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राधा भट्टराधा भट्टचिपको, शराबबंदी और उत्तराखंड आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाली और गांधी शांति प्रतिष्ठान की अध्यक्ष राधा भट्ट इन दिनों राज्यव्यापी नदी बचाओ अभियान में सक्रिय हैं। उनके नेतृत्व में उत्तराखंड में इस साल (नदी बचाओ अभियान वर्ष) मनाया जा रहा है। इस अभियान के बारे में आपसे बातचीत:

-आपके अभियान में प्रदेश के कितने संगठन सक्रिय हैं और वे किस तरह इस मुहिम को मजबूत बनाने में जुटे हुए हैं?
इस अभियान में उत्तराखंड राज्य की दो दर्जन से अधिक संस्थाएं और संगठन जुड़े हुए हैं। उनके स्वयंसेवक अपनी-अपनी घाटियों में आमजनों के साथ मिलकर स्थितियों का अध्ययन कर रहे हैं। सरकार तक लोगों की समस्याओं को पहुंचाने में लगे हैं। धरना-सत्याग्रह में जुड़ रहे हैं और नदी बचाने के लिए वृक्षारोपण करने में लगे हैं। इसके अलावा जंगलों को आग से बचाने और चाल-खाल बनाने में जुटे हुए हैं।

- अभियान का एक प्रतिनिधिमंडल आपके नेतृत्व मे प्रदेश के मुख्यमंत्री से मिल चुका है। उन्होंने आंदोलनकारियों को क्या आश्वासन दिया है?

प्रतिनिधिमंडल मुख्यमंत्री से जनवरी की राज्यव्यापी पदयात्रा के दौरान उन सब मुद्दों को लेकर मिला था, जो उत्तराखंड में जल संवर्धन और नदियों के संरक्षण के लिए लोगों की ओर से उठाए गए थे। मुख्यमंत्री ने हमारी बातें सुनीं। लेकिन कोई स्पष्ट आश्वासन नहीं दिया था, केवल मीडिया में कहते रहे हैं कि बड़े बांधों के निर्माण पर पुनर्विचार करेंगे और धार्मिक नदियों पर कम से कम छेड़छाड़ करेंगे।

- आपकी अगली रणनीति क्या होगी?
अभियान सभी निर्णय सामूहिक रूप से उठाता है, जिन-जिन नदियों पर संयोजक समितियां व संयोजक मिलकर कदम तय करते हैं और स्थितियां बनती हैं वैसा कदम मिल कर तय करेंगे। अभी हमारा अभियान प्रोफेसर जीडी अग्रवाल के उपवास पर ध्यान केंद्रित किए हुए है।

- उत्तराखंड नदी बचाओ अभियान में जनता की भागीदारी किस प्रकार बढ़ रही है?
जनता की भागीदारी विभिन्न घाटियों में बढ़ रही है। जो पहले अपने कष्टों को धीरे से कह रहे थे वे अब ज्ञापन दे रहे हैं, धरना उपवास कर रहे हैं। महिलाएं संगठित हो रही हैं। वे अपने क्षेत्र की नदियों के प्रति सजग होकर वहां होने वाले रेत-बजरी आदि के खनन के व्यापारिक दोहन को रोक रही है। जंगलों में लगने वाली आग को बुझा रही हैं। उनके प्रयासों पर लोग अधिक से अधिक चाल-खाल बना रहे हैं। आरक्षित वनों को बचाने के लिए भी सक्रियता और प्रतिबद्धता से काम कर रही है।

- क्या इस अभियान को उत्तराखंड के बाहर से भी समर्थन मिल रहा है? मिल रहा है तो किस तरह से?
प्रदेश के बाहर से कई सामाजिक क्षेत्र में पर्यावरण के लिए काम करने वाले लोग नदियों को बचाने के लिए लोगों में जागृति लाने के मकसद से राज्यव्यापी पदयात्राओं के बाद रामनगर में हुए सम्मेलन में शामिल हुए थे। आर्थिक दृष्टि से की गई हमारी अपील पर अनेक मित्रों व इन कामों में विश्वास रखने वाले साथियों ने अपनी छोटी-छोटी मदद भी भेजी है, जिससे स्थानीय स्तर पर चल रहे प्रयासों को ताकत मिली है। दूसरे प्रदेशों में भी इस वर्ष को उत्तराखंड की तर्ज पर नदी बचाओ अभियान वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है। नदी के सवाल पर प्राफेसर जीडी अग्रवाल के आमरण अनशन के फैसले को देखते हुए देश भर के आईआईटी वाले सर्वोदयी साथी और उनके शिष्य सक्रिय हो गए हैं। प्रो. अग्रवाल के फैसले का पूर्ण समर्थन करते हुए उत्तराखंड नदी बचाओ अभियान के साथी भी अपने-अपने क्षेत्रों में लोगों को जगा रहे हैं। संगठित कर रहे हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नाम से आन लाइन आवेदन पर हस्ताक्षर अभियान चलाए जा रहे हैं। उनके समर्थन में अभियान के साथी भी प्रदेश में अलग-अलग जगहों पर सामूहिक उपवास कर रहे हैं।

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