अकेले नहीं आता अकाल

Submitted by admin on Sat, 10/03/2009 - 21:18
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उत्तर भारत में जलस्तर 1.6 इंच तक गिर चुका है। यह अगस्त 2002 से अगस्त 2008 के बीच चार सेंटीमीटर सालाना की दर से गिरा। इस दौरान जलदायी स्तर से 26 घन मील से भी ज़्यादा भूजल उड़नछू हो गया। ऑर्गेनिक कृषि की तुलना में हरित क्रांति वाली रासायनिक खेती में 10 गुना ज़्यादा पानी का इस्तेमाल होता है।रासायनिक उर्वरक नाइट्रस ऑक्साइड नामक ग्रीनहाउस गैस का उत्पादन करते हैं, जो कार्बन डाईऑक्साइड की तुलना में 300 गुना ख़तरनाक है।सबसे सस्ती कारों के दौर में अब तक की सबसे महंगी दाल मिल रही है। मानसून की मेहरबानी कम रही, तो समूचे देश पर अकाल की काली छाया घिर आई है। अकाल से बहुत पहले अच्छे विचारों का अकाल पड़ने लगता है। अच्छी योजनाओं का अकाल और बुरी योजनाओं की बाढ़..

काल की पदचाप साफ़ सुनाई दे रही है और सारा देश चिंतित है। यह सच है कि अकाल कोई पहली बार नहीं आ रहा है, लेकिन इस अकाल में ऐसा कुछ होने वाला है, जो पहले कभी नहीं हुआ। देश में सबसे सस्ती कारों का वादा पूरा किया जा चुका है। कार के साथ ऐसे अन्य यंत्र-उपकरणों के दाम भी घटे हैं, जो 10 साल पहले बहुत सारे लोगों की पहुंच से दूर होते थे। इस दौर में सबसे सस्ती कारों के साथ सबसे महंगी दाल भी मिलने वाली है- यही इस अकाल की सबसे भयावह तस्वीर होगी। यहां मैं स्पष्ट कर दूं कि यह बात औद्योगिक विकास के विरुद्ध नहीं कही जा रही है। लेकिन इस महादेश के बारे में सोचना हो, तो हमें इसकी खेती, इसके पानी, अकाल, बाढ़, सबके बारे में सोचना होगा।

हमारे यहां एक कहावत है, ‘आग लगने पर कुआं खोदना’। कई बार आग लगी होगी और कई बार कुएं खोदे गए होंगे, तब अनुभवों की मथानी से मथकर ही ऐसी कहावतें ऊपर आई होंगी। लेकिन कहावतों को लोग या नेतृत्व जल्दी भूल जाते हैं। अगले पांच-सात दिनों में मानसून अपने रहे-सहे बादल समेटकर लौट जाएगा, तब साफ़ हो जाएगा कि गुजरात जैसे अपवाद को छोड़ दें, तो इस बार पूरे देश में औसत से बहुत कम पानी गिरा है। अकाल की आग लग चुकी है और अब कुआं खोदने की तैयारी चल रही है। लेकिन देश के नेतृत्व का- सत्तारूढ़ और विपक्ष का भी पूरा ध्यान, लगता नहीं कि कुआं खोदने की तरफ़ है। अपने-अपने घर-परिवार के चार-चार आना क़ीमत के झगड़ों में शीर्ष नेतृत्व जिस ढंग से उलझा पड़ा है, उसे देख उन सबको बड़ी शर्म आती होगी, जिन्होंने तीन महीने पहले इनके पक्ष में मत डाला था।

कई बातें बार-बार कहनी पड़ती हैं- इन्हीं में एक बात यह भी है कि अकाल कभी अकेले नहीं आता। उससे बहुत पहले अच्छे विचारों का अकाल पड़ने लगता है। अच्छे विचार का अर्थ है, अच्छी योजनाएं। अच्छी योजनाओं का अकाल और बुरी योजनाओं की बाढ़। हालिया दौर में, ऐसा ही कुछ हुआ है। देश को स्वर्ग बना देने की तमन्ना में तमाम नेताओं ने स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन- सिंगूर, नंदीग्राम और ऐसी ही न जाने क़ितनी बड़ी-बड़ी योजनाओं पर पूरा ध्यान दिया। इस बीच यह भी सुना गया कि इतने सारे लोगों द्वारा खेती की ज़रूरत ही नहीं है। एक ज़िम्मेदार नेता की तरफ़ से यह भी बयान आया कि भारत को गांवों का देश कहना ज़रूरी नहीं रहा है। गांवों में रहने वाले शहरों में जाकर रहने लगेंगे, तो हम उन्हें बेहतर चिकित्सा, बेहतर शिक्षा और बेहतर जीवन के लिए तमाम सुविधाएं आसानी से दे सकेंगे।

लेकिन इस बात को यहीं छोड़ दीजिए। अब हमारे सामने मुख्य चुनौती है खरीफ़ की फ़सल को बचाना और आने वाली रबी की फ़सल की ठीक-ठीक तैयारी। दुर्भाग्य से, इसका कोई बना-बनाया ढांचा सरकार के हाथ फिलहाल नहीं दिखता। देश के बहुत बड़े हिस्से में कुछ साल पहले तक किसानों को इस बात की ख़ूब समझ थी कि मानसून के आसार अच्छे न दिखें, तो पानी की कम ज़रूरत पड़ने वाली फ़सलें बो ली जाएं। इस तरह के बीज पीढ़ियों से सुरक्षित रखे गए थे। लेकिन आधुनिक विकास के दौर ने, नई नीतियों ने किसान के इस स्वावलंबन को अनजाने में ही सही, पर तोड़ा ज़रूर है।

लगभग हर क्षेत्र में धान, गेहूं, ज्वार, बाजरा के हर खेत में पानी को देखकर बीज बोने की पूरी तैयारी रहती थी। पर 30- 40 साल के आधुनिक कृषि विकास ने इस बारीक समझ को आमतौर पर तोड़ डाला है। पीढ़ियों से एक जगह रहकर उसे जानने वाला किसान, छह-आठ महीनों में ट्रांसफर होकर जाने वाले कृषि अधिकारी की सलाह पर निर्भर बना डाला गया है। पहले जितना पानी मुहैया होता था, उसके अनुकूल फ़सल ली जाती थी। अब नई योजनाओं का आग्रह रहता है कि राजस्थान में भी गेहूं, धान, गन्ना, मूंगफली जैसी फ़सलें बोएं, जिनमें बहुत पानी लगता है। इस साल, हर जगह जितना कम पानी बरसा है, उतने में हमारे स्वनामधन्य बांध भी पूरे नहीं भरे हैं। कृषि मंत्री ने यह भी घोषणा की है कि किसानों को भूजल का इस्तेमाल कर फ़सल बचाने के लिए 10 हज़ार करोड़ रुपए की डीज़ल सब्सिडी दी जाएगी। यह योजना अगर ईमानदारी से लागू हो जाए, तो अकाल के समय दोहरी मार पड़ सकती है- मानसून का पानी नहीं मिला है और ज़मीन के नीचे का पानी भी फ़सल को बचाने के मोह में खींचकर ख़त्म कर दिया जाएगा, तो अगले बरसों में आने वाले अकाल और भी भयंकर होंगे।

राजस्थान में अलवर ऐसा इला़का है, जहां साल में 25-26 इंच पानी गिरता है। इस बार तो उसका आधा ही गिरा है। फिर भी वहां के एक बड़े हिस्से में पिछले 27 साल में हुए काम की बदौलत अकाल की छाया उतनी बुरी नहीं है। जयपुर के ग्रामीण इला़कों में भी बड़ी आसानी से ऐसे गांव मिल जाएंगे, जहां कहा जा सकता है कि अकाल की परिस्थितियों के बावजूद फ़सल और पीने के लिए पानी सुरक्षित रखा गया है। हरेक राज्य में ऐसी मिसालें खोजनी चाहिए और उनसे अकाल के लिए सब़क लेने चाहिए।

पिछले दिनों कृषि वैज्ञानिकों और मंत्रालय से जुड़े अधिकारियों व नेताओं ने इस बात पर ज़ोर दिया कि कृषि अनुसंधानों में कम पानी की मांग करने वाली फ़सलों पर शोध होना चाहिए। वास्तव में ऐसे बीज समाज के पास रहे हैं। उनके लिए आधुनिक सिंचाई की ज़रूरत ही नहीं है। इन्हें बारानी खेती के इला़के कहा जाता है। 20-30 सालों में बारानी खेती के इला़कों को आधुनिक कृषि की दासी बनाने की कोशिशें हुई हैं। उन्हें पिछड़ा बताया गया, ऐसे बीजों को और उन्हें बोने वालों को पिछड़ा बताया गया, उन्हें पंजाब-हरियाणा जैसी आधुनिक खेती करके दिखाने के लिए कहा गया। आज हम बहुत दुख के साथ देख रहे हैं कि अकाल का संकट पंजाब-हरियाणा पर भी छा रहा है। इसलिए, इस बार जब अकाल आया है, तो हम सब मिलकर सीखें कि अकाल अकेले नहीं आता है। अगली बार जब अकाल पड़े, तो उससे पहले अच्छी योजनाओं का अकाल न आए।

 

गौना ताल : प्रलय का शिलालेख  

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिए कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम

अध्याय

1

भाषा और पर्यावरण

2

सुनहरे अतीत से सुनहरे भविष्य तक

3

शिक्षा: कितना सर्जन, कितना विसर्जन

4

साध्य, साधन और साधना

5

जड़ें

6

पुरखों से संवाद

7

तकनीक कोई अलग विषय नहीं है

8

राज, समाज और पानी : एक

राज, समाज और पानी : दो

राज, समाज और पानी : तीन

राज, समाज और पानी : चार

राज, समाज और पानी : पाँच

राज, समाज और पानी : छः

9

अकेले नहीं आता अकाल

10

चाल से खुशहाल

11

तैरने वाला समाज डूब रहा है

12

नर्मदा घाटीः सचमुच कुछ घटिया विचार

13

गौना ताल : प्रलय का शिलालेख

14

रावण सुनाए रामायण

15

दुनिया का खेला

16

आने वाला पल जाने वाला है

17

तीर्थाटन और पर्यटन

18

जीवन का अर्थ : अर्थमय जीवन

 

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अनुपम मिश्रबहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि सीएसई की स्थापना में अनुपम मिश्र का बहुत योगदान रहा है. इसी तरह नर्मदा पर सबसे पहली आवाज अनुपम मिश्र ने ही उठायी थी.

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