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हाड़ौती क्षेत्र में जल के ऐतिहासिक स्रोत (Traditional sources of water in the Hadoti region)

Author: 
अनुकृति उज्जैनियाँ
Source: 
इतिहास एवं भारतीय संस्कृति विभाग, समाज विज्ञान संकाय, वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान-304022, शोध-प्रबन्ध 2015

प्राचीनकाल से आधुनिक समय तक मानव अभिव्यक्ति के साधनों में मिट्टीपट, मुद्रा, ताम्र पत्र, पट्टिकाएँ और स्तम्भ आदि इतिहास का बोध कराते रहे हैं। प्रारम्भ में अक्षर ज्ञान के अभाव में मनुष्य ने अपनी अभिव्यक्ति शैलचित्रों में व्यक्त की थी परन्तु जैसे-जैसे अक्षर ज्ञान का विकास प्रारम्भ हुआ वैसे ही मनुष्य ने अभिव्यक्ति के साधनों में शैलचित्रों के स्थान पर शब्दों को पत्थर पर लिखना शुरू किया। शब्दोत्कीर्ण पत्थर ही शिलालेख के नाम से प्रतिष्ठित हैं।1 ये शिलालेख शिलाओं, प्रस्तर पट्टों, भवनों या गुफाओं की दीवारों, मन्दिरों के भागों, स्तूपों, स्तम्भों, मठों, तालाबों, बावड़ियों तथा खेतों के बीच गढ़ी हुई शिलाओं पर बहुधा मिलते हैं। इनकी भाषा संस्कृत, हिन्दी, राजस्थानी और फारसी तथा उर्दू में समय के अनुकूल प्रयुक्त हुई है। इनमें गद्य और पद्य दोनों का समावेश दिखाई देता है।

अभिलेख मानव जीवन के साक्षात दर्पण हैं। यह सभ्यता और संस्कृति के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश ही नहीं डालते अपितु आने वाले भविष्य के निर्माण हेतु प्रेरणा भी प्रदान करते हैं। मनुष्य अपनी गतिविधियों को प्राचीन काल से ही कहीं न कहीं अंकित करता रहा है। कहीं शिलालेख के रूप में, कहीं ताड़ पत्रों पर तो कहीं चर्म पर्णों पर। अन्ततः कागज के आविष्कार के पश्चात मानव ने अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम कागज को बनाया। आधुनिक पुरालेख राजकीय अथवा निजी संग्रहों में सुरक्षित ऐसे ही साधन हैं जो इतिहास हेतु अत्यन्त उपयोगी हैं।2

हाड़ौती क्षेत्र में जल का इतिहास एवं महत्त्व (History and significance of water in the Hadoti region)

Author: 
अनुकृति उज्जैनियाँ
Source: 
इतिहास एवं भारतीय संस्कृति विभाग, समाज विज्ञान संकाय, वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान-304022, शोध-प्रबन्ध 2015

जल की उत्पत्ति


भारतीय संस्कृति की यह मान्यता सुविदित है कि मानव शरीर पाँच तत्वों का बना हुआ है। “पाँच तत्व का पींजरा तामे पंछी पौन” यह उक्ति प्रसिद्ध है। ये पाँच तत्व है-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। इन्हें पंचभूत भी कहते हैं क्योंकि ये वे तत्व हैं जिनसे सारी सृष्टि की रचना हुई है।1

आसीदिद तमोभूतम प्रज्ञातमलक्षणम।
अप्रतर्क्यमविज्ञेय प्रसुप्तमिव सर्वत। 7।
ततः स्वयं भूर्भगगवान व्यक्तो व्यंजयत्रिदम।
महा भूतादि वृतौजाः प्रादुरासीत्रमोनुदः। 8।


(भावार्थ - पहले यह संसार तम, अंधकार रूपी प्रकृति से घिरा था। इसमें कुछ भी प्रत्यक्ष ज्ञात नहीं था जिससे तर्क द्वारा लक्षण स्थिर किए जा सके। सभी तरफ अज्ञान और शून्य अवस्था के नाश करने वाले लक्षण सृष्टि की सामर्थ्य से युक्त स्वयंभू भगवान महा भूतादि पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु पंच तत्वों का प्रकाश करते हुए प्रकट हुए)

वेदकाल से लेकर आज तक जल का यह महत्त्व शास्त्रों और काव्यों में प्रतिफलित होता आया है। शास्त्रों में प्रसिद्ध है कि अव्याकृत ब्रह्मा ने जब सृष्टि की रचना करनी चाही तो सबसे पहले उसने जल में सृष्टि का बीजवपन किया2 जल को नारा भी कहा गया है क्योंकि वह नर (ईश्वर) की सन्तान है व नारा (जल) ईश्वर का प्रथम आश्रय स्थल है, इसलिये ईश्वर को नारायण कहते हैं3। ऋग्वेद में वरुण देवता के साथ आपका उल्लेख हुआ है और इसी आप से सृष्टि की रचना हुई है। इसी प्रकार इन्द्र को आकाश, पृथ्वी, जल, व पर्वत का राजा माना है। इन्द्र के लिये कहा गया है कि वृत्र का वध करके वह आप (जल) को मुक्त कराता है4

हाड़ौती का भूगोल एवं इतिहास (Geography and history of Hadoti)

Author: 
अनुकृति उज्जैनियाँ
Source: 
इतिहास एवं भारतीय संस्कृति विभाग, समाज विज्ञान संकाय, वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान-304022, शोध-प्रबन्ध 2015

चौहान राजपूतों की 24 शाखाओं में से सबसे महत्त्वपूर्ण हाड़ा चौहान शाखा रही है। इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड को हासी के किले से एक शिलालेख मिला था, जिसमें हाड़ाओं को चन्द्रवंशी लिखा गया है।1 सोमेश्वर के बाद उसका पुत्र राय पिथौरा या पृथ्वीराज चौहान राजसिंहासन पर बैठा। पृथ्वीराज चौहान शहाबुद्दीन मोहम्मद गौरी के साथ लड़ता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ। तत्पश्चात चौहानों के हाथ से भारत-वर्ष का राज्य जाता रहा। फिर भी चौहान शाखाएँ यत्र-तत्र फैलती गयीं और चौहान क्षत्रिय जहाँ-तहाँ अपना शासन करते रहे।2 जब नाडोल के चौहान कुतुबुद्दीन ऐबक से हारकर भीनमाल में गये। उसी समय उस वंश के माणिक्यराय द्वितीय नामक वीर ने मेवाड़ के दक्षिण पूर्व में अपना राज्य स्थापित किया और बम्बावदा को अपनी राजधानी बनाया। माणिक्यराय की छठीं पीढ़ी में हरराज या हाडाराव नामक एक बड़ा प्रतापी वीर उत्पन्न हुआ। हरराज या हाड़ाराव के नाम पर चौहानवंश की इस शाखा का नाम हाड़ावंश पड़ा है, जिसमें कोटा-बूँदी राज्यों का समावेश होता है।3

हाड़ा शब्द की व्युत्पत्ति


हाड़ौती शब्द ‘हाड़ा’ से बना है। हाड़ा शब्द की व्युत्पत्ति के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद रहा है। अभी तक इस सम्बन्ध में कोई सन्तोषप्रद मत प्रतिपन्न नहीं हो पाया है। अनेक किंवदन्तियाँ इस सम्बन्ध में प्रचलित हैं, परन्तु दो को अधिक आश्रय मिला है। उनमें से एक ‘‘अस्थि’’ शब्द से सम्बन्ध रखती है और दूसरी ‘‘हिडि’’ धातु से सम्बन्धित है। पहली अस्थि सम्बन्धित किंवदन्ती यह है कि बीसलदेव चौहान के पोते व अनुराग के बेटे इस्तपाल मुस्लिम शासक गजनी की सेना के साथ युद्ध करते हुए गंभीर रूप से घायल हो गए और उनकी तमाम हड्डी-पसली जर्जरित हो गई, उनके कटे हुए अंगों (हाड़ों) को एक स्थान पर एकत्रित किया गया। उस समय उनकी कुलदेवी ने आकर उन पर अमृत छिड़क दिया, जिससे वे पुनर्जीवित हो गये। इसी समय से उनके वंशजों को हाड़ा कहा जाने लगा।4

राजस्थान के हाड़ौती क्षेत्र में जल विरासत - 12वीं सदी से 18वीं सदी तक (Water heritage in Hadoti region of Rajasthan - 12th Century to 18th Century)

Author: 
अनुकृति उज्जैनियाँ
Source: 
इतिहास एवं भारतीय संस्कृति विभाग, समाज विज्ञान संकाय, वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान-304022, शोध-प्रबन्ध 2015

परिचय


जल विधाता की प्रथम सृष्टि है। विधाता ने सृष्टि की रचना करने से पहले जल बनाया फिर उसमें जीवन पैदा किया। मनुस्मृति कहती है ‘‘अप एवं सर्सजादो तासु बीज अवासृजन’’ जल में जीवन के बीज विधाता ने उगाये। जल प्रकृति का अलौकिक वरदान स्वरूप मानव, प्राणी तथा वनस्पति सभी के लिये अनिवार्य है।

आज सम्पूर्ण प्राणी जगत् जल का ही विकसित रूप माना जा सकता है। विश्व की सभी सभ्यताएँ नदियों के किनारे पनपी हैं, जल की अपार उपलब्धियों ने कृषि व व्यापार को विस्तार दिया है, जिससे सुविधा सम्पन्न सभ्यताएँ कला, संस्कृति एवं साहित्य से जुड़ गई, जिससे वह देश व राज्य सब तरह से सम्पन्न हो गया।

आज के इस विकसित युग में नवीन तकनीकों के विकास ने हमारी पुरातन जल-विरासत को नजरअन्दाज कर दिया है, जिस कारण प्राकृतिक प्रकोप, तापक्रम का बढ़ना, जलप्रदूषण, कुपोषण जैसे घातक प्रभाव अब हमारे सामने आने लगे हैं। वर्षा की अनिश्चितता एवं जल की कमी होने पर हमें बार-बार अपने परम्परागत तरीके याद आते हैं, परन्तु फिर भी हम उन्हें संरक्षित कर अपनाने का प्रयास नहीं कर पा रहे है। इन्ही सबका सूक्ष्म अध्ययन करने का प्रयास इस शोध में किया है। यह रिसर्च छः अध्यायों में विभाजित है।

अध्याय क्रम इस प्रकार हैं -
1 - हाड़ौती का भूगोल एवं इतिहास (Geography and history of Hadoti)
2 - हाड़ौती क्षेत्र में जल का इतिहास एवं महत्त्व ( History and significance of water in the Hadoti region)
3 - हाड़ौती क्षेत्र में जल के ऐतिहासिक स्रोत ( Historical sources of water in the Hadoti region)
4 - हाड़ौती के प्रमुख जल संसाधन ( Major water resources of Hadoti)
5 - हाड़ौती के जलाशय निर्माण एवं तकनीक ( Reservoir Construction & Techniques in the Hadoti region)
6 - उपसंहार

इटावा जनपद का जल संसाधन प्रबंधन (Water resources management of Etawah district)

Author: 
दुर्गेश सिंह
Source: 
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी से भूगोल विषय में पी.एच.डी. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध - 2008-09

लघु सिंचाई परियोजनायें :


जनपद इटावा में वृहद सिंचाई योजनाओं की अपेक्षा यदि लघु सिंचाई योजनाओं का विकास किया जाये, तो इससे इस जनपद के कृषकों का अधिक हित होगा। लघु सिंचाई योजनाओं के स्थापन से पारिस्थितिकी असंतुलन की समस्या भी उत्पन्न नहीं होगी।

नहर के निर्माण में अधिक भूमि का प्रयोग होता है। अधिक समय तथा अधिक लागत आती है, जबकि कुओं के निर्माण में अल्प भूमि के प्रयोग के साथ कम समय तथा कम लागत आती है। नहर सिंचाई में भूमि की उर्वरता का क्रमिक ह्रास होता है तथा कुओं की सिंचाई से भूमि की उर्वरता में वृद्धि होती है, क्योंकि कुओं के पानी में, सोडा, नाइट्रेट फ्लोराइड्स तथा सल्फेट के तत्व होते हैं। नहर की सिंचाई से क्षारीयता एवं जलाक्रांत की संभावना रहती है। कुओं से अल्प जलापूर्ति के कारण न क्षारीयता की संभावना है, न जलाक्रांत की। कुओं की सिंचाई प्राविधि सरल, सहज तथा सस्ती है। नहर पर शासन का स्वामित्व होने के कारण, सिंचाई के लिये शासकीय कर्मचारियों का मुखापेक्षी होना पड़ता है। आवश्यकता पड़ने पर, नहर का पानी समुचित मात्रा में उपलब्ध नहीं हो पाता। कुओं पर कृषकों का स्वामित्व रहता है। अत: वे आवश्यकतानुसार कुओं के पानी का उपयोग कभी भी कर सकते हैं।

जनपद के दक्षिणी भाग में दो प्रमुख नदियाँ यमुना एवं चंबल अवस्थित हैं, जिन्होंने लगभग अधिकांश क्षेत्र को खड्ड भूमि (बीहड़) में परिवर्तित कर दिया है। अत: इस भाग में नहर सिंचाई हेतु उपयुक्त धरातल उपलब्ध नहीं है। अर्थात नहर सिंचाई की संभावनायें न के समान हैं, ऐसी स्थिति में लघु सिंचाई संसाधनों का विकास आवश्यक है।

जनपद इटावा में इस समय निम्नलिखित लघु सिंचाई परियोजनायें प्रभावी ढंग से कार्य कर रही हैं।

(क) नलकूप सिंचाई परियोजना :

इटावा जनपद के जल संसाधन की समस्याएँ (Water Resource Problems of Etawah district)

Author: 
दुर्गेश सिंह
Source: 
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी से भूगोल विषय में पी.एच.डी. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध - 2008-09

जल संसाधन की समस्यायें
बाढ़ एवं जल जमाव :
बाढ़ :



‘‘Flood is a discharge which exceeds the natural channel capacity of a river and then spills on to the adjacent flood plain’’

नदियों की बाढ़ एक प्राकृतिक घटना है। बाढ़ से जनपद में चंबल, यमुना, क्वारी, सेंगर, अहनैया, पुरहा आदि नदियों के किनारों की भूमि डूब जाती है। कछारी क्षेत्र की फसलें नष्ट हो जाती हैं एवं यातायात अवरुद्ध हो जाता है। धन-जन की हानि होने से जनपद की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

सामान्यत: लगभग पाँच या दस वर्ष तक के अंतराल से जनपद की नदियों में बाढ़ आने का इतिहास है। सन 1996 की बाढ़ इतनी भयानक थी कि कानपुर से ग्वालियर राष्ट्रीय राजमार्ग बंद करना पड़ा था। चंबल नदी पर बने ‘बरई पुल’ एवं यमुना नदी पर बने इटावा पुल पर यातायात बंद कर दिया गया था। जनपद के लगभग सभी छोटे-छोटे पुल टूट गये थे। छोटे पुलों की निर्माण सामग्री तीव्र बहाव में बह गयी थी। इस वर्ष प्रभावित गाँवों की संख्या 154 थी। बहुत से गाँवों के संपर्क मार्ग जल में डूब जाने के कारण अनेक समस्यायें उत्पन्न हो गयीं। सरकार ने नौका आदि का प्रबंध किया, जो पर्याप्त नहीं था। बाढ़ से घिरे लोगों को 40000 हजार रुपये की खाद्य सामग्री डाली गयी। इस बाढ़ में 8 लोगों की मौत हो गयी। अनेक जानवर पानी के तेज बहाव के साथ बह गये। नदियों की तलहटी में बसे गाँवों के अंदर पानी भर गया जिसमें सैकड़ों घर पानी से डूब गये। कछारों में पानी भर जाने से फसल नष्ट हो गयी। बाद में बाढ़ पीड़ितों को भोजन वस्त्र एवं आवास व्यवस्था हेतु जिलाधीश इटावा द्वारा लगभग 11 लाख रुपये वितरित किये गये, जो पर्याप्त नहीं थे। जिलाधीश कार्यालय इटावा के एक अनुमान के अनुसार लगभग 20 लाख रुपये की खरीफ की फसलें नष्ट हो गयीं। 12 लाख रुपये के मकानों की एवं लगभग 50 हजार रुपये की पशुधन की हानि हुई। लगभग 5 लाख रुपयों के पुलों एवं सड़कों की क्षति हुई।

इटावा जनपद के जल संसाधन का कृष्येत्तर क्षेत्रों में उपयोग (Use of Water Resources in Agricultural Sectors of Etawah District)

Author: 
दुर्गेश सिंह
Source: 
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी से भूगोल विषय में पी.एच.डी. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध - 2008-09

पेयजल के क्षेत्र में :


स्वच्छ एवं पर्याप्त पेयजल की उपलब्धता स्वस्थ मानव और सभ्य समाज की न केवल आधारभूत आवश्यकता है, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति का मूलभूत अधिकार भी है। हमारे संविधान में पेयजल की आपूर्ति विषयक प्राविधान सातवीं अनुसूची के भाग-दो में देते हुए इसे राज्य सरकारों के दायित्वों के अंतर्गत राज्य का विषय रखा गया है। प्रत्येक जनपद की सीमा के अंतर्गत सभी शहरी एवं नगरीय बस्तियों में शुद्ध एवं पर्याप्त पेयजल व्यवस्था सुनिश्चित करना संबंधित राज्य सरकारों का दायित्व है तथा केंद्र सरकार राज्य सरकार द्वारा किये गये तत्संबंधी प्रयासों के लिये आर्थिक सहायता प्रदान करती है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सामान्यत: शहरी क्षेत्रों में पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करने हेतु व्यापक प्रयास किये गये, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों की ओर सरकार द्वारा यथोचित ध्यान देना बाद में प्रारंभ किया गया। अत: शहरी क्षेत्रों की तुलना में हमारे ग्रामीण क्षेत्र शुद्ध पेयजल की आपूर्ति में पिछड़े रहे हैं। पिछले दो तीन दशकों में ग्रामीण क्षेत्र में सभी ग्राम वासियों को पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिये विभिन्न पेयजल योजनाओं एवं कार्यक्रमों को प्रभावपूर्ण तरीकों से संचालित किया जा रहा है।

मनुष्य के पीने, खाना बनाने, स्नान करने, बर्तनों की सफाई एवं घर की धुलाई तथा शौच व्यवस्था आदि हेतु जल की आवश्यकता होती है। परिणामत: शुद्ध एवं स्वच्छ जल के स्रोत सदैव से मानव आकर्षण के केंद्र रहे हैं। घरेलू कार्यों में जल के उपयोग की मात्रा यद्यपि तुलनात्मक रूप से कम है, फिर भी जल के इस उपयोग का महत्त्व अत्यधिक है। जनपद के निवासी तम्बू, झोपड़ी, कच्चे पक्के छोटे बड़े मकान बनाकर जलस्रोतों के सहारे ग्राम तथा नगरों में निवास कर रहे हैं। इस क्षेत्र में परिवार के रहन-सहन का स्तर तथा ग्रामीण नगरीय बस्तियों के अनुसार जलापूर्ति प्रतिरूप में प्रर्याप्त भिन्नता मिलती है। जो निम्नांकित वर्णन से स्पष्ट है।

ग्रामीण बस्तियों में जल का उपयोग :

इटावा जनपद का लघु बाँध सिंचाई (Lower dam irrigation of Etawah district)

Author: 
दुर्गेश सिंह
Source: 
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी से भूगोल विषय में पी.एच.डी. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध - 2008-09

प्रकृति ने प्राकृतिक संसाधन के रूप में अनेक निधियाँ प्रदान की हैं। इन प्राकृतिक संसाधनों में जल सबसे बहुमूल्य है। पानी का प्रयोग प्राणीमात्र, मनुष्य, पशु, पक्षी, पेड़-पौधे, वनस्पतियाँ सभी करते हैं, इसीलिये जल को जीवन का आधार कहा गया है।

इटावा जनपद के अध्ययन क्षेत्र में कूप एवं नलकूप सिंचाई (Well and tubewell irrigation in the study area of Etawah district)

Author: 
दुर्गेश सिंह
Source: 
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी से भूगोल विषय में पी.एच.डी. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध - 2008-09

जल जीवन का आधार है। जल का सर्वाधिक उपभोग कृषि क्षेत्र में होता है। जो उसे कृत्रिम एवं प्राकृतिक साधनों द्वारा प्राप्त होता है। वर्षा के अभाव में कृत्रिम साधनों द्वारा खेतों को जल उपलब्ध कराया जाता रहा है। भाराीय वर्षा पूर्णत: मानसून से प्राप्त होती है, जो अनिश्चित, अनियमित तथा असामयिक होने के साथ-साथ विषम भी है। अत: कृषि के लिये सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। भारत में प्राचीन काल से ही सिंचाई के लिये कृत्रिम साधनों का प्रयोग होता आ रहा है। सिंचाई के लिये जल दो रूपों में प्राप्त होता है। धरातलीय जल तथा भूमिगत जल किंतु वायु की तरह जल यथेष्ठ मात्रा में उपलब्ध नहीं है। विभिन्न उपयोगों के लिये शुद्ध जल की आवश्यकता पड़ती है, जिसका प्रमुख स्रोत भूमिगत जल है। यह जलराशि धरातल के नीचे पाई जाती है। धरातलीय जल प्रवेश्य चट्टानों में निरंतर नीचे की ओर रिसता रहता है। वर्षा काल में जब धरातल पर जल की मात्रा बढ़ जाती है, जल का रिसाव भी बढ़ जाता है। इसके कारण बड़ी मात्रा में जल नीचे चला जाता है। फलत: भूमि के नीचे जल का स्तर ऊँचा हो जाता है। कूपों और नलकूपों के माध्यम से इस जल का उपयोग कर लेते हैं।

कूप एवं नलकूप ऐसे कृत्रिम साधन हैं, जिससे भूमिगत जल को बाहर निकाला जाता है। इस जल का उपयोग विभिन्न कार्यों में किया जाता है, जिनमें सिंचाई भी एक है। भारत में कूप एवं नलकूप सिंचाई के महत्त्वपूर्ण साधन हैं। वर्तमान समय में इन दोनों साधनों के सम्मिलित योगदान से 55.90 प्रतिशत भू-भाग सींचा जाता है, जबकि उत्तर प्रदेश में कूप एवं नलकूप 70.47 प्रतिशत क्षेत्र को सिंचन क्षमता उपलब्ध कराते हैं। कूप एवं नलकूप सिंचाई साधनों की अपनी अलग-अलग विशेषतायें हैं।

कूप


कूप भूमिगत जल निकालने का एक परंपरागत साधन है। इसका उपयोग प्राचीन काल से चला आ रहा है। भारत में कूपों की सहायता से कुल सिंचित भूमि के लगभग 22.47 प्रतिशत भाग में सिंचाई की जाती है। कुओं द्वारा वहीं सिंचाई की जाती है, जहाँ इनके निर्माण के लिये निम्न भौगोलिक दशाएँ अनुकूल हों।