नमामि गंगे ऐसे में कैसे निर्मल हो पाएगी गंगा

Author: 
केदार दत्त
Source: 
दैनिक जागरण, 10 मई 2018

ऋषिकेश में गंगा नदी में गिरता नालाऋषिकेश में गंगा नदी में गिरता नालाराष्ट्रीय नदी गंगा को स्वच्छ और निर्मल बनाने के लिये नमामि गंगे परियोजना को लेकर केन्द्र सरकार भले ही सक्रिय हो, लेकिन उत्तराखण्ड में धरातल पर वह गम्भीरता नहीं दिखती, जिसकी दरकार है। गंगा के मायके गोमुख से हरिद्वार तक ऐसी तस्वीर नुमायां होेती है।

2503 किमी के इस फासले में चिन्हित 135 नालों में से अभी 65 टैप होने बाकी हैं, जबकि इस क्षेत्र के शहरों, कस्बों से रोजाना निकलने वाले 146 एमएलडी (मिलियन लीटर डेली) सीवरेज में से 65 एमएलडी का निस्तारण चुनौती बना है। उस पर सिस्टम की ‘चुस्ती’ देखिए की जिन नालों को टैप किये जाने का दावा है, उनकी गन्दगी अभी भी गंगा मे गिर रही है. उत्तरकाशी, देवप्रयाग, श्रीनगर इसके उदाहरण हैं। इन क्षेत्रों में टैप किये गए नाले अभी भी गंगा में गिर रहे हैं तो जगह-जगह ऐसे तमाम नाले हैं, जिन पर अफसरों की नजर नहीं जा रही।

थोड़ा अतीत में झाँके तो गंगा की स्वच्छता को लेकर 1985 से शुरू हुए गंगा एक्शन प्लान के तहत उत्तराखण्ड मे भी कसरत हुई। तब गोमुख से हरिद्वार तक 70 माले टैप करने की कवायद हुई और यह कार्य पूर्ण भी हो गया।

इस बीच 2015 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में मामला पहुँचा तो ट्रिब्यूनल ने सभी नालों को गंगा में जाने से रोकने को कदम उठाने के निर्देश दिये। इस बीच केन्द्र की मौजूदा सरकार ने गंगा स्वच्छता पर ध्यान केन्द्रित किया और 2016 में अस्तित्व मे आई नमामि गंगे परियोजना।

गंगोत्री धाम में स्नान घाटों की नहीं सुधरी हालत

Author: 
शिव सिंह थलवाल
Source: 
राष्ट्रीय सहारा, 18 अप्रैल, 2018

गंगोत्री धाम के स्नान घाट वर्ष 2012 और 2013 में आई आपदा में क्षतिग्रस्त हो गये थे। इससे पहले भी यह घाट काफी असुरक्षित रहा है। कई तीर्थयात्री यहाँ पर गंगा स्नान करते समय बहकर जान भी गँवा चुके हैं। आपदा के कारण इन घाटों की स्थिति और बदतर हो गई। गंगोत्री स्नान घाट का निर्माण नमामि गंगे परियोजना मद से होना था, लेकिन सिंचाई विभाग की ओर से घाटों के निर्माण के लिये तैयार की गई डीपीआर को स्वीकृति नहीं मिली है।

सूख गईं नदियाँ, रह गईं तो बस कहानियाँ


दम तोड़तीं नदियाँदम तोड़तीं नदियाँगर्मी ने दस्तक दिया नहीं कि जल संकट की खबरें आम हो जाती हैं। पर मध्य-प्रदेश के सतपुड़ा व अन्य इलाकों की स्थिति कुछ अलग है। यहाँ पानी की किल्लत मौसमी न रहकर स्थायी हो गई है। ज्यादातर नदियां सूख गई हैं। नरसिंहपुर और होशंगाबाद जिले की, सींगरी, बारूरेवा, शक्कर, दुधी, ओल, आंजन, कोरनी, मछवासा जैसी नदियां पूरी तरह सूख गई हैं। इनमें से ज्यादातर बारहमासी नदियां थीं। पीने के पानी से लेकर फसलों के लिए भी पानी का संकट बढ़ गया है।

एक खो गई नदी की तलाश

Author: 
दिनेश श्रीनेत

जलालपुर में सूखी सई नदीजलालपुर में सूखी सई नदीनदी की पहली स्मृतियों में ट्रेन की खिड़की से झाँकता धुँधलका कौंधता हैं। बचपन में पुल से गुजरती ट्रेन की धड़-धड़ सुनते ही हम उचककर खिड़की से झाँकते। लगता था ऊपर से लोहे के भारी-भरकम पिलर्स गिर रहे हैं। उनके गिरने की लयबद्ध आवाज आ रही है। हमारी ट्रेन भी उतनी ही तेजी से भाग रही होती थी।

सिंधु-गंगा मैदानी क्षेत्र में वायुमंडलीय एरोसोल की प्रवृत्ति और उनके सम्भावित प्रभाव

Author: 
मनीष कुमार एवं तीर्थकर बनर्जी
Source: 
विज्ञान गंगा, पर्यावरण एवं धारणीय विकास संस्थान, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी-221005

सिंधु-गंगा मैदानी क्षेत्र में वायुमंडलीय एरोसोल की प्रवृत्ति और उनके सम्भावित प्रभाव


जलवायु परिवर्तन 21वीं सदी की सबसे अहम चुनौती के रूप में उभर कर सामने आया है। पृथ्वी के बढ़ते हुए तापमान और कई महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक प्रक्रियाओं में बदलाव को वैश्विक स्तर पर काफी गम्भीरता से लिया जा रहा है।

विभिन्न मानवीय गतिविधियों से वायु प्रदूषण के स्तर में काफी वृद्धि हुई है और यह जलवायु परिवर्तन का एक प्रबल स्रोत है। वायुमंडलीय प्रदूषण में मुख्यतया ग्रीन हाउस गैसें तथा कुछ और हानिकारक गैसों के प्रभावों पर काफी शोध और अध्ययन हो रहे हैं। हाल के कुछ वर्षों में गैसों के अतिरिक्त वायुमंडल में विद्यमान एरोसोल भी वैज्ञानिक जगत का ध्यान आकर्षित किये हैं।

पृथ्वी के ऊर्जा बजट और कई अन्य जलवायु प्रक्रियाओं में महत्त्वपूर्ण योगदान देने में सक्षम एरोसोल अपने अनेक नकारात्मक विशेषताओं की वजह से भी शोध का मुख्य केन्द्र बनते जा रहे हैं। सिंधु गंगा मैदानी क्षेत्र में ऐरोसोल की भारी उपलब्धता और विविधता इस क्षेत्र में इनकी उपस्थिति के महत्त्व को बढ़ा देती हैं।

कृषि, बायोमास दहन, वाहनों से होने वाले उत्सर्जन और औद्योगीकरण से इस क्षेत्र में एरोसोल की बढ़ती मात्रा और उनके स्पष्ट प्रभाव सामने आ रहे हैं। परन्तु जलवायु परिवर्तन में इनके योगदान पर अनिश्चितता बनी हुई है। वैश्विक जल चक्र, कृषि उत्पादन तथा मानव स्वास्थ्य पर एरोसोल का प्रभाव एक चिंता का विषय है।

एरोसोल उत्सर्जन की रोकथाम के लिये नवीन तथा उन्नत तकनीक का इस्तेमाल करना समय की आवश्यकता है। संपोष्य विकास की संकल्पना को पूरा करने के लिये ऐरोसोल उत्सर्जन की रोकथाम वैज्ञानिकों और नीति निर्देशकों के लिये एक चुनौती भरा विषय है जिसके सक्रिय कार्यान्वयन की आवश्यकता है।

एरोसोल क्या है?

हाइड्रो प्रोजेक्ट्स के ई-फ्लो का होगा अध्ययन

Source: 
अमर उजाला, 29 मार्च, 2018

प्रदेश में अप्रैल-मई माह के दौरान बिजली का उत्पादन कम हो सकता है। वजह यह है कि इस साल सर्दियों में बारिश और बर्फबारी कम हुई है। इस वजह से नदियों में पानी का प्रवाह कम होने की सम्भावना जताई जा रही है, जिसका विद्युत उत्पादन पर विपरीत असर पड़ सकता है।

संकट में चित्रकूट की लाइफ लाइन मन्दाकिनी

Author: 
जीतेन्द्र कुमार गुप्ता

मन्दाकिनी नदीमन्दाकिनी नदीजब से मानव सभ्यता का विकास हुआ है तब से हम पानी को जानते व समझते आए हैं ऐसा माना जाता है कि मानव सभ्यता का विकास नदियों के किनारे ही हुआ है तथा पला-बढ़ा विकसित हुआ है। इस तथ्य से जल व नदियों की महत्ता का अन्दाजा लगाया जा सकता है।

विश्व के अधिकतर प्रमुख शहर नदियों के किनारे ही बसे हैं क्योंकि नदियों से जीवन दायक जल तो मिलता ही है साथ ही यात्रा मार्ग तथा आजीविका के साधन भी उपलब्ध होते हैं पर अब इंसानी विकास की आँधी ने प्राकृतिक जलस्रोतों व नदियों के अस्तित्व को खतरे में लाकर खड़ा कर दिया है।

इसी स्थिति में बुन्देलखण्ड क्षेत्र के चित्रकूट में बहने वाली मन्दाकिनी नदी अब संकटमय स्थिति में नजर आ रही है। चित्रकूट से 15 किमी. दूर सती अनुसुइया से निकलने वाली यह नदी चित्रकूट, कर्वी से होते हुए बाँदा के राजापुर गाँव के पास यमुना में विलय हो जाती है। लगभग इस 50 किमी. के सफर में मन्दाकिनी कहीं नाले में तब्दील दिखाई देती है तो कहीं बिल्कुल सूखी हुई नजर आती है।

पहले यह नदी सदानीरा रही है और इसके 2003 की बाढ़ के रौद्र रूप के किस्से दूर-दूर तक फैले हुए हैं पर अब यह नदी नाले के रूप में सिकुड़ चुकी है। पूरे चित्रकट का लगभग 70% पीने का पानी इसी सप्लाई होता है। पर इसकी हालत को देखते हुए अब यह कितने दिन तक यह लोंगों की प्यास बुझाएगी कहा नहीं जा सकता। दिनों-दिन नदी के कैचमेंट एरिया में नयी-नयी इमारतें बनती नजर आती हैं जिससे इसके बहाव में तो फर्क आता ही है साथ ही नदी के पारिस्थितिकी में भी बदलाव आ रहा है और बड़ी बात यह है कि यह सब मानव स्वार्थ का ही उदाहरण है।

नदी का पौराणिक महत्त्व

नए भागीरथ चाहिए

Author: 
डॉ. पंकज श्रीवास्तव
Source: 
नर्मदा के प्राण हैं वन, नर्मदा संरक्षण पहल - 2017

कुछ देशों के नागरिकों की जीवन पद्धति एवं प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग का स्तर इतना बढ़ गया है कि जल्दी ही हमको यह धरती छोटी पड़ने लगेगी। इन संस्थाओं द्वारा प्रस्तुत किये गए एक रोचक किन्तु चौंकाने वाले आकलन के अनुसार विश्व के कई सम्पन्न देशों द्वारा धरती पर डाला जा रहा दबाव जिसे पारिस्थितिक पदचिन्ह कहा गया है, इतना अधिक है कि हमें एक से अधिक धरतियों की आवश्यकता पड़ने वाली है। नदियों के साथ जुड़ी अनेक पौराणिक-ऐतिहासिक कथाओं और किंवदन्तियों से यह पता चलता है कि धरती पर नदियों के अवतरण और विलुप्त होने में मानव की भी बड़ी भूमिका रही है। गंगा नदी के अवतरण में राजा भागीरथ की कठिन तपस्या और भगवान शिव की जटाओं में गंगा का उतरना प्रतीकात्मक रूप से यही सिद्ध करता है कि पर्वतों के वनों की, नदियों के उद्गम क्षेत्र में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि आज भी नदियों के पुनरुद्धार के लिये भागीरथ जैसी लगन और तपस्या की आवश्यकता है। यदि हमें नदियों को जीवन्त और सक्रिय बनाए रखना है तो वास्तव में हमें जगह-जगह ऐसे लोगों की आवश्यकता पड़ेगी, जो नदियों के इन कामों को भागीरथ जैसी लगन से अंजाम दे सकें।

यदि पर्यावरण की निःशब्द चीत्कारों की तरंगें हमारे हृदय और मानस को समय रहते झंकृत कर सकें तो अभी भी इतनी देर नहीं हुई है कि वापस लौटा ही न जा सके। परन्तु यह काम अब आसान नहीं रह गया है। विकास के नाम पर प्रकृति की ताकतों के साथ किया जा रहा दुस्साहसपूर्ण खिलवाड़ अनन्त काल तक निर्बाध नहीं चल सकता क्योंकि अब धरती के अनेक पारिस्थितिक तंत्रों का दम निकला जा रहा है।

नर्मदा अंचल के वन एवं वन्य जैवविविधता

Author: 
डॉ. पंकज श्रीवास्तव
Source: 
नर्मदा के प्राण हैं वन, नर्मदा संरक्षण पहल - 2017

नर्मदा नदीनर्मदा नदीनर्मदा अंचल के वनों और नदियों के प्रवाह के बीच नाजुक रिश्ते के बारे में जानकारी दे चुकने के बाद नर्मदा अंचल के वनों और वन्य जैव विविधता के बारे में संक्षिप्त जानकारी देना प्रासंगिक होगा। यहाँ कैसे जंगल हैं और उनमें वन्य जैवविविधता कैसी है इसी विषय पर संक्षिप्त जानकारी आगे दी गई है। प्राचीन भारतीय साहित्य में नर्मदा को बड़ा महत्त्व दिया गया है। कूर्म पुराण, मत्स्य पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, वामन पुराण, नारद पुराण तथा भागवत पुराण आदि में नर्मदा के बारे में विवरण के साथ ही इसके अंचल में पाये जाने वाले वनों की शोभा भी बखानी गई है।