धरती के लिए आकाश को बचाएं

Submitted by admin on Tue, 02/03/2009 - 09:41
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देवेंद्र मेवाड़ी


यह हमारा सौभाग्य है कि विशाल सौरमंडल में केवल हमारी पृथ्वी पर जीवन रचा गया। इसमें विशाल सागर बने। विस्तृत मैदान और ऊंचे पहाड़ बने। सागरों में जन्म लेकर पेड़-पौधों ने धरती पर कदम रखे और प्राणवायु पैदा करके पृथ्वी के चारों ओर के वायुमंडल में इसकी मात्रा बढ़ाई, ताकि इसमें सांस लेकर सभी जीव पनप सकें। प्राणी पनपे और पेड़-पौधों के पीछे-पीछे धरती पर आए। पेड़-पौधों ने उन्हें सांसें दीं और भोजन दिया। हमारे वायुमंडल में मुख्य रूप से प्राणवायु ऑक्सीजन और नाइट्रोजन पाई जाती है। वायुमंडल में 10 से 50 किलोमीटर की ऊंचाई तक ओजोन गैस की परत है। सभी जीवधारियों के सिर पर इसी परत की सुरक्षात्मक छतरी तनी हुई है। ओजोन की परतें सूरज से पृथ्वी की ओर आने वाली खतरनाक अल्ट्रा-वॉयलेट किरणों को रोक लेती हैं।

वैज्ञानिक लगातार आगाह करते आ रहे हैं कि अगर हमने प्रकृति से छेड़छाड़ की, इसे दूषित किया, तो यह दुनिया रहने लायक नहीं रहेगी। लेकिन हमारी अपनी करतूतों ने इसे रहने लायक अब रखा कहां है! बड़े शहरों में जीता हुआ आदमी कार्बन कण, धूल-कुहासा और दूषित हवा फेफड़ों में खींचता, विषैले पदार्थ मिला अनाज तथा साग-भाजी खाता और मोटर कारों व कल-कारखानों का कर्कश कोलाहल झेलता हुआ बस किसी तरह जी रहा है। फिर भी हवा का प्रदूषण जारी है। कल-कारखाने, मोटर कारें, भटि्टयां, चूल्हे और जंगलों की आग हवा में लगातार धुआं उगल रही हैं। इससे जो जहरीली गैसें पैदा हो रही हैं, वे ओजोन की परत पर सीधे वार कर रही हैं।

अगर कार्बन डाई ऑक्साइड सामान्य मात्रा में वायुमंडल में मौजूद हो, तो धरती की सतह से लौटने वाली गरमी को बांधकर हमारे लिए सही तापमान बनाए रखती है। लेकिन, वायुमंडल में लगातार इसकी मात्रा बढ़ने से यह कंबल का काम करती है और गरमी को रोक देती है। गरमी बढ़ती चली जाती है और मौसम गरमी की मार दिखाने लगता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि पिछले 50 वर्षों में भूमंडल का तापमान 0.5 डिगरी सेल्सियस बढ़ा है और अनुमान है कि अगले 50 वर्षों में तीन से चार डिगरी सेल्सियस तक और बढ़ेगा। औद्योगिक प्रगति की यही दर रही, तो आने वाली सदियों में गरमी को झेलना मुश्किल हो जाएगा। गरमी बढ़ने से मौसम बदलेंगे। गरम प्रदेशों में अथाह गरमी से सूखा पड़ जाएगा। न्यूयॉर्क के वर्ल्ड वाच इंस्टीट्यूट ने भविष्यवाणी की है कि गरमी बढ़ने से खाद्यान्नों का उत्पादन घटता जाएगा। फसलों को भारी नुकसान होगा। भूमध्य सागरीय क्षेत्र पूरी तरह सूखे की चपेट में आ जाएंगे।

वर्ल्ड वाच इंस्टीट्यूट की रपट में बताया गया है कि अगले 100 वर्षों में तापमान एक से पांच डिगरी सेल्सियस बढ़ जाएगा। तापमान बढ़ने से ध्रुवों की बर्फ पिघलेगी। बर्फ पिघलने से नदियों में बाढ़ आएगी। नदियां गाद से दोआबों को भर देंगी। सागरों का जल-स्तर बढ़ जाएगा। सागर तटों पर बसे शहर डूब जाएंगे। मौसम विज्ञानियों का कहना है कि बंगाल की खाड़ी में ऐसी प्राकृतिक विपदाएं बढ़ती जाएंगी और अनुमान है कि अगली सदी के अंत तक बांग्लादेश का सारा भू-भाग सागर में डूब जाएगा।

नदियों में पानी बढ़ने के कारण गंगा, ब्रह्मपुत्र और नील नदी के किनारे बसे नगर डूब सकते हैं। कोलकाता शहर को सागर की लहरें घेर लेंगी। ध्रुवों की बर्फ पिघलने से हॉलैंड, जमैका, मालदीव और अटलांटिक महासागर में फैला बहामा द्वीप-समूह भी शायद जल-प्रलय की भेंट चढ़ जाएगा। वल्र्ड वाइड फंड फॉर नेचर से सहायता प्राप्त एक वैज्ञानिक अध्ययन में इस खतरे की ओर संकेत किया गया कि तापमान बढ़ने से जंगलों की हरियाली उत्तर की ओर सिमटने लगेगी और टुंड्रा वनों तक नष्ट हो जाएगी, जिससे लाखों पक्षियों व अन्य जीव प्रजातियों का जीवन संकट में पड़ जाएगा। यह खतरा 2010 तक दिखाई देने लगेगा।

वैश्विक तपन बढ़ने से आबोहवा बदलती जा रही है। विश्व के अनेक भागों में सूखा पड़ रहा है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं। एशिया, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में पानी का भारी संकट शुरू हो चुका है। तापमान बढ़ने से फसलों पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ रहा है। नतीजतन उपज घट रही है। इस तरह अकाल का साया फैलता जाएगा और विश्व भर में गरीब वर्ग ही नहीं, मध्यवर्ग भी भूख से प्रभावित हो जाएगा।

ग्लोबल वार्मिंग के इस महा संकट को रोकने के प्रयास अब हमें आपातकालीन स्तर पर शुरू कर देना चाहिए। बदलती आबोहवा के संकेतों को समझकर हमें आसन्न कार्बन ग्रीष्म ऋतु के मारक कदमों को रोकना होगा। इसके लिए दुनिया के सभी देशों के नागरिकों के साथ ही नीति निर्धारकों और राजनेताओं को भी एकजुट होकर कार्बन डाई ऑक्साइड गैस और ग्रीनहाउस गैसों की नकेल कड़ाई से कसनी होगी।

(लेखक विज्ञान कथाकार हैं)

साभार – अमर उजाला

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