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नेग में मिली हरियाली

आप मानें या न मानें, उत्तराखंड की लड़कियों ने शादी के लिए आए दूल्हों के जूते चुरा कर उनसे नेग लेने के रिवाज को तिलांजलि दे दी हैं। वे अब दूल्हों के जूतें चुराकर रूढ़ि को आगे नहीं बढ़ातीं। बलकि उनसे अपने मैत (मायके) में पौधे लगवाती हैं। इस नई रस्म ने वन संरक्षण के साथ-साथ सामाजिक समरसता और एकता की एक ऐसी परंपरा को गति दी है जिसकी चर्चा अब उत्तराखंड तक सीमित नहीं रह गई है।

मैती आंदोलन की भावनाओं से अभिभूत होकर अब लोग जहां पेड़ लगा रहे हैं। वहीं उनके व्यवहार भी बदल रहे हैं। पर्यावरण के प्रति उनके सोच में परिवर्तन आ रहा है। यही वजह है कि अब लोग अपने आसपास के जंगलों को बचाने और इसके संवर्धन में भी सहयोग करने लगे हैं। इस आंदोलन के चलते पहाड़ों पर अब काफी हरियाली दिखने लगी है और सरकारी स्तर पर होने वाले वृक्षारोपण की भी असलियत उजागर हुई है। गांव-गांव में मैती जंगलों की श्रंख्लाएं सजने लगी हैं।

पर्यावरण संरक्षण के लगातार बढ़ते इस अभियान को अपनी परिकल्पना और संकल्प से जन्म देने वाले कल्याण सिंह रावत ने कभी सोचा भी नहीं था कि उनकी प्रेरणा से उत्तराखंड के एक गांव से षुरू हुआ यह अभियान एक विराट और स्वयंस्फूर्त आंदोलन में तब्दील हो जाएगा। अब तो इसकी व्यापकता इतनी बढ़ गई है कि इसके लिए किसी पर्चे-पोस्टर और बैठक-सभा करने की जरूरत नहीं होती है। मायके में रहने वाली मैती बहनें शादियों के दौरान दूल्हों से पौधे लगवाने की रस्म को खुद-ब-खुद अंजाम देती हैं। विवाह के समय ही पेड़ लगाने की इस रस्म के स्वयंस्फूर्त तरीके से फैलाने की एक वजह यह भी है कि इस मौके पर बारात में आए लोग भी शामिल होते हैं। जो अपने गांव वापिस जाकर अपने यहां इसे लागू करने से नहीं चूकते। शादी कराने वाले पंडित भी इस आंदोलन का मुफत में प्रचार करते रहते हैं। अब तो शादी के समय छपने वाले निमंत्रण पत्रों में भी मैती कार्यक्रम का जिक्र किया जाता है।

मैत्री आंदोलन के जरिए मैत्री बहनों ने वह कर दिखाया है जो न तो कोई सरकार कर सकी और न ही कोई संगठन ही कर सकते थे। मैत्री बहनों ने पर्यावरण के क्षेत्र में इंसानी रिष्तों को और अधिक निकट लाने के साथ ही न केवल पहाड़ के इलाके को, बल्कि मैदानी क्षेत्रों को भी हरा-भरा करने का एक ऐसा बीड़ा उठा लिया है जिससे न केवल उत्तराखंड सहित अपने देश के कई राज्य, बल्कि दुनिया के कई देश भी मुग्ध हैं। एक छोटी-सी शुरूआत ने घर-घर, गांव-गांव दस्तक देकर आज मैत्री आंदोलन का रूप ले लिया है। आठ हजार गांवों में यह आंदोलन फैल गया है और इसके तहत लगाए पेड़ों की संख्या एक करोड़ से भी ऊपर पहुंच गई है।

करीब डेढ़ दशक पहले चमोली के ग्वालदम से फैला यह आंदोलन कुमाऊं में घर-घर होते हुए अब गढ़वाल के हर घर में दस्तक देने लगा है। शुरूआती दौर में पर्यावरणीय संरक्षण के वास्ते चलाए गए इस अभियान में महिलाओं और बेटियों ने इसमें सर्वाधिक भागीदारी निभाई। मैती का अर्थ होता है लड़की का मायका। हरेक बेटी चाहती है कि उसका बचपन जिस धरती की गोद में विकसित हुआ है उस धरती में हर प्रकार की सुख समृध्दि हो। उसके मायके में पानी की कमी न हो, जंगल हरे-भरे बने रहें। धरती खूब अन्न उपजाती रहे। हर बच्चा, बूढ़ा समृद्ध और स्वस्थ रहे। यही सब मनोकामना ही मैती है।

इसी भावनात्मक लगाव के कारण ही आज हर गांव के बेटी इस आंदोलन से जुड़ रही है और इसे आगे बढ़ा रही है। इस आंदोलन को बहुमुखी रूप देने के लिए सबसे पहले लड़कियां अपने गांव में मैती संगठन बनाती हैं।

गांव की हर अविवाहित लड़की इस संगठन से जुड़ती है। इसमें स्कूल जाने वाली लड़कियों के साथ, घर में रहने वाली लड़कियां भी शामिल होती हैं। इस संगठन का लड़कियों के घर-परिवार के साथ गांव की महिला मंगल दल का भी समर्थन सहयोग प्राप्त होता है। बड़ी-बूढ़ी महिलाएं भी मैती की गतिविधियों में शामिल होने से नहीं चूकतीं। मैती संगठन की कार्यविधि बिल्कुल साफ और एकदम सरल है। संगठन को मजबूत और रचनात्मक बनाने के लिए सभी लड़कियां अपने बीच की सबसे बड़ी और योग्य लड़की को अपना अध्यक्ष चुनती है, अध्यक्ष पद को बड़ी दीदी का नाम दिया जाता है। अध्यक्ष पद को बड़ी दीदी के नाम से संबोधित किया जाता है। बड़ी दीदी का सम्मान उनके गांव में उतना ही होता जितना एक बड़े परिवार में सबसे बड़ी बेटी का होता है। गांव के मैती संगठन की देखरेख और इसको आगे बढ़ाने का काम चुनी गई बड़ी दीदी ही करती है। बाकी सभी लड़कियां इस संगठन की सदस्य होती हैं। जब बड़ी दीदी की शादी हो जाती है तो दूसरी योग्य लड़की को बहुत सहजता के साथ संगठन की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है। और यह क्रम लगातार चलता रहता है। गांव की हरेक लड़की मायके में अपने घर के आसपास किसी सुरक्षित जगह पर अपने प्रयास से किसी वृक्ष की एक पौध तैयार करती है। यह पौध जलवायु के अनुकूल किसी भी प्रजाति की हो सकती है। कुछ लड़कियां जमीन पर पॉलीथीन की थैली पर केवल एक पौधा तैयार करती हैं। गांव में जितनी लड़कियां होती हैं, उतने ही पौधे तैयार किए जाते हैं। हरेक लड़की अपने पौध को देवता मानकर या अपने जीवन साथी को शादी के समय देने वाला एक उपहार मानकर बड़ी सजगता, तत्परता और सुरक्षा से पालती-पोसती रहती हैं। इस तरह अगर गांव में सौ लड़कियां हैं तो सौ पौध तैयार हो रहे होते हैं। ये पेड़ मायके में बेटी की विरह झेल रही मां-बहन और भाईयों के लिए यादगार होता है, वहीं पिता के लिए बुढ़ापे का सहारा भी साबित हो रहा है। वैज्ञानिक दृष्टि से अनुमान लगाएं तो एक फलदार पेड़ अपने पूरे जीवन में पालकों को कम से कम सत्रह लाख से अधिक का लाभ दे जाता है। इस तरह मैती आंदोलन के तहत लगाया गया पेड़ बेटियों द्वारा पिता का ऋण चुकाना भी माना जा रहा है। पेड़ उस समय भी लड़कियों के लिए आनंद का कारण बन जाता है, जब वे अपने बड़े हो रहे बच्चों के साथ मायके आती हैं तो देखती हैं कि उनका लगाया पेड़ भी उनके बच्चों की तरह बड़ा हो गया होता है। बड़े हुए पेड़ एक आत्मिक आनंद देने के साथ अपने मायके के लोगों के प्रति भी विष्वास कायम करने में मदद करते हैं क्योंकि जिस पेड़ को वह मायके में लगा कर जाती है उसकी देखभाल माता-पिता और भाईयों द्वारा किया जाता है तभी वह पेड़ बड़ा हो पाता है।

किसी भी गांव की लड़की की शादी तय हो जाने पर बड़ी दीदी के मां-बाप से बातचीत करके उनके घर के ही आंगन में या खेत आदि में शादी के समय दूल्हे के साथ पौधारोपण कर देती हैं। शादी के दिन अन्य औपचारिकताएं पूरी हो जाने पर बड़ी दीदी के नेतृत्व में गांव की सभी लड़कियां मिलकर दूल्हा-दुल्हन को पौधारोपण वाले स्थान पर ले जाती हैं। दुल्हन द्वारा तैयार पौधे को मैती बहनें दूल्हे को यह कहकर सौंपती है कि यह पौधा वह निशानी है या सौगात है जिसे दुल्हन ने बड़े प्रेम से तैयार किया है। दूल्हा मैती बहनों के नेतृत्व में पौधा रोपता है और दुल्हन उसमें पानी देती है। मंत्रोच्चार के बीच रोपित पौधा दूल्हा-दुल्हन की विवाह की मधुर स्मृति के साथ एक धरोहर में तब्दील हो जाता है। पौधा रोपने के बाद बड़ी दीदी दूल्हे से कुछ पुरूस्कार मांगती है। दूल्हा अपनी हैसियत के अनुसार कुछ पैसे देता है जो मैती संगठन के कोष में जाता है। मैती बहनें दूल्हों से प्राप्त पैसों को बैंक या पोस्टआफिस में या गांव की ही किसी बहू के पास जमा करती हैं। पहले जूते चोरी करने के एवज में जो पैसे मिलते थे उनका कोई सामाजिक उपयोग भी नहीं होता था। यों ही खाने-पीने के सारे पैसे उड़ जाते थे। लेकिन अब पेड़ लगाने के फलस्वरूप प्राप्त पैसों का सदुपयोग गांव की गरीब बहनों की मदद के लिए किया जाता है। गरीब बहनों के विवाह के अलावा इन पैसों से उन बहनों के लिए चप्पल खरीदी जाती हैं, जो नंगे पांव जंगल में आती-जाती हैं या इन पैसों से गरीब बच्चियों के लिए किताब या बैग आदि खरीदे जाते हैं। हरेक गांव में मैती बहनों को साल भर में होने वाली दस-पंद्रह शादियों से करीब तीन-चार हजार से अधिक पैसे जमा हो जाते हैं। ये पैसे मैती बहनें अपने गांव में पर्यावरण संवर्धन के कार्यक्रम पर भी खर्च करती हैं।

जिस उत्तराखंड की गौरा देवी की गाथा पर्यावरण संरक्षण की गाथा बन गई, वहीं मैती बहनों का यह अभियान भी पर्यावरण के क्षेत्र में देश-दुनिया के लिए अनुकरणीय बन गया है। पर्यावरण आंदोलन की प्रतिमूर्ति गौरा देवी की परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए अस्सी के दशक में ग्वालदम की कुछ महिलाओं ने विवाह के शुभ अवसर पर दूल्हे के जूते चुराने की परंपरा को तोड़कर दूल्हे से वृक्ष लगाने का नेग मांगा और यह आंदोलन षुरू हो गया। अब यह आंदोलन उत्तराखंड सहित देश के आठ राज्यों में भी अपनी जड़ें जमा चुका है। चार राज्यों में तो वहां की पाठय-पुस्तकों में भी इस आंदोलन की गाथा को स्थान दिया गया है। कनाडा में मैती आंदोलन की खबर पढ़कर वहां की पूर्व प्रधानमंत्री फलोरा डोनाल्ड आंदोलन के प्रवर्तक कल्याण सिंह रावत से मिलने गोचर आ गई। वे मैती परंपरा से इतना प्रभावित हुई कि उन्होनें इसका कनाडा में प्रचार-प्रसार शुरू कर दिया। अब वहां भी विवाह के मौके पर पेड़ लगाए जाने लगे हैं। कैलीफोर्निया में कार्यरत माया चढ्ढा ने पर्यावरण को बचाने के लिए यह अभियान अमेरिका में शुरू किया तो इसकी चर्चा वहां के अखबार वाशिंगटन पोस्ट में विस्तार से हुई। बीबीसी पर भी इस आंदोलन के बारे में अब तक तीन बार कार्यक्रम प्रसारित हो चुके हैं। मैती परंपरा से प्रभावित होकर कनाडा सहित अमेरिका, आस्ट्रिया, नार्वे, चीन, थाईलैंड और नेपाल में भी विवाह के मौके पर पेड़ लगाए जाने लगे हैं।

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