पंजाब: सब्मर्सिबलों की शर-शय्या पर

Submitted by admin on Thu, 09/10/2009 - 20:26
Printer Friendly, PDF & Email
Source
सुरेन्द्र बंसल / गांधी मार्ग

पांच नदियों के नाम पर बसे पंजाब में आज उन नदियों की बात करना पिछड़ा कहलाना होगा। पंजाब की मिट्टी, पंजाब का पशुधन, पंजाब का पानी, पंजाब के परिंदों का दिन दूनी-रात चौगुनी गति से गायब होना जितने माथों की शिकन होना चाहिए था, जितने दिलों की उदासी होना चाहिए था, उतना है नहीं। ऋषियों, गुरूओं, संतों द्वारा प्राकृतिक संपदाओं के गुणगान, लोकगीतों में बहारों की धमक, किसी प्रिय के आगमन के लिए परिंदों को छतों की मुडेरों पर बुलावे मानो छलावे थे। इन्हीं रसभरी परंपराओं वाले पंजाब को लंदन-पेरिस बनाने पर तुले हैं नए विकास पुरूष।

इस सनातनी देश में धर्म, जाति, संप्रदाय कुछ भी रहा हो, सबके धर्मस्थान पानी के बिना अधूरे ही समझे गए। पंजाब में हजारों गुरूद्वारों के नाम के साथ अमृतसर (यानी अमृत के तालाब) की परंपरा का निरवाहन है। यहां तक कि हरित क्रांति के भगदड़ी दौर में रीते कूओं के नाम पर आज भी कुछ गूरूधामों का नाम खूहीसर, यानि कुआंसर तक है। लेकिन पंजाब में पानी की लहलहाती परंपराओं को उखाड़ने में सबसे ज्यादा हाथ पंजाब के विभिन्न संप्रदाओं के धर्मस्थलों का है। कुछ धर्मस्थलों को छोड़ दें, शेष अनेक धर्मस्थानों की नाभि माने गए तालाबों, बावड़ियों को मिट्टी से भरकर प्लाटों में बदल दिया गया है। प्लाट के बाद दुकानदारी तो अगली सीढ़ी है ही। मात्र कथा-कहानी को ही धार्मिक कृत्य मनाने वालों ने परमात्मा के हस्ताक्षर मिटाने का काम भी साथ-साथ जारी रखा है। हांफती रस्मों के इस दौर में पानी का भी दम घुट रहा है। ‘पंजाब’ (पंज आब, पांच पानी, पांच नदियां) जैसा रसभरा शब्द भी रसविहीन होकर रह जाएगा।

पंजाब से बहने वाली सभी प्रमुख नदियां अब केवल बरसाती नदियां बन कर रह गई हैं। सतलुज की तीन प्रमुख नदियां जयंती, सिस्वां तथा बुदकी लगभग लुप्त हो चुकी हैं। जयंती नदी शिवालिक से निकल कर आती है। 20 वर्ष पूर्व तक पानी से भरी रहने वाली शिवालिक की यह बेटी आज हाशिए की लकीर मात्र रह गई है। नदियों के किनारों पर अवैध निर्माण ने स्थिति को और भी गंभीर बना दिया है।

सुंदर परंपराओं की जड़ काटकर पहले नल, फिर नलकूप और अब तो सब्मर्सिबल लगाए जा रहे हैं। हालात इतने विचित्र होते जा रहे हैं कि सब्मर्सिबल मानों गली-मुहल्ले से हटकर रहने वाले तथाकथित संभ्रात परिवारों के भवनों के बाहर टंगी नामपट्टी बन गया है। लड़की-लड़के का रिश्ता मिलाने के लिए कुंडली के साथ-साथ घर में सब्मर्सिबल देखकर जोड़ा जाने लगा है। सब्मर्सिबल न दिखने पर पूछा भी जाता है कि सब्मर्सिबल क्यों नहीं है।

ऐसी ही करतूतों के कारण यानी अत्यधिक भूजल दोहन के कारण जल स्तर औसतन प्रतिवर्ष 20 से.मी. नीचे जा रहा है। पानी के घटते स्तर की भयंकर स्थिति के लिए पंजाब नंबर एक पर है। यानी पंजाब दी बल्ले-बल्ले है। उसके बाद हरियाणा, राजस्थान और तमिलनाडु आते हैं। पंजाब की भयंकर स्थिति इसलिए मानी जानी चाहिए क्योंकि प्रदेश में कुल 118 ब्लाक मंडल जल संभर (डार्क जोन) हैं। उनमें से 62 की गिनती अति दोहित क्षेत्रों में आ चुकी है। इन्हीं क्षेत्रों में मानसून से पूर्व भूजल स्तर 4 मीटर तक नीचे चला जाता है। इनमें प्रमुख हैं- संगरूर, अहमदगढ़, पखोवाल, जगरांव, सुंदर परंपराओं की जड़ काटकर पहले नल, फिर नलकूप और अब तो सब्मर्सिबल लगाए जा रहे हैं। हालात इतने विचित्र होते जा रहे हैं कि सब्मर्सिबल मानों गली-मुहल्ले से हटकर रहने वाले तथाकथित संभ्रात परिवारों के भवनों के बाहर टंगी नामपट्टी बन गया है। धूरी, बरनाला, सुनाम, अमृतसर, जालंधर, फिरोजपुर, फरीदकोट, लुधियाना, फतेहगढ़ साहिब, पटियाला, भटिंडा, पट्टी, वेरका, तरनतारण, खंडूर साहिब, जंडियाला, नूरमहल, जालंधर (पूर्व), बंगा, भोगपुर, आदमपुर, नकोदर, शाहकोट, फिल्लौर, गोरायां, समराला, नाभा, समाना, राजपुरा, सरहिंद, मोगा, रामपुराफूल पूर्व। इन सभी क्षेत्रों में गर्मी के दिनों में नलों से पानी की जगह सांय-सांय का सन्नाटा बहने लगता है। दोआबा क्षेत्र देश के सर्वाधिक उपजाउ क्षेत्रों में माना जाता है। उसी क्षेत्र में गिरते भूजल स्तर को देख वैज्ञानिक 15-20 वर्षों में पंजाब के उजड़ जाने की आशंका जताने लगे है।

पंजाब के धरती पुत्रों ने हरित क्रांति के मजे तो लूटे लेकिन इसी हरियाली के पीछे चलते उस काले ब्रुश को नहीं देखा, जो उनका पानी, उनकी मिट्टी, उर्वरा शक्ति, उनका गरिमामय लोकजीवन, उनका लोकसाहित्य, मुर्दों को भी जीवित करने वाला उनका संगीत, सबसे महत्वपूर्ण उनका अनमोल स्वास्थ्य-सब मिटा रहा था। हरे इन्कलाब के बाद में नशे की लत की भी बाढ़ आई और यह बाढ़ सेम (दलदल) की शक्ल में पंजाब का स्थाई बन गई। इसी हरे इंकलाब के बाद पंजाब का किसान गरीबी की रेखा से नीचे गया। किसान परिवारों द्वारा आत्महत्याओं के मामले में देश भर में हमारा प्यारा पंजाब प्रथम स्थान पर आया। नवयुवक सफेदपोश हुए, विकास का सिंहासन प्रवासी मजदूरों की दयादृष्टि पर टिका।

इतना सब होने पर भी देश के कृषि योजनाकार पंजाब की कृषि का मॉडल पूरे देश पर थोपने की फिराक में हैं। पंजाब को कभी अपने गेहूं पर बेहद नाज था। लेकिन धान की फसलों की लगातार बुआई के कारण जो गेहूं अब पंजाब में उगाया जाता है, उसके स्वाद को गली के कुत्ते भी नकार चुके हैं। कुत्ते घरों से फेंकी गई रोटियां अब नहीं खाते, छत पर डाली गई रोटियों को पक्षी नहीं खाते। ऐसी परिस्थितियों के बावजूद कृषि योजनाकार मशरूम उगाने और फूलों की खेती जैसे ऊल-जलूल सुझाव बराबर दिए चले जा रहे हैं।

जो गेहूं अब पंजाब में उगाया जाता है, उसके स्वाद को गली के कुत्ते भी नकार चुके हैं। कुत्ते घरों से फेंकी गई रोटियां अब नहीं खाते, छत पर डाली गई रोटियों को पक्षी नहीं खाते। पंजाब में बेहूदे प्रयोगों के कारण ही पंजाब के पचहत्तर प्रतिशत किसानों की आर्थिक स्थिति बदतर हुई है। लगभग सैंतालीस प्रतिशत किसानों की कृषि व दूध उत्पादों से होने वाली आमदनी प्रदेश के अकुशल माने गए श्रमिक की न्यूनतम आमदनी जितनी रह गई है। पुराने तालाबों को भर कर प्लाटों की शक्ल में बदल देने के बाद सिर्फ पालतू पशुओं को नहलाने मात्र से ही राज्य में बिजली का खर्चा अनाप-शनाप बढ़ा है।

कुछ क्षेत्रों में 1984 के बाद जलस्तर चार से पांच मीटर तक घटने के बाद खारेपन तथा पीने के पानी में नाइट्रेट बढ़ने का खतरा समाने आ चला है। जहां स्कूटर, कार पर मात्र 20 रूपये का स्टीकर चिपकाकर प्रदूशण रोकथाम का सबसे अच्छा और कानूनी उपाय माना जाता हो, वहां धान की भुस्सी, खेतों में डंठल जलाकर पूरे पंजाब को एक डेढ़ महीना खूब हंफाया, खंसाया जाता है। रेल, बस, हवाई जहाज से, कहीं से भी देखें तो पूरा प्रदेश धू-धूकर जलता मिलेगा। आज पंजाब की चक्कियों में पशुओं के लिए पिसने वाले चारे में मरे हुए जानवरों की हडि्डयों का चूरा भी पीस जाता है। पावंटा साहिब की ओर से आने वाला नरम पत्थर तो मिलावट के लिए अलग से पिसा जाता है। इन सब विकसित पद्धतियों के कारण पशुओं और मनुष्यों में कैसी-कैसी बीमारियां फैल रही हैं, इसके ठीक सरकारी या गैर सरकारी आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।

इधर इसी विकास की बर्बर अराजकता के दौर में पढ़ा-लिखा धनाढ्य वर्ग लगभग सब मूलभूत समस्याओं से कट चुका है। उसकी नजरों में तालाबों, बावड़ियों, पुराने पेड़ों को बचाने की बात करना पिछड़ेपन वाली बात है। इसका एक उदाहरण देखें: संगरूर जिले का एक शांति प्रिय शहर मालेरकोटला। इस शहर के बीच एक बेहद विशाल भव्य तालाब था। चारों ओर सुंदर छतरियां थीं, इंप्रूवमेंट ट्रस्ट ने उसको विकास के नाम पर भरने का बीड़ा उठाया। उसको भरने के लिए लगभग तीन महीनों में 25 लाख रूपए लगे। उसके चारों ओर लगी सुंदर छतरियों में तीन छतरियां एक लाख 20 हजार में बेच दी गईं। मात्र एक छतरी अपने पूरे परिवार के उजड़ने के बाद बैरागी सी खड़ी है। इसी तरह के सैकडों उदाहरणों में पुराने तालाब विकास की नई कब्रों में दफना दिए गए हैं।

आज पंजाब में लगभग 14 लाख सब्मर्सिबल दिन-रात पानी उलीच रहे हैं। कोई भी राजनेता, समाजनेता, साधारण किसान तक इस बात को समझने को तैयार नहीं है कि पंजाब की धरती सब्मर्सिबलों की शर-शय्या पर टिकी है। भीष्म पितामह के पास तो इच्छा मृत्यु का वरदान था, एक कामना थी धर्म की जीत की, अंतिम धर्म दीक्षा के लिए कुछ शिष्य चरणों में करबद्धखड़े भी थे। पर पंजाब वालों के पास क्या बचा है? आज पंजाब सरकार के पास शामलात जमीन का कोई इतिहास, रिकार्ड नहीं बचा है। सरकारी नीतियां भी राजनैतिक दलों के उन घोषणा पत्रों की तरह ही होती हैं, जिनको किसी के पास पहुंचना नहीं होता। आज पंजाब का पानी पाताल पर निर्भर है। लेकिन पाताल का पानी समाप्त होने के बाद क्या होगा? तालाब धरती माता की नाभि होते है। नाभि केंद्र में टिकी रहे तो पूरा शरीर संयमित रहता है। नाभि सरकने से क्या होता है, इसको सभी जानते हैं। कभी किसी व्यक्ति के शरीर का पानी समाप्त हो जाए तो कैसी भगदड़ मच जाती है उसको बचाने की। लेकिन आज धरती माता का पानी खत्म होने की ओर है।

आज पंजाब में लगभग 14 लाख सब्मर्सिबल दिन-रात पानी उलीच रहे हैं। कोई भी राजनेता, समाजनेता, साधारण किसान तक इस बात को समझने को तैयार नहीं है कि पंजाब की धरती सब्मर्सिबलों की शर-शय्या पर टिकी है। भीष्म पितामह के पास तो इच्छा मृत्यु का वरदान था, एक कामना थी धर्म की जीत की, अंतिम धर्म दीक्षा के लिए कुछ शिष्य चरणों में करबद्ध खड़े भी थे।

पर पंजाब वालों के पास क्या बचा है?

Add new comment

This question is for testing whether or not you are a human visitor and to prevent automated spam submissions.

2 + 5 =
Solve this simple math problem and enter the result. E.g. for 1+3, enter 4.

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

Latest