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क्या गंगा सिर्फ एक साधन

गंगागंगाडॉ. गिरधर माथनकर
देश के आज के परिदृश्य पर नजर दौड़ाते हैं तो यह लगता है कि समस्याओं और उनके समाधानों में मेल बहुत कम देखने को मिलता है। स्थिति यह है कि हम 3 समस्यायें सुलझाने के चक्कर में 13 नयी समस्यायें पैदा कर लेते हैं।

मुद्दा है गंगा के प्रवाह की अविरलता जरूरी है या गंगा व उसकी सहायक नदियों पर बड़े, मझोले व छोटे बांध बनाये जायें, गंगा को हिमालय में सुरंगों में से प्रवाहित किया जाये, उस पर वैराज बनाये जाये। वैसे यह मुद्दा पूर्व में भी चिंतकों ने उठाया ही है, लेकिन जून 08 में पर्यावरणविद्, आई.आई.टी. कानपुर के पूर्व प्रोफेसर डॉ. गुरूदास अग्रवाल के उत्तरकाशी में गोमुख से उत्तरकाशी तक गंगा (भागीरथी) के नैसर्गिक स्वरूप से की जा रही छेड़छाड़ के विरोध में आमरण अनशन पर बैठने से अखबारों व अन्य संचार माध्यमों में यह मुद्दा प्रमुखता से छाया रहा।

मुद्दा स्पष्ट हो, गंगा के साथ समाज का संबंध स्पष्ट हो, गंगा को लेकर एक सुविचारित नीति बने, इस हेतु पृष्ठभूमि स्पष्ट होना आवश्यक है। देशवासियों को ज्ञात है कि उत्तराखंड में जल-विद्युत परियोजनाओं का जाल बिछाकर उत्तराखंड को ऊर्जा उत्पादक राज्य के रूप में विकसित करने की महत्वाकांक्षी योजना पर काम शुरू हुआ है। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद से सत्तासीन सरकारों का इस दिशा में रूझान लगातार बढ़ता ही जा रहा है। उत्तराखंड राज्य के लिये पड़ोसी हिमांचल प्रदेश एक आदर्श ऊर्जा उत्पादक राज्य के रूप में मौजूद भी है।

सर्वप्रथम उन तथ्यों को सामने लाया जाय जो लेखक की अलग-अलग लोगों से चर्चा में निकलकर सामने आये। जिन लोगों से चर्चा की गयी उनमें पढ़े-लिखे युवा, धर्माचार्य, इंजीनियर-वैज्ञानिक, मजदूर-किसान, पत्रकार, वरिष्ठ नागरिक, महिलायें, राजनेता, सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षक आदि थे। चर्चा से जो निष्कर्ष निकलकर आए वे निम्नवत हैं -

* राजनीति से जुड़ा व्यक्ति मुद्दे पर सबसे पहले यह प्रश्न करता है कि गंगा के साथ कौन सी पार्टी की सरकार के द्वारा छेड़छाड़ हो रही है। केन्द्र में कौन सी सरकार है, इससे भी उसका सरोकार होता है। मुद्दे के प्रति तात्कालिक संवेदना व्यक्त करते हुए भी अपना मत संतुलन के साथ प्रस्तुत करता है ताकि अपनी राजनीतिक विचारधारा या दल के प्रति प्रतिबध्दता बनी रहे।
* मीडिया के अधिकांश मित्रों को इस मुद्दे पर विशेष रूप से डॉ. अग्रवाल के अनशन में मेधा पाटकर या सुन्दरलाल बहुगुणा की ही सूरत नजर आती है। वैसे भी मीडिया की अपनी शैली होती है तथा मीडिया से जुड़े व्यक्ति की अपनी स्वतंत्र राय कम ही पता चल पायी।
* देश का इंजीनियर व वैज्ञानिक वर्ग मुद्दे को ध्यान से सुनने के पूर्व ही अपने मन में बैठी ऊर्जा स्वायत्तता व प्रदूषण मुक्त जल विद्युत परियोजनाओं की पैरवी करते नजर आता है।
* धर्माचार्य जहाँ गंगा के प्रति माँ का संबोधन करते हैं वही इस अनशन के प्रति सहानुभूति रखते हैं, लेकिन स्वयं को इस मुद्दे के साथ अपनी किसी भौतिक भागीदारी से बचाते से दिखते हैं।
* युवा पीढ़ी सामान्यत: इस विषय को गंभीरता से सुनती नजर नहीं आती। सुनती भी है तो उसके मन में आज के आर्थिक विकास के प्रति अधिक सहानुभूति होती है।
* देश का मजदूर व खेतों में काम करने वाला किसान इस मुद्दे के प्रति अपेक्षाकृत अधिक संवेदनशील नजर आया। वह अपने दैनंदिन दु:खदर्दों को मुद्दे के साथ जोड़कर बात नहीं करता। हालांकि इस मुद्दे में अपनी किसी प्रकार की भागीदारी के लिए असमर्थता जरूर व्यक्त करता है।

कुल मिलाकर देश का मध्यमवर्गीय समुदाय, खेतिहर किसान, दैनिक मजदूरी में लगा मजदूर, 60 की उम्र पार किये वरिष्ठ नागरिक, महिलायें गंगा के साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ के प्रति संवेदनशील है। सम्पन्न वर्ग चाहे दिल्ली का हो या देहरादून का, सस्ती व 24 घंटे बिजली मिले, इस हेतु वकालत करता पाया गया। पहाड़ के निवासियों से बात करने पर प्रतिक्रियायें अलग-अलग रही। पहाड़ के व्यापारी वर्ग का पूरा ध्यान पर्यटकों-तीर्थ यात्रियों पर टिका हुआ होता है। गंगा के स्वरूप में परिवर्तन या भविष्य से वह अपने आप को अधिक नहीं जोड़ पाता। ठेठ पहाड़ी अपनी बात में पहाड़ी संस्कृति व गंगा से अपने रिश्ते की बात तो करता है लेकिन सुविधा सम्पन्नता की जिंदगी का स्वप्न अब उसके भी मन मं े पलता नजर आ रहा है। देश भर की अनेक स्वयंसेवी संस्थाओं ने डॉ. अग्रवाल के अनशन का नैतिक समर्थन किया व यथासंभव अपने-अपने प्रभाव क्षेत्रों में मुद्दे पर जन जागरण, धरना-प्रदर्शन, मीडिया में समाचार आदि के माध्यम से अपनी सक्रिय उपस्थित दर्ज की। खोजबीन करने पर यह भी पता चलता है कि जिन-जिन संस्थाओं ने अभियान में हिस्सा लिया वे कहीं न कहीं डॉ. अग्रवाल पूर्व से ही से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े रहे। बहुत कम ऐसे लोग या संस्थायें थी जो डॉ. अग्रवाल को नहीं जानते थे, फिर भी उनके अनशन के प्रति सक्रियता से जुटे। डॉ. अग्रवाल का व्यक्तित्व व्यापक है। देश का कोना-कोना उनका देखा-परखा हुआ है। पर्यावरण, ग्रामीण विकास, शिक्षा जैसे विषयों से उन्होंने अपने आपको जोड़ रखा है अत: उनके समर्थकों, शुभचिंतकों की संख्या भी अच्छी खासी थी जिससे मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर का व्याप मिल सका। स्वामी रामदेव, स्वामी चिदानंद (परमार्थ निकेतन, ऋषिकेश), महामंडलेश्वर स्वामी हंसदास व बद्रिकाश्रम के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की सक्रिय भागीदारी से डॉ. अग्रवाल के अनशन का कुछ परिणाम निकला व उत्तराखंड सरकार ने भैरों घाटी व पाला-मनेरी परियोजनायें स्थगित की। हालांकि परियोजनायें स्थगित मात्र हुई है, समाप्त नहीं। लोहारीनाग-पाला परियोजना का काम बंद नहीं हुआ है। केन्द्र सरकार के सीधे अधिकार क्षेत्र की इस परियोजना पर पुनर्विचार हेतु एक समिति केन्द्र सरकार द्वारा जरूर बनायी गयी। समिति 3 माह में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी। उपरोक्त से यह तो स्पष्ट है कि जो भी आधी-अधूरी सफलता इस आंदोलन को मिली, उसका श्रेय 4 धर्माचार्यों की सक्रियता को ही जाता है।

दिनांक 13 जून से 21 जून 08 तक उत्तराखंड से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्रों में डॉ. अग्रवाल के अभियान को दिन-प्रतिदिन बढ़ा हुआ स्थान मिलता गया। एकबारगी देखने से तो यह लगता था कि लड़ाई सिर्फ डॉ. अग्रवाल व उत्तराखंड सरकार के बीच ही है व उत्तराखंड की जनता का इस आंदोलन को मौन समर्थन है। अनेक स्थानीय छोटे-बड़े जन संगठनों ने भी डॉ. अग्रवाल के अनशन के प्रति समर्थन व्यक्त किया था जिसमें माटू संगठन, नदी बचाओ मंच, जयनंदा उत्थान समिति, वाणी आदि प्रमुख थे। विद्यार्थी संगठनों के माध्यम से भी युवाओं ने आंदोलन में सहभाग किया। उत्तराखंड सरकार के 2 परियोजनाओं को स्थगित करने के निर्णय के बाद अलग-अलग राजनीतिक दलों द्वारा वक्तव्य देकर, चिंतकों द्वारा लेख लिखकर, उत्तरकाशी के लोगों द्वारा करके सरकार के निर्णय का विरोध किया गया। अभी भी इस संबंध में कुछ खबरें समाचार पत्रों में छप ही रही है। लेखक का इस संबंध में यह अभिमत बना कि विरोध की 2 ही जड़े हैं, एक वे लोग जिनका तुरंत रोजगार बंद हुआ व दूसरा राजनीतिक विरोध याने विरोध के लिये विरोध। फिलहाल डॉ. अग्रवाल ने स्वामी रामदेव व अन्य जुड़े संतों के अनुरोध पर 30 जून 2008 को अस्थायी रूप से अनशन तोड़ दिया है।

आगे कुछ भी हो सकता है। केन्द्र सरकार लोहारी-नाग-पाला परियोजना बंद करेगी या नहीं यह भविष्य के गर्त में समाया है। निश्चित है उत्तरांखंड सरकार अपनी स्थगित परियोजनाओं के लिये केन्द्र सरकार से मोलभाव करेगी व कालान्तर में दोनों के बीच कुश्ती-कसरत भी चल सकती है। अनुमान यह भी लगा सकते हैं कि अगले लोकसभा चुनाव में गंगा को राजनीतिक मुद्दा भी बनाया जा सकता है। इस सब से यह जरूर लगता है कि गंगा को लोग मां मानते हों या सामान्य नदी मानते हों, गंगा की स्थिति दयनीय है। बात चाहे उसकी अविरलता की हो या निर्मलता की हो। अब उत्तराखंड के हाईकोर्ट में गंगा की अविरलता हेतु व स्थगित परियोजनाओं को पुन: शुरू करने हेतु अलग-अलग पी.आई.एल. भी हुई है। न्याय प्रक्रिया अपने हिसाब से चलेगी। यदि निर्णय न्यायाधीशों पर छोड़ भी दिया जाये तो भी स्थिति लंबे समय तक अस्पष्ट ही बनी रहेगी। लेखक इस लेख के माध्यम से कुछ प्रश्न खड़े करना चाहता है ताकि समाज में सार्थक चिंतन हो सके -

* क्या गंगा सिर्फ एक नदी है या इस देश की संस्कृति है ?
* देश भर से व विदेशों से लोग गंगोत्री क्यों आते हैं ? अपने-अपने घर गंगा जल क्यों ले जाते हैं ?
* क्या हमारे योजनाकारों ने नदियों को बांधने, तोड़ने-मरोड़ने के पूर्व उससे होने वाले प्रभावों का विस्तृत अध्ययन किया है ? यदि किया है तो उसे शब्दश: सार्वजनिक किया जा सकता है? क्या इस अध्ययन में विश्व स्तर की अनेक नदियों को बांधने आदि से उत्पन्न प्रभावों का संदर्भ लिया गया है ?
* क्या गंगा व उसकी सहायक नदियों पर बड़ी-बड़ी परियोजनायें (विशेष रूप से गोमुख से देवप्रयाग के बीच) बनने से तापमान बढ़ने, गोमुख, ग्लेशियर के लगातार पिघलते जाने का कोई संबंध है ?
* क्या गंगा नदी पर निर्मित, निर्माणाधीन व प्रस्तावित परियोजनाओं से होने वाले लाभ-हानि का ब्यौरा सार्वजनिक बहस के लिये तैयार किया गया है ?
* गंगा नदी को भारतीय संस्कृति में माँ का दर्जा मिला है। क्या यह महज परंपरा निभाने के लिये उच्चारित होता है या इसके गहरे भावनात्मक व आध्यात्मिक कारण भी हैं ?
* क्या गंगा पर उत्तराखंड में राज्य के अपने निहित उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु बड़ी-बड़ी परियोजनायें लगाना सिर्फ उनका अधिकार ही है या गंगा, गोमुख से गंगा सागर तक एक है व गंगा के ऊपर कोई भी कदम उठाने के पूर्व गंगा से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हर देशवासी की सहमति भी आवश्यक है ?
* क्या उत्तराखंड में जल विद्युत परियोजनायें ही ऊर्जा का केवल एक मात्र मौजूद विकल्प है ?
* गंगा को हिमपुत्री कहा गया है। यदि श्रृंखलाबध्द तरीके से बांध बनेंगे, गंगा को सुरंगों में डालेंगे तो क्या हिमपुत्री गंगा का जल हिमालय क्षेत्र की जड़ी-बूटियों के सतत् संपर्क में बना रहेगा ?
* गंगा जल देश के चालीस करोड़ लोगों को पीने का पानी, खेतों की सिंचाई, उपजाऊ मिट्टी देती है फिर उत्तराखंड में इसे जगह-जगह पर बांध देंगे तो इन लोगों का क्या होगा ?
* क्या गंगा पर बांध बनने से जो जंगल डूब क्षेत्र में आयेंगे उससे क्षेत्र की जैव विविधता प्रभावित नहीं होगी ? यदि होगी तो उसे क्या उसी रूप में पुन: प्राप्त किया जा सकेगा ?
* गंगा पर जगह-जगह पर बांध बनाने से व पहाड़ों में सुरंगें बनाने से भूस्खलन की समस्या खड़ी नहीं होगी ? क्या बड़े बांध व भूकम्प के बीच संबंध का हमने समग्रता से अध्ययन किया है ताकि भूकंप की समस्या से निश्चिंत हुआ जा सके ?

* बड़े बांधों से बनने वाली बिजली का वास्तविक लाभ किसे मिलता है ? पहाड़ों पर रहने वाले ग्रामीणों को या दिल्ली, देहरादून में एयरकंडीशन में रहने वाले सम्पन्न लोगों को ? लेखक का ऊपर लिखित प्रश्नों पर यह मत है कि पहाड़ों में बाँध बनाना, जल विद्युत परियोजनायें लागू करना यह सरकारों द्वारा अपनी रूचि व समझ से शुरू किया खेल होता है। वास्तविक लाभार्थियों की निर्णय में किसी भी प्रकार की सहभागिता नहीं होती है। कुल मिलाकर ये पहाड़ी संस्कृति को जबरन दिखाये जाने वाले सुंदर सपने हैं। परियोजनाओं पर क्रियान्वयन के पूर्व ईआई.ए. की पंरपरा है। इस काम के लिये किराये पर रखी एजेंसी यह काम परियोजनाओं के हित साधन हेतु इस को सामान्यत: गुपचुप तरीके से करती है, बेमन से करती है। ई.आई.ए. के अन्तर्गत किये गये अध्ययन उथले व पूर्वाग्रह से ग्रसित होते हैं। कई बार कई गंभीर तथ्यों पर झूठी जानकारी तक ई.आई.ए. में होती है जो कि जनता के जिंदगी से गहरा संबंध रखती है। यदि आप इस बात की सत्यता जानना चाहते हैं तो सूचना के अधिकार के तहत संबंधित पक्ष से जानकारी प्राप्त करने का प्रयास करके अवश्य देखे।

प्रश्न जीवन पध्दति का है। लेखक का मानना है कि हमें अपनी स्थिति-परिस्थिति की अनुकूलता के अनुसार उपलब्ध ऊर्जा संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करना चाहिए। ऊर्जा का संयमित उपयोग एक पक्ष है व मात्र सुख सुविधाओं के लिये अधिकाधिक ऊर्जा उत्पादन दूसरा पक्ष है। हम दिन प्रतिदिन भोगवादी जीवन पध्दति में रमते जा रहे हैं व अब माँ तुल्य भागीरथी गंगा भी एक संसाधन मात्र रह गयी है। पीढ़ी दर पीढ़ी समाज गंगा के साथ माँ के रिश्ते को भूल रहा है। आवश्यकता है समग्र सोच के साथ गंगा माँ के साथ जीने की।

(डॉ. गिरधर माथनकर, सामाजिक कार्यकर्ता एवं पूर्व प्राध्यापक ग्रामोदय वि.वि. चित्रकूट)

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