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बराबरी, पहुंच और वितरण

भवानी में टकराव

तमिलनाडु में भवानी नदी के संग्रहण क्षेत्र में जनसंख्या वृद्धि, अनियोजित विस्तार और घरेलू और औद्योगिक स्तर पर पानी की बढ़ती मांग ने नदी के बेसिन में पानी का इस्तेमाल करने वालों के बीच प्रतियोगिता को बढ़ा दिया है।
आर राजगोपाल, एन जयकुमार

तमिलनाडु के बीचों-बीच से होकर बहने वाली कावेरी नदी की मुख्य सहायक नदी है भवानी। यह केरल के शांत वन क्षेत्र से उत्पन्न होकर दक्षिण-पूर्व दिशा की ओर 217 किमी का सफर तय करते हुए भवानी शहर के पास ही कावेरी नदी में मिल जाती है। इस राज्य मे कावेरी नदी का संग्रहण क्षेत्र 43000 वर्ग किमी है जिसमें से लगभग 5400 वर्ग किमी का क्षेत्र भवानी के उप-संग्रहण क्षेत्र द्वारा निर्मित है। जबकि कावेरी नदी का कुल संग्रहण क्षेत्र 82000 वर्ग किमी है जो कि कर्नाटक, पांडिचेरी, केरल और तमिलनाडु में स्थित है जिसमें से 6000 वर्ग किमी का क्षेत्र भवानी नदी का है। इस क्षेत्र का अधिकतर हिस्सा (87 प्रतिशत) तमिलनाडु में स्थित है । निचली भवानी परियोजना (एल बी पी) महत्वपूर्ण बहुउद्येशीय जलाशय है जिसे मुख्य रूप से जल संग्रहित कर इसके संग्रहण वाले क्षेत्रों में नहर व्यवस्था द्वारा पानी पहुंचाने के लिए बनाया गया है। इस जलाशय का इस्तेमाल पनबिजली उत्पन्न करने और मछली पकड़ने के लिए भी किया जाता है। इसके अलावा कोडिवेरी और कलिंगारायन जैसे दूसरे विकल्पों के जरिये विभिन्न नहर व्यवस्थाओं में पानी को हटाया जाता है। यह कई सदियों से चली आ रही एक पुरानी व्यवस्था है। इस संग्रहण क्षेत्र का ऊपरी हिस्सा पूर्ण विकसित नहीं है इसलिए कृषि के लिए अधिकतर, कुओं तथा वर्षा के जल पर निर्भर रहना पड़ता है ।

सूखी जमीन, प्यासे लोग

यह नदी पीने, खेती और उद्योगों के लिए पानी उपलब्ध करा कर कोयंबटूर और इरोडे जिले की अर्थव्यवस्था में प्रमुख भुमिका निभाती है। जनसंख्या में व़ृद्धि‍, इस क्षेत्र का अनियोजित विस्तार तथा साथ-ही-साथ घरेलू और औद्योगिक स्तर पर बढ़ती पानी की मांग के कारण नदी का संग्रहण क्षेत्र बंद होने के कगार पर है जिससे इस जलाशय पर काफी भार है। इसके परिणाम स्वरूप पानी इस्तेमाल करने वालों के बीच तीव्र प्रतियोगिता है तथा कृषि और घरेलू क्षेत्रों में मांग और पूर्ति के बीच में एक बड़ा अंतर भी है। पिछले कई सालों से कम बारिश वाले क्षेत्रों के विस्तार के कारण नदी के उदगम के विपरीत दिशा में पानी की कमी ने खतरे का रूप ले लिया है। एल बी पी डैम से सामान्य रूप में 1700 घन मिमी पानी की आपूर्ति अधिकारिक रूप से मान्य है। लेकिन पिछले कुछ सालों से इसमें लगातार गिरावट दर्ज की गई है। 2001 में यह 1275 घन मिमी, 2002 में यह 793 घन मिमी तथा 2003 में यह 368 घन मिमी थी। घाटी के किसानों, मूल बाशिंदों और एल बी पी के कारण बसे नये किसानों के हितों के बीच पहले से ही टकराव जारी है। पहले से बसे किसानों के लिए 11 महीने पानी की आपूर्ति निर्धारित है, जिसे वे धान की 2-3 फसलें उगाने और गन्ना, केले जैसे वार्षिक फसलों के लिए इस्तेमाल करते हैं। दूसरी तरफ जो नये किसान हैं वो साल में केवल धान की एक फसल या फिर वैसी फसल जिसके लिये कम पानी की जरूरत है, उगा पाते हैं।
जब तक पानी की आपूर्ति पर्याप्त रूप से थी तब तक विरोध भी नहीं होता था। लेकिन 2002 में सप्लाई बहुत कम थी और नये बसाये क्षेत्रों में पानी भी नहीं छोड़ा गया था। जिससे उत्तेजित होकर यहां के नये वाशिंदों ने उच्च न्यायालय में राज्य के खिलाफ मुकदमा दायर कर इस बात की गुहार लगायी कि कम से कम एक फसल के लिए पानी की आपूर्ति की जाये। उनकी दलील थी कि पुराने क्षेत्रों में दूसरी फसल के लिए पानी तभी मुहैया कराया जाये जब तक की नये बसे क्षेत्रों में पहली फसल के लिए जरूरत के हिसाब से उचित मात्रा में पानी उपलब्ध करा दिया जाये, जैसा कि 30 अगस्त 1963 को जारी सरकार के उस आदेश (आदेश संख्या - 2,274) में कहा गया था। अदालत ने जल संसाधन विभाग से दोनों क्षेत्रों में पानी के बंटवारे के लिए समझौते का एक फॉर्मूला तैयार करने को कहा था। विभाग ने जल ग्रहण क्षेत्रों के क्षेत्रफल के आधार पर एक योजना तैयार की जिसके तहत प्रस्ताव किया गया कि उपलब्ध पानी का 60 प्रतिशत नये बसे क्षेत्रों के लिए (80000 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई के लिए) तथा 40 प्रतिशत पहले से बसे क्षेत्रों के लिए (लगभग 20000 हेक्टेयर) छोड़ा जाये। किन्तु पहले से बसे किसानों ने इसका इस आधार पर विरोध किया कि उनके नदी-तट संबंधी अधिकार के तहत उन्हें 11 महीनों तक पानी की निर्वाध आपूर्ति का अधिकार प्राप्त है।

इस गतिरोध के मद्देनजर एक स्थानीय केंद्रीय मंत्री ने दोनों पक्षों को बातचीत के लिए तैयार किया, लेकिन समस्या के हल का यह प्रयास भी असफ़ल रहा। अदालत ने अपने अंतरिम आदेश में राज्य को कहा था कि हर मौसम में सिस्टम को खोलने के लिए पहले अदालत का आदेश हासिल करे। पहले की व्यवस्था के तहत पहले से बसे लोगों के लिए 18 अगस्त को एवं नये बसे लोगों के लिए 15 अगस्त को नहर खोलने की व्यवस्था की गयी थी। सिंचाई के काम के विस्तार के कारण और इसलिये अधिक पानी की मांग भी मुख्य रूप से नदी के उदगम क्षेत्रों में (साथ ही साथ पुराने क्षेत्रों में भी) और इस कारण पानी की कमी को, सीधे पंपों की जरिये नदी के पानी को अनधिकृत रूप से निकाल कर पूरा किया जाने लगा। पंपों के जरिए पानी निकालने के अलावा जलसंग्रहण क्षेत्रों में भूमिगत जल का अनियंत्रित दोहन भी एक अन्य प्रमुख मुद्दा था, जिसका समाधान करने में सरकार सक्षम नहीं थी। उदार संस्थागत वित्तीय सहायता ने इस समस्या को बढ़ावा दिया। साथ ही साथ सरकार की ओर से की जाने वाली मुफ्त बिजली आपूर्ति ने भी इस समस्या को बढ़ाने में सहयोग दिया।

निचले क्षेत्रों में बसे किसान, इस मुद्दे को न केवल अदालत में ले गये बल्कि उन्‍हें अदालत में जीत मिली और अदालत का फैसला उनके हक में हुआ। अपने हक़ में हुए फैसले से उन्हें जीत भी मिली। लेकिन प्रभावहीन नौकरशाही अदालत के फैसले को लागू करने में अक्षम रही। 2004 में हुये 14 वें आम चुनावों में पानी को लेकर टकराव ने एक प्रमुख भूमिका निभायी। बेसिन क्षेत्र के राजनीतिज्ञों और किसान संगठनों के बीच हड़बड़ी में इस मुद्दे को सुलझाने के लिए बातचीत भी हुई थी। पहले से बसे लोगों तथा नये बसे लोगों के बीच पानी के बंटवारे की समस्या का कारण, मिश्रित रूप से उद्योगों एवं घरेलू क्षेत्रों में बढ़ती पानी की मांग है। 2004 में हुई कम बारिस ने बांध में पानी की अत्यंत कमी की स्थिति को और बढ़ा दिया। जैसे-जैसे चुनाव का समय नजदीक आता गया सत्ताधारी दल के मंत्री अपने वोट बैंक बढ़ाने के लिए किसानों की समस्या को निबटाने की कोशिश करने लगे, लेकिन कोशिश असफल रही और इस बीच, बुरी तरह से पड़े सूखे ने इस विवाद में एक नया अंश जोड़ दिया। इस क्षेत्र में पानी की कमी ने किसानों को कावेरी नदी के मुहाने पर अपनी मांगग को लेकर आंदोलन करने पर बाध्य किया।

चूंकि इस क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या काफी अधिक थी और शासक दल के लिए इनका समर्थन, वोट बैंक के नजरिये से फायदेमंद था इसलिए बांध से पानी को कावेरी के मुहाने की ओर छोड़ दिया गया जो कि जलाशय के प्रबंधन नियमों के बिल्कुल खिलाफ था। जिससे भवानी के संग्रहण क्षेत्र के किसानों में गुस्सा फैल गया और उन्होंने एक निर्दलीय उम्मीदवार नियुक्त करने का फैसला किया। उन्होंने इसका नाम `वाटर कैंडिडेट´ (पानी उम्मीदवार) रखा और इस तरह की घटना भारत के चुनावी इतिहास में पहली बार घटित हुई थी। किसानों के विभिन्न समुहों में वैचारिक विभिन्नताओं के कारण यह प्रयास भी असफल रहा और अंत में राज्य के मुख्य विपक्षी पार्टी का उम्मीदवार किसानों के वोट जीतने में सफल रहा। इससे नये क्षेत्रों में बसे किसानों को इस मुद्दे को सिंचाई अधिकारियों के समक्ष उठाने तथा जलाशय से अधिक मात्रा में पानी हासिल करने में आसानी हुयी क्योंकि उनके नेता केन्द्र सरकार में मंत्री बन गये थे।
नये क्षेत्रों में बसे किसानों के संगठन मंत्री की मदद से पुराने बाशिंदों को अदालत में ले गये। इस वक्त जब मामला अदालत में लंबित है पानी की विकट स्थिति गंभीर बनी हुयी है खास तौर पर मध्य वर्ग पीने के लिए पानी खरीदने को मजबूर है। प्रदूषण से प्रभावित किसानों ने इस समस्या का कानूनी समाधान पाने की कोशि‍श की और प्रदूषण फैलाने वाली कुछ टेक्सटाईल और केमिकल इकाईयों को बंद करवाने में वे सफल भी रहे थे। इस मुद्दे पर विभिन्न पक्ष अलग कार्य करते हुए इस समस्या को हल करना चाहते हैं लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा प्रतीत होता है कि किसान अन्य प्रयासों की तुलना में कानून व्यवस्था पर अधिक निर्भर हैं। विभिन्न पक्षों द्वारा असमान और एक-दूसरे के विपरीत कार्य किये जाने के कारण नदी के संग्रहण क्षेत्रों में पानी की स्थिति गंभीर बन गयी है। भविष्‍य में जैसे-जैसे गैर कृषि क्षेत्रों में लगातार तेजी से मांगग बढ़ेगी, स्थिति के और गंभीर होने की आशंका बढ़ेगी। इस स्थिति में संगठित प्रयास एवं परस्पर सहयोग जरूरी है। इससे जुड़े सभी लेगों खासतौर से राज्‍य सरकार के सहयोग से संग्रहण क्षेत्रों में जल संसाधनों के एकीकृत रूप से विकास के लिये एक तंत्र बनाया जाना चाहिये।

यह काम बाहर की कोई स्वायत्त एजेंसी के अधीन किया जा सकता है जो हर वगों जैसे किसानों, उद्यमियों, घरेलू लोगों तथा सरकार की जरूरतों को जान सके और एक फोरम का गठन कर बातचीत के जरिये हल निकाला जा सके।

बातचीत के लिए विभिन्न पक्षों की बैठक
21 फरवरी 2005 को हुई जिसमें किसानों, गैर सरकारी संगठनों, सरकारी विभागों, उद्यमियों, सामाजिक कार्यकर्त्‍ताओं और शिक्षाविदों से उनके विचारों और प्रतिक्रियाओं पर चर्चा की गई। सभी ने इस मुद्दे पर आगे बातचीत जारी रखने और इस कठिन स्थिति से बाहर निकलने के लिये प्रयास करते रहने पर सहमति जताई।

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