जल नीति राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में बननी चाहिये

Submitted by admin on Sun, 09/21/2008 - 19:37
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अजमेरअजमेरप्रोफेसर रासा सिंह रावत अजमेर के सांसद हैं। कहते हैं कि जब मैं छोटा था तो अजमेर में अरब सागर और बंगाल की खाड़ी दोनो ही ओर का मानसून आता था। लेकिन वनों के कटने और रेगिस्तान के विस्तार के कारण वनस्पति का अभाव हो गया। परिणामस्वरुप अजमेर भी मारवाड़ व मेवाड़ की तरह अकाल की चपेट में आ गया। वर्षाभाव की वजह से तालाब सूख गये। राजस्थान सरकार ने अब तय किया है कि अजमेर जिले के गाँवों को भी बीसलपुर का पानी दिया जा जाये। 300 किमी दूर से लाया गया पानी अजमेर के सूखे ओठों की प्यास बुझा पाएगा? प्रस्तुत है उनसे बातचीत . . .

अजमेर की जल समस्या के बारे में कुछ बतायें।

अजमेर राजस्थान के एकदम बीच में स्थित है। कई वर्षों पहले पहले, जब मैं छोटा था, अजमेर में अरब सागर और बंगाल की खाड़ी दोनो ही ओर का मानसून आता था। लेकिन वनों के कटने और रेगिस्तान के विस्तार के कारण वनस्पति का अभाव हो गया। परिणामस्वरुप अजमेर भी मारवाड़ व मेवाड़ की तरह अकाल की चपेट में आ गया। वर्षाभाव की वजह से तालाब सूख गये। पहले भूजल के लिये परंपरागत चरस व रहट हुआ करतीं थीं, परम्परा से थीं, जो भूजल को अधिक नुकसान नहीं पहुँचातीं थीं। परंतु जब से भूजल निकालने के लिये बोरिंग शुरू हुई है और हैंडपंप व बिजली के ट्यूबवेल लगाये गये हैं, तब से भूजल का और अधिक दोहन शुरू हो गया है व जलस्तर नीचे चला गया है। यहाँ तक कि अजमेर जिले में पेयजल का भी संकट हो गया है। अजमेर में लगभग तीन सौ किलोमीटर दूर टौंक जिले में बीसलपुर के बाँध से पानी आता है। आज अजमेर में अड़तालीस घंटे में एक बार पानी आता है। अजमेर में सिंचाई जल का भी अभाव है। वर्षा अच्छी होने पर खेती हो जाती है नहीं तो ग्रामीण गाँव छोड-छोड़क़र मजदूरी के लिये शहर पलायन करते हैं। हम सोचते थे, चंबल का पानी लिफ्ट होकर अजमेर जिले में आ आयेगा। लेकिन यह सपना ही होकर रह गया। कभी वर्षा हो जाती है तो बाँध भर जाते हैं, नहीं तो पुष्कर भी सूख जाता है। अजमेर के गाँवों में फ्लोराइड की मात्रा बहुत अधिक है। इसलिये वहाँ का पानी पीने योग्य नहीं है। निवासी इस पानी को पीकर कुबड़े हो रहे हैं। इसलिये राजस्थान सरकार ने अब तय किया है कि अजमेर जिले के गाँवों को भी बीसलपुर का पानी दिया जा जाये।

अगर अजमेर शहर में पानी अड़तालीस घंटों में एक बार आता है, तो पानी की आपूर्ति कैसे हो पाती है?

लोग पानी को इकठ्ठा कर लेते हैं, जो दो दिन तक चलता है। लोगों की आदत भी बन गयी है, पानी को एकत्र करके रखने की। पहले सीमेंट की पाइपलाइन थी जो अक्सर फट जाती थीं। अब स्टील की पाइपलाइन डाली जा रहीं हैं। जवाहर लाल नेहरू शहरी मिशन के अंतर्गत इस योजना पर कार्य चल रहा है।

अभी अभी आपने चंबल नदी के पानी के लिफ्ट होने की बात कही। नदियों के जोड़े ज़ाने की परियोजना को आप किस तरह लेते हैं?

किसी जमाने में कृषि मंत्री के आर कृष्णा राव की योजना थी कि गंगा को कावेरी से जोड़ा जाये और उत्तर की नदियों का पानी दक्षिण लाया जाये। लेकिन यह सपना ही रह गया। जब अटल बिहारी वाजपेयी जी प्रधानमंत्री बने, उन्होंने इस पर ध्यान दिया कि उत्तरी नदियों में बाढ़ का सारा पानी बेकार चला जाता है, इस पानी का उपयोग कैसे किया जाये। मंत्रियों की एक कमेटी बनायी गयी। राजस्थान की चंबल नदी को मध्यप्रदेश की काली व सिंध से जोड़ने की बात की गयी। परंतु दूसरी सरकार के आने पर यह का कार्य धीमा पड़ गया। जिस तरह राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण हुआ, नदियों का भी हो सकता था। पंजाब राजस्थान को पानी देने में हमेशा आनाकानी करता रहता है। भारत का पानी पाकिस्तान में बहकर चला जाता है, अगर वही पानी राजस्थान को दिया जा जाये तो स्थिति काफी सुधर सकती है। मैं समझता हूं कि जल को राष्ट्रीय संपदा मानकर मानकर, 2002 की राष्ट्रीय जल नीति में थोड़ा परिवर्तन कर केंद्रीय सरकार को अपने पास जल संबंधी अधिकार लेने चाहिये।

आप 2002 की जल नीति में क्या संशोधन चाहते हैं?

इस जल नीति में सिंचाई व कृषि राज्यों का विषय है, राज्यों को सारे अधिकार प्राप्त हैं। जबकि जल नीति राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में बननी चाहिये। आज कावेरी, सतलुज जैसी नदियों पर राज्यों के बीच विवाद है। आज जल संरक्षण पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा। इस पर एकसमान केंद्रीय नीति बनाने की जरुरत है।

आप कृषि व सिंचाई के अधिकार राज्यों से लेने की बात करते हैं। हमारे संविधान ने अनुसूची सात के तहत इन दोनो ही विषयों को राज्य का विषय माना है। दूसरे, यह संघीय व्यवस्था का दौर है। राज्य सरकारें केंद्र से अधिकाधिक अधिकार लेने की माँग कर रहीं हैं। ऐसे में इन विषयों को राज्य से ले लेना क्या संविधान के संघीय ढांचे के विरुद्ध नहीं होगा?

इन्हें समवर्ती सूची के अंतर्गत ले लेना चाहिये ताकि केंद्र के हाथ में कुछ संवैधानिक शक्ति आ जायें। आज केंद्र सरकार कमेटियों व सुप्रीम कोर्ट इत्यादि के माध्यम से राज्य जल विवाद सुलझाने का प्रयास करता है। संवैधानिक प्रावधान इन समस्याओं को निबटाने में मदद ही करेंगे। राष्ट्रीय संसाधनों का राष्ट्रीय हित में उपयोग निश्चित ही लाभकारी रहेगा।

आपने भूजल दोहन की बात कही। शीतल पेय कंपनियाँ जमीन से हजारों लीटर पानी खींचती हैं। इन पर कोई रोक भी नहीं है। विभिन्न सरकारें व आपकी पार्टी इस विषय में क्या कर रही है?

आपका कहना सही है। इस दोहन पर अंकुश लगाना ही चाहिये।

आखिर इस मुद्दे पर कठोर नियम क्यों नहीं बनाये जा रहे हैं?

नियम बनाने की ओर सरकार अग्रसर है। न सिर्फ हमारी पार्टी बल्कि केंद्र व अन्य राज्य सरकारें भी चिंतित हैं।

जल में निजी भागीदारी से आप कहाँ तक सहमत हैं?

बड़े कारखाने जो पानी का बहुत अधिक इस्तेमाल करते हैं व गंदा पानी भी बहाते हैं, ऐसे कारखानों को जल शुद्धि हेतु संयंत्र लगाने चाहिये। उन्हें वह शुद्ध जल आसपास के निवासियों को भी देना चाहिये। अगर अल्प दरों पर यह जल उपलब्ध कराया जाता है तो कोई समस्या नहीं होनी चाहिये। आखिर सरकार भी तो सिंचाई व पीने हेतु जल शुल्क लेकर उपलब्ध कराती है। बाढ़ प्रबंधन, जल शुद्धि, पर्यावरण शुद्धि, वनस्पति विस्तार आदि मसलों पर निजी क्षेत्र की भागीदारी बेहतर सिद्ध हो सकती है। 2002 की नीति में भी निजी भागीदारी को विशेष प्रोत्साहन दिया गया है।

बीजेपी स्वदेशी पर जोर देती रही है और आप निजीकरण की प्रस्तावना कर रहे हैं।

मैं विदेशी कंपनियों की थोड़े ही कह रहा हूं। हमारे भारत में भी बड़ी-बड़ी कंपनियाँ हैं, उनको अधिकार मिलने चाहिये। अगर कोई कंपनी संसाधनों के साथ आगे आती है, जल क्षेत्र में निवेश करती है तो हमें उसका स्वागत करना चाहिये।

आपके जिले में जल समस्या को लेकर लोगों में कितनी जागरुकता है?

हमारी सरकार ने जल-चेतना यात्रा प्रारंभ की है जिससे लोगों में जागरुकता आयी है। इस यात्रा ने गाँव-गाँव जाकर जागरुकता फैलाई है। इससे जल संरक्षण की जरुरत व जल भराव की समस्या इत्यादि मसलों का प्रसार हुआ है। सरकार ने नये बनने वाले घरों की छतों पर पर, विद्यालयों में जल संरक्षण पर बल दिया है। हर विद्यालय में, घरों के पास कुंड बनाये जायें ताकि पानी बह कर व्यर्थ न जा जाये, एकत्र होता रहे। कुएँ व तालाबों की सफाई कराई गयी है। ग्रामीण इलाकों में नुक्कड़ नाटक इत्यादि के जरिये पानी समस्या को रेखांकित किया गया है।

आपने अपनी सासंद निधि से कितनी राशि जल संबधी का कार्यों पर खर्च की है?

लगभग पंद्रह बीस प्रति प्रतिशत राशि का उपयोग हैंडपंप इत्यादि के लिये किया है। मैंने सांसद निधि से पुराने तालाबों की गाद भी निकलवाई है ताकि तालाबों में अधिक पानी रह सके। पाइपलाइन भी लगवाई हैं।
 

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