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ब्राउन क्लॉउड ( Brown Cloud )

कुछ नम स्थितियों में, यह कुहरा बनाता है। ब्राउन क्लॉउड haze = धुआं + कुहरा + नमी + धूल कण से बनता है। यह दहन (जैसे लकड़ी को जलाने, कारों और कारखानों आदि), बायोमास के जलने और अधूरे दहन के साथ औद्योगिक प्रक्रियाओं से हवा में मिले अणुओं और प्रदूषकों से बनता है। ये बादल शीतकालीन मानसून (नवंबर / दिसंबर से अप्रैल) से जुड़ा हुआ है, इस दौरान हवा से प्रदूषकों को धोने के लिए बरसात भी नहीं होती।

Brown Cloud
In some humidity conditions, it forms haze. It is created by a range of airborne particles and pollutants from combustion (e.g. woodfires, cars, and factories), biomass burning and industrial processes with incomplete burning. The cloud is associated with winter monsoon (November/December to April) during which there is no rain to wash pollutants from the air.

ब्राउन क्लाउड 2


हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय भूभौतिकी अनुसंधान संस्थान के मुनीर अहमद का कहना है कि ग्लेशियरों के इस कदर तेज़ी से पिघलने की वजह ग्लोबल वार्मिंग के साथ-साथ 'ब्राउन क्लाउड' है.

दरअसल, ब्राउन क्लाउड प्रदूषण युक्त वाष्प की मोटी परत होती है और ये परत तीन किलोमीटर तक मोटी हो सकती है. इस परत का वातावरण पर विपरीत असर होता है और ये जलवायु परिवर्तन में अहम भूमिका निभाती है.

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम यानी यूएनईपी की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की सबसे ऊँची चोटी माउंट एवरेस्ट की तलहटी में भी काले धूल के कण हैं और इनका घनत्व प्रदूषण वाले शहरों की तरह है.

शोधकर्ताओं का कहना है कि क्योंकि काली-घनी सतह ज़्यादा प्रकाश और ऊष्मा सोखती है, लिहाजा ग्लेशियरों के पिघलने की ये भी एक वजह हो सकती है. अगर ग्लेशियरों के पिघलने की रफ़्तार अंदाज़े के मुताबिक ही रही तो इसके गंभीर नतीजे होंगे.

दक्षिण एशिया में ग्लेशियर गंगा, यमुना, सिंधु, ब्रह्मपुत्र जैसी अधिकाँश नदियों का मुख्य स्रोत हैं. ग्लेशियर के अभाव में ये नदियां बारामासी न रहकर बरसाती रह जाएँगी और कहने की ज़रूरत नहीं कि इससे लाखों, करोड़ों लोगों का जीवन सूखे और बाढ़ के बीच झूलता रहेगा.

खतरनाक हैं भूरे बादल

चीन और भारत पर भूरे बादलों का प्रभाव कुछ ज्यादा ही देखने को मिल रहा है। संयुक्त राष्ट्र की पर्यावरण शाखा के लिए की गई एक शोध से साबित होता है कि एशियाई शहर खतरनाक भूरे बादलों की चपेट में आते जा रहे हैं। एनवायरमेंट न्यूज नेटवर्क की इस शोध से पता चला है कि अधिकतर एशियाई शहरों में सूरज की 25 प्रतिशत किरणें धरती तक पहुंच ही नहीं पाती है, क्योंकि प्रदूषण की वजह से बने भूरे बादल उन्हें आकाश में ही रोक लेते हैं। ये बादल कभी-कभी तो 3 किलोमीटर गहरे होते हैं। इससे सबसे अधिक प्रभावित शहर चीन का ग्वानजाउ है, जो 1970 से ही धुएं के बादलों से घिरा हुआ है।

इसके अलावा जिन शहरों पर सबसे अधिक खतरा है, वे हैं बैंकाक, बीजिंग, ढाका, कराची, कोलकाता, मुम्बई, दिल्ली, सिओल, शंघाई, शेनजाउ और तेहरान। इस रिपोर्ट के अनुसार इन बादलों में मौजूद टोक्सिक पदार्थों की वजह से चीन में प्रति वर्ष 3,40,000 लोग मारे जाते हैं। ये टोक्सिक पदार्थ हिन्दू कुश और हिमालय पर्वत शृंखला के लिए भी खतरा है। इससे वहां के ग्लेशियर तेजी से पिघलते जा रहे हैं। ऐसा खतरा यूरोपीय और अमरीकी महाद्वीप के देशों पर भी है, परंतु वहां होने वाली शीतकालिन वर्षा और बर्फ की वर्षा इन बादलों को मिटा देती है। लेकिन एशियाई शहरों मे बर्फीली वर्षा नहीं होती है और वहां भूरे बादलों का खतरा लगातार बढ़ रहा है।

प्रतिमत - ब्राउन क्लाउड रोकेंगे ग्लोबल वार्मिग! 1


बीजिंग। दुनिया की सबसे बड़ी जनसंख्या वाले देशों भारत व चीन सहित कई एशियाई देशों में ब्राउन क्लाउड्स [भूरे बादल] को पर्यावरण के लिए जहां बेहद खतरनाक बताया जा रहा है वहीं इसके कुछ फायदे भी हैं। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक ब्राउन क्लाउड्स ग्लोबल वार्मिग को रोकने में मददगार साबित हो सकते हैं।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की प्रमुख आशिम स्टेनर के मुताबिक वाहनों, फैक्ट्रियों के धुएं तथा कोयले व खेतों-जंगलों के जलने से ब्राउन क्लाउड्स का निर्माण होता है। जहां भूरे बादलों से सूर्य की रोशनी में एक चौथाई तक कमी हो जाती है वहीं ये वैश्विक तापमान को दो डिग्री सेल्सियस तक कम रखने में मददगार साबित हो रहे हैं।

दूसरे शब्दों में कहें तो भूरे बादलों की दो मील मोटी चादर जलवायु परिवर्तन की गति को 20 से 80 फीसदी तक कम कर सकती है। स्टेमर के अनुसार 'इस चादर से जलवायु परिवर्तन का असर थोड़ा कम हो सकता है लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि यह पर्यावरण के लिए फायदेमंद है। जहां इन बादलों का असर ज्यादा है वहां के तापमान में बढ़ोत्तारी ही होगी।'

1- साभार – जागरण याहू

2- साभार – That’s Hindi -One India

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hi gayswelll 

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