SIMILAR TOPIC WISE

Latest

गायब होते ग्लेशियर

बढ़ते तापमान का भारतीय ग्लेशियरों पर बुरा असर पड़ रहा है और अगर ग्लेशियरों के पिघलने की यही रफ्तार रही तो हिमालय के ग्लेशियर 2035 तक गायब हो जाएंगे। अध्ययन में पाया गया है कि हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार बहुत तेज है। शोधकर्ताओं का कहना है कि कश्मीर में कोल्हाई ग्लेशियर पिछले साल 20 मीटर से अधिक पिघल गया है जबकि दूसरा छोटा ग्लेशियर पूरी तरह से लुप्त हो गया है। हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय भूभौतिकी अनुसंधान संस्थान के मुनीर अहमद का कहना है कि ग्लेशियरों के इस कदर तेजी से पिघलने की वजह ग्लोबल वार्मिंग के साथ-साथ ब्राउन क्लाउड है।

दरअसल, ब्राउन क्लाउड प्रदूषण युक्त वाष्प की मोटी परत होती है और ये परत तीन किलोमीटर तक मोटी हो सकती है। इस परत का वातावरण पर विपरीत असर होता है और ये जलवायु परिवर्तन में अहम भूमिका निभाती है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम यानी यूएनईपी की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट की तलहटी में भी काले धूल के कण हैं और इनका घनत्व प्रदूषण वाले शहरों की तरह है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि क्योंकि काली-घनी सतह ज्यादा प्रकाश और ऊष्मा सोखती है, लिहाजा ग्लेशियरों के पिघलने की ये भी एक वजह हो सकती है। अगर ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार अंदाज़े के मुताबिक ही रही तो इसके गंभीर नतीजे होंगे। दक्षिण एशिया में ग्लेशियर गंगा, यमुना, सिंधु, ब्रह्मपुत्र जैसी अधिकांश नदियों का मुख्य स्रोत हैं। ग्लेशियर के अभाव में ये नदियां बारहमासी न रहकर बरसाती रह जाएंगी और कहने की ज़रूरत नहीं कि इससे लाखों, करोड़ों लोगों का जीवन सूखे और बाढ़ के बीच झूलता रहेगा।

ग्लेशियरों के ख़तरे



नेपाल के एक युवा पर्वतारोही जलवायु परिवर्तन के भीषण परिणामों की तरफ़ लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए माउंट एवरेस्ट की यात्रा करेंगे। दावा स्टीवन शेरपा नाम के इस पर्वतारोही की उम्र महज 23 वर्ष है लेकिन वह इस उम्र में ही एवरेस्ट सहित दुनिया की कई उँची पर्वतमालाओं को लांघ चुके हैं। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने हिमालय पर मौज़ूद ग्लैशियरों को पिघलते हुए देखा तो उनके मन में आया कि क्यों न आम लोगों का ध्यान पर्यावरण के मुद्दों की तरफ खींचा जाए। बेल्जियम और नेपाली मिश्रित मूल के स्टीवन शेरपा का कहना है कि वर्ष 2007 में जब वह पर्वतारोहण कर रहे थे तो खुमबु आईस फॉल के दौरान उन्हें एक डरावना अनुभव हुआ। दावा मानते हैं कि ग्लोवल वार्मिंग की वजह से ही उस दिन हिम नदी पिघली थी।

वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालय पर मौजूद सैकड़ों ग्लेशियर जलवायु परिवर्तन की वजह से पिघल रहे हैं। ये ग्लेशियर पाकिस्तान से लेकर भूटान तक फैले हैं। इन पिघलते हुए ग्लेशियरों के कारण कुछ नई झील बन गई हैं जिनसे इन घाटियों में बाढ़ आने का ख़तरा बढ़ गया है। नेपाल स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटिग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट ने अनुमान व्यक्त किया है कि वर्ष 2050 तक इस तरह के सारे हिमनद पिघल जाँएंगे जिससे इस क्षेत्र में पहले बाढ़ और फिर अकाल आने का ख़तरा बढ़ रहा है। संस्था के मुताबिक हिमालय से निकलने वाली नदियों पर कुल मानवता का लगभग पाँचवां हिस्सा निर्भर है।

विकसित देशों में प्रदूषण बढ़ा


जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी का कहना है कि औद्योगिक देशों में वर्ष 2000 से 2006 के बीच ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन 2।3 प्रतिशत बढ़ा है। कार्बन गैसों में सबसे यादा बढ़ोत्तरी पूर्व सोवियत संघ के देशों और कनाडा में हुई है। संयुक्त राष्ट्र के प्रवक्ता ने कहा है कि यदि ख़तरनाक जलवायु परिवर्तन को रोकना है तो देशों को ज्यादा तेजी से कार्रवाई करनी होगी। दुनिया भर के देश अगले महीने पोलैंड में जलवायु परिवर्तन पर चर्चा करने के लिए मिलने वाले हैं और प्रदूषण के जो नए ऑंकड़े आए हैं वो आशाजनक नहीं हैं।

संयुक्त राष्ट्र ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि हालांकि वर्ष 2006 में दुनिया भर में कार्बन गैसों के उत्सर्जन में 0.01 प्रतिशत की गिरावट आई। लेकिन संयुक्त राष्ट्र सचिवालय का कहना है कि सांख्यिकी की दृष्टि से इस कमी का कोई महत्व नहीं है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2000 के बाद से कार्बन गैसों में बढ़ोत्तरी दिख रही है। हालांकि जिन देशों में कार्बन गैसों में बढ़ोत्तरी हुई है उन देशों ने गैसों में कटौती का आश्वासन दिया था। इस मामले में सबसे बड़ा दोषी देश कनाडा दिख रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार 1990 से अब तक वहाँ कार्बन गैसों में 21.3 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है जबकि इसमें छह प्रतिशत की कमी होनी चाहिए थी। हाल के समय में सबसे ज्यादा गैसों का उत्सर्जन पूर्वी एशियाई देशों में दर्ज किया गया है। वर्ष 2000 के बाद से यहाँ 7।4 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। ब्रिटेन उन चुनिंदा देशों में से है जो अपने कार्बन गैसों पर नियंत्रण रख पा रहा है। हालांकि ब्रिटेन सरकार को दी गई एक ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि हवाई जहा और समुद्री पोतों के चलते वहाँ प्रदूषण बढ़ रहा है। इस रिपोर्ट के अनुसार वहाँ आयात की जा रही सामग्री में मौजूद कार्बन के कारण भी इसमें बढ़ोत्तरी हुई है।

वनों से बढ़ता पृथ्वी का तापमान!


वैज्ञानिकों का कहना है कि पेड़ भी जलवायु परिवर्तन के लिए ज़िम्मेदार हैं ऐसे में जब बर्फीले इलाकों में पेड़ लगाने से पृथ्वी के तापमान में और वृध्दि हो सकती है क्योंकि पेड़ गरमी को परावर्तित नहीं होने देते। अमरीकी शोधकर्ताओं का मानना है कि बर्फीले इलाकों में पेड़ों के काटे जाने से पृथ्वी के बढ़ते तापमान को रोकने की कोशिशों में मदद मिल सकती है। यह शोध नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेस में प्रकाशित हुआ है और इसमें पर्यावरण की इस जटिलता को उजागर किया गया है। अभी तक यह माना जाता रहा है कि पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से दुनिया के तापमान में वृध्दि हो रही है।

दरअसल पेड़ों की पत्तियां कार्बन डाइऑक्साइड जैसी ग्रीन हाउस गैसों को वातावरण से हटा देती हैं। लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि रूस, यूरोप और कनाडा के बर्फीले इलाकों के पेड़ों की पत्तियां बर्फ को ढक लेती हैं जिससे वह इसे परावर्तित नहीं कर पाती हैं। इससे पृथ्वी पर सूरज की रोशनी का अधिक अवशोषण होता है। हालांकि वैज्ञानिकों ने इससे बचने के लिए पेड़ों को काटे जाने को नहीं कहा है।

उल्लेखनीय है कि हाल में जलवायु परिवर्तन पर जारी एक अहम रिपोर्ट में कहा गया है कि इसकी वजह से करोड़ों लोगों को पानी नहीं मिलेगा, फसलें चौपट हो जाएँगीं और बीमारियाँ फैलेंगी। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के परिणाम पूरी दुनिया में दिखाई देने लगे हैं। रिपोर्ट में एक धुँधले भविष्य की तस्वीर दिखाई गई है। इसके अनुसार भविष्य में पानी की किल्लत होगी। साथ ही बाढ़ एक सामान्य समस्या होगी, बीमारियाँ तेज़ी से बढ़ेंगी। इसके अनुसार फसलों में लगातार कमी आएगी और लाखों लोग भूखे रहेंगे। इसमें कहा गया है कि दोनों ध्रुव, अमेरीका, एशिया और प्रशांत महासागर के छोटे द्वीप इसके निशाने पर होंगे।

उत्सर्जन में कटौती पर मतभेद


जलवायु परिवर्तन पर बाली सम्मेलन के अंतिम दिन ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती के लिए लक्ष्य तय करने पर फिर गहरे मतभेद उभर आए हैं। अमेरिका किसी तरह के लक्ष्य निर्धारण के पक्ष में नहीं है जबकि यूरोपीय संघ ने चेतावनी दी है कि लक्ष्य तय करने में नाकामी हाथ लगी तो वो अगले महीने जलवायु परिवर्तन पर अमेरिका की अगुआई में होने वाले सम्मेलन का बहिष्कार करेंगे। अमेरिका का मत है कि अलग-अलग देशों को ख़ुद ही प्रदूषण फैलानी वाली गैसों के उत्सर्जन में कटौती का लक्ष्य तय करने की छूट मिलनी चाहिए।

इंडोनेशिया यूरोपीय देशों और अमरीका के बीच किसी तरह का समझौता कराने की कोशिश कर रहा है। उसकी कोशिश है कि स्पष्ट लक्ष्य निर्धारण को समझौते के अंतिम मसौदे से निकाल दिया जाए, जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र की संस्था आईपीसीसी के साथ नोबल पुरस्कार प्राप्त करने वाले अल गोर ने सम्मेलन में हिस्सा ले रहे सदस्यों से हार नहीं मानने की अपील की। अधिकारियों का कहना है कि कई मुद्दों पर सहमति बन चुकी है। मतभेद औद्योगिक देशों में प्रदूषण के विषय पर है।

साभार - नवभारत

Post new comment

The content of this field is kept private and will not be shown publicly.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Lines and paragraphs break automatically.

More information about formatting options

CAPTCHA
यह सवाल इस परीक्षण के लिए है कि क्या आप एक इंसान हैं या मशीनी स्वचालित स्पैम प्रस्तुतियाँ डालने वाली चीज
इस सरल गणितीय समस्या का समाधान करें. जैसे- उदाहरण 1+ 3= 4 और अपना पोस्ट करें
6 + 5 =
Solve this simple math problem and enter the result. E.g. for 1+3, enter 4.