बरसात में कैसे करें जल संग्रहण

Submitted by admin on Sun, 09/27/2009 - 10:59
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अश्विनी कुमार ठाकुर


यदि खेतों में ढ़ाल का प्रतिशत अधिक है तो ढ़ाल की विपरीत दिशा में हल या अन्य उपलब्ध कृषि यंत्रों द्वारा खेतों की गहरी जुताई करना चाहिये, इससे वर्षा का पानी खेत में अधिक गहराई तक अवशोषित होगा एवं उसके नीचे की ओर बहने की गति कम होगी। अंततोगत्वा भूमि क्षरण की दर में कमी आयेगी। ढ़ाल की विपरीत दिशा में जुताई करने से हल द्वारा निर्मित नालियों में पानी अधिक समय तक खेत में ठहरेगा। जिससे भूमि में जल की प्रतिशत मात्रा में वृद्धि होगी।

 

भू समतलीकरण एवं मेढ़बंदी


अधिक ढ़ालू भूमियों का समतलीकरण किया जा सकता है। समतलीकरण करने से इन भूमियों के ऊपर से वर्षा जल के बहाव में रूकावट आयेगी एवं भूमि का क्षरण भी कम होगा। भूमि ढाल के प्रतिशत की अपेक्षा वर्षा जल दुगुनी गति से बहता है, अतः ढ़ाल को जितना कम किया जायेगा भूमि पर पानी के बहाव की गति दुगुनी मात्रा में कम होगी।

इस प्रकार ढ़ाल के प्रतिशत को कम करके भूमि कटाव को कम किया जा सकता है एवं भूमि में जल की मात्रा बढ़ाई जा सकती है। यदि ढ़ालू खेतों का समतलीकरण किया गया है तो इन समस्त खेतों के चारों ओर मेढ़ बनाना चाहिये जिससे खेत का पानी एवं खेत की मिट्टी खेत में ही रहे।

 

ढ़ाल के विपरीत दिशा में गहरी जुताई


यदि खेतों में ढ़ाल का प्रतिशत अधिक है तो ढ़ाल की विपरीत दिशा में हल या अन्य उपलब्ध कृषि यंत्रों द्वारा खेतों की गहरी जुताई करना चाहिये, इससे वर्षा का पानी खेत में अधिक गहराई तक अवशोषित होगा एवं उसके नीचे की ओर बहने की गति कम होगी। अंततोगत्वा भूमि क्षरण की दर में कमी आयेगी। ढ़ाल की विपरीत दिषा में जुर्ता करने से हल द्वारा निर्मित नालियों में पानी अधिक समय तक खेत में ठहरेगा। जिससे भूमि में जल की प्रतिशत मात्रा में वृद्धि होगी।

 

खेत के ऊंचे स्थान पर शोक पिट एवं बारो पिट का निर्माण


ढालू खेतों के ऊंचे सममतल स्थान पर शोक पिट एवं बारो पिट का निर्माण किया जाता है, ये संरचनायें ऊंचे स्थान के पानी को नीचे नहीं बहने देतीं एवं इन संरचनाओं के माध्यम से खेत का पानी खेत में अवशोषित होते रहता है, जिससे मिट्टी का कटाव भी कम होता है। शोक पिट एवं बारो पिट छोटी-छोटी संरचनायें होती हैं। अतः इनके निर्माण में अधिक खर्च नहीं आता है।

 

सम्मोच रेखाओं पर खेती का निर्माण


अत्यधिक ढलान वाले खेत जिनको सममतल करना आसान नहीं होता है वहां पर कंटूर ट्रेंच का निर्माण किया जाता है। इन खेतों के निचले हिस्से में फलदार वृक्षों का रोपण करना चाहिये, इस प्रकार की खंतियों का निर्माण करने से खेत में अधिक पानी रूकता है एवं मृदा कटाव में कमी आती है।

 

बरसात में कैसे करें जल संग्रहण


सम्मोच रेखाओं पर असंबद्ध खन्तियों का निर्माण किया जाता है। अत्यधिक ढ़ालू भूमियों पर इन संरचानाओं का निर्माण करना महत्वपूर्ण एवं लाभप्रद कार्य है। स्टेगर्ड ट्रेवेंज के निचले हिस्से में जहां पर मिट्टी एकत्रित होती है वहां पर फलदार एवं बहुउद्देशीय पौधों का रोपण किया जा सकता है। ढालू भूमियों पर इस विधि को अपनाने के निम्न फायदे हैं।

Ø अधिक ढाल वाला भूखण्ड छोटे-छोटे में बंट जाता है एवं स्टेगर्ड ट्रेंच लघु जल संचयन तालाब का कार्य करती है। खोदी गई मिट्टी को गड्ढे के निचले हिस्से पर रखा जाता है। जिससे भूमि में नमी बनी रहती है एवं पौधों को मिलती रहती है।
Ø स्टेगर्ड या कंटिन्यूस ट्रेंवेज के निर्माण से वर्षा जल भूमि पर तीव्र गति से बहता है जिससे मिट्टी कटाव में कमी आती है एवं भूमि में जल का अधिक संचयन होता है।
Ø ढालू पहाड़ियों एवं भूमि में इस प्रकार की संरचनाओं का निर्माण करने के पश्चात वानस्पतिक अवरोध अथवा जो भी वृक्षारोपण किया जाता है उसकी तीव्र वृद्धि होती है व प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा होती है।

 

तालाबों का निर्माण


रिसन तालाब-मरहान या टिकरा भूमि में जल संरक्षित करने के लिये छोटी डबरी बनायी जाती है जिसे रिसन तालाब कहते हैं। इनका आकार छोटा होता है।

इस तालाब की विशेषता यह होती है कि इसमें जो वर्षा जल एकत्रित होता है वह उपलब्ध भूमि कृषि भूमि में रिसन के द्वारा भू जल की मात्रा को बढ़ाता है इसलिए इसमें वर्षा जल अधिक समय तक उपलब्ध नहीं रहता परंतु यह भूमि को नमी प्रदान कर भूमि की भू जल मात्रा की वृद्धि करता है। यह भू जल अपरोक्ष रूप से फसल के लिये लाभकारी होता है।

 

डबरी


मध्य भूमि में निर्मित होने वाले तालाब को डबरी के रूप में पहचाना जाता है। यह मध्यम आकार के होते हैं। वर्षा जल ऊंचाई से बहता हुआ इसमें एकत्रित होता है एवं लम्बे समय तक संग्रहित रहता है। सिंचाई के लिए इससे जल लिया जाता है।

 

सामान्य तालाब


निचली भूमि या गभार में जल संरक्षण के लिये तालाब का निर्माण किया जाता है।, क्योंकि यह निचली भूमियों में स्थित होता है इसलिए इसमें वर्षा जल लंबे समय तक संग्रहित रहता है। दूसरी फसल के लिये भी तालाब से पर्याप्त मात्रा में सिंचाई जल उपलब्ध होता है।

तालाब निर्माण में इस बात का विशेष ध्यान रखें कि उसमें जल प्रवेश एवं जल निकासी मार्ग अवश्य रूप से बना हुआ हो, तालाब जल संरक्षण तकनीक की एक वृहद संरचना होती है एवं उसकी जल धारण क्षमता का विशेष ध्यान रखना चाहिये। उसकी मेढ़ों के अंदर की तरफ अगर हो सके तो काली मिट्टी का लेप लगायें या पत्थरों से मजबूती प्रदान करें ऐसा करने से मेढ़ों की मिट्टी बहकर तालाब में जमा नहीं होगी एवं तालाब की जल संरक्षण क्षमता का हास नहीं होगा। इन सब तकनीकों को अपनाकर किसान वर्षा जल का समुचित संग्रहण कर उचित समय पर उपयोग कर सकते हैं।

 

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