेक्टेयर ढलवां जमीन किराए पर ली, जिस पर बरसाती सिंचाई से प्रति हेक्टेयर मुश्किल से 50 किलो अन्न उग सकता था। इस शहरी बाबू की बेवकूफी को देखने के लिए गांव वाले उत्सुक थे। लेकिन निर्णय लेने के पूर्व विलासराव ने अभ्यास किया था। उस पर अमल करते हुए ढलान को सीढ़ियों की तरह काटकर छोटे-छोटे समतल क्षेत्र किए। सबसे नीचे मिट्टी का बांध बनाकर एक छोटा सा सरोवर बनवाया। बारिश से उनका छोटा सा सरोवर भर गया और मिट्टी में जल उतर गया तब विलासराव ने सरोवर के नीचे एक कुंआ खोदा और उस पर साढ़े सात अश्व शक्ति की मोटर लगाई। पानी को नीचे से खींच ऊपर टेकरे पर पहुंचा अपने स्तरबद्ध खेतों को सींचा। जब 50 किग्रा. के स्थान पर विलासराव ने प्रति हेक्टेयर 500 किलोग्राम अनाज उगाकर दिखाया और इस जमीन पर 4000 वृक्ष भी लगा दिए, 15 गाएं भी वहां पहुंचा दीं-तब 1976 में तमाशा देखने का विचार रखने वाले ग्रामवासी उनके पास आकर मिन्नतें करने लगे। विलासराव को कमाई की जरूरत नहीं थी, यह तो उनके यज्ञ का अपेक्षित पूर्वानुमान ही था।

"हमारे लिए भी अपने जैसी सिंचाई व्यवस्था करवा दीजिए',
गांववाले बोले, "हमारे बच्चे युवा भिखारियों से भी बदतर हालत में मुम्बई की शैतानी गलियों में मजदूरी करते हैं। गन्ना बेचने के लिए दर-दर भटकते हैं। हमारे गांव हरे-भरे हो जाएं तो हमारे लड़के-लड़कियां हमें छोड़ कर क्यों जाएंगे?'
विलासराव समझ गए कि जिस शांत क्रांति का स्वप्न उन्होंने देखा था उसके यथार्थस्वरूप में आने का समय आ गया है।

गांववालों से उन्होंने कहा, "आपके लिए न सरकार कुछ कर सकती है और न मैं ही कुछ कर सकता हूं। अपनी समस्या और दु:ख का निराकरण आपको स्वयं करना होगा। पराई आस, सदा निराश।' सभी ने एक स्वर में कहा, "कबूल!' इसके बाद कई अनौपचारिक सत्रों-बैठकों में गांववालों से खुलकर बातें करते हुए सबसे सहमति और समर्थन प्राप्त कर विलासराव ने एक स्वप्न साकार कर दिखाया। सबमें सहमति बनी कि अकाल से बचने के लिए भूस्वामित्व पर निर्भर न रहते हुए सभी को आधा एकड़ जमीन सींचने के लिए आवश्यक पानी प्राप्त करने का अधिकार होगा, क्योंकि इतनी जमीन पर स्वयं परिश्रम करके मनुष्य अपनी आवश्यकता का अनाज पा ही सकता है। लेकिन जिनके पास कोई जमीन नहीं, उन्हें भी यह अधिकार होगा, जिसका विनिमय हो सकता है। आधे एकड़ का ही रहेगा। इस जलाधिकार का संरक्षण गांव की पानी पंचायत ही करेगी, जिसका संचालन गांव से बाहर का कोई व्यक्ति नहीं करेगा। जबकि पानी का आवंटन गांव के बाहर का एक वेतनभोगी करेगा। इससे भेदभाव की संभावना घटेगी। जलाधिकार के अंतर्गत प्राप्त जल से कोई गन्ना नहीं उगा सकेगा। कम पानी से उगने वाली बाजारा, ज्वार, मक्के की फसल ही उगाई जाएगी, जिससे पेट की आग बुझेगी। यह भी तय हुआ कि पानी पंचायत की योजना के खर्च का 20 प्रतिशत सभी को अग्रिम देना होगा। शेष विलासराव द्वारा स्थापित "ग्राम गौरव प्रतिष्ठान न्यास' से ऋण में प्राप्त होगा।

इसके बाद नाइगांव में 8, राजूरी में 3, टेकावाड़ी, पिलानवाड़ी, पांडेश्वर, देवगांव, शीदेवाड़ी और धालेवाड़ी को मिलाकर 50 पानी पंचायतें स्थापित हुईं। आधा एकड़ सिंचाई के जलाधिकार पर 20 गांवों की 10,000 आबादी आत्मनिर्भर बनी। 50 योजनाओं पर कुल खर्च दो करोड़ रुपए से भी कम पड़ा। अपने "जड़तंत्र' के सत्ताधीशों को धालेवाड़ी जाकर, प्रजाशक्ति को परखने का अवसर मिल सकता है।

वहां की करा नदी पर एक छोटे बांध की योजना के तहत लोगों को हटा उन्हें अन्यत्र पुनर्वास कराना था। इस पुनर्वास योजना से बेहाल हुए धालेवाड़ी के 67 परिवारों ने अपनी पानी पंचायत बनाई। अब आधे एकड़ के जलाधिकार की व्यवस्था के तहत प्रत्येक व्यक्ति प्रतिवर्ष 10-20 हजार (1992 में) प्याज, ज्वार, गलगोटे उगाकर कमाता है। सरकारी सहायता के बिना 50 हजार से लेकर 1 लाख रुपए तक की लागत से वहां घर बने हैं। हर घर में गाय-भैंस हैं। गांव की ग्रामशाला के 125 युवक पानी पंचायत चलाते हैं और गांव के आग्रह पर पुलिस थाने को विदा कर दिया गया, क्योंकि सारे झगड़े-फसाद समाप्त हो गए। खादी के दो जोड़ी कपड़ों में चलने वाले विलासराव सालुंके गांवों के युवाओं को जलसंग्रह प्रबन्धन सिखा रहे हैं। उनका कहना है, "सरकारी तंत्र को ग्रामोत्थान से कोई लेना-देना नहीं है। गांवों को समझे-पहचाने बगैर वह अपने मस्टर प्लान बनाता रहेगा। यह काम ग्रामीणों को ही करना है।' 1972 के अकाल की दशा पर विलासराव कहते हैं।

हालांकि विलासराव सालुंके अब हमारे बीच नहीं रहे। पर उनका विचार बीज रूप में “पानी पंचायत”, "ग्राम गौरव प्रतिष्ठान न्यास' अभी भी अपनी भूमिका निभा रहे हैं।

विलासराव सालुंके महाराष्ट्र के एक प्रतिष्ठित व्यवसायी थे। वर्षों पूर्व अकालग्रस्त लोगों की पीड़ा देखकर उन्होंने एक संकल्प लिया और उसे पूर्ण भी कर दिया था। यह संकल्प क्या था, इसे पूर्ण कैसे किया गया इस घटना को शब्दों में बांधकर एक लेख के रूप में 1992 में प्रस्तुत किया था श्री महेन्द्र देसाई ने। यह लेख गुजराती पत्रिका "चित्रलेखा' के 25 मई'92 के अंक में प्रकाशित हुआ था। आज जब देश के कुछ राज्य अकाल की विभाषिका से जूझ रहे थे तब यह वास्तविक कथा बहुत प्रासंगिक हो उठी थी। अत: मूल गुजराती लेख का हिन्दी में अनुवाद किया श्री व्योम अखिल ने, जो यहां प्रस्तुत है। यह विवरण पांचजन्य से लिया गया है।

Tags -Pani Panchayat, Pani Panchayat. A case study of sustainable water management in Hindi.Vilasrao Salunkhe's Pani Panchayat is making people return, Vilasrao Salunkhe authors a novel scheme of rural regeneration, Pani Panchayat - Gram Gaurav Pratishthan,

pani panchayat

it's great work and all school and college going children must read it.it's a part of life and one should know all these things.great work by Vilasrao Salunke and Mrs.Salunke, Regards, Suneel Joshi,pune. Co-ordinator, Rashtriya Jal Biradari,pune, Maharashtra. 097666 42909. email- nachiket312@hotmail.com office- 373,Shaniwar Peth, B-5,Dhanlaxmi Complex,opp.Kanya Shala, behind Agrawal Dept.Stores. pune-411030.Maharashtra,India. C0-ORDINAOR.. ANaRDe Foundation,mumbai. NGO,working for community Development.

Post new comment

The content of this field is kept private and will not be shown publicly.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Lines and paragraphs break automatically.

More information about formatting options

CAPTCHA
यह सवाल इस परीक्षण के लिए है कि क्या आप एक इंसान हैं या मशीनी स्वचालित स्पैम प्रस्तुतियाँ डालने वाली चीज
इस सरल गणितीय समस्या का समाधान करें. जैसे- उदाहरण 1+ 3= 4 और अपना पोस्ट करें
6 + 5 =
Solve this simple math problem and enter the result. E.g. for 1+3, enter 4.