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बाढ़ रोकने के लिए सप्तकोसी पर ऊंचा बांध बांधना जरूरी : विशेषज्ञों की राय

कोसी बैराजकोसी बैराजनई दिल्ली / बिहार के कोसी क्षेत्र में आई भयानक बाढ़ से उपजी जल प्रलय की स्थिति के बीच बाढ़ विषेशज्ञों ने सप्तकोसी बहुउद्देशीय परियोजना को अमली जामा पहनाए जाने और कोसी नदी पर बने बांध के रखरखाव के लिए अमेरिकी प्रौद्योगिकी के उपयोग से साल दर साल आने वाली बाढ़ पर नियंत्रण किए जाने की बात की है। बाढ़ विशेषज्ञ नीलेंदू सान्याल और दिनेश चंद्र मिश्र ने कहा कि भारत और नेपाल के बीच सप्तकोसी बहुउद्देशीय परियोजना के तहत अभी तक अधिक ऊंचाई का बांध नहीं बनने व अमेरिकी बांध प्रौद्योगिकी का उपयोग नहीं किए जाने के कारण आज हमें महाजल प्रलय की स्थिति का सामना करना पड़ रहा है।

बाढ़ विशेषज्ञ दिनेश चंद्र मिश्र ने बताया कि भारत और नेपाल के बीच 2004 में सप्तकोसी बहुउद्देशीय परियोजना के तहत चार सदस्यीय भारतीय दल का गठन कर इस परियोजना की व्यवहार्यता रपट तैयार की गई। इसमें सप्तकोसी पर ऊंचे बांध के निर्माण की बात कही गई थी जिसकी ऊंचाई तजाकिस्तान में बख्श नदी पर विश्व के सबसे ऊंचे रोंगन बांध के बराबर 335 मीटर निर्धारित की गई थी।

उन्होंने बताया कि इसके अलावा कोसी की सात सहायक नदियों में शामिल सुनकोसी नदी पर बांध बनाया जाना था और नेपाल के ओखलाधुंगा क्षेत्र में सुनकोसी से नहर निकाल कर उसे मध्य नेपाल से कमला नदी से जोड़ा जाना था। यह कवायद अभी तक पूरी नहीं की जा सकी है। मिश्र ने बताया कि बिहार में हर साल आने वाली बाढ़ से निजात पाने का रास्ता कोसी नदी पर ऊंचा बांध बनाना है। सप्तकोसी नेपाल की सबसे बड़ी नदी है जिससे सूखे मौसम मे औसतन एक लाख पचास हजार क्यूसेक जल प्रवाह होता है। मानसून के दौरान यह बढ़कर चार लाख क्यूसेक हो जाता है।

उन्होंने कहा कि सप्तकोसी बहुउद्देशीय परियोजना के पूरा होने से भारत और नेपाल दोनों को फायदा है। इसके कारण न केवल 5500 मेगावाट बिजली पैदा की जा सकेगी बल्कि भारत और नेपाल में तीन लाख हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि में सिंचाई कार्य भी हो सकेगा। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि बिहार में हर साल आने वाली बाढ़ पर नियंत्रण किया जा सकेगा। बाढ़ विशेषज्ञ नीलेंदू सान्याल ने कहा कि कोसी बराज या भीमसागर बराज का निर्माण 1959 और 1963 में हुआ था जिसके रखरखाव की स्थिति काफी खराब है। मरम्मत के लिए अभी भी वर्षों पुराने तरीके का उपयोग किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि पूरे बांध का वीडियो फुटेज तैयार कर इसके रखरखाव के लिए अमेरिकी प्रौद्योगिकी का उपयोग किया जाना चाहिए। इसके तहत धातु ट्राई पैड पालीमर से बने ब्लाडर और बालू के उपयोग से बांध के मरम्मत का कार्य किया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि अमेरिका में इस प्रौद्योगिकी का विकास सेना के लिए किया गया था। बांधों के रखरखाव में यह काफी कारगर साबित हुई थी।

इस बीच बांध मरम्मत से जुड़े इंजीनियरों के अनुसार बांध को मजबूती प्रदान करने के लिए पत्थरों और बोरियों में भरे मिट्टी और बालू को लोहे के तार की जाली लगाई जाती है। नेपाल में कोसी नदी पर बांध पर ऐसे लोहे की तार की जालियों को स्थानीय लोगों को काट कर कबाड़ के रूप में बेच दिया गया है। बांध पर लगाई गई जालियों को काटे जाने से बांध कमजोर हो गया और जल प्रवाह के दवाब में टूट गया।

कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि कोसी पर बांध बनाने से बांग्लादेश को भी आपत्ति हो सकती है क्योंकि 1996 में बांग्लादेश और भारत के बीच हुए फरक्का समझौते में ऐसी किसी भी स्थिति से बचने की बात कही गई है जिससे गंगा का जल प्रवाह प्रभावित होता हो। कोसी बाद में गंगा से जाकर मिलती है। इस पर बांध बनने से गंगा का जल प्रवाह प्रभावित होगा।

कोसी को बांधा नहीं जा सकता

पिछले कई सालों से न सिर्फ केन्द्र सरकार ने बल्कि बिहार सरकार ने भी बाढ़ कार्यवाही योजना का गलत निर्धारण किया है। सन 1954 से जब नेपाल इस मामले में एक पक्ष बना है तबसे लगातार पूरी जिम्मेदारी नेपाल पर थोपना काफी आसान हो गया है। तथ्यान्वेषण दल को यह देखकर अचम्भा हुआ कि न तो केन्द्र सरकार और न ही बिहार सरकार ने यह आकलन करने के लिए कोई सर्वेक्षण किया है कि बाढ़ नियंत्रण उपायों का समाज के समाजिक आर्थिक परिस्थिति पर क्या प्रभाव पड़ा है। यही स्थिति नेपाल में भी है।

तथ्यान्वेषण दल का यह मानना है कि मौजूदा समस्या का मूल कारण तटबंध ही नहीं है। दल इस स्थिति के हल के लिए निश्चित नीति निर्णय चाहता है। हालांकि जिसे गैरकानूनी माना जाता है, लेकिन पानी में फंसे लोग अपने आस-पास जमा पानी को निकालने के लिए तटबंध को तोड़ने का सहारा लेते रहते हैं। इसके पक्ष में सामान्य सोच यह है कि तटबंधों को तोड़ने से कोई अनचाही परिस्थिति नहीं पैदा होती है।

भारत में तटबंधों को तोड़ने के प्रमाण भी हैं। दामोदर नदी में 1854 में बने 32 किमी लम्बे तटबंध को 1869 में ढहा दिया गया। ब्रिटिश सरकार को बहुत जल्दी यह महसूस हो गया कि इससे बाढ़ नियंत्रण नहीं होता, तटबंधों से उपजाऊ जमीने डूब में जा रही थीं, जिसके लिए उन्हें मुआवजा देने को बाध्य होना पड़ता था। तथ्यान्वेषण दल के लेखक श्री सुधीरेन्द्र शर्मा के अनुसार, ''तटबंध टुटने के कारण मुआवजा देने की सबसे पहली घटना 1896 की है जब पश्चिम बंगाल के बर्दवान जिले में किसानों को 60,000 रुपये मुआवजा दिया गया।''

हॉलैंड में राइन और मियूस नदी को बांधने में असफल रहने पर वहां के जलविज्ञानियों ने सुरक्षा का एक खास तरीका अपनाया है जिसे 'नदी के उन्मुक्त प्रवाह की जगह' कहा जाता है। इस नई आवधारणा न सिर्फ जानकारी युक्त चर्चा की जरूरत है बल्कि यह व्यापक राजनैतिक समर्थन पर आधारित है। ऐसे उपायों पर उत्तर बिहार के निवासियों से चर्चा करके निष्कर्ष पर पहुंचने की जरूरत है, लेकिन इसके लिए केन्द्र सरकार और बिहार सरकार के बीच आपसी सहमति की जरूरत है।

जब तक दोषी अधिकारियों एवं संस्थाओं को जवाबदेह नहीं बनाया जाएगा तब तक न सिर्फ वे पिछली गलतियां दोहराई जाएंगी बल्कि नई अवधारणाओं और रणनीतियों को लागू करना भी मुश्किल होगा। यह बात जल संसाधन से जुड़ी संस्थाओं के मूल, क्रियाकलाप, और कानूनों से साफ होती है। वे सभी बड़ी परियोजनाओं के नियोजन, डिजाइन और क्रियान्वयन के लिए ही बनी हैं। यह बात भी साफ है कि वे भागीदारी युक्त या पारदर्शी संस्थाओं के प्रति इच्छुक भी नहीं हैं। ये संस्थाएं पूरी नदी घाटी की आवश्यकताओं, संसाधनों और प्राथमिकताओं को शामिल करने में असफल रही हैं। इस तरह ''मौजूदा संस्थाओं को पूरी तरह नये सिरे से खंगालने (परिभाषित) की जरूरत है'', ऐसा कहना है कोसी के तथ्यान्वेषण रिपोर्ट के सह-लेखक श्री गोपाल कृष्ण का।

ऐसे मामलों में किसी न्यायिक या प्रशासनिक जांच से आपराधिक जिम्मेदारी नहीं तय होती है, क्योंकि ऐसे आयोगों और समितियों के निष्कर्ष तो निश्चित ही होते हैं। यह तो किसी परिणाम पर न पहुंचने की नियमित प्रक्रिया है। हालांकि, न्यायमूर्ति राजेश बालिया आयोग के विचारार्थ विषय में कोसी उच्च स्तरीय समिति के बारे में स्पष्ट किया गया है, लेकिन उसकी विशेषताओं पर ध्यान देने की जरूरत है। लेकिन ऐसे आयोगों की सबसे बड़ी सीमा यह होती है कि ये समस्या के लिए जिम्मेदार मौजूदा संस्थाओं से न तो सवाल करती हैं और न तो कर सकती हैं। आयोगों द्वारा तैयार ऐसी सैकड़ों रिपोर्टों में धूल पड़ रही हैं और उन्हें दीमक चाट रहे हैं। इनमें से ज्यादातर का उपयोग चुनावों में प्रचार के लिए होता है। इस तरह, सबकी परिणति एक जैसी होती है।

आइए इस आपदा पर भारतीय प्रधानमंत्री, बिहार के प्रधानमंत्री और बिहार के मुख्यमंत्री के बयान पर एक नजर डालते हैं। कोसी क्षेत्र के कुशहा में तटबंध में कटाव आने के बाद बिहार के मुख्यमंत्री ने 19 अगस्त 2008 को भारत के विदेश मंत्री से निवेदन किया कि वे कोसी समझौते के अनुसार नेपाल में कटाव के मरम्मत के लिए नेपाल सरकार को कानून व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए सम्पर्क करें।

नेपाल के सुंसारी जिले के लौकाही पुलिस थाना में 16 अगस्त 2008 उन असामाजिक तत्वों के खिलाफ एक प्राथमिकी दर्ज कराई गई है जिनके द्वारा ऐसी परिस्थिति उत्पन्न की गई कि सभी इंजिनियरों को वहां से भाग जाना पड़ा।

20 अगस्त 2008 को नेपाल के प्रधानमंत्री ने स्थिति का जायजा लेते हुए कहा कि, ''कोसी समझौता एक भयंकर ऐतिहासिक भूल थी'' और ''इसे लोग पीड़ित हैं''। समझौते की वजह से तटबंधों का निर्माण हुआ है और बड़े बाध का प्रस्ताव है। भारत के प्रधानमंत्री ने 28 अगस्त 2008 को बाढ़ग्रस्त इलाकों का हवाई सर्वेक्षण करने के बाद इस समस्या को ''राष्ट्रीय आपदा'' घोषित किया और राहत और पुनर्वास के लिए तत्काल 1000 करोड़ रुपये जारी करने की भी घोषणा की।

यह ध्यान देने योग्य है कि भारत सरकार ने 2004 में घोषित अपने राष्ट्रीय न्यूनतम सहमति कार्यक्रम के तहत उत्तरी बिहार के बाढ़ नियंत्रण, ड्रेनेज आदि योजनाओं को पूरा करने का संकल्प लिया था (जिसके लिए नेपाल सरकार की सहमति भी जरूरी है)। उस वादे को किए हुए चार साल हो गए लेकिन अब फिर अगस्त 2008 में उन्होंने कहा कि, ''नेपाल सरकार से समन्वय के लिए वे एक उच्च स्तरीय दल गठित करेंगे''। उन्होंने यह भी वादा किया कि तटबंध के मरम्मत, रखरखाव व सुरक्षा के लिए वे बिहार सरकार को आवश्यक तकनीकी सहायता भी उपलब्ध करएंगे। इस तरह की आश्वासन वाली बातें तो पिछले 60 सालों से की जा रहीं है। इससे पहले भारत सरकार ने नेपाल के जल संसाधन मंत्रालय के अंतर्गत जल आधारित आपदा निवारण विभाग के निवेदन पर 7 जुलाई 2008 को नदियों के तटबंध के मरम्मत व विकास के लिए अनुदान दिया था।

इन सबसे साफ है कि जमीनी स्तर पर जो भी बदलाव आए, ज्यादातर बाते वैसे ही रहती हैं। तटबंध के मरम्मत का कार्य जारी है और तात्कालिक हल के तौर पर उसके मार्च 2009 तक पूरा हो जाने की उम्मीद है। ऐसे समय में उत्तारी बिहार और नेपाल में कोसी के बाढ़ क्षेत्र का दौरा करके लौटे तथ्यान्वेषण दल की मांग है कि इस पूरी आपदा पर और खासकर उत्तरी बिहार में कोसी घाटी के ड्रेनेज (जलनिकासी) पर एक श्वेत पत्र जारी किया जाय। ताकि मौजूदा नीतियों के कारण बंद हुई ड्रेनेज समस्या को हल किया जा सके। इससे समस्या और बाढ़ प्रवण क्षत्र में बढ़ोतरी करने वाली तथाकथित विपरीत हल की परिस्थतियों का पता लगना चाहिए।

इस रिपोर्ट का कहना है कि बांध, तटबंध और उनकी मरम्मत जैसे बाढ़ नियंत्रण के उपायों से सिर्फ तात्कालिक राहत मिल सकती है। ऐसी परिस्थिति में नदी के बहाव क्षेत्र में बदलाव के कारकों का सूक्ष्म स्तर पर दीर्घकालीक और सावधानीपूर्वक अध्ययन की जरूरत है। यहां यह स्पष्ट करने की जरूरत है कि तटबंध के कटाव को बंद कर दने से ही समस्या का स्थायी हल नहीं हो जाएगा। परिवर्तनकारी जलविज्ञान को नजरअंदाज करने पर बांध और तटबंध की उम्र 25 साल होती है और बदलावों को ध्यान दते हुए तकनीकी सुधार करते हुए 37 साल होती है।

कोसी तटबंध में अब तक का यह आठवां कटाव है, जिसमें नेपाल के चार पंचायत, उत्तरी बिहार के 4 जिले सहरसा, सुपौल, मधेपुरा और अररिया इस बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। इनके अलावा 12 अन्य जिले पुर्णिया, खगड़िया, मुजफ्फरपुर, पश्चिमी चंपारण, सारण, शेखपुरा, वैशाली, बेगुसराय, पटना, और नालंदा भी इस बाढ़ से प्रभावित हुए हैं। एक अनुमान के अनुसार करीब 35 लाख लोग इस बाढ़ से प्रभावित हुए हैं। बिहार सरकार के रिपोर्टों के अनुसार पिछले साल 22 जिलों में 48 लाख लोगों को बाढ़ के कारण सहायता की जरूरत थी। इससे साफ है कि घटना के पैमाने का अनुमान न कर पाने से इतनी बड़ी आपदा आई। बाढ़ के पानी का सबसे पहला कार्य यह होता है कि अतिरिक्त पानी की निकासी करे। लेकिन इंजिनियरिंग हस्तक्षेप के करण ऐसा नहीं हो पाया।

अब तक न ऐसा कोई तटबंध बना है और न भविष्य में बनेगा जिसमें कटाव न आए। कोसी नदी के तटबंध में कटाव और पिछले नेपाली और भारत सरकार द्वारा बड़े बांध का प्रस्ताव के तर्क में इस बात पर ध्यान नहीं दिया गया कि कोसी को बांधा नहीं जा सकता।

अपने विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों और जटिल जलविज्ञान के विशेषताओं के कारण कोसी एक ऐसी नदी है जिसके बारे में अभी व्यापक रूप से समझा जाना बाकी है। यह सही समय है कि नीति निर्माता ''प्रकृति पर नियंत्रण'' करने के अपनी पुरानी अवधारणा का त्याग करें और यह माने कि हमें बाढ़ के साथ जीना सीखना होगा।

विस्तृत जानकारी के लिए सम्पर्क करें।
सुधीरेन्द्र शर्मा : 9868384744, ईमेल : sudhirendar@vsnl.net
गोपाल कृष्ण : 9818089660, ईमेल : krishnagreen@gmail.com

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