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जल-जनित बीमारियों से जूझते शहर

जल जनित बीमारियांजल जनित बीमारियांडा. सिद्धार्थ अग्रवाल/ राष्ट्रीय सहारा


देश के चार बड़े शहरों मुंबई, दिल्ली, कोलकाता तथा चेन्नई में पीने एवं अन्य उपयोग हेतु पानी की उपलब्धता प्रति व्यक्ति 135 लीटर प्रतिदिन के मानक से आधा से भी कम है। यघपि 91 प्रतिशत शहरी क्षेत्रों में पेयजल सुविधा उपलब्ध है परन्तु यह सभी शहरों में समान नहीं है। छोटे शहरों में, जिनमें करीब एक–तिहाई आबादी है, पानी की उपलब्धता करीब 60 प्रतिशत लोगों को ही है। स्लम एवं अन्य गरीब बस्तियों में तो यह और भी कम है। इन बस्तियों में हैण्डपम्प तथा नलों पर पानी लेने हेतु लम्बी कतारें लगानी पड़ती हैं और पानी की आपूर्ति मात्र कुछ घण्टे ही होती है।


पानी की उपलब्धता ही नहीं इसकी गुणवत्ता भी चिन्ता का विषय है। जहां शुद्ध पानी जीवन रक्षक है वहीं दूषित पानी से भारत में 3 करोड़ 77 लाख व्यक्ति प्रति वर्ष जल जनित बीमारियों जैसे कि कॉलरा, पोलियो, पेचिश, टायफाइड एवं हेपेटाइटिस से प्रभावित होते हंै और करीब 15 लाख बच्चों की अकेले डायरिया के कारण मृत्यु हो जाती है। इसके अतिरिक्त पानी में मिले फ्लोराइड एवं आर्सेनिक आदि से होने वाली बीमारियां जैसे कि फ्ल्यूरोरिस से 6 करोड़ 60 लाख, कैंसर से 1 करोड़ तथा बड़ी संख्या में लोग त्वचा रोगों से प्रतिवर्ष प्रभावित होते हैं।


राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2005–06 के अनुसार करीब आधे शहरी परिवारों में घर के अन्दर पाइप का पानी, जो कि अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है, की आपूर्ति होती है। परन्तु पानी की उपलब्धता शहरी गरीब और समृद्ध परिवारों में अत्याधिक असमान है। जहां 62.2 प्रतिशत समृद्ध शहरी परिवारों को घरों के अन्दर पाइप का पानी उपलब्ध है वही शहरी गरीबों में 20 प्रतिशत से भी कम को यह सुविधा उपलब्ध हो पाती है। 80 प्रतिशत से अधिक शहरी गरीब परिवारों में पानी नल, हैण्डपम्प या अन्य स्रोतों से भरकर रखा जाता है जो कि अधिकांशत: पहले से ही दूषित होता है, अथवा भरकर रखते समय संक्रमित हो जाता है। यह तथ्य दर्शाते हैं कि साफ पीने का पानी करीब 80 फीसद शहरी गरीब आबादी के लिए दूर की कौड़ी है। यह इस तथ्य से भी सिद्ध होता है कि भारत जल की गुणवत्ता के मामले में 122 देशों में से 120वें स्थान पर आता है। भारत के शहरों में जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है और इसी के साथ बढ़ रही है पानी की मांग। अनुमानों के अनुसार वर्तमान 33.5 करोड़ शहरी आबादी अगले 2 दशकों में बढ़कर 54 करोड़ से अधिक हो जायेगी, साथ ही शहरों में पानी की मांग भी बढ़कर दुगनी हो जाने का अनुमान है।


शहरों की इस बढ़ती पेयजल मांग को पूरा करने हेतु सन् 2012 तक भारत को 53,666 करोड़ रूपये खर्च करने होंगे परन्तु अतिरिक्त धन का आवंटन ही इस हेतु पर्याप्त नहीं है। अधिकांश राज्यों और शहरों में पहले से आवंटित राशि खर्च नहीं हो पाती है। पेय-जल की बढ़ती मांग को सुनिश्चित करने हेतु यह आवश्यक है कि योजनाओं का क्रियान्वयन कुशलतापूर्वक किया जाये। नगर निकायों को जलापूर्ति योजनाएं शुरू करने हेतु धन तो उपलब्ध कराया जाता है परन्तु उनके रख–रखाव हेतु पर्याप्त धन उपलब्ध नहीं हो पाता। उचित रख–रखाव के अभाव में करीब 20 से 50 प्रतिशत पानी लीकेज के कारण बर्बाद हो जाता है। इन योजनाओं की निरंतरता एवं लीकेज रोकने हेतु आवश्यक है कि इनके संचालन एवं रख–रखाव हेतु पर्याप्त धन उपलब्ध हो। इस हेतु पानी के टैक्स को कम करके अधिकतम लोगों की वहन क्षमता के योग्य बनाना चाहिए ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग टैक्स दे सकें और जलापूर्ति योजनाओं के रख–रखाव एवं निरंतरता हेतु पर्याप्त धन उपलब्ध हो सके।


साफ पानी उपलब्ध कराने तथा इसके स्वच्छता पूर्वक उपयोग हेतु विभिन्न विभाग एवं एजेंसियां जैसे कि जल संसाधन मंत्रालय, शहरी विकास एवं गरीबी उपशमन मंत्रालय, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, नगर निकाय एवं राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय विकास संस्थाएं विभिन्न भूमिकाएं निभाती हैं। परन्तु यह सभी सीमित ताल–मेल के साथ लगभग अलग–अलग कार्य करती हैं। योजनाओं के कुशल क्रियान्वयन तथा गुणवत्ता परक पानी उपलब्ध कराने हेतु इन सभी विभागों एवं संस्थाओं में तालमेल आवश्यक है।
पानी की आपूर्ति ही नहीं बल्कि समुदाय को कम पानी उपयोग एवं इनकी बर्बादी रोकने तथा दूषित पानी के द्वारा होने वाली बीमारियों से बचाव के प्रति भी जागरूक करना चाहिए। अनेक सफल कार्यक्रमों के अनुभव बताते हैं कि स्वयंसेवी एवं सामुदायिक संस्थाएं समुदाय को जागरूक एवं प्रेरित करने में अधिक कुशल होती हैं। अत: स्वयंसेवी संस्थाओं, सामुदायिक समूहों एवं स्कूलों आदि की कार्यक्रमों में साझेदारी द्वारा पानी की बरबादी रोकने, संग्रहित करने एवं स्वच्छ व्यवहारों को अपनाने हेतु समुदाय को प्रेरित कर जल–जनित बीमारियों को कम किया जा सकता है। स्वच्छ पेयजल के अभाव में प्रतिवर्ष होने वाली बीमारियों के उपचार पर 6700 करोड़ रूपये खर्च करने पड़ते हैं।

साभार - राष्ट्रीय सहारा

ville souffert de l'eau, - les maladies d'origine
城市因水-传染疾病
Stadt litt mit Wasser - Krankheiten
city suffered with Water - borne diseases

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