बाढ़ की राजनीति बनाम राजनीति की बाढ़

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दिनेश कुमार मिश्र / kosimitra
जब देश में पहली बाढ़ नीति को 1954 में स्वीकार गया था उस समय ज़मीन्दारी और महाराजी तटबंधों के अलावा बिहार में तटबंधों की लम्बाई 160 किलोमीटर थी और यहाँ बाढ़ से प्रभावित हो सकने वाला क्षेत्र 25 लाख हेक्टेयर था। सरकार ज़मीन्दारी और महाराजी तटबन्धों को अवैज्ञानिक और अक्षम मानती थी इसीलिये केवल सरकार द्वारा बनाये गये तटबन्धों को ही मान्यता देती थी। तटबन्धों की लम्बाई 1990 में बढ़ कर 3454 किलोमीटर हो गई। 1992 तक कुछ रिटायर्ड लाइन तटबन्ध बन जाने के कारण इनकी लम्बाई 3465 किलोमीटर तक जा पहुँची, मगर उसके बाद की बाढ़ों में 11 किलोमीटर लम्बाई में तटबन्ध बह जाने के कारण यह लम्बाई पूर्ववत 3454 किलोमीटर पर जा टिकी। राज्य के विभाजन के बाद 24 किलोमीटर की लम्बाई में तटबन्ध झारखण्ड में चले गये हैं और बिहार सरकार की एक रिपोर्ट के अनुसार अब बिहार राज्य में इनकी लम्बाई 3430 किलोमीटर ही बची है। मज़ा यह है कि 35 किलोमीटर लम्बे तटबन्ध चले जाने के बाद भी राज्य का बाढ़ से सुरक्षित क्षेत्रा पहले जितना (29 लाख हेक्टेयर) ही बना हुआ है। नदियों के किनारे इतने लम्बे तटबन्ध बना लिये जाने के बाद राज्य को बाढ़ की स्थिति पर काफी नियंत्रण पा लेना चाहिये था मगर हुआ इसका ठीक उलटा। राज्य में बाढ़ की चपेट में आ सकने वाला क्षेत्रा बढ़ते-बढ़ते 1971 में 43 लाख हेक्टेयर, 1982 में 64.61 लाख हेक्टेयर और 1994 में 68.80 लाख हेक्टयर तक जा पहुँचा है। यानी जैसे जैसे तटबन्धों की लम्बाई बढ़ी उसी अनुपात में राज्य का बाढ़ की चपेट में आने वाला इलाका भी बढ़ा।

इस तरह का उलट-फेर केवल बिहार में हुआ हो, ऐसा नहीं है। यह समस्या पूरे देश की है। साठ के दशक में जहाँ देश में 2.50 करोड़ हेक्टेयर ज़मीन पर बाढ़ आने का अन्देशा था वही आठवीं योजना के अन्त में बढ़ कर यह 1.6 गुना यानी 4.0 करोड़ हेकटेयर हो गया था। बिहार में इसी दरम्यान यह बढ़त तीन गुना थी, बस इतना ही प़फर्क था। राज्य में योजना काल में बाढ़ नियंत्राण पर मार्च 2002 तक 1327 करोड़ रुपये खर्च हुये थे। वर्ष 2002-03, 2003-04, 2004-05 और 2005-06 में राज्य के जल संसाधन विभाग के अनुसार इस मद में क्रमश: 72.63 करोड़ रुपये, 55.45 करोड़ रुपये, 85.31 करोड़ रुपये और 106.60 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। इस तरह आज़ा दी के बाद बिहार में मार्च 2006 तक बाढ़ नियंत्राण पर 1646.99 करोड़ रुपये खर्च हुये हैं।

जैसी कि आशंका थी कि तटबन्ध टूटेंगे तो वह हो भी रहा है। पश्चिम में घाघरा से लेकर पूरब में महानन्दा तक हर साल यह घटना होती है और उसकी वज़ह से लोगों के जान-माल की क्षति बदस्तूर जारी है। कोसी के तटबन्ध 1963, 1968, 1971, 1984, 1987 1991, और 2008 में टूट चुके हैं। 1987 में प्रान्त में एक भयंकर बाढ़ आयी थी जिसमें प्राय: सभी नदियों के तटबन्ध बेभाव टूटे और 104 स्थानों पर यह दुघर्टना हुई। इस बाढ़ में 17 लाख से अिधक घर गिरे और 1400 लोग मारे गये। केवल फसल का नुकसान 680 करोड़ रुपयों का हुआ। इस बाढ़ के बाद तटबन्धों की भूमिका पर एक हलकी सी बहस की शुरुआत हुई। कई जगहों पर स्थानीय लोगों ने विभिन्न कारणों से तटबन्धों को खुद भी काटा है। अगर राज्य में 1972 या 1992 जैसा सूखा न पड़े तो यहाँ की बाढ़ किसी को हाथ नहीं रखने देती है। आज गुलजारी लाल नन्दा हमारे बीच नहीं हैं वरना उनसे पूछा जाता कि समय के साथ बाढ़ों के दुष्प्रभाव के घटने का जो सपना उन्होंने देखा और दिखाया था उसकी आज क्या हालत है।अब तो बाढ़ साल दर साल भयंकर होती जा रही है।

1990 से लेकर 2006 तक, जब तक राज्य में जनता दल/ राष्ट्रीय जनता दल सरकार का शासन था, राज्य में कुल 11 किलोमीटर तटबन्ध बने और बह भी गये। अब बाढ़ नियंत्राण का सारा का सारा पैसा इन तटबन्धों की मरम्मत पर खर्च होता है। जब तात्कालीन सरकार ने राज-काज संभाला था तब बाढ़ से निपटने की दिशा में कुछ नये प्रयास किये जाने का संकेत मिला था। राज्य के जल-संसाधन मंत्री ने सार्वजनिक रूप से तटबन्धों को लानत-मालामत भेजी और उनका कहना था कि राज्य में बाढ़ की समस्या के पीछे इन तटबन्धों का ही हाथ है। उन्होंने उन सारे छेदों को बन्द करने की कोशिश की जिनसे होकर बाढ़ नियंत्रण के लिये उपलब्ध पैसा बह जाया करता था। उन्होंने एक कदम और आगे जाते हुये यहाँ तक कहा कि उनके कार्यकाल में किसी भी तटबन्ध को टूटने नहीं दिया जायेगा और अगर ऐसा होता है तो वह अपने पद से त्याग-पत्रा दे देंगे। 18 जुलाई 1991 में कोसी का पश्चिमी तटबन्ध नेपाल में भारदह के पास कट गया। इस तटबन्ध का नेपाल में रख-रखाव का जिम्मा भी बिहार सरकार का है। यह मामला बिहार विधान सभा में भी उछला और माननीय सदस्यों ने जिनमें सत्ताधारी पार्टी के सदस्य भी शामिल थे, मंत्री महोदय के इस्तीफे की मांग की। इस्तीफा दिया भी गया मगर यह अलग बात है कि वह कभी स्वीकार नहीं किया गया।

उसके बाद से एक नई परम्परा की शुरुआत हुई कि अगर कहीं तटबन्ध टूट जाये तो सरकार की तरफ से यह कहा जाता था कि तटबन्ध टूटा नहीं, `असामाजिक तत्वों´ ने काट दिया है। बागमती के तटबन्धों की 1993 की 7 स्थानों पर पड़ी दरार और उसी साल कमला के दायें तटबन्ध में सोहराय के पास टूटने की घटना को `असामाजिक तत्वों´ के खाते में ही डाल दिया गया। सोहराय में तो हालत यह थी कि तटबन्ध पीड़ितों को सरकार से 2.4 किलोग्राम गेहूँ राहत सामग्री के रूप में मिलने की उम्मीद में यह सिद्ध करना पड़ा कि वहाँ तटबन्ध टूटा है।

1995 में गंडक, कमला, बागमती और अधवारा समूह की नदियों के तटबन्ध पिफर टूटे और इस बार गंगा के दक्षिण चान्दन और बउुआ बांधों के टूटने की घटनायें हुई और इस बार बांका, भागलपुर, साहबगंज और गोड्डा जैसे जिले राज्य के बाढ़ नक्शे पर अपनी जगह बना गये और अब इन जिलों का यह रुतबा प्राय: स्थाई हो गया है। साहबगंज और गोड्डा जिले तो झारखण्ड में चले गये मगर बांकी दो जिले अब स्थाई रूप से बाढ़ ग्रस्त हैं।

जिम्मेवारी से दामन झाड़ने की कला


इसके अलावा पूर्वकाल में बने जमीन्दारी और महाराजी तटबन्धों का अलग किस्सा है। जमीन्दारी उन्मूलन के साथ-साथ जमीन्दारों द्वारा नदियों पर बनाये गये तटबन्ध सरकार के अधीन आ गये और उसने उन्हें रेवेन्यू विभाग के जिम्मे दे दिया। इन तटबन्धों की हालत खराब रहा करती थी और रेवेन्यू विभाग के पास न तो उतने संसाधन थे और न ही इतनी तकनीकी क्षमता या इच्छा-शक्ति कि वह इनको सही हालत में रख सके। यह तटबन्ध हर बरसात में थोक के भाव टूटते थे और जनता उनसे तबाह होती थी।
बिहार का जल-संसाधन विभाग इसे रेवेन्यू विभाग की जिम्मेवारी बता कर अपना दामन भफाड़ लेता था और रेवेन्यू विभाग भी चुप्पी साध लेता था जब कि जनता पिसती रहती थी। 1998 की बाढ़ में बिहार विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता सुशील कुमार मोदी ने 125 स्थानों पर तटबन्ध टूटने की घटना और उसमें सरकार द्वारा बरती गई लापरवाही का मुद्दा उछाला और इसके लिए वह दरभंगा में धरने पर भी बैठे। सरकार ने प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम अपनी स्थिति स्पष्ट की कि, `...नदी की तेज धारा से तटबन्ध मात्र सात जगह टूटा है और सात-आठ स्थलों पर ग्रामीणों द्वारा निचले खेत को भरने, नदी में जल गिराने, निकासी हेतु तटबन्ध को काट दिया गया। एक सौ पच्चीस स्थलों पर तटबन्ध टूटने के कारण ही उत्तर बिहार में बाढ़ का प्रकोप है, सत्य से कोसों दूर है।" ...सिंचाई विभाग मात्रा 29 लाख हेक्टेयर जमीन को बाढ़ से बचाने की जिम्मेवारी रखता है तथा महाराजी बांध, जमीन्दारी बांध आहर, पइन को सुरक्षित रखने की जिम्मेवारी सिंचाई विभाग की नहीं है।

´ प्रेस विज्ञप्ति में यह नहीं बताया गया कि अगर बाढ़ से बचाव की जिम्मेवारी जल-संसाधन विभाग की नहीं है तो पिफर किसकी है। बिहार विधान सभा में ऐसे ही मुद्दे पर बहस करते हुए इस घटना से 32 साल पहले (14 सितम्बर 1960) विधायक पूर्णेन्दु नारायण सिंह ने ठीक यही आरोप लगाया था। उन्होंने कहा कि, `...सिंचाई और पावर मंत्री ने कहा कि 36 और 27 प्रतिशत एम्बैन्कमेन्ट में जो ब्रीच हुआ है उसके लिये वे जिम्मेवार हैं और बाकी की जिम्मेवारी वह नहीं लेते हैं। बाकी के लिये वे कहते हैं कि राजस्व विभाग, रिवर वैली प्रोजेक्ट, इरिगेशन डिपार्टमेन्ट और एग्रीकल्चर विभाग की जिम्मेवारी है। इस तरह कोई कोऑर्डिनेशन नहीं है। यह ठीक नहीं है। एक विभाग दूसरे विभाग के उपर जिम्मवारी पफेंकता है तो इससे काम नहीं होगा। इसके लिये एक अलग विभाग होना चाहिए। बाढ़ नियंत्राण के जितने भी काम हों सबकी जिम्मेवारी इस विभाग की रहे।´´ जाहिर है कि सरकारें कुछ ज्यादा ही सुस्त् हैं कि ऐसे छोटे-छोटे मसले तय करने में भी पीढ़ियाँ गुजर जाती हैं। इस तरह से तटबन्ध कितनी जगह टूटा, उसके मोल-तोल की एक परम्परा पिछले लगभग 40 साल से तो बिहार में चल रही थी।

2006 में नितीश कुमार के नेतृत्व में गठित बिहार सरकार ने इतना काम जरूर किया कि जमींदारी और महाराजी तटबन्धों के रख-रखाव का काम औपचारिक रूप से जल संसाधन विभाग को सौंप दिया। इस पहल का परिणाम क्या निकलता है, यह समय बतायेगा।
जब जमींदारी खत्म कर दी गई तो उसकी सारी सम्पत्ति और जिम्मेवारी सरकार की हो गई फिर जिम्मेवारी से इतने वर्षो तक आँखें क्यों मोड़ी गईर्षोर्षो और अगर यह तटबन्ध रेवेन्यू विभाग के थे तो क्यों नहीं यह बात बरसात के पहले बताई जाती थी और क्यों जनता को यह नहीं बताया जाता था कि बाढ़ की स्थिति में अमुक-अमुक अफसर से सम्पर्क किया जाना चाहिए जो रेवेन्यू विभाग का है, यह जिम्मेवारी उसी की है। क्या कभी बिहार सरकार यह भी बतायेगी कि बिहार की कुल 68.8 लाख हेक्टेयर जमीन में से 29 लाख हेक्टेयर की बाढ़ से सुरक्षा की जिम्मेवारी उसकी है मगर क्या बाकी 40 लाख हेक्टेयर क्षेत्रा पर बसे लोगों से यह कहा जाय कि अब बाढ़ से आप खुद निपट लीजिए, हमारी कोई जिम्मेवारी नहीं है और क्या वह उन इलाकों को चििÉत करेगी जहाँ वह यह जिम्मेवारी लेने से मना करती है। इसके साथ ही अगर उस 29 लाख हेक्टेयर क्षेत्रा पर, जिसे सरकार अपनी तरपफ से बाढ़ से सुरक्षित मानती है, बाढ़ से जान-माल का कोई नुकसान होता है तो क्या सरकार इसकी क्षतिपूर्ति करेगी।

इसका सीधा-सादा जवाब है कि ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला है। सरकार अपनी रफ्ऱतार से चलती है और जनता अपना समझे। सारा घटनाचक्र `वो तेरा काम है साकी, ये मेरा काम है साकी´ की तज़ पर चलता है और भविष्य में भी चलता रहेगा।
बाढ़ के मसले पर मिथ्या प्रचार का यह हाल है कि 1994 से राज्य के जल-संसाधन मंत्री सार्वजनिक रूप से इस बात पर संतोष व्यक्त करते थे कि वह बाढ़ नियंत्राण के लिये राज्य की नदियों के किनारे तटबन्ध बनाने के काम में शामिल नहीं हैं। उधर उन्हीं के जल-संसाधन विभाग की उसी साल की वार्षिक रिपोर्ट में लिखा था कि, ``...अब तक निर्मित तटबन्धों की कुल लम्बाई 3,465 किलोमीटर है, जिससे लगभग 29.28 लाख हेक्टेयर क्षेत्रा को बाढ़ से सुरक्षा प्रदान होती है। 10 चालू तटबन्ध योजनाएं अभी निर्माणाधीन हैं। इनकी कुल प्रस्तावित लम्बाई 872.74 किलोमीटर है तथा लाभान्वित क्षेत्र 6,36,560 हेक्टेयर है। अब तक केवल 556.69 किलोमीटर लम्बाई में उनका निर्माण हुआ है जिससे 3,18,110 हेक्टेयर भूमि को आंशिक सुरक्षा मिल रही है। निधि के अभाव में इन्हें पूरा करने में कठिनाई हो रही है।´´

अब यह तय करना मुश्किल है कि इनमें से किस खबर पर विश्वास किया जाये। उस पर जो मंत्री महोदय सार्वजनिक मंच से बोलते थे या उस सूचना पर जोकि उनका विभाग चाहता था कि जनता जाने। वास्तव में, शायद यह किसी भी सरकार के हक में जाता है कि वह राज्य में, बिगड़ती बाढ़ की परिस्थिति के लिये तटबन्धों को जिम्मेवार ठहराये। इससे उसको दो प़फायदे होते हैं। एक तो यह कि वत्तZमान बाढ़ के लिए तटबन्ध जिम्मेवार हैं यह सरकार नहीं। और दूसरे यह कि राज्य में जब लगभग सारे के सारे तटबन्ध तब बने थे जब प्रान्त में दूसरी पार्टियों का शासन था। इसलिए अगर तटबन्धों की वजह से कोई नुकसान पहुँचता है तो इसके लिए वह पार्टियाँ जिम्मेवार हैं। और इतना कह देने के बाद भी प्राय: सभी सरकारें वही काम करने के लिये तत्पर रहती हैं जो कि पिछली सरकारों ने बाढ़ नियंत्रण के नाम पर किया था और असफल हुई थीं। यह एक सुरक्षित तरीका है क्योंकि जब आज नदियों के साथ छेड़-छाड़ के परिणाम सामने आयेंगे तब आज की पूरी राजनीतिज्ञों, इंजीनियरों और ठेकेदारों की टीम इतिहास के गर्त में समा चुकी होगी और तब इन सवालों का जवाब अगर कोई देगा तो वह दूसरा ही होगा। आज की हमारी सरकारें भी वही कर रही हैं।

तटबन्धों से हाई डैम और नदी जोड़ने की ओर


अधिकारिक रूप से सरकार ऐसा मानती है कि उत्तर बिहार के मैदान में बाढ़ नियंत्राण तभी हो सकेगा जब यहाँ की नदियों पर नेपाल में वहीं बांध बना दिये जायें जहाँ यह नदियाँ पहाड़ों से मैदानों में उतरती हैं। हम लोग अक्सर कोसी पर बराहक्षेत्र में, बागमती पर नुनथर में और कमला पर शीसापानी में बांध बनाये जाने की बातें सुनते हैं। इसी तरह गंडक, घाघरा और महानन्दा नदियों की सहायक धाराओं पर भी बांध बनाने के प्रस्ताव हैं। 2004 में केन्द्र सरकार ने घोषणा की थी कि अब नेपाल में बराहक्षेत्र बांध के निर्माण के लिए दफ्रतर खुलेगा और इसके लिये लगभग 30 करोड़ रुपयों का अनुदान भी दिया जायेगा।

इस उद्देश्य से नेपाल में विराटनगर, धरान और काठमाण्डू में अब दफ्रतर खुल भी गये हैं। नेपाल में बांध निर्माण की दिशा में आजादी के बाद के 59 वर्षों की यही उपलिब्ध है। उसके बाद भी अगर नेपाल में बांध बन जाते हैं तो उनसे बाढ़ रुक पायेगी, इस पर अभी से सन्देह व्यक्त किये जा रहे हैं। इसके अलावा 2002 से विस्तृत चर्चा में आई भारत की नदी जोड़ योजना का भी प्रस्ताव आया है। गंगा-ब्रह्मपुत्र घाटी की नदियों को जोड़ने में नेपाल की रजामंदी महत्त्वपूर्ण हो जाती है और शायद इसीलिये इस मसले पर फिलहाल खामोशी है।

नेपाल में प्रस्तावित बराहक्षेत्र


केन्द्र और बिहार राज्य की सरकार कोसी नदी पर बराहक्षेत्र में प्रस्तावित बांध को ही कोसी क्षेत्र की बाढ़ समस्या का एकमात्र समाधान मानती हैं। इस तरह के प्रस्तावित सारे बांधों के निर्माण के लिए उपयुक्त स्थल भारत में न हो कर नेपाल में अवस्थित हैं जिसकी वजह से जब तक नेपाल सरकार की रजामन्दी न हो तब तक भारत अकेले कोई भी निर्णय लेने की स्थिति में नहीं है। इन बांधों के निर्माण में पड़ने वाले व्यवधानों के बारे में हम ने पहले भी कुछ-कुछ चर्चा की है। निर्मली में 6 अप्रैल 1947 वाले अपने भाषण में सी. एच. भाभा ने नेपाल में कोसी पर प्रस्तावित बराहक्षेत्र बांध की पुरजोर वकालत की थी। उस समय न तो बड़े बांधों से होने वाले नुकसान के बारे में कोई खास जानकारी उपलब्ध थी और न ही पिछली शताब्दी के 80 और 90 के दशक में होने वाले पर्यावरण आन्दोलनों की कोई भनक ही थी। बांध से प्रभावित होने वाले लोगों के विस्थापन और पुनर्वास समस्या पर उठते हुये विरोध के स्वर भी उस समय तक सुनने में नहीं आये थे। बांधों के निर्माण के लिए आवश्यक धन-राशि भी, ऐसा लगता था, तब आसानी से उपलब्ध हो जाती क्योंकि भारत की आजादी की सुबह करीब थी और देश को एक नवोदित राष्ट्र के रूप में मान्यता मिलने वाली थी। उस समय सबसे अच्छी बात यह थी कि भारत और नेपाल दोनों ही देशों ने बांध के निर्माण में अपनी दिलचस्पी दिखाई थी। क्योंकि यह मसला अंतर्राष्ट्रीय था, अत: इसमें केन्द्र सरकार की भूमिका अहम हो जाती थी। राज्य सरकार भले ही इस बांध परियोजना की लाभार्थी थी मगर निर्णय की प्रक्रिया में उसकी भूमिका महज तबलची की थी। असली गाना-बजाना तो केन्द्र सरकार को ही करना था।

भारत में पानी राज्य का विषय है और यह राज्य का ही कर्त्तव्य बनता है कि वह किसी भी विपत्ति के समय प्रजा के लिए राहत मुहैया करके उसके योग-क्षेम का वहन करे। इसका मतलब यह होता है कि जब तक बराहक्षेत्र या उस जैसे अन्य बांध नहीं बन जाते और राज्य की बाढ़ समस्या का समाधान नहीं हो जाता, तब तक प्रान्तीय सरकार को अपने स्तर पर संरचनात्मक या अन्य माध्यमों से प्रजा की बाढ़ के थपेड़ों से रक्षा करना पड़ेगी। केन्द्र सरकार इस प्रयास में राज्य सरकार की कुछ मदद करती है ताकि वह ऐसी संरचनाओं का निर्माण कर सके और राहत कार्य के खर्चे उठा सके। इस तरह से राज्य और केन्द्र सरकार की भूमिकायें बड़ी साफ हैं।

केन्द्र सरकार द्वारा जब से 1945 में कोसी पर प्रस्तावित तटबन्धों को बराहक्षेत्रा बांध के हक में नकारा गया तभी से बराहक्षेत्र बांध का भूत योजनाकारों, इंजीनियरों और राजनीतिज्ञों का पीछा कर रहा है। निर्मली सम्मेलन (1947) में जो प्रस्ताव किया गया था उसी कड़ी में राम बिलास पासवान के बिहार की बाढ़ संबंधी एक ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के जवाब में तत्कालीन केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री अर्जुन चरण सेठी ने 23 अगस्त 2003 को लोकसभा को बताया कि, ``... जहाँ तक बिहार का संबंध है, हम लगातार नेपाल सरकार से संपर्क बनाये हुये हैं क्योंकि यह सारी नदियाँ नेपाल से निकलती हैं। जब तक हमारा नेपाल से कोई समझौता नहीं हो जाता तब तक इस समस्या का समाधान नहीं हो सकता। नेपाल क्षेत्रा में अनुसंधान और विस्तृत परियोजना रिपोर्ट बनाने के प्रस्ताव का क्रियान्वयन करने के लिए एक संयुक्त परियोजना कार्यालय को मंजूरी दी जा चुकी है। भारत के 42 तथा नेपाल के 100 अधिकारी मिल कर अनुसंधान और अध्ययन का काम करेंगे। इस परियोजना में अनुमानत: 269 मीटर उफँचा बांध बनाया जायेगा जिसकी विद्युत उत्पादन क्षमता 3300 मेगावट होगी। इसके अलावा नेपाल तथा भारत दोनों को सिंचाई का भी लाभ मिलेगा। कोसी बहुद्देशीय योजना के अलावा इस प्रस्ताव में सुन-कोसी डाइवर्शन परियोजना भी शामिल।´´ कुछ इसी तरह की बात तात्कालीन केन्द्रीय जल-संसाधन मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी ने 5 जून 2004 को किशनगंज में कही। इसी तरह के बयान 2005 में फिर प्रियरंजन दासमुंशी और जय प्रकाश नारायण यादव (केन्द्रीय जल संसाधन राज्य मंत्री) जनता के बीच दे चुके हैं। यानी जहाँ तक बराहक्षेत्रा बांध का सवाल है, लगभग 60 वर्ष के अन्तराल के बाद भी नेता लोग एक ही बयान पर कायम हैं कि वह नेपाल से वार्ता कर रहे हैं।

भाभा के निर्मली भाषण (1947) के बाद से केन्द्र और राज्य के मंत्री इस तरह का भाषण लगातार दिया करते हैं मगर 59 साल बीतने के बाद भी उनके भाषण का मूल पाठ वही रहता है कि नेपाल से बातचीत चल रही है। यह अजीब बात है कि अगर बराहक्षेत्र बांध ही कोसी नदी घाटी की सारी समस्याओं का समाधान है और इससे दोनों देशों का फायदा है तो भारत क्यों नहीं नेपाल को इन फायदों से अब तक अवगत करा पाया और क्यों नेपाल इतने लम्बे समय से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दे रहा है?

(लेखक बाढ़ विशेषज्ञ एवं अभियंता हैं, कोसी और महानंदा पर लिखित पुस्तक काफी चर्चित रही)

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