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बस्तर जिले के औद्योगिक और घरेलू जल का पुन: चक्रण (Recycling of industrial and domestic water in Bastar district)

Author: 
कु. प्रीति चन्द्राकर
Source: 
भूगोल अध्ययनशाला पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (म.प्र.), शोध-प्रबंध 1997

घरेलू एवं औद्योगिक जल का पुन: चक्रण


जल के वर्तमान तरीकों से उपयोग के कारण भविष्य में जल की गम्भीर समस्या का संकट सामने है। जल में भौतिक एवं रासायनिक अवयवों के विद्यमान होने से जल प्रदूषित हो जाता है और मानव उपयोग में हानिकारक प्रभावों के कारण जल जन्य रोग होता है (त्रिवेदी, 280 -281)। त्रिवेदी ने जल प्रदूषकों का मानक तैयार किया है।

बस्तर जिले में इन मानकों के आधार पर किये गये विश्लेषण से जगदलपुर, किरंदुल एवं बचेली में जल प्रदूषक तत्व पाये गये हैं। जिले के इन अपशिष्ट प्रदूषक जल बहिर्स्राव निम्नलिखित रूप में है :

(1) घरेलू बहिर्स्राव : विभिन्न घरेलू कार्यों जैसे खाना पकाने, नहाने, धोने तथा अन्य सफाई कार्यों में विभिन्न पदार्थों का उपयोग होता है, जो अंतत: अपशिष्ट पदार्थों के रूप में घरेलू बहिर्स्राव के साथ बहा दिये जाते हैं। सामान्य मलिन जल से अधिक गंभीर जल प्रदूषण नहीं होता है। परंतु यदि उसमें कीटनाशी तथा प्रक्षालक पदार्थ भी सम्मिलित हो, तब हानि की संभावना बढ़ जाती है।

बस्तर जिले के 93 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्र 94635 किलो लीटर जल का उपयोग होता है। इसमें लगभग 20,000 किलो लीटर जल बह जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में अपशिष्ट जल की निकासी कम मात्रा में होती है। क्योंकि ग्रामीण लोग तालाबों का अधिकतर प्रयोग करते हैं। जिसके कारण घरेलू बहिर्स्राव कम होता है। अत: इसका पुन: उपयोग श्रमसाध्य एवं खर्चिला है।

बस्तर जिले में शहरी क्षेत्रों में 18460 किलो लीटर जल का उपयोग होता है। जिसका 3700 किलो लीटर जल व्यर्थ बह जाता है। इस अपशिष्ट जल में रासायनिक पदार्थों की मात्रा अधिक होती है। इस जल का उपचार करके जल का पुन: उपयोग किया जा सकता है।

बस्तर जिले के जल संसाधन समस्याएँ एवं समाधान (Water Resources Problems & Solutions of Bastar District)

Author: 
कु. प्रीति चन्द्राकर
Source: 
भूगोल अध्ययनशाला पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (म.प्र.), शोध-प्रबंध 1997

1. जल जनित रोग : रोगों के स्रोत, उनका स्थानिक वितरण एवं उनसे बचाव के उपाय
2. जल प्रदूषण : जल प्रदूषण के स्रोत, प्राकृतिक स्रोत, मानवीय स्रोत, प्रदूषण का स्थानिक स्वरूप, जल प्रदूषण की समस्याओं के निराकरण के उपाय

जल जनित रोग


जल जन्य रोग : जल संसाधन के अध्ययन में जल जनित रोगों का अध्ययन महत्त्वपूर्ण है। यह जल की गुणवत्ता एवं जल उपयोग के मनुष्य स्वास्थ्य के साथ प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित है। प्राय: जल में प्राप्त जैविक प्रदूषण जल में शक्य रोग जनक जैवों के अनुसंकुलन या परिवर्धन है। इसके कारण जल का प्रयोग संकटकारी हो गया है। इस प्रकार प्रदूषित जल से जल जनित रोगों का प्रसार होता है (रघुवंशी, 1989, 126)।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के सर्वेक्षण के अनुसार विश्व के 80 प्रतिशत से अधिक रोग दूषित जल के कारण होते हैं। बस्तर जिले में भोजन एवं दूषित जल से रोग होता है। प्रथम, दूषित जल के प्रत्यक्ष उपयोग से जल जन्य रोग जैसे : हैजा, आंत्रशोध, डायरिया, मियादी बुखार, इत्यादि होते हैं। द्वितीय, जल एक संक्रमणकारी तत्व के रूप में भी रोगों को जन्म देता है, जैसे - स्कर्वी, स्ट्राकोमा आदि। तृतीय संक्रमणकारी कुछ रोग जल में कुछ बड़े परोपजीवियों की उपस्थिति से होते हैं, जैसे कृमि संक्रमण के कारण होने वाली सिस्टोसोलियासिस रोग। यह रोग सिस्टोसोमय नामक चपटे सधरे पणीभ कृमियों के कारण होता है, जो संदूषित जल में पाये जाते हैं (बाघमार, 1988, 189)।

बस्तर जिले के जल का अन्य उपयोग (Other uses of water in Bastar District)

Author: 
कु. प्रीति चन्द्राकर
Source: 
भूगोल अध्ययनशाला पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (म.प्र.), शोध-प्रबंध 1997

1. मत्स्य उत्पादन, स्थानिक वितरण, उत्पादन की मांग प्रकार एवं समस्याएँ
2. परिवहन तथा मनोरंजन


जल के अन्य उपयोग


मत्स्य उत्पादन हेतु जल उपयोग : मत्स्य पालन जल संसाधन विकास का महत्त्वपूर्ण पहलू है। बस्तर जिले में मत्स्योद्योग विकसित हो रहा है। जिले के अंतर्गत आने वाले सभी जल संसाधनों, जलाशयों, नदियों, तालाबों आदि में मत्स्य - पालन होता है। बस्तर जिले में उपलब्ध जल - क्षेत्र के 12,010.114 हेक्टेयर में मत्स्य पालन होता है। इसमें 1246.474 टन मछली का उत्पादन होता है।

जिले की मुख्य नदियों की कुल लंबाई 644 किमी है। इनमें इंद्रावती 376 किमी महानदी 64 किमी, शबरी 180 किमी, गोदावरी 24 किमी लंबी है। इन नदियों में मछलियाँ कम पाई जाती है। बस्तर जिले में व्यापारिक मछलियाँ (रोहू, कतला, मोंगरी) का मुख्य रूप से पालन एवं उत्पादन किया जाता है। जिले में मत्स्य उत्पादन की इकाइयों को (तालिका क्र. 7) में दर्शाया गया है।

तालिका क्र. 7.1 बस्तर जिला मत्स्य-पालन जिले में सिंचाई विभाग द्वारा 5737.325 हेक्टेयर क्षेत्र में मत्स्य पालन किया जाता है। उसके बाद निजी एवं मुंडा क्षेत्र के 1354.880 हेक्टेयर क्षेत्र में और ग्राम पंचायत के अंतर्गत 339.742 हेक्टेयर जल क्षेत्र में मत्स्य उत्पादन किया जाता है। बस्तर जिले में मत्स्य पालन मुख्यत: जगदलपुर, दंतेवाड़ा, बीजापुर, कोंडागाँव, कांकेर, नारायणपुर परियोजनाओं में होता है।

बस्तर जिले के जल का घरेलू और औद्योगिक उपयोग (Domestic and Industrial uses of water in Bastar district)

Author: 
कु. प्रीति चन्द्राकर
Source: 
भूगोल अध्ययनशाला पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (म.प्र.), शोध-प्रबंध 1997

जल का घरेलू और औद्योगिक उपयोग, ग्रामीण तथा नगरीय जल प्रदाय, पेयजल योजना का विकास, जल पूर्ति के स्रोत, नदी, नाले, तालाब एवं नलकूप, जल की मात्रा तथा गुणवत्ता, जल शुद्धिकरण प्रक्रिया का विकास।

पानी पर सभी का जीवन आधारित है। यह मनुष्य के जीवन तथा स्वास्थ्य के लिये बहुत आवश्यक अवयव है। लोगों के लिये सुरक्षित पीने के पानी की आपूर्ति एक आधारभूत आवश्यकता है। प्रति व्यक्ति 150 से 200 लीटर प्रतिदिन जल आपूर्ति को पर्याप्त समझा जाता है। जल क उपयोग यद्यपि मौसम, रहन सहन के स्तर और मनुष्यों की आदतों पर निर्भर करता है। तथापि जल की ज्यादा मात्रा और गुणवत्ता होने से लोगों के स्वास्थ्य में वृद्धि होती है (पार्क, 1983, 143)। एक कहावत है - जल का अपव्यय न करो, अभाव नहीं होगा। हम जल का अभाव तब तक महसूस नहीं करते, जब तक कि कुआँ सूख न जाये। इसमें कोई शंका नहीं है कि जल की आवश्यकता सर्वाधिक है। प्रत्यक्षत: अक्षय होने की वजह से इसके उपयोग पर मानव प्रयास का मार्ग प्रशस्त हुआ है (गारलैंड, 1958, 203)।

जल का उपभोग, पीने, खाना पकाने, इत्यादि कार्यों में होता है, जिसके बिना मानव-सभ्यता नष्ट हो सकती है। जल की कमी होने की स्थिति में इस उपयोग को प्राथमिकता दिया जाता है।

अध्ययन क्षेत्र की जनसंख्या 22,71,314 है। यहाँ 3,715 गाँव हैं। जिले की जनसंख्या का 92.88 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्र में और 7.12 प्रतिशत शहरी क्षेत्र में निवास करती है। इस अध्याय का उद्देश्य पीने के पानी का उपयोग, ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों में इसके वितरण, पीने के पानी की गुणवत्ता और उन बीमारियों का आकलन करना है, जो जल प्रदूषण द्वारा उत्पन्न होती है।

शहरी क्षेत्र में जल आपूर्ति :


बस्तर जिले के शहरी क्षेत्र में जनसंख्या का केवल 7.12 प्रतिशत निवास करता है। जगदलपुर जिले का सबसे बड़ा शहर है। उसके बाद कोंडागाँव, कांकेर, किरंदुल एवं बचेली आते हैं।

बस्तर जिले का जल संसाधन उपयोग (Water Resources Utilization of Bastar District)

Author: 
कु. प्रीति चन्द्राकर
Source: 
भूगोल अध्ययनशाला पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (म.प्र.), शोध-प्रबंध 1997

सिंचाई - सिंचाई का विकास, सिंचाई का वितरण, सिंचाई के साधन, सिंचाई परियोजनाएँ, सिंचित फसलें, सिंचाई के लिये अंतर्भोम जल की उपयोगिता, सिंचाई की समस्याएँ।

जल संसाधन उपयोग


जल के उपयोग में कुछ विशिष्टताएँ होती हैं। प्राय: जल की उपलब्धता और समस्याएँ स्थानीय या क्षेत्रीय होती हैं। सामान्यत: कृषि क्षेत्र की आवश्यकता साफ जल द्वारा पूरी की जाती है। जल के विभिन्न उपयोग समय तथा स्थान विशेष के साथ बदलते हैं। किसी विशेष क्षेत्र में जल की उपयोगिता प्रबल होती है, जबकि कुछ क्षेत्रों में सहायक या महत्वहीन होती है। कई क्षेत्रों में जल की उपयोगिता एक-दूसरे का विरोध करती प्रतीत होती है। जैसे - घरेलू और सिंचाई, जबकि कुछ जल पूर्ति परिपूरक होती है, जैसे - प्रदूषण, बाढ़ की रोकथाम और मनोरंज (मोरे और रिआर्डन, 1969, 54) लेंडसबर्ग (1964, 123) ने शुद्ध जल के विविध उपयोगों को चार वर्गों तथा - जल निकास का उपयोग, बहाव उपयोग, स्थान पर उपयोग एवं नकारात्मक अथवा विपरीत उपयोग में बाँटा है।

बस्तर जिले में पहले प्रकार के जल उपयोग की प्रधानता है। यहाँ जल संसाधन का उपयोग मुख्यत: तीन कार्यों के लिये होता है - सिंचाई, औद्योगिक उपयोग एवं घरेलू जल आपूर्ति। जिले में सिंचाई और घरेलू उपयोग में जल संसाधन का सबसे अधिक उपयोग होता है।

सिंचाई : बस्तर जिले में बहुत कम, लगभग 37,993 हेक्टेयर भूमि विभिन्न साधनों से सिंचित है। यह संपूर्ण फसली क्षेत्र का केवल 4.30 प्रतिशत है। जबकि मध्य प्रदेश का औसत 13.7 प्रतिशत है।

बस्तर जिले का अंतर्भौम जल (Subsurface Water of Bastar District)

Author: 
कु. प्रीति चन्द्राकर
Source: 
भूगोल अध्ययनशाला पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (म.प्र.), शोध-प्रबंध 1997

अंतर्भौम जल : अंतर्भौम जल का स्थानिक प्रतिरूप, विशिष्ट प्राप्ति पारगम्यता, अंतर्भौम जलस्तर की सार्थकता, अंतर्भौम जल की मानसून के पूर्व पश्चात गहराई, अंतर्भौम जल की सममान रेखाएँ, अंतर्भौम जल का पुन: पूर्ण एवं विसर्जन।

भू-गर्भ जल


वर्षाजल का कुछ भाग मिट्टी के छिद्रों से रिसकर गुरुत्वाकर्षण के बल से नीचे चला जाता है, जिससे भूमिगत जल बनता है। यह जल भूमि के अंदर किसी अप्रवेश्य स्तर से मिलने तक नीचे रिसता रहता है और उसके पश्चात पार्श्वीय दिशा में आगे बढ़ता है। मिट्टी का वह भाग जिसके बीच में से भूमिगत जल का प्रवाह चल रहा हो। संतृप्त कटिबंध कहलाता है और इस कटिबंध के पृष्ट भाग को भूमिगत जल तल कहते हैं।

भूगर्भीय संरचना एवं प्रकृति भू-गर्भ जल की उत्पत्ति तथा वितरण का प्रमुख तत्व है। भू-गर्भ जल प्राचीन चट्टानों से नवीनतम चट्टानी संरचना में विद्यमान रहता है। नवीनतम चट्टानी संरचना में प्राचीन चट्टानी संरचना की तुलना में अधिक जल-धारण क्षमता होती है। भू-गर्भ जल उपलब्धता मुख्यत: चट्टानी कणों की विभिन्नता, उनका परस्पर संगठन चट्टानों की सरंध्रता एवं जलवहन क्षमता पर निर्भर है।

बस्तर जिले के विभिन्न जल प्रक्षेप की प्रमुख चट्टानी संरचना एवं उनकी विशेषताएँ भिन्न-भिन्न हैं। जिले की चट्टानी संरचनाओं में जल धारण संरचनाएँ निम्नलिखित हैं।

(1) लेटेराइट लौह अयस्क : यह अवसादी नूतन चट्टान हैं। यह चट्टान जिले के मध्य में बैलाडीला एवं भानुप्रतापपुर के मध्य में पहाड़ी क्षेत्र में पाया जाता है। इन चट्टानों में कई परतें एक दूसरे के ऊपर सटी रहती है। इन चट्टानों में जोड़ तथा संधियाँ पायी जाती हैं। इन संधियों में अपरदित सतह ही भू-गर्भ जल उपलब्धता को सुगम बनाते हैं। अपक्षयित चट्टान की अपरदित सतह की गहराई 25 से 35 मीटर तक है।

बस्तर जिले का धरातलीय जल (Ground Water of Bastar District)

Author: 
कु. प्रीति चन्द्राकर
Source: 
भूगोल अध्ययनशाला पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (म.प्र.), शोध-प्रबंध 1997

धरातलीय जल : अपवाह तंत्र, जलप्रवाह, वाष्पोत्सर्जन, जलप्रवाह, सतही जल, तालाब, नदी, नालों के जल का मूल्यांकन, तालाबों की संग्रहण क्षमता, जल की गुणवत्ता।

धरातलीय जल


जल जीवन के लिये अपरिहार्य है। जल के बिना जीवन की कल्पना संभव नहीं है। इसलिये जल संसाधनों का सही आकलन, त्वरित गति से विकास, समुचित उपयोग एवं एकरूपता के लिये विभिन्न माध्यमों से किए जा रहे प्रयासों में परस्पर समन्वय हेतु समग्र दृष्टि से विश्लेषण आवश्यक है।

जल धाराओं का जल ही सतही जलपूर्ति के रूप में सामान्यत: उपलब्ध जल है। बस्तर जिला मुख्यत: इंद्रावती-गोदावरी एवं महानदी द्वारा अपवाहित है। तर्री, हटकुल एवं दूध, महानदी प्रक्रम की प्रमुख नदियाँ हैं। जिले की कुल सतही जल उपलब्धता का 5.58 प्रतिशत जल (1026 लाख घन मीटर) 2,660 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत महानदी क्रम की नदियों द्वारा संग्रहित किया जाता है। गोदावरी क्रम की इंद्रावती एवं सबरी नदी जिले के पश्चिमी भाग एवं दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र में अपवाह का स्वरूप निर्मित करती है। इंद्रावती नदी जिले की कुल सतही जल उपलब्धता का 69.20 प्रतिशत जल (12,710 लाख घन मीटर) 26,560 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में संग्रहित करती है। सबरी नदी जिले के कुल सतही जल उपलब्धता का 14.33 प्रतिशत जल (2,632 लाघ घन मीटर) 5,700 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र से संग्रहित करती है। निम्न गोदावरी नदी जिले के कुल सतही जल उपलब्धता का 10.87 प्रतिशत जल (1,997 लाख घन मीटर) 4,260 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र से संग्रहित करती है।

जिले में सतही जल की कुल आवक 18,365 लाख घन मीटर वार्षिक है, जो 39,180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र से संग्रहित होती है। जिले में इन नदियों की लंबाई 640 किलोमीटर है, जिनके जल संग्रहण क्षेत्र एवं उपलब्ध जलराशि का विवरण तालिका क्र. 3.1 में दर्शाया गया है।

बस्तर जिले की जल संसाधन का मूल्यांकन (Water resources evaluation of Bastar)

Author: 
कु. प्रीति चन्द्राकर
Source: 
भूगोल अध्ययनशाला पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (म.प्र.), शोध-प्रबंध 1997

वर्षा : वर्षा का वितरण, वार्षिक वितरण, मासिक वितरण, वर्षा के दिन, वर्षा की तीव्रता, वर्षा की परिवर्तनशीलता, वर्षा की प्रवृत्ति एवं वर्षा की संभाव्यता।

वाष्पन क्षमता : मिट्टी में नमी एवं उसका उपयोग, नमी, जल अल्पता (जलाभाव), जलाधिक्य, सूखा (अनावृष्टि), जलवायु विस्थापन

जल संसाधन का मूल्यांकन


वर्षा : प्राकृतिक जल का बहाव एवं वाष्पोत्सर्जन की पूर्ति वर्षा द्वारा होती है। जल संसाधन संभाव्यता, विकास एवं उपयोग की दृष्टि से वर्षा की विचलनशीलता गहनता और प्रादेशिक व्यवस्था के लिये इसका विस्तृत ज्ञान आवश्यक है।

बस्तर जिले में 95 प्रतिशत वार्षिक वर्षा दक्षिण-पश्चिमी मानसून के द्वारा जून से सितंबर के मध्य प्राप्त होती है। बस्तर जिले की औसत वार्षिक वर्षा 1,371 मिमी है। जिसके वितरण में स्थानिक विशेषताएँ विद्यमान है। जिले में जहाँ जून में मानसून का प्रारंभ एकाएक होता है, वहीं अक्टूबर के मध्य तक इसका निवर्तन हो जाता है।

बस्तर जिले की भौगोलिक पृष्ठभूमि (Geography of Bastar district)

Author: 
कु. प्रीति चन्द्राकर
Source: 
भूगोल अध्ययनशाला पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (म.प्र.), शोध-प्रबंध 1997

भौतिक पृष्ठभूमि :


स्थिति एवं विस्तार, भू-वैज्ञानिक संरचना, धरातलीय स्वरूप, मिट्टी, अपवाह, जलवायु, वनस्पति।

सांस्कृतिक पृष्ठभूमि :

जनसंख्या
जनसंख्या का वितरण, घनत्व, जनसंख्या का विकास, आयु एवं लिंग संरचना, व्यावसायिक संरचना, अर्थव्यवस्था, भूमि उपयोग, कृषि तथा पशुपालन, खनिज परिवहन तथा व्यापार।

भौगोलिक पृष्ठभूमि


स्थिति एवं विस्तार :
बस्तर जिला भारत के मध्य प्रदेश राज्य के दक्षिण-पूर्व में स्थित है। बस्तर जिला पूर्व में उड़ीसा, पश्चिम में महाराष्ट्र, दक्षिण में आंध्र प्रदेश एवं उत्तर में रायपुर तथा दुर्ग जिले द्वारा सीमांकित है।

बस्तर जिला दण्डकारण्य पठार का उत्तरी हिस्सा है। इस जिले से पूर्वी समुद्र तट की दूरी लगभग 200 किमी है। बस्तर का अधिकांश क्षेत्र पठारी है। इसका विस्तार 170-46’ उत्तरी अक्षांश से 20 0-35’ उत्तरी अक्षांश तक तथा 800-15’ पूर्वी देशांतर से 820-15’ पूर्वी देशांतर तक है। बस्तर जिले की उत्तर दक्षिण लंबाई लगभग 288 किमी तथा पूर्व-पश्चिम चौड़ाई 200 किमी है। इसका क्षेत्रफल 39,144 वर्ग किमी है। क्षेत्रफल की दृष्टि से यह जिला भारत के केरल, मणिपुर, मेघालय, जैसे राज्यों से तथा बेल्जियम, फिलीपींस और इजराइल जैसे देशों से भी बड़ा है।

जिले की समुद्र सतह से सबसे कम ऊँचाई कोंटा (278.37 मीटर) तथा अधिक ऊँचाई बैलाडीला (848 मीटर) की है। बस्तर जिला प्रशासनिक दृष्टि से 13 तहसीलों और 32 विकासखंडों में विभाजित है। बस्तर जिले में कुल 3,715 ग्राम 4 नगर और 3 नगरपालिका क्षेत्र है। जगदलपुर बस्तर जिले का सबसे बड़ा नगर है, जो जिला मुख्यालय है। इसके अतिरिक्त कांकेर, किरंदुल और कोण्डागाँव अन्य नगर हैं। जगदलपुर, कांकेर और कोण्डागाँव नगरपालिका क्षेत्र है। बस्तर जिले में सात एकीकृत आदिवासी विकास परियोजनाएँ -

1. कांकेर तथा भानुप्रतापपुर
2. कोंडागाँव
3. जगदलपुर
4. दंतेवाड़ा
5. सुकमा