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गंगा-करनाली-घाघरा नदी घाटी में अन्तरराष्ट्रीय जल प्रबंधन हेतु सहभागितापूर्ण दृष्टिकोण

Author: 
अब्राहम सैमुएल और के जे जॉय
Source: 
'ट्रान्स्बाउंडरी रिवर ट्रीटिस', वाटरएड और फ्रेशवाटर एक्शन नेटवर्क साउथ एशिया (फैनसा)

परिचय


Fig 1 Ganga-Karnali-Ghaghara River Basin विश्व की लगभग 60 प्रतिशत मीठे जल की धाराएँ 263 अन्तरराष्ट्रीय नदी घाटियों से होकर बहती हैं, इनका फैलाव पृथ्वी की लगभग आधी भू-सतह और लगभग 40 प्रतिशत आबादी के बीच है। दक्षिण एशिया में, सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी प्रमुख नदी घाटियों का प्रवाह बांग्लादेश, भूटान, चीन, भारत, नेपाल और पाकिस्तान के बीच बँटता है। इन घाटियों में ऐसे करोड़ों लोगों का आवास है, जो स्थायी विकास के आर्थिक और सामाजिक दोनों संकेतकों के स्तर पर कमजोर हैं। इन नदियों के साझा उपयोग की वजह से अक्सर पड़ोसी देशों के बीच संघर्ष की स्थिति बन आती है। उनके बीच की मौजूदा सत्ता असमानता और क्षेत्र की भू-राजनीति अक्सर कमजोर जल सम्बन्ध और एकतरफा निर्णय को बढ़ावा देती है। ऐसी संधियाँ और समझौते अक्सर राष्ट्रवादी बहस से भी प्रभावित होते हैं, इन संधियों में किसी गैर-सरकारी भागीदारों, विशेष रूप से प्रभावित समुदायों के लोगों को शामिल नहीं किया जाता।

हाल के दिनों में यह समझ तेजी से विकसित हुई है कि ऐसे जल संसाधन जो सभी देशों में बाँटे जाएँ या साझा किये गए हों, उन्हें विभिन्न हितधारकों की भागीदारी के साथ एकीकृत तरीके से प्रबन्धित किया जाना चाहिए, गंगा-करनाली-घाघरा बेसिन के बारे में यह चर्चा पत्र जो 'नेपाल और भारत' और 'भारत और बांग्लादेश' के द्वारा साझा किया गया है, समुदाय के स्थानीय जल सुरक्षा के मसलों को शामिल कर घाटी के प्रबन्धन को अधिक न्यायसंगत और सहभागी बनाने का मार्ग प्रदान करता है।

गंगा-करनाली-घाघरा बेसिन

बीहड़ भूमि का समतलीकरण - खतरा या अवसर (Leveling the Chambal Ravines - Right or Wrong)

Author: 
पद्मिनी पाणि
Source: 
डाउन टू अर्थ, सितम्बर, 2017

चम्बल नदी घाटी का लगभग 4,800 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र इस बीहड़ के अन्तर्गत आता है जिसका विकास मुख्य रूप से चम्बल नदी के दोनों किनारों पर हुआ है, जो इस इलाके की जीवनरेखा है। चम्बल के किनारे पर घाटी का गठन काफी सघन है जिसका 5 से 6 किमी का क्षेत्र गहरे नालों के जाल से बँटा हुआ है। कई छोटे और बड़े नाले अन्ततः नदी में मिलकर नदी प्रणाली में गाद को काफी बढ़ा देते हैं। पानी के प्रवाह के कारण उत्पन्न गाद को इस घाटी प्रभावित क्षेत्र की एक प्रमुख संचालक शक्ति माना जाता है। भूमि ह्रास दुनिया के कई हिस्सों में एक गम्भीर पर्यावरणीय चुनौती का रूप ले चुका है। घाटी, भूमि ह्रास का ही एक रूप है जो भूमि के अत्यधिक विच्छेदित भागों का निर्माण करती है। घाटी बनने का प्रमुख कारण पानी का तेज बहाव है जो मुख्य रूप से प्राकृतिक प्रक्रिया है, किन्तु मनुष्य की गतिविधियों के कारण इसकी तीव्रता बढ़ सकती है। वैश्विक अनुमान के अनुसार कुल ह्रास क्षेत्र न्यूनतम 100 करोड़ हेक्टेयर से लेकर अधिकतम 6 अरब हेक्टेयर हो सकता है, जिसके स्थान सम्बन्धी वितरण में भी इतना ही अन्तर है। कृषि-आधारित देशों में भूमि ह्रास का विकास और कल्याण पर काफी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

हमें करना होगा नदियों के प्रवाह का सम्मान

Author: 
अतुल कनक
Source: 
राजस्थान पत्रिका, 02 अगस्त, 2017

विकास के प्रतिमानों को स्पर्श करने के लिये बाँधों की निर्माण की आवश्यकता को अनदेखा नहीं किया जा सकता। लेकिन नदियों के जलस्तर में गिरावट के कारण उनके प्रवाह क्षेत्र में हो रहे अनावश्यक निर्माणों पर रोक लगाई जानी चाहिए थी। बस्तियाँ और बाजार नदियों के मुहाने तक ही नहीं चले गए बल्कि उनके पेटे में भी उतर गए। अब ऐसे में नदियों को प्रकृति जब कभी अपनी पूरी स्वच्छन्दता के साथ बहने का अवसर देती है, किनारे बसी बस्तियों में हाहाकार मच जाता है। सामान्य बरसात में भी देश के विभिन्न हिस्सों में नदियों ने रौद्र रूप धारण कर लिया है। इस कारण हजारों लोगों को सुरक्षित ठिकाने की तलाश में अपना घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। पश्चिमी राजस्थान को रेगिस्तानी प्रदेश के तौर पर पहचाना जाता है, लेकिन वहाँ भी एक बड़े हिस्से में बाढ़ के हालात हैं।

सवाल यह है कि प्रकृति कुपित है या विकास के नाम पर हमने ही कुछ ऐसा कर लिया है कि बादल सामान्य से अधिक पानी बरसाने लगे। सामान्य बारिश भी आसमान से गिरती आफत प्रतीत होने लगती है। इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिये विकास के नाम पर नदियों के साथ हुए बर्ताव को समझना आवश्यक है।

वर्तमान में देश के कई हिस्सों में बरसात हो रही है, लेकिन अधिकांश जगहों पर इस स्थिति से निबटने की तैयारी ही नहीं थी। नदियों पर बड़े-बड़े बाँध बना लेने के बाद हमने यह मान लिया है कि हर स्थिति में पानी की आवक की मात्रा पर नियंत्रण पाया जा सकता है।

गाद का साध

Source: 
डाउन टू अर्थ, जुलाई, 2017

. नदी केवल बहता पानी नहीं है। गाद इसका अविभाज्य अंग है। गंगा और डॉल्फिन पर काफी शोध कर चुके जीव विज्ञानी रविन्द्र कुमार सिन्हा कहते हैं, “गाद के बिना तो नदियाँ मर जाएँगी। गाद नहीं होगी तो जैवविविधता भी नहीं होगी।” गाद और रेत से बने टापुओं पर कई तरह के पक्षी और जलीय जीव रहते हैं। मछलियाँ जब धारा के विपरीत चलती हैं तो जरूरत पड़ने पर इन टापुओं के पीछे आकर रुकती हैं और यहाँ जमा सड़े जैविक पदार्थों को खाती हैं। गाद अपने साथ पोषक तत्वों को भी एक जगह से दूसरी जगह ले जाती है। रेत पानी को सोखकर सुरक्षित रखता है। कंकड़ पानी के प्रवाह में हलचल पैदा कर उसमें ऑक्सीजन घोलते हैं। अतः मछलियों के अंडे देने के लिये उपयुक्त जगह बनाते हैं। गाद जब बाढ़ के पानी के साथ आस-पास के इलाके में फैलती है, तो उसमें निहित उर्वरक तत्व जमीन को उपजाऊ बनाते हैं।

गाद समस्या तब बन जाती है जब यह बह या फैल नहीं पाती और नदी के पेट में जमा होने लगती है, पर बड़े स्तर पर गाद को नदी से निकालना न तो आसान है और न ही वांछनीय। अव्वल तो इतनी सारी गाद निकालने के लिये बड़ी मात्रा में संसाधन जुटाने होंगे और अगर निकाल भी ली जाये तो किसी के पास कोई पुख्ता उपाय नहीं है कि इसे डालेंगे कहाँ। नदी विशेषज्ञ कलायन रुद्र के अनुसार, केवल फरक्का के पीछे जमी गाद निकालने के लिये जितने ट्रकों की जरूरत होगी उन्हें अगर कतार में खड़ा कर दिया जाये तो यह कतार पृथ्वी के 126 चक्कर पूरे कर लेगी। इस गाद को समुद्र तक ले जाने का खर्च भारत सरकार की सालाना आय का दोगुना होगा। यह अनुमान बारह साल पुराना है, तब से गाद और बढ़ चुकी है।

रास नहीं आया पुनर्वास

Author: 
जितेंद्र
Source: 
डाउन टू अर्थ, जुलाई, 2017

नर्मदा नदी पर बन रहे सरदार सरोवर बाँध के पूर्ण होने पर सरकार भले ही जश्न मना रही हो लेकिन इससे उन लोगों के माथे पर फिर से चिन्ता की लकीरें दिखाई दे रही हैं, जो इसकी जद में आ रहे हैं। बाँध को पूर्ण क्षमता (138.68 मीटर) में भरने से बहुत से गाँव और घर जलमग्न हो जाएँगे।

नर्मदा बचाओ आंदोलन मध्य प्रदेश के 176 गाँव और धरमपुरी कस्बा इसी चिन्ता में डूबा हुआ है। रोज राजस्व अधिकारी सुप्रीम कोर्ट के आदेश की प्रति और पुलिस के दलबल के साथ मध्य प्रदेश के बड़वानी और धार जिलों के अन्तर्गत आने वाले इन क्षेत्रों का मुआयना करते हैं। वे लोगों से कहते हैं कि घर, दुकान, खेत, पशुचर, भूमि और पूजा स्थल 31 जुलाई तक खाली कर दें।

धार जिले के नासिरपुर निवासी विजय मरोला का कहना है, “कुछ अधिकारियों ने धमकी दी है कि यदि उक्त तारीख तक हमने यह जगह नहीं छोड़ी तो हमारे गाँव पर सरदार सरोवर बाँध का पानी छोड़ दिया जाएगा।” मध्य प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में 2016 दायर किये गए ताजा शपथपत्र में कहा है कि मरोला, उनके वृद्ध माँ-बाप, उनका नवजात शिशु, पत्नी और छोटी बहन उन 1,10,000 हजार (21,808 परिवार) लोगों में शामिल हैं, जिनके घर और जमीन बाँध के 30 से अधिक फाटक बन्द कर दिये जाने के बाद जलमग्न होने की स्थिति में आ जाएँगे। बाँध के जलस्तर को 121.92 मीटर से 138.68 मीटर तक बढ़ाने के लिये इन फाटकों को बन्द किया जाएगा।

2 जुलाई - मध्य प्रदेश में वृक्षारोपण और पर्यावरण के महापर्व को कारगर बनाने का अवसर


2 जुलाई को नर्मदा के किनारे वृक्षारोपण करते म.प्र. के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान2 जुलाई को नर्मदा के किनारे वृक्षारोपण करते म.प्र. के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहाननर्मदा सेवा यात्रा के बाद 2 जुलाई 2017 को मध्य प्रदेश में एक बार फिर इतिहास रचा गया है। इस इतिहास के केन्द्र में हैं मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री का वह संकल्प जो नर्मदा सेवा यात्रा के दौरान उनके द्वारा बारम्बार दुहराया गया था। वह संकल्प जिसके मार्फत नर्मदा क्षेत्र और उसके आसपास के समूचे समाज को वृक्षारोपण और पर्यावरण बचाने की कोशिश से जोड़ने का पुरजोर प्रयास किया गया था।

यह वही प्रयास है जिसमें प्रदेश के मुखिया ने साधु सन्तों से लेकर फिल्म जगत के सितारों को और मीडिया से लेकर देश के जाने-माने पर्यावरणविदों को जोड़कर अदभुत काम कर दिखाया था। प्रधानमंत्री की मौजूदगी में नर्मदा की रेत के अवैध और अवैज्ञानिक खनन को रोकने के लिये न केवल संकल्प लिया था वरन उसे रोककर और वैज्ञानिक आधार दिलाने के लिये ऐतिहासिक फैसला लेकर देश के सामने उदाहरण पेश किया था।

उसी क्रम में 2 जुलाई 2017 को प्रदेश के 51 में से 24 जिलों के 98 हजार 976 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 6 करोड़ पौधों का रोपण कर हरितिमा की चुनरी चढ़ाने का प्रयास किया गया है। मुख्यमंत्री खुद अमरकंटक, लमेटाघाट (जबलपुर), छीपानेर (सीहोर) और ओंकारेश्वर में वृक्षारोपण किये। यह प्रयास विश्व रिकार्ड बनेगा और सदा-सदा के लिये प्रदेश और उसके मुखिया के नाम पर अंकित होगा।

इंसानी दर्जा क्या, स्वयं ईश्वर हैं नदियाँ


भारत के प्राचीन समाज ने नदियों, पर्वतों, समुद्रों, बादलों, वृक्षों तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों को इंसान का नहीं- ईश्वर का दर्जा दे रखा था! फिर यह सोचनीय है कि हम नदियों को इसांन का दर्जा देने की कवायद कर- पुरखों के सामने कितने बौने साबित हो रहे हैं? कहाँ थी उनकी सोच और दूरदृष्टि। और कहाँ आ खड़े हुए हैं हम, प्राकृतिक संसाधनों को समाप्त करते-करते। ईश्वर का विराट स्वरूप क्या है? उसका दर्शन हम इस धरती पर कैसे कर सकते हैं? मध्य प्रदेश विधानसभा ने नर्मदा नदी को इंसान का दर्जा दिये जाने का संकल्प पिछले दिनों पारित किया है। विधानसभा के पूर्व कैबिनेट ने भी इस आशय का एक प्रस्ताव पास किया था। इसके पूर्व उत्तराखण्ड हाई कोर्ट ने गंगा और यमुना के लिये भी ‘लीगल पर्सन’ याने कानूनी हैसियत की माफिक का दर्जा देने के निर्देश प्रदान किये हैं। इसके पीछे मूल भाव यही है कि इन नदियों के साथ छेड़छाड़ करने वाले को उतना ही दोषी माना जाये जितना किसी इंसान के साथ घटित होने वाली घटना पर कानूनी दायरे में आने पर उसे सजा का प्रावधान होता है।

नदियों के संरक्षण की दिशा में इन फैसलों और प्रस्तावों की मोटे तौर पर तो सराहना ही की जानी चाहिए। ये पर्यावरण की दिशा में उठाए गए उचित कदम हो सकते हैं। लेकिन इन सन्दर्भों में यह भी देखा जाना जरूरी है कि भारत की फिलासफी आखिर क्या रही है?

गंगा मैली नहीं रहेगी

Source: 
तहलका, 15 मई 2017

राष्ट्रीय नदी गंगा क्या इतनी प्रदूषण मुक्त हो सकेगी कि उसके जलचर जीवित रहें और मानव मात्र को भी गंंगा के स्वच्छ, निर्मल जल के स्पर्श मात्र से यह अहसास हो सकेगा कि वह वाकई उस गंगा का आचमन कर रहा है जो स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरी थी और जिसका उल्लेख शास्त्रीय ग्रंथों में मिलता है।

“धर्म का मान रखने और मोक्षदायिनी नदियों जैसे गंगा, यमुना, ताप्ती, कावेरी, गोदावरी आदि को देवी का मान देने वाले नेता आज देश के राजनेता हैं। शासन में यदि इनके रहते हुए भी नदियों का वैभव वापस नहीं लौटा तो अगले चुनावों में जनता शायद इन्हें समुचित जबाव दे।”

बाधाओं बीच अविरल नर्मदा

Author: 
अजीत सिंह और सुष्मिता सेनगुप्ता
Source: 
डाउन टू अर्थ, अप्रैल 2017

‘सौंदर्य की नदी’ नर्मदा नित नए संकटों से घिरने के बावजूद अपनी अविरलता, अपनी जीवंतता छोड़ने को तैयार नहीं है। मगर विकास की आधुनिक समझ अपनी जिद पर अड़ी है। बड़े बाँधों के खिलाफ जन संघर्षों का पर्याय रही नर्मदा आज कई खतरों से जूझ रही है। इनमें से कुछ खतरे जाने-पहचाने हैं तो कुछ एकदम नए। नर्मदा के इन्हीं संघर्षों की पड़ताल करती अजीत सिंह और सुष्मिता सेनगुप्ता की रिपोर्ट -