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कपड़े धोने की ईको फ्रेंडली तकनीक

केले के पत्ते की राख


जल प्रदूषण आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती है। विकास के इस दौर में हम सुविधाओं के पीछे इस कदर दौड़ पड़े हैं कि अपना ही नफा-नुकसान तक नहीं सोच पा रहे हैं। हमने अपनी जीवन शैली को ही ऐसा बना लिया है जिसमें किसी चीज के लिए बस और नहीं की तो गुंजाइश ही नहीं है, और.. और.... चाहिए, नतीजा हमारे समय है- साफ-सुरक्षित पेयजल की कमी। देश में कहीं बाढ़ की समस्या है तो कहीं सुखाड़ की, कहीं भूजल स्तर बढ़ रहा है, तो कहीं घट रहा है, एक ओर जहां भूजल के कम होने की समस्या है वहीं जो जल उपलब्ध है उसके साफ होने की कोई गारंटी नहीं है।

हमारी ही गैर जिम्मेदाराना आदत से जल प्रदूषण की समस्या बढ़ रही है। इसी सिलसिले में हिंदी इंडिया वाटर पोर्टल की ओर से मैने पानी के क्षेत्र में सक्रिय कुछ लोगों से बातचीत की। बातचीत का मुद्दा था कि पानी को कैसे प्रदूषित होने से रोका जा सकता है। दरअसल पिछले सप्ताह हमें समाज प्रगति सहयोग संस्था में नरेगा के तहत जल ग्रहण क्षेत्रों का निर्माण पर प्रशिक्षण कार्यक्रम में बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड से आए कुछ साथियों से बातचीत करने का मौका मिला, जिसमें शाम के समय सबने मिलकर चर्चा की कि हम कैसे लोगों को जल प्रदूषित करने से रोक सकते हैं। इसी समय पानी में बढ़ते आर्सेनिक के कारणों पर भी बात हुई, जिसमें हिंदी पोर्टल के वेब एडिटर शिराज केसर ने बताया कि भूजल के अति दोहन के साथ साथ हमारी कपड़े धोने की आदत भी इस समस्या के लिए जिम्मेदार हैं।

कपड़े धोने के लिए हम डिटर्जेंट और सर्फ का इस्तेमाल करते हैं। बिहार के सुपौल जिले की ग्राम्य शील संस्था में काम करने वाली नीलम अपने क्षेत्र में पानी के मुद्दों पर जनजागरूकता का कार्य करती हैं, उंहोंने बताया कि आज हमने अपने पारंपरिक ज्ञान को भुला दिया है, बुजुर्गों का सम्मान करने के बजाय उन्हें दुत्कार रहे हैं। पहले हमारी जीवन शैली ऐसी थी कि सीमित साधनों में ही गुजारा करते थे। कपड़े धोने के लिए रीठों और केले के पत्तों की राख का इस्तेमाल किया जाता था। रीठों का इस्तेमाल करना तो शायद ज्यादातर लोग जानते हैं लेकिन केले के पत्तों के बारे मे शायद ही सुना होगा।

नीलम ने बताया, दरअसल आंगन या बागीचे में लगे केले के पेड़ को साफ सफाई की जरूरत तो पड़ती ही है। कुछ पत्ते, शाखाएं जो सूख जाती हैं उन्हें हटाना पड़ता है, बस यही बचा- खुचा कचरा कपड़े धोने में इस्तेमाल किया जा सकता है। पहले लोग इसी कचरे को इकट्ठा करके खाना बनाने के लिए चूल्हे में ईंधन के रूप में इस्तेमाल करते हैं फिर उससे जो राख बनती है, उसके दो हिस्से करके डिब्बे में भरकर रख दिया जाता है, एक डिब्बा शौच आदि के बाद हाथ धोने के लिए रख दिया जाता है। जैसे साबुन से हाथ धोए जाते हैं वैसे ही साबुन की जगह केले के पत्ते की राख का इस्तेमाल किया जाता है।

दूसरे डिब्बे को कपड़े धोने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। जैसे सर्फ में कपड़े भिगोकर रखे जाते हैं ठीक वैसे ही पानी में एक मुट्ठी केले के पत्ते की राख डालकर कपड़े भिगो देते हैं। सूती कपड़े गर्म पानी में भिगोने से चमक जाते हैं, बाकी अन्य कपड़ों को गुनगुने पानी में भिगोया जा सकता है, कुछ देर पानी में भीगने के बाद कपड़ों को हाथ से मलकर निकाल देने पर कपड़े साफ हो जाते हैं। इसके बाद साफ पानी से कपड़े निकाले जाते हैं।

बिहार के सुपौल जिले में पूर्वजों के इस पारम्परिक ज्ञान का उपयोग कुछ समय तक तो किया गया वह भी गरीबी के दिनों मे, लेकिन यह पारंपरिक ज्ञान अब मर रहा है। नीलम का कहना है कि वह खुद भी गुर्बत में इस तकनीक का इस्तेमाल करती थी, लेकिन अब तो उपभोक्तावादी संस्कृति ने सब कुछ आसान कर दिया है, जिसके चलते हम ऐसे खतरनाक साधनों का भी इस्तेमाल करने लगे हैं जो हमारे ही स्वास्थ्य के लिए हानिकारक सिद्ध हो रहे हैं।

मक्का के पौधे की राख-


पारंपरिक ज्ञान का कोई छोर नहीं है। वाकई मुझे हैरानी हुई जब मैने लोक सेवक मंडल और गांधी स्मारक निधि के चेयरमैन श्री ओंकार चंद जी से बातचीत करते हुए जाना कि केले के पत्ते के अलावा मक्का के पौधे की राख से भी कपड़े धोए जाते थे। उन्होंने बताया कि हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्रों में लोग पहले कपड़े धोने के लिए मक्का के पौधों का भी प्रयोग किया करते थे। जब मक्का तैयार हो जाती और मक्का की कटाई हो जाती थी तो जड़ और तने का कुछ हिस्सा जमीन में छोड़ दिया जाता है फिर हल चलाकर उसे निकाल लिया जाता है और इकट्ठे करके गांव के लोगों को बांट दिया जाता है। गांव के लोग उसे सुखाकर चूल्हे में ईंधन के रूप में इस्तेमाल करते हैं और उसके बाद जो राख बनती है उसे एक बांस की टोकरी में कुछ घास बिछाकर रख दिया जाता है। टोकरी को बाल्टी के ऊपर रखकर ऊपर से पानी डाला जाता है, पानी रिसकर बाल्टी में इकट्ठा होता रहता है लेकिन इस पानी की खासियत यह है कि यह पानी सर्फ की तरह कपड़े धोने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

मक्का की राख से कपड़े के अलावा अगर बर्तन भी धोए जाएं तो उनमें भी चमक बरकरार रखी जा सकती है।

चंडीगढ़ निवासी श्रीमती विमला जी का कहना है, "डिटर्जेंट और सर्फ किस कदर पानी को प्रदूषित कर रहे हैं हमें इसका अंदाजा तक नहीं है।

समय की मांग है फिर से पारंपरिक ज्ञान को जीवित किया जाए, ताकि आने वाले खतरों को रोका जा सके। जरूरत है फिर से पुराने तरह के देसी साबुनों और ज्ञान की, पद्धति की। आज की जीवन शैली में वॉशिंग मशीनों का प्रयोग आम हो गया है जबकि मशीनें सर्फ के बिना चल नहीं सकती जिससे पानी में सर्फ का प्रदूषण बढ़ रहा है। इसलिए पारंपरिक ज्ञान को पुनर्जीवित करना और अपनी आदतों को बदलना निहायत जरूरी हौ गया है।"

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