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जल में बसा देवता

बाढ़अनुपम मिश्रवे पुरोगामी पुरुष हैं। कार्यकर्ता तो आपको बहुत मिलेंगे, परंतु कर्म व ज्ञान का सम्मिश्रण आपको अनुपम मिश्र में ही मिलेगा। ज्ञान, कोरी सूचना भर नहीं, अनुभव की आंच में तपा हुआ अर्जित ज्ञान। उनका समूचा जीवन जल के प्रति एक सच्ची प्रार्थना रहा है। तीन दशकों से भी अधिक समय से वे भारत के लुप्त होते जल संसाधनों को बचा रहे हैं। इसलिये उनका प्रत्येक शब्द एक दस्तावेज बनता है, जहाँ वे जल संकट के विभिन्न पहलुओं को अपनी पैनी दृष्टि से उघाड़ते हैं। नगर जल प्रबंधन, शुद्ध पेयजल, भूजल व सार्वजनिक जल, हरेक मसले पर उनके तर्क बड़े पुष्ट हैं। उनकी दोनों किताबें – ‘आज भी खरे हैं तालाब’ व ‘राजस्थान की रजत बूँदें’ क्लासिक्स में गिनी जाती हैं। इनके देशी विदेशी कई भाषाओं में अनुवाद हो चुके हैं। और किसी सच्चे ज्ञानी की तरह वे अति विनम्र हैं। वृक्ष जितना फलदार होता है, उतना ही झुक जाता है। अनुपम बेहिचक स्वीकारते हैं, राजस्थान के अथाह जलकर्म के समक्ष उनका तीस वर्षीय अनुभव गौण रह जाता है। इन दिनों वे गाँधी शांति प्रतिष्ठान, दिल्ली में पर्यावरण सेल के निदेशक हैं।

आप इतने वर्षों से जल से जुड़े हुये हैं। आपकी जलयात्रा कब शुरु हुई?

मोटे तौर पर तो हम लोग मध्य प्रदेश के हैं, जन्म महाराष्ट्र् में हुआ। थोड़ा होश संभाला तो कुछ समय हैदराबाद में बीता। इन सभी जगहों पर पानी के बहुत काम हुये हैं। इस तरह कुँए, तालाब इत्यादि के संपर्क में आया। बाद के दिनों में दिल्ली में पढ़ाई हुयी और उसके बाद पहली नौकरी गाँधी शांति प्रतिष्ठान से शुरु हुई। जब मैं यहाँ 1969-1970 में आया तो हमारे सचिव ने किसी एक मौके पर मुझे बीकानेर भेजा। यह मेरा राजस्थान का तो पहला अनुभव था, साथ ही उसके नितांत मरु हिस्से बीकानेर का भी पहला अनुभव था, जहाँ बहुत कम पानी गिरता है। मैं तब तक इससे अनजान था। मैंने बचपन में भूगोल में पढ़ा भी होगा तो इतने ध्यान से नहीं ही पढ़ा होगा कि देश में कहाँ पानी ज्यादा गिरता है, कहां कम गिरता है और अगर कम गिरता है तो क्या वहां के समाज ने अपने को ज्यादा मजूबत किया है और अगर अधिक गिरता है तो समाज ने बचने के क्या इंतजाम किये हैं। इन सब बारीकियों में जानने का तब तक कोई मौका नहीं मिला था। बीकानेर गये तो जिनके घर जाना था, उनके आँगन में छोटा सा चबूतरा बना था और उस पर ढक्कन लगा था। मैं सोच में पड़ गया कि तालाबंद यह विचित्र सा ढाँचा आखिर क्या होगा? मैंने पूछा तो उन्होंने बताया कि यह टाँका है। मैंने उससे पहले टांका शब्द भी कभी नहीं सुना था। हमें पहली बार पता चला कि वर्षा का पानी आंगन में गिरते समय एक ढाल से बहकर इस टाँके में जाता है, इकठ्ठा हो जाता है और यही पानी साल भर काम आता है। परंतु यही टाँका क्यों बनाया गया है, कुंआ क्यों नहीं है तो पता चला कि नीचे खारा पानी है। हल्का सा खारा तो मध्य प्रदेश या उत्तर प्रदेश में भी मिल जाता है, परंतु इतना खारा कि पीया ही न जा सके व बादलों का पानी रोकना ही एकमात्र विकल्प है, ये सब मेरे छोटे दिमाग में आने लायक था ही नहीं। वह पानी के विराट कर्म का पहला दर्शन था। ऐसा लगा कि मैं तो कुछ भी नहीं जानता। राजस्थान के समाज ने पानी को कैसे देखा है, कैसे अपनी समस्याओं को आनंद में बदला है, मुझे पता नहीं था। इसके बाद फिर राजस्थान जाना हुआ तो फिर नये अनुभव हुये, पानी के बारे में और पता चला। धीरे-धीरे उस तरफ की खिड़कियां खुलती गयीं। परंतु ये सब छोटी-छोटी खिड़कियाँ थीं, इतना बड़ा काम है कि हर बार कुछ दिखता था, कुछ छूट जाता था। फिर मैंने अपने सचिव को पानी पर कुछ लिखने को सुझाया। वे बहुत उदार थे, हरेक कार्यकर्ता को पूरी छूट देते थे। तब मैंने राजस्थान, मध्य प्रदेश, बुंदेलखंड, गोवा, गुजरात इत्यादि जगहों का पानी संबंधित काम इकट्ठा किया। कोई दस साल काम करने पर ‘आज भी खरे हैं तालाब’ नाम से किताब तैयार हुई। ये किताब शायद आपने पढ़ी होगी।

जी, पढ़ी है। इसके बाद आपने ‘राजस्थान की रजत बूदें’ लिखी।

हाँ। यह किताब ‘आज भी खरे हैं तालाब’ के लगभग दो साल बाद लिखी। आज भी खरे हैं तालाब में एक अध्याय राजस्थान पर है, उसे लिखते में ऐसा लगा कि एक अध्याय से काम नहीं चलेगा। इस समाज का सुंदर जल दर्शन सबके सामने लाने के लिये एक और किताब लिखनी चाहिये। राजस्थान के मरु प्रदेश पर फिर हमने ‘राजस्थान की रजत बूंदें’ लिखी। इस तरह पानी से बहुत सार्थक ढंग से हम जुड़ सके। आज लगभग तीस साल काम करने के बाद भी कहता हूं और ऐसा किसी विनम्रतावश नहीं कहता, आज भी जब भी राजस्थान जाता हूं और नयी बातें पता चलती हैं। अभी पंद्रह दिन पहले ही राजस्थान गया था। इस बार जो जाना उसके समक्ष पिछले तीस साल का अनुभव भी बौना लगता है।

इस बार आपको ऐसा क्या खास पता चला चला?

इस बार हमने जैसलमेर के रामगढ़ खंड को जाना, जो शायद देश का सबसे सूखा हिस्सा है। अब तक मैं जो जानता था, उससे भी नयी जानकारियाँ इस बार मिलीं।

जैसे?

जैसे, हम एक सुंदर से कुँए के संपर्क में आये। इसके चालीस किलामीटर के दायरे में मीठे पानी का कोई दूसरा स्रोत नहीं है। इस कुंऐ के आसपास इतना खारा पानी है कि भेड़ बकरी पीने से मना कर देते हैं। वे सभी इस कुँऐ पर ही आते हैं। हमारा पढ़ा लिखा समाज, जो भूगोल, समाजशास्त्र, इतिहास, जल विज्ञान, राजनीति विज्ञान जानता है, ऐसे समाज के मन में यह सवाल आयेगा कि अगर चालीस किलोमीटर के दायरे में एक मीठा कुँआ है तो ये भेड़ बकरी वहीं क्यों नहीं रहते, वहाँ से किलोमीटरों दूर क्यों रहते हैं, जहाँ से उन्हें रोज चलकर पानी पीने यहाँ आना पड़ता है। इसका उत्तर यह है कि वहाँ मीठा पानी है लेकिन चारा नहीं है। बंजर इलाका है, मुश्किल से चार पेड़ कुँए के इर्द गिर्द बचा कर रखे हुये हैं जिससे पशु छाया में बैठ सकें। राहगीर तीन सौ फीट नीचे से पानी निकाले तो अपना पसीना सुखाने उन पेड़ों के नीचे बैठ सके। आसपास तिनका तक नहीं है। सिर्फ रेत ही रेत। रेत का अनंत विस्तार। ऐसा इलाका अपने यहाँ है, इसका भरोसा नहीं होता, जबकि हम तीस साल से वहां जा रहे हैं। पानी मीठा है लेकिन चारा नहीं है। चारागाह बीस किलोमीटर दूर है। वहाँ प्रकृति ने चारा भरपूर दिया है। वहाँ की घास के बारे में कहावत है कि वह बादल देखकर हरी हो जाती है। वहां हजारों पशु चर सकते हैं, पेट भर सकते हैं। परंतु वहां पानी नहीं है। यह भी प्रकृति का कोई रहस्य ही होगा कि चारा अलग दिया है, पानी अलग दिया है। दोनों को एक जगह देने से दोनों खत्म होते हैं। जिसे आज आप अंग्रेजी में सस्टेनेबिल डेवलपमेंट कहते हैं, यहाँ पर स्वत: ही दिखता है। हमारे मित्र छतरसिंह ने बताया कि कई जगह टयूबवेल आने से चारागाह नष्ट हो गये। पानी खूब हो गया, सब पशु दिन भर वहीं बैठे रहते थे। वहाँ का सारा चारा खत्म हो गया। धीरे धीरे पानी का इतना दोहन हुआ कि टयूबवेल भी खत्म हो गया। उस इलाके में मीठे पानी के तीन कुंए हैं, जो शायद किसी अघोषित पंक्ति में बद्ध होंगे। अपन सरस्वती लुप्त होने का हल्ला सुनते हैं, परंतु इसके नीचे कोई और ही सरस्वती होगी जो लुप्त हो गयी। अपनी पीढ़ी का ज्ञान व समझ देखिये कि हजार बारह सौ साल पहले उसने इन तीन मीठे कुँओं को अलग-अलग समय में, सौ-दो सौ साल के अंतर पर, उसी पंक्ति में ढूंढ़ कर बना दिया। उसके बाद चौथा मीठा कुँआ कोई आज तक बना ही नहीं पाया। अब तो युद्ध के बाद से सीमा पर बीएसएफ की टुकड़ियाँ बैठतीं हैं। उनको भी पानी चाहिये। उनके ट्रक रामगढ़ के टाँकों से ट्र्कों में पानी लेकर आते हैं। यह अछूता भारत है। अभी मैंने सुना कि किसी ने अछूतों पर एक फिल्म बनायी है, इंडिया अनटच्ड। यह अवश्य ही बननी चाहिये, अछूत समस्या हमारा एक दाग है। परंतु यह तो हमारा एक बेदाग, अछूता भारत है। इसके बारे में हमारे राजनेता नहीं जानते, हमारे समाजसेवक नहीं जानते।

यह तो असूर्या पश्चा जैसे हुआ कि सूरज भी यहाँ तक नहीं पहुँचा।

बिल्कुल। इन इलाकों के बारे में तो जब जाते हैं तब ही पता चल पाता है व सिर झुक जाता है, उन लोगों की शक्ति व तपस्या देखकर। इन कुँओं पर किसी भी संस्था या सरकार ने पिछले हजार साल में एक पैसा नहीं लगाया होगा। पंचवर्षीय योजनायें यहाँ नहीं पहुँचती, ये खुद ही फल फूल रहे हैं। ये पाँच सौ साल की योजनाओं के अंतर्गत बनते होंगे। पंचवर्षीय तो यहाँ बहुत छोटी पड़ेगी, लोग मर जायेंगे। खेती नहीं, चारा नहीं लेकिन मीठा पानी है। भौतिक विज्ञान व समाज विज्ञान की दृष्टि से कुँए इतने सुंदर बने हैं। ज्यादा बड़े टाँके बनाकर अधिक पानी बाहर निकाल लिया तो नीचे का भंडार सूख जायेगा। उस भंडार को सुरक्षित रखने के लिये जरूरी है कि पानी एक मात्रा से अधिक न निकाला जाये।

वहाँ के निवासी अनकहे ही इस नियम का पालन भी करते हैं।

बिल्कुल। एक चौकीदार नहीं है वहाँ। आप को ही जाकर पानी का उपयोग करना है, आप को ही उसे संरक्षित करना है।

मुझे आपका तो पता नहीं, परंतु मेरे लिये यह किसी दैवीय इल्हाम से कम नहीं है कि ऐसे स्थान भी भारत में हैं। सही बात है। आप देखिये कि हम अपने समाज के बारे में कितना कम जानते हैं व कितनी फिजूल की चिंता करते हैं। हमें तो इस समाज की जरा भी फिक्र नहीं करनी चाहिये। जब तक हम इन्हें श्रध्दा से देखने का नया दौर नहीं शुरु करेंगे तब तक हम व्यर्थ का उदास होते रहेंगे। जिनते लोग इन्हें सुधारने निकले, आखिर में यही कहते हैं कि हम कुछ कर नहीं पाये या हमारी सुनी नहीं गयी।

उन्हें हमारी बात सुनने की जरुरत भी नहीं है।

बिल्कुल। उन्हें आखिर क्या सुनायेंगे हम। जो हजार साल की योजना बना रहे हैं, उन्हें हम जाकर पर्यावरण व सस्टेनेबिल डिवैलपमेंट सिखायें कि चूँकि संयुक्त राष्ट्र संघ सस्टेनिबल की बात करता है, तुम भी करो तो वो तो कहेगा - भाई हम तो दो हजार साल की प्लानिंग करके चल रहे हैं।

राजस्थान में आयी इंदिरा गाँधी नहर कहाँ तक पानी दे पायी है?

पानी रामगढ़ के बाद बस थोड़ी दूर तक जाता है। इस इलाके में नहर आयी है। नहर पूरी रेत में डूबी पड़ी है, जिसमें एक बूँद पानी कभी नहीं आ पायेगा। करोडों रुपये इस नहर पर खर्च हो चुके हैं। हर साल इस नहर को साफ करने के लिये टैंडर जाते हैं। मैं इतना कड़वा आदमी नहीं हूं, परंतु वहां नहर के नाम पर भ्रष्टाचार देखकर कहना चाहता हूं कि इस नहर का नाम इंदिराजी पर है, उसी इलाके में इंदिराजी के नाम पर एक जेल भी बनानी चाहिये - इंदिरा गाँधी नहर विशेष जेल। नहर विभाग के कर्मचारी, इससे जुड़े राजनेता व कई अन्य लोगों को जेल में भेजा जा सकता है। वहां कोई स्टिंग ऑपरेशन की जरुरत नहीं। आप हजारों चित्र ले सकते हैं। खुला खेल है बंद नहर का। कोई विजिलैंस डिपार्टमैंट नहीं चाहिये। कोई अंधा व्यक्ति भी अपनी डंडी से टटोल कर बता सकता है कि नहर सूखी पड़ी है, रेत में डूबी हुई है। उस इलाके में जमीन आवंटित हो चुकी है खेती करने के लिये। लोग जमीन खरीद चुके हैं, परंतु उन्हें कभी एक बूँद पानी नहीं मिलेगा। और अंत में ये तीन कुंए वहाँ हँसते हुये खड़े होंगे कि तुम्हारी नयी योजना, नयी तकनीक कुछ नहीं काम आया।

सतही जल तो सार्वजनिक संपत्ति है, परंतु भूजल नहीं है। निजी संपत्ति होने की वजह से इसका अनावश्यक दोहन होता है, हम लोग भी बोरिंग करते हैं, बड़ी कंपनियाँ तो हजारों लीटर पानी खींच लेतीं हैं। जो अंतत: सतह जल को भी नुकसान पहुंचाता है।

क्या भूजल पर कड़े कानून बनने चाहिये?

जरूर बनने चाहिये। लेकिन जैसा मैंने अभी नहर वाले किस्से में बताया कि कानून बनने का मतलब उसका पालन करना और उसके न पालन करने के रास्ते खोजना भी है। इसलिये यह कहते हुये डर लगता है कि भूजल का कानून होना चाहिये। इसके दो तीन पहलू हैं। पहला ये कि कितने फुट तक हम खोद सकते हैं। अगर नियम बनता है कि दो सौ फुट से नीचे नहीं जा सकते तो कल कोई तीन सौ फुट खोदेगा, सौ फुट की रिश्वत देगा। कितना पानी निकाल सकते हैं, इसका मीटर लगेगा। फिर हम मीटर की चोरी करेंगे। दूसरा तरीका यह है कि भूजल का उपयोग करो और उसकी भरपाई भी करो। भूजल को रीचार्ज करो। ये विवेक समाज में क्यों नहीं आता। अभी मैंने बताया कि जैसलमेर के उस क्षेत्र में तीन कुँए हैं। समाज तीनों कुँओं का प्रयोग करता है परंतु दुरुपयोग नहीं होने देता। कोई लिखित कानून नहीं है, लेकिन सब लोगों को पता है कि इससे अधिक पानी नहीं निकालना है नहीं तो ये कुंए नष्ट हो जायेंगे। अगर वहाँ हम डीजल की एक मोटर लगा दें, तो पंप कुँए का पानी निकाल फेंकेगा। फिर हम वहाँ खेती भी कर सकते हैं, आसपास हजारों एकड़ खाली जमीन पड़ी है। पांच-दस साल तो बड़े आराम से खेती हो सकती है। बड़ी उर्वर मिट्टी है। उस पर आज तक कभी खेती नहीं हुई, उसका उर्वरता तो बहुत होगी। यही कहकर तो वहां नहर भेजी गयी थी कि बस पानी नहीं है बाकी सब कुछ है। नहर आ जायेगी तो पूरे में खेती हो जायेगी। मुझे लगता है कि वहाँ के लोगों ने तय किया होगा, अलिखित, अघोषित सम्मेलन किया होगा कि उस कुँए का खेती के लिये उपयोग नहीं किया जाये और उस कुँए को बचाया जाये। बिना मिले भी सम्मेलन हुआ होगा, जरुरी नहीं कि हजार लोग बैठे ही हों। सभी पशुपालक हैं और पानीपालक भी हैं। पानी को पाल पोस कर रखना जानते हैं। अपने पर्यावरण के सबसे अच्छे पालक होंगे। सरकार ने भूजल के उपयोग हेतु कानून तो कहीं न कहीं बनाये ही हैं। रजिस्ट्रेशन भी आ गया है कि हैंडपंप कितना खोदा जा सकता है, बिना पंजीकृत किये अगला हैंडपंप नहीं खोदा जा सकता है। कितना भूजल निकालना है, कितना रीचार्ज करना है, अगर यह विवेक हम सीख जायें तो किसी कानून की जरूरत नहीं है और अगर हमने विवेक नहीं किया तो प्रकृति के पास तो इसका हल है ही। प्रकृति नीचे से पानी देना ही बंद कर देगी। जल स्तर नीचे चला जायेगा, आप दो सौ से तीन सौ फुट पर जायेंगे, प्रकृति चार सौ फुट पर चली जायेगी। हम पाँच सौ पर गये तो वह छ: सौ पर चली जायेगी। प्रकृति जल स्तर को गिराती चली जायेगी। उसके बाद हमको वह इलाका छोड़ना पड़ेगा। ऐसी नौबत न आये उससे पहले हम सुधर जायें, ऐसी परिस्थिति बनानी पड़ेगी।

यानी जो ईमानदार हैं, सिर्फ वही बचेंगे, बेईमान का अंत तय है।

कई बार ईमानदार भी जाता है। प्रकृति कभी-कभी इतनी क्रूर हो जाती है कि वह पूरे इलाके को ही खाली करवा देती है। अगर हमने अपने इलाके में तीन सौ के बाद खोदना बंद कर दिया लेकिन और लोगों ने नीचे तक खोदना जारी रखा, तो अंत में औरों के साथ हमें भी आपको भी वह इलाका छोड़ना पड़ेगा। मुझे यह भी लगता है कि सतही जल सार्वजनिक होते हुये भी बचाने लायक है। उसका भी अनावश्यक दोहन हुआ है। राज्यों ने अपनी नदियों पर बांध बनाये हैं। इसलिये सार्वजनिक होते हुये भी इसका निजीकरण जैसा तो हुआ ही है। समाज के एक हिस्से ने इस जल को अपना माना, दूसरे को देने से मना किया। राज्य के बीच जल विवाद इसके उदाहरण हैं। हो सकता है, कल पंजाब पूरे राजस्थान में ही पानी बंद करवा दे। पंजाब की सरकार तय कर सकती है कि अब आगे पानी नहीं दिया जायेगा। फिर भले ही बीस साल तक कोर्ट में लड़ते रहो लेकिन पानी तो पंजाब एक दिन में बंद कर सकता है, जो उत्तर प्रदेश ने दिल्ली कि लिए किया। दिल्ली में अब टिहरी का पानी आ रहा है। अगर कल वहाँ की सरकार पानी देने का विरोध करती है तो फिर से दिल्ली में पानी आपूर्ति रुक सकती है। ये बड़े ही कटु प्रश्न हैं जिनका हल हमारे पास नहीं है।

शायद हम इन प्रश्नों से बचना चाहते हैं।

हाँ! हरेक सरकार को लगता है कि उसके पाँच साल बीत जायें, उसके बाद तो ये दूसरे की समस्या है। दरअसल जल संबधी सार्थक विचार के लिये जल के प्रति ममत्व चाहिये जो हम लोगों में नहीं है।

ममत्व! यह अज्ञेय का बड़ा ही प्रिय शब्द था।

यह तो मैं नहीं जानता परंतु अगर हम पानी को लेकर ममत्व नहीं रखते तो हमें फतेहपुर सीकरी नहीं भूलना चाहिये। अकबर ने नयी राजधानी बनायी, लेकिन कुछ साल बाद छोड़ कर जाना पड़ा। न तो कोई हमला हुआ, न ही कोई रोग फैला लेकिन वहाँ पानी नहीं बचा। आप गौर करें, अकबर कोई छोटा मोटा राजा नहीं था। उसके पास उस समय की सबसे अच्छी जानकारी व संसाधन रहे होगें। वह ऐसे विद्वानों को ढूँढ़कर ला सकता था जो फतेहपुर सीकरी के लिये फिर से पानी जुटा देते लेकिन संभव नहीं बचा होगा। हमें नहीं भूलना चाहिये कि अगर ये घटना पांच सौ साल पहले हो सकती है तो आज भी हो सकती है।

एक बात बतायें। अब तक हमारी सारी चर्चा जल पर केंद्रित रही है, परंतु शुद्ध पेयजल को कैसे जन-जन को उपलब्ध कराया जाये? आज नदियों, नलों में पीने लायक पानी नहीं ही बचा है। हम बोतलीकृत पानी पर अपन अपनी निर्भरता कैसे कम कर सकते हैं?

इसके लिये हमें सोचने का तरीका बदलना पड़ेगा। शुद्ध पेयजल बिल्कुल नया शब्द है। इसके तीन टुकड़े हैं। पहला टुकड़ा हटाइये, पेय जल बचता है। दूसरा टुकड़ा भी हटाईये, सिर्फ जल बचता है। किसी भी भाषा में जल से पहले पेय प्रत्यय नहीं लगता था। जल मात्र ही पीने लायक बचाकर रखा जाता था। लोग सीधे कुँओ, नदियों, तालाब से पानी पीते थे। उन्हें गंदा करते ही नहीं थे। आपको रामायण, बाइबिल आदि धर्म ग्रथों में उदाहरण मिल जायेंगे। हमारे सभी धर्मावतार नदी, तालाब से सीधे पानी निकाल चुल्लू में पानी पीते थे। अठारहवीं, उन्नीसवी, बीसवीं शताब्दी यहाँ तक कि इक्कीसवी शताब्दी के प्रारंभ तक पानी पेय ही हुआ करता था। दिल्ली में 1960 तक यमुना का पानी लोग सीधे ही पीने के लिये ले जाते होंगे। मैं नहीं कह सकता कि पहले हमने पानी खराब किया उसके बाद शुद्ध पेय जल मुहावरे को अविष्कृत किया या शुद्ध पेय जल को प्रचलित करने के लिये हमने पानी खराब होने दिया कि इस नदी को बेकार हो जाने दो फिर इतने करोड़ लीटर पानी का हम व्यापार करेंगे, नया बाजार खोजेंगे। आज हर निगम इस बात का दावा करती है कि वह पानी को शुद्ध करके ही नल में भेजती है फिर भी हमें उसके पानी पर भरोसा नहीं है। शहर में रहने वाला हर परिवार, अपनी हैसियत के अनुसार, बीस रूपये से लेकर बीस हजार तक के फिल्टर नगर निगम के नल में लगाता है। नदी, तालाब की बात तो भूल ही जाइये। इसका यह अर्थ हुआ कि वातावरण भी बना है कि हम तो आपको पानी शुद्ध दे ही नहीं रहे हैं। शुद्ध पेय जल तो कहीं और से लेकर आइये। बोतल के पानी पर निर्भरता तब कम होगी जब हम अपनी नदियों का पानी गंदा नहीं करेंगे। पानी को शुद्ध रहने देंगे। आज भी देश के अनेक हिस्से हें जहॉ बोतल का पानी नहीं पहुँचा है। बहुत से इलाकों में कुँए का पानी बड़ा ही शुद्ध होता है, उसे सीधे पिया जा सकता है। परंतु ऐसे इलाके हमारी आंखों के सामने नहीं हैं।

और जो इलाके सामने हैं, उनमें पानी पीने लायक नहीं बचा है। दिल्ली जैसे महानगर में जल प्रबंधन की सबसे बड़ी चुनौती आपको क्या लगती है?

यह प्रश्न तो सचमुच हमारी बुद्धि से बाहर का बन गया है। एक तो नदी को नदी नहीं रहने दिया है, नाले में बदल दिया है। तीन-तीन सौ करोड़ तीन की योजनायें यमुना पर आ चुकी हैं। कल ही प्रधानमंत्री ने एक और योजना घोषित की है। हर योजना के बारे में सरकार कहती है कि अपेक्षित परिणाम नहीं निकले। क्या थी अपेक्षा? तीन सौ करोड़ खर्च करने के बाद अपेक्षित परिणाम नहीं निकले तो दूसरी योजना कैसे बनी, अगर उससे अपेक्षित परिणाम नहीं निकले तो तीसरी कैसे बनी। कम से कम अब तो योजना बनाना बंद करो। सरकार को ये बताना चाहिये कि पिछली योजनाओं में इतना पैसा खर्च हुआ लेकिन परिणाम नहीं निकला इसका कारण यह है कि गलत तरीके से हमने यमुना की सफाई की। अब हम उस तरीके से नहीं करेंगे। इसे सार्वजनिक करना चाहिये। इसके बगैर फिर से यूं ही पैसा खर्च होगा व यमुना साफ नहीं होगी। दूसरा, लगभग हर साल प्रकृति यमुना को साफ कर आपको वापस करती है। बाढ़ के दिनों में पूरी गंदगी बह जाती है। परंतु हम गंदा करना बंद नहीं करते। हम यमुना की सफाई की योजना तो बताने हैं उसको गंदा न करने की योजना नहीं बनाते।

हम सिर्फ दिखावे की सफाई करते हैं। झुग्गियों को हटा देते हैं। हम छिटपुट काम करते हैं। क्लोरीन वगैरा से सफाई करते हैं। झुग्गियों को हटा देते हैं फिर वहाँ खेल गाँव बसा देते हैं, अक्षरधाम व सचिवालय बसा देते हैं। अब तो हम कह रहे हैं कि हमें इतना चौड़ा नदी का पाट ही नहीं चाहिये, यूरोप की तर्ज पर हम इसको एक चैनल में बदल देना चाहते हैं। आसपास करोड़ों की जमीन निकल आयेगी। आज हम इस योजना को रोक नहीं पायें लेकिन इसको एक दिन यमुना रोकेगी। जिस दिन उसको यह चैनल तोड़कर बहना होगा, वह बहेगी। नदी यूरोप में भी बही है। अभी हाल ही में डैन्यूब में बाढ़ आयी, उसमें नौ देश डूब गये। हमें नदियों का इलाका श्रध्दा से अलग करना ही होगा कि हम इसमें पैर नहीं रखेंगे। यह स्वीकारेंगे कि यह तो नदी का इलाका है, वही इसकी स्वामिनी है। मैं यमुना के बारे में इतना ही कहना चाहूँगा कि दिल्ली शहर सात बार बसाया उजाड़ा गया है। यह आठवीं बार भी उजड़ सकता है। गिनती सात पर ही खत्म नहीं होती। अगर हमें इसे आठ नहीं करना है तो जो पानी संबंधी काम दिल्ली में हो चुके हैं, हमें उन्हें याद करना चाहिये। कहा जाता है कि दिल्ली में इस कोने से उस कोने तक पॉच सात सौ तालाब थे। इनमें वर्षा का पानी भरता था। कुछ बहकर यमुना में जाता था, यमुना में थोड़ी सी बाढ़ आती थी। आज यमुना में खूब बाढ़ आती है क्योंकि हमने पानी रोक कर रखने के सारे तरीके छोड़ दिये हैं। हमने यमुना के इलाकों में मकान बना दिये हैं, हाउसिंग सोसाइटी बना दी हैं। परंतु अगर पानी की स्मृति में कोई जगह है तो पानी दौड़कर वहाँ आता है।

पानी की स्मृति! यह तो काफी सुंदर अभिव्यक्ति है।

पानी की स्मृति कभी नहीं मिटती। बूँद-बूँद पानी की स्मृति बनी हुई है कि इसको गंगा में मिलना है या यमुना में। इसमें कभी भी घालमेल नहीं होता। पानी के राज्य में कोई दलबदल नहीं है कि आज इस इस पार्टी का राज है तो चलो अपनी पार्टी छोड़ उस पार्टी में चलते हैं।

पानी की स्मृति वापस अपने बचपन, मुहल्ले, गाँव में लौट आती है।

बिल्कुल। वह लौट आती है। आप दस मंजिल की इमारत बना दीजिये, अगर वह पानी की स्मृति का इलाका है तो वह दस मंजिल डुबो देगी। पानी को आप घुमा दीजिये, दीवार बना दीजिये, परंतु वह उस दीवार को तोड़ कर वापस अपने घर आ जाता है।

यूरोप, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया हर जगह ऐसा हुआ है। उत्तर बिहार की वर्तमान बाढ़, जिसमें करीब एक करोड़ लोग डूबे हैं, उसके बारे में संयुक्त राष्ट्र संघ ने कहा है कि अभी तक की स्मृति में यह सबसे बड़ी बाढ़ है। ऐसा इसलिये हुआ कि हमने पानी की विस्मृति की। हम भूल गये कि पानी कहां बहता है। हमने कहा कि यहाँ एक बिल्डिंग बनाओ, यहां एक हाईवे बनाओ, एक रेलवे लाइन डाल दो। हमने पानी के रास्ते से छेड़छाड़ की। बिहार में पानी ज्यादा नहीं गिरा है। वर्षा औसत ही हुई है। पानी तो अपने रास्ते ही जा रहा है। चूंकि हमने उसके रास्ते तोड़ दिये हैं, वह बिफर रहा है। मोटे तौर दिल्ली को यह याद रखना होगा कि उसे अपने पानी, अपने अकाल व बाढ़ के लिये, राजधानी में पानी संकट न होने देने के लिये, फिर से तालाबों पर लौटना होगा। जिन तालाबों में बिल्डिंग बन गयीं हैं या तो उन्हें खाली करवायें और अगर नहीं खाली कर सकते तो दूसरी जगहों पर तालाब बनवाने होंगे। अगर हम यह कुशन नहीं बनायेंगे, हमारा भूजल घटता जायेगा। आज हम टिहरी से पानी लाते हैं, फिर कोई और दूर का बाँध ढूंढ़ना होगा। बाँध बनाने की भी एक सीमा होती है। एक सीमा के बाद आप किसी नदी पर बाँध नहीं बना सकते और अगर दिल्ली में पानी नहीं रहा तो हो सकता है कि देश की राजधानी बदल कर दिल्ली के बजाय कोई और हो जाये। आखिर बिना पानी के राजधानी कैसे चलेगी।

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