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प्राचीन जल अभियांत्रिकी का बेजोड़ नमूना है, भोपाल ताल

तालों में ताल भोपाल का, बाकी सब तलैयातालों में ताल भोपाल का, बाकी सब तलैयादेवेन्द्र जोशी/ हिन्दी मी़डिया.इन

यह कहावत बहुत प्रसिध्द है कि '' तालों में ताल भोपाल का, बाकी सब तलैया। गढ़ों में गढ़ चित्तौड़ का बाकी सब गढैयां ''। राजा भोज द्वारा 11 वीं शताब्दी में निर्मित कराया गया भोपाल का ताल शहर का गौरव है, यह शान-ए- भोपाल है। प्राचीन काल से ही मानव सभ्यताएं जल स्त्रोतों के किनारे विकसित हुई हैं, और यह तालाब भी इसका अपवाद नहीं है। इस तालाब के जितना बड़ा जलाशय यदि किसी शहर के निकट हो, तो शहरवासियों का उस पर गर्व करना सर्वथा उचित है।

यह नासमझी का ही नतीजा माना जायेगा कि यह विशाल ताल एक बार फिर सूखने के कगार पर है। सदियों से लबालब भरा रहने वाला यह ताल दुर्दशा का शिकार इस वजह से हुआ कि लोगों ने इस ताल के पारम्परिक जल स्त्रोतों और जल भराव क्षेत्र की ओर समुचित ध्यान नहीं दिया और प्राकृतिक संतुलन से अनावश्यक छेड़-छाड़ की। लेकिन अब भोपाल के लाखों वाशिन्दों की प्यास बुझाने वाले इस ताल को बचाने के लिए सैकडों लोग खुद ब खुद आकर तालाब की सफाई के लिए श्रमदान करने में जुट गए है। रोजाना सैकडों की संख्या में विभिन्न वर्गो के लोग, अधिकारी, कर्मचारी, जनप्रतिनिधि, बुजुर्ग, बच्चे और महिलाएं भोपाल के ताल के सफाई के लिए जुट रहे है। मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान कि अगुवाई में शुरू हुआ यह अभियान आगामी जून माह तक सतत जारी रहेगा। मानव और मशीनों के संयुक्त योगदान से इस बार निश्चित ही सैकडों साल पुराने इस ताल को नया जीवन मिलेगा।

भारत की ह्रदयस्थली भोपाल आनेवाला हर कोई बड़े शहर के बीचों बीच एक विशाल तालाब देखकर स्तब्ध रह जाता है। इस तालाब के जितना बड़ा जलाशय यदि किसी शहर के निकट हो, तो शहरवासियों का उस पर गर्व करना सर्वथा उचित है। प्राचीन काल से ही मानव सभ्यताएं जल स्त्रोतों के किनारे विकसित हुई हैं, और यह तालाब भी इसका अपवाद नहीं है। सैकड़ो साल पुराना भोपाल का यह ताल प्राचीन जल-अभियांत्रिकी का बेजोड़ उदाहरण है।

बेहद प्राचीन और जनउपयोगी इस जलाशय का इतिहास अनेक खट्टे-मीठे अनुभवों से भरा हुआ है। उपलब्ध ऐतहासिक अभिलेखों के आधार पर यह माना जाता है कि धार प्रदेश के प्रसिध्द परमार राजा भोज एक असाध्य चर्मरोग से पीड़ित हो गए थे। एक संत ने उन्हें सलाह दी कि वे 365 स्त्रोतों वाला एक विशाल जलाशय बनाकर उसमें स्नान करें। साधु की बात मानकर राजा ने राजकर्मचारियों को काम पर लगा दिया। इन राजकर्मचारियों ने एक ऐसी घाटी का पता लगाया, जो बेतवा नदी के मुहाने स्थित थी। लेकिन उन्हें यह देखकर झुंझलाहट हुई कि वहां केवल 356 सर-सरिताओं का पानी ही आता था। तब कालिया नाम के एक गोंड मुखिया के पास की एक नदी की जानकारी दी जिसकी अनेक सहायक नदियां थीं। इन सबको मिलाकर संत के द्वारा बताई गई संख्या पूरी होती थी। इस गोंड मुखिया के नाम पर इस नदी का नाम कालियासोत रखा गया, जो आज भी प्रचलित है।

लेकिन राजा भोज के चुनौतियों का दौर अब भी समाप्त नहीं हुआ था। बेतवा नदी का पानी इस विशाल घाटी को भरने के लिए पर्याप्त नहीं था। इसलिए इस घाटी से लगभग 32 किलोमीटर पश्चिम में बह रही एक अन्य नदी को बेतवा घाटी की ओर मोड़ने के लिए एक बांध बनाया गया। यह बांध आज के भोपाल शहर के नजदीक भोजपुर में बना था। इन प्रयासों से जो विशाल जलाशय बना, उसका नाम भोजपाला रखा गया। उसका विस्तार 65,000 हेक्टेयर था और कहीं कहीं वह 30 मीटर गहरा था। यह प्रायद्वीपीय भारत का कदाचित सबसे बड़ा मानव-निर्मित जलाशय था। उसमें अनेक सुंदर द्वीप थे, और उसके चारों ओर खुबसूरत पहाड़ियां थीं। वह प्रसिध्द भोजपुर शिवालय से आज के भोपाल शहर तक फैला हूआ था। कहते हैं कि राजा भोज इस जलाशय में स्नान करके अपने रोग से मुक्त हो गए। राजा भोज द्वारा निर्मित विशाल जलाशय भोजपाला की वजह से ही इस शहर का नाम धीरे-धीरे भोजपाल और बाद में भोपाल हो गया।

बेतवा नदी के बहाव को रोकने के लिए भोजपुर में जो मुख्य बांध बनाया गया था, वह पत्थरों से निर्मित था। इस बांध को 1443 ईस्वीं में होशंगशाह ने तुड़वा दिया था। कहते हैं कि उसके सैनिकों को उसे तोड़ने में 30 दिन लग गए। बांध के टूटने के बाद भी जलाशय को पूरा सूखने में 30 वर्ष लगे। तालाब की सूखी जमीन पर आज बसाहट है।

कालान्तर में भोजपुर का बांध तोड़ दिया गया, लेकिन भोपाल में कमला पार्क के पास जो मिट्टी का बांध था, वह बच गया। उसके कारण एक छोटा जलाशय शेष रह गया। इसी को आज बड़ा तालाब कहते हैं। वर्ष 1694 में नवाब छोटे खान ने बड़े तालाब के पास बाणगंगा पर एक बांध बनवाया, जिसके कारण छोटा तालाब अस्तित्व में आया। यह दोनों तालाब आज भी धार के दूरदर्शी राजा भोज की स्मृति को अमर बनाए हुए है।

वर्ष 1963 में भदभदा पर एक बांध बनाकर बड़े तालाब की जल संग्रहण क्षमता को बढ़ाया गया। इससे बड़े तालाब के पश्चिमी और दक्षिणी भागों के डूब क्षेत्र में वृध्दि हुई। बड़े तालाब का जल विस्तार क्षेत्र लगभग 31 वर्ग किलोमीटर है, जबकि छोटे तालाब का जल विस्तार क्षेत्र मात्र 1.29 वर्ग किलोमीटर है। इन तालाबों की औसत गहराई 6 मीटर है। कुछ स्थानों में गहराई 11 मीटर है। बड़े तालाब की जल संग्रहण क्षमता 1160 लाख घन मीटर है। यह पानी तालाब के जलग्रहण क्षेत्र में हुई वर्षा से आता है और अंतत: भोपाल के रहवासियों को घरों के नलों से पेयजल के रूप में उपलब्ध होता है। भोपाल के तालाबों के नीचे की चट्टानें डेक्कन ट्रैप बेसाल्ट प्रकार की हैं, जो ज्वालामुखियों के लावा के बहने और तुरंत ठंडा होने के कारण बनी हैं। जिस भूभाग में भोपाल का तालाब स्थित हैं, प्राचीन समय में उस भूभाग में काफी भूगर्भीय उथल-पुथल हुई थी।

अपने लगभग एक हजार वर्ष के अस्तित्व काल में बड़ा तालाब एक प्राकृतिक नमभूमि में बदल गया है। वोट क्लब पर टहलते हुए जब भी लोग तकिया टापू के पीछे सूरज को डूबते देखते है, तो वे इस तालाब के सौंदर्य से अभिभूत हुए बिना नहीं रह पाते। यद्यपि आज इन तालाबों के इर्द-गिर्द अनेक आधुनिक संरचनाएं बना दी गई हैं फिर भी तालाब को आस्तित्व प्रदान करने वाली प्रमुख संरचना वही मिट्टी का पुराना बांध है जिसे राजा भोज ने बनवाया था। निश्चित ही राजाभोज में गजब की दूरदृष्टि थी क्योंकि 11वीं सदी में निर्मित यह जलाशय आज 21वीं शताब्दी में भी भोपाल शहर की 40 प्रतिशत पेयजल आपूर्ति कर रहा है। इसका श्रेय निश्चय की उस समय की बेजोड़ जल-अभियांत्रिकी क्षमता को है।

लेखक मध्य प्रदेश के जनसंपर्क विभाग में हैं और विभिन्न विषयों पर स्वतंत्र लेखन भी करते हैं।

साभार - हिन्दी मी़डिया.इन

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