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पानी का केन्द्रीय बजट

वित्तमंत्री ने सन 2007-08 का आम बजट पेश करते समय बजट भाषण में सर्वहितकारी वृद्धि, कृषि क्षेत्र के लिए उच्च प्राथमिकता एवं द्वितीय हरित क्रांति का नारा देकर सबको लुभाने की कोशिश की थी। यदि हम बजट को ग्रामीण एवं कृषि क्षेत्र के नजरिये से देखते हुए इस पर गहराई से नजर डालें तो पता चलता है कि वित्त मंत्री ने जो नारा दिया था उसे करनी में नहीं बदला।

लेकिन सबसे पहले उन्हे इस बात की बधाई देनी चाहिए जिनके वे हकदार है। वित्तमंत्री ने भूजल पुनर्भरण की जिस योजना का प्रस्ताव किया है, वह निश्चित तौर पर सही दिशा में उठाया गया एक कदम है। लेकिन, जिस तरीके से उन्होंने योजना का वर्णन किया उससे कई सवाल उठते हैं। श्री चिदंबरम ने कहा कि, ``अत्यंत आवश्यक भूजल पुनर्भरण की रणनीति के तहत वर्षाजल को खुदे हुए कुओं में डालने की योजना है।´´ जबकि प्रति ढांचे के लिए रुपये 4000/- का आबंटन कुछ ज्यादा ही है।

गुजरात के सौराष्ट्र में किसानों ने मात्र कुछ सौ रुपयों की लागत से इसे हासिल किया है। हमें इसके विवरण की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी कि प्रस्तावित 100 जिलों के 850 ब्लॉकों में 70 लाख ढांचों के लिए इसे किस तरह अमल में लाया जाएगा। यह भी स्पष्ट नहीं है कि नाबार्ड के माध्यम से दिये जाने वाले रुपये 1800 करोड़ की रकम को कितनी अवधि में व्यय किया जाना है। सरकार ने जिस अध्ययन के आधार पर यह योजना बनाई उसे सार्वजनिक करना चाहिए।

जबकि, भारतीय जल संसाधन तंत्र उस राजा की तरह बर्ताव करता है जो अपना राज्य विस्तार करने में लगा रहता है, बगैर इस चिंता के कि इस अधिग्रहण का क्या हो रहा है। विश्व बैंक के एक 2005 के आकलन के अनुसार भारत को मौजूदा ढांचों के रखरखाव के लिए रुपये 17000 करोड़ प्रति वर्ष की अवश्यकता है। दो वर्ष पूर्व अपने बजट भाषण में श्री चिदंबरम ने इस बात पर खेद व्यक्त किया था कि भारत की सिंचाई क्षेत्र की कार्यक्षमता विश्व की सबसे निम्नतम क्षमता में से एक है। उन्होंने इस स्थिति के सुधार के लिए कुछ भी नहीं किया है। इसके ठीक विपरीत उन्होंने त्वरित सिंचाई लाभ योजना के लिए बजट में करीब 55 प्रतिशत की वृद्धि करते हुए इसे 11000 करोड़ कर दिया। यही बात भारत निर्माण के तहत सिंचाई के हिस्से के लिए किया गया है, जिसमें से ज्यादातर बड़े बांधों और लम्बी दूरी की नहरों के लिए खर्च होता है, जो कि सालों से काफी महंगी एवं तुलनात्मक रूप से अलाभकारी साबित हुई है। इस परिप्रक्ष्य में ये भी देखिए कि राष्ट्रीय वर्षाजनित क्षेत्र प्राधिकरण के लिए मात्र 100 करोड़ रुपये की रकम आबंटन प्रस्तावित है। दो वर्ष पूर्व उन्होंने बेकार अवस्था में पड़े जल संरचनाओं के मरम्मत, नवीनीकरण एवं सुधार को अपनी स्वप्निल योजना कहा था। इन जल संरचनाओं को विश्व बैंक और अन्य सहायता एजेंसियों की दयादृष्टि पर निर्भर होना पड़ेगा क्योंकि बजट में इसके लिए एक ढेला भी देना प्रस्तावित नहीं है।

जल क्षेत्र में सबसे बड़ी समस्या, पारदर्शिता एवं जवाबदेही के अति अभाव को हल करने के लिए वित्तमंत्री ने कुछ भी प्रस्ताव नहीं किया है। सभी योजनाओं के शिथिल व लम्बित अमलीकरण के सुधार के लिए इसके सिवा कोई चारा नहीं है। इसके अलावा, भूमि की क्षमता में कमी को सुधारने, छोटे किसानों की उत्पादकता बढ़ाने एवं फसलों की उत्पादकता की राष्ट्रीय औसत में बढ़ोतरी के लिए कुछ भी विश्वसनीय प्रस्ताव नहीं किया है। वे चावल की पैदावर में बढ़ोतरी करने वाली सघन खेती की नयी प्रणाली को बढ़ावा देकर एक आसान कदम उठा सकते थे, जिसमें पानी, बीज एवं रसायनों की लागत को कम करते हुए उपज बढ़ाने की क्षमता है।

एक बात जो उन्हें राहत पहुंचा सकती है वह यह कि उनके कृषि उपजों की लाभकारी कीमत सुनिश्चित की जाय। इस दिशा में एकमात्र प्रस्ताव जो श्री चिदंबरम ने किया वह है एक अन्य समिति (डा. आर राधाकृष्ण) की घोषणा। जाहिर है इसके लिए सरकार के पास धन या प्राथमिकता नहीं है। सन् 2007-08 ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना का पहला साल है एवं न तो प्रस्ताव पत्र में और न ही बजट में व्यापक एवं टिकाऊ कृषि विकास को हासिल करने के लिए कोई विश्वसनीय कदम उठाया गया है। इस एक क्षेत्र से 11.5 करोड़ परिवारों का भरण-पोषण होता है, यह बात बजट में कही गई है, लेकिन लगता है समझी नहीं गई है।

हिमांशु ठक्कर - ht.sandrp@gmail.com

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