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अपकेन्द्रीय पम्पों का प्रचालन सिद्धान्त

अगर एक बाल्टी को एक हाथ की लम्बाई पर घुमाये तो यह क्रिया उसमें भरे जल पर इतना दाब उत्पन्न कर देगी कि उसके तल में लगी टोंटी से पानी की एक धार निकलने लगेगी। एक अपकेन्द्रीय पम्प में आंतरनोदकों पर लगे वेन (vane) हाथ और रस्सी के समान ही कार्य करते हैं। पम्प का बाल्यूट बाल्टी की तरह पानी रखता है। दोनों मामलों के सिद्धान्त एक समान हैं। जैसे आतरनोदक घूमता है यह पानी को बाहरी किनारों की ओर फेंकता है। वाल्यूट के अन्दर का पानी तब तक दाब में रहता है जब तक कि यह बाहर नही आ जाता। चूषण पाइप के द्वारा पानी आंतरनोदक के मध्य मे प्रवेश करता है।

अपकेन्द्री पम्प की स्थापना
अपकेन्द्री पम्प को उसकी अभिकल्पित दक्षता पर चलाने और उपकरण की आयु लम्बी बनाये रखने के लिए सही ढंग से स्थापित किया जाना चाहिए। उसकी नींव अच्छी होनी चाहिए और उसका संरेखण (alignment) उचित ढंग से किया जाना चाहिए। पम्प की स्थपना करते समय निम्नलिखित बातों पर विचार किया जाना चाहिएः

1- निरीक्षण तथा देखभाल करने के लिए पम्प तक पहुँचने में आसानी होना।
2- पम्प सुरक्षित रखने के लिए उसका ढका होना।
3- बाढ़ की परिस्थितियों के विरूद्ध सुरक्षा।
4- जल पूर्ति के साधन यथा सम्भव पास लगाना, ताकि चूषण मार्ग छोटा और सीधा बनाया जा सके।

पम्प की नींव बनाने के कंकरीट सर्वोत्तम रहती है। पम्प की नीवं मे सुरक्षा पूर्वक कसा जाना चाहिए। इसके लिए नीवं मे उचित आकार के बोल्ट कंक्रीट मे लगाये जाने चाहिए पम्प तथा शक्ति एकक (power unit) बीच मे सही सीध मे (coupling) होना चाहिए। पम्प के उचित प्रचालन के लिए उसका हर समय समतल अवस्था मे रहना आवश्यक है।
पम्प को समतल अवस्था मे लाने के लिए पच्चरों का आवश्यकतानुसार समायोजन किया जा सकता है। पम्प को समतल अवस्था मे लाने के बाद आधार-पट्टिका के चारों ओर कम से कम 6 से,मी, ऊँचा पुश्ता बनाकर उसकी अपेक्षित गहराई तक कंक्रीट डाली जाती है और उसको अच्छी तरह कडा होने के लिए छोड दिया जाता है। पच्चरों को उनकी जगी पर ही छोडा जा सकता है। कंक्रीट के कडे पडने पर आधार बोल्ट को कस देना चाहिए और मोटर व पम्प के संरेखण की जाँच की जानी चाहिए।

पम्प का रखरखाव देख रेख-

1- पम्प को खाली मत चलाये या पानी बन्द होने पर अधिक समय तक न चलायें।
2- वियरिंग का तापमान देख रहे।
3- स्टफिग बाक्स से पानी की 30 से 60 बूदं/मिनट से ज्यादा नहीं गिरनी चाहिए।
चिकनाहट करना

1- ग्रीस द्वारा चिकनाहट-

प्रथम 200 घन्टे चलने के बाद ग्रीस बदलनी चाहिए। इसके बाद जल्दी-2 ग्रीस बदलते रहना चाहिए। यह पम्प के चलने की दशा पर निर्भर करता है। सामान्यतः 8 घन्टे प्रति दिन के हिसाब से चलने पर 1000 घन्टे चलने के बाद ग्रीस बदलते है। बैयरिंग में चिकनाई चलते समय करनी चाहिए।

2- तेल द्वारा चिकनाहट-

प्रथम एक माह चलने के बाद तेल बदलना चाहिए इसके प्रतयेक 6 महीने बाद तेल बदलना चाहिए। स्टेफिग बाक्स की पैकिग को बदल देना चाहिए यदि पानी रिस रहा है। पैकिगं रिगस को चिकनाहट के बाद घुसेडना चाहिए स्टफिग बाक्स का तापमान कम रखने के लिए इसके ऊपर से पानी बहाना चाहिए।

ओवर हालिंग-

यदि पम्प से शुद्व पानी उठाया जा रहा है। तो 2-3 साल के बाद ओवर हालिंग की जरुरत पड़ती है। सभी वियरिंग को एक साथ बदलना चाहिए। और कुछ पुर्जों को तुरन्त बदलने के लिए अतिरिक्त रखना चाहिए जैसे पम्प साफ्ट, बाल्ब वियरिंग, साक्ट स्लीवस, ग्लैड पैकिगं कपलिंग बाल्ट रबर बासर के साथ आदि।

स्रोत-uttarakrishiprabha.com

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