सबसे पहली और जरूरी चीज पानी

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मधुसूदन आनन्द /6 Jun 2009,नवभारत टाइम्स (कापीराइट)
मुझे नहीं मालूम कि भारत में कैसे नदियों, बावड़ियों, जोहड़ों और तालाबों को फिर से पुनर्जीवित किया जाए और कौन इस भगीरथ-कार्य को करेगा। हमारी सरकारें पानी के बारे में उतनी भी सचेत नहीं हैं, जितनी देश की रक्षा के बारे में। पानी को लेकर देश में कोई अखिल राष्ट्रीय चेतना तक नहीं है। क्या आपको नहीं लगता कि आज सबसे पहली और जरूरी चीज पानी है, जिस पर गौर करने की, जिसे बचाने की जरूरत है। दिल्ली के पॉश इलाके हौज खास में रहनेवाले मेरे एक मित्र का फोन था। बोले : चार- पांच दिनों से नल से एक बूंद भी पानी नहीं टपका। वैसे भी पानी रात को 3-4 बजे आता है और हम दिन भर का काम चलाने के लिए भरकर रख लेते हैं। पहले फोन करने पर जल बोर्ड का टैंकर आ जाता था। अब उसके दफ्तर जाने पर भी कोई नहीं सुनता। ग्राउंड वॉटर बेहद खारा और हार्ड है और उससे बिल्कुल भी काम नहीं चलता। कुछ करो भाई।

भाई बेचारा क्या करे। वह भी साउथ दिल्ली में ही रहता है। उसे भी पानी की कमी से जूझना पड़ता है। वैसे तो साउथ दिल्ली में हमेशा से ही प्रति व्यक्ति पानी की सप्लाई कम है लेकिन इन दिनों तो जीवन दूभर होता जा रहा है। जिन लोगों के पास पैसा है, वे प्राइवेट टैंकर से पानी मंगा लेते हैं। लेकिन गरीब क्या करे? और पानी की भीषण कमी दिल्ली में कमोबेश सभी जगह है। दिल्ली में पानी के लिए हर गर्मियों में हाहाकार मचता है और मारपीट होती है। सोचिए, जब देश की राजधानी का यह हाल है तो और शहरों की हालत क्या होगी?

दिल्ली के ही अखबारों में छपा है कि यों तो समूचे मध्य प्रदेश में ही पानी का संकट है, लेकिन इंदौर, उज्जैन, देवास और सागर संभाग के शहरों में बुरी हालत है। मसलन देवास और उज्जैन में हफ्ते में एक दिन ही पानी की सप्लाई होती है। पानी के लिए अब तक इस राज्य में 45 झगड़े तो बाकायदा दर्ज किए जा चुके हैं, जिनमें सात लोगों की मौत हो गई।

राज्य की राजधानी भोपाल में अभी कुछ रोज पहले पानी के लिए मची मारामारी में एक ही परिवार के तीन लोग मारे गए। कुछ शहरों में तो यह भी ठिकाना नहीं कि नलों में हफ्ते में एक बार भी पानी आएगा। भीषण संकट को देखते हुए सिहोर शहर की नगरपालिका ने अपने निवासियों को राशन कार्ड की तर्ज पर वॉटर-कार्ड जारी करने का फैसला किया है। इस कार्ड से प्रति व्यक्ति 50 लीटर प्रतिदिन के हिसाब से पानी दिया जाएगा। जबकि यह माना जाता है कि एक आदमी को रोज कम-से-कम 150 लीटर पानी चाहिए। अभी इस शहर के नलों में चार दिन में एक बार पानी आता है, वह भी थोड़ी देर के लिए। बताया गया है कि राज्य के 341 कस्बों और 15 हजार गांवों में पानी का भीषण संकट है।

राजस्थान में पानी की कमी का सदाबहार आलम आज यह है कि पिछले महीने राजधानी जयपुर के बाहरी इलाकों में प्रदूषित पानी पीने के कारण 20 बच्चे मारे गए। जब लोग भड़क उठे तो अधिकारियों ने हस्बे मामूल कंधे उचका दिए, मगर विवश होकर यह अपील उन्हें भी करनी ही पड़ी कि राज्य द्वारा जिन 3500 टैंकरों से पानी भेजने का इंतजाम किया गया है, कृपया उन्हीं का पानी पीएं। राज्य के 8000 गांवों और 52 कस्बों में पीने के पानी का अकाल है। इन टैंकरों से आखिर कितना पानी मिल पाएगा? भीलवाड़ा और पाली में तो रेलगाड़ियों से पानी पहुंचाया जा रहा है।

भारत के अनेक गांवों और शहरों में पीने के पानी की कमी लगातार बढ़ती जा रही है। गर्मियों में हालात बेहद खराब हो जाते हैं। कुछ समय पहले एक अंतरराष्ट्रीय एजेंसी ने कहा था कि अगर भारत ने साफ पानी की सप्लाई को सुनिश्चित नहीं किया तो 10-12 बरसों में उसकी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था तो बैठ ही जाएगी, 40 प्रतिशत आबादी भी साफ हो जाएगी। ऐसा ही आकलन चीन के बारे में भी है, जिसकी अर्थव्यवस्था के विकास की रफ्तार भारत से भी तेज है। भारत में जमीन के नीचे पानी का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। जो कुएं आज खोदे जाते हैं, वे कल सूख जाते हैं। कहीं-कहीं तो 400-500 मीटर तक खुदाई करने पर पानी मिलता है। जाहिर है, वहां पीने का पानी भी मुश्किल से मिलता है।

अगर आप सचमुच बिना पानी के किसी दिन की कल्पना करें तो एक अजीब अहसास से कांप उठेंगे। साफ पानी न हो तो आप क्या पीएंगे? कैसे नहाएंगे और दांत साफ करेंगे? बर्तन धोने, कपड़े धोने, घर साफ करने और भोजन पकाने आदि के लिए रोज पानी चाहिए। पानी नहीं होगा तो आप कैसे जीएंगे? आखिर कितनी देर कोई प्यासा बैठा रह सकता है। यह सोचकर देखें तो हौज खास के मेरे मित्र की समस्या आप समझ सकते हैं।

पानी पर आपका अधिकार है। वह आपको मिलना ही चाहिए। और साफ मिलना चाहिए। यही नहीं, वह मुफ्त भी मिलना चाहिए। और जो सरकार या राज्य उसे उपलब्ध नहीं करा सके, उसे एक दिन भी अपनी कुर्सी पर बने रहने का हक नहीं होना चाहिए। पानी पर आपके अधिकार का मतलब है जीवन का अधिकार। अगर पानी आपको नहीं मिल रहा है तो समझिए कि आपसे आपके जीने का अधिकार छीना जा रहा है। किसी भी देश में इस स्थिति को स्वीकार नहीं किया जा सकता और भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में तो बिल्कुल भी नहीं।

पानी का हिसाब-किताब लगाने के लिए वॉटर बजट का प्रयोग किया जाता है। वॉटर बजट का मतलब है, औसत वार्षिक वर्षा कितनी मिलीमीटर हुई और भारत का कुल भूतल क्षेत्र कितना है। योजना आयोग ने इन दोनों तथ्यों की गणना के आधार पर अपनी एक रिपोर्ट (2007) में माना था कि भारत में वर्षा को जब आंकड़ों में बदलेंगे तो इसका मतलब होगा 4000 क्यूबिक किलोमीटर। इसमें से 1869 क्यूबिक किलोमीटर देश की नदियों के कुल वार्षिक प्रवाह के रूप में और 432 क्यूबिक किलोमीटर फिर से ग्राउंड वॉटर के रूप में धरती में जमा हो जाता है। कुल वर्षा का करीब 40 प्रतिशत वाष्प आदि के रूप में उड़ जाता है। इसका मतलब है कि कुल 60 प्रतिशत पानी ही हमारे लिए उपलब्ध होता है। लेकिन विडंबना यह है कि इस अधिकार को लेकर देश में जो चेतना बननी चाहिए, उसके कहीं दर्शन नहीं होते। हमारे देश में पानी के प्राकृतिक स्त्रोतों की कोई कमी नहीं है। कई सालों से मॉनसून भी अच्छा रहा है। लेकिन पानी की हिफाजत करने और उसे बरतने के मामले में हमारे यहां गहरा आलस्य और अज्ञान है। उद्योगीकरण और शहरीकरण के विस्तार के बावजूद पानी का प्रबंधन आज भी इस तरीके से किया जा सकता है कि वह सबको मिल सके। लेकिन नहीं हो पा रहा है। आप जानते हैं कि इस धरती पर जितना भी पानी जितने रूपों में है - पर्वतों पर, ध्रुवों पर, समुद्रों में, नदियों में, झीलों में, नालों में, पेड़-पौधों में और मनुष्य सहित तमाम जीव प्रजातियों में, वह आज भी उतना ही है जितना कि शुरू-शुरू में था।

पृथ्वी पानी को देशों और राज्यों में नहीं बांटती। इसे मनुष्य ने बांटा है। आज भारत जिस रूप में मौजूद है, उसमें कुल प्रयोग में लाने लायक पानी का हिसाब-किताब लगाने के लिए वॉटर बजट का प्रयोग किया जाता है। वॉटर बजट का मतलब है, औसत वार्षिक वर्षा कितनी मिलीमीटर हुई और भारत का कुल भूतल क्षेत्र कितना है। योजना आयोग ने इन दोनों तथ्यों की गणना के आधार पर अपनी एक रिपोर्ट (2007) में माना था कि भारत में वर्षा को जब आंकड़ों में बदलेंगे तो इसका मतलब होगा 4000 क्यूबिक किलोमीटर। इसमें से 1869 क्यूबिक किलोमीटर देश की नदियों के कुल वार्षिक प्रवाह के रूप में और 432 क्यूबिक किलोमीटर फिर से ग्राउंड वॉटर के रूप में धरती में जमा हो जाता है। कुल वर्षा का करीब 40 प्रतिशत वाष्प आदि के रूप में उड़ जाता है। इसका मतलब है कि कुल 60 प्रतिशत पानी ही हमारे लिए उपलब्ध होता है।

दिक्कत यह है कि कितना पानी उड़ जाता है या रूप बदल लेता है, इसका ठीक-ठीक अनुमान शायद नहीं लग पाता। इसलिए कई विशेषज्ञ मानते हैं कि 40 प्रतिशत का आंकड़ा असल में कहीं ज्यादा होना चाहिए। कुछ ने तो इसे 69.5 प्रतिशत तक माना है। इसका मतलब क्या हुआ? यह कि पानी जितना बताया जा रहा है, उससे भी कम है। आप कहेंगे कि जब पृथ्वी के दो-तिहाई से भी ज्यादा हिस्से पर समुद्रों के रूप में पानी है, तो क्या डर। समस्या यह है कि समुद्री पानी को पीने लायक पानी में बदलना फिलहाल बेहद महंगा काम है। यह विराट काम प्रकृति ही वर्षा के रूप में संपन्न करती है। आप वर्षा की एक-एक बूंद के लिए समुद का अभिवादन कीजिए, क्योंकि प्रयोगशाला में यह पानी बनाया नहीं जा सकता। जानते हैं, पृथ्वी पर मौजूद सारे पानी में से कुल ढाई प्रतिशत ही मनुष्य के इस्तेमाल के लायक है। इसीलिए सिर्फ इसके विवेकपूर्ण इस्तेमाल से ही मनुष्यता बच सकती है। और कोई उपाय नहीं।

मुझे नहीं मालूम कि भारत में कैसे नदियों, बावड़ियों, जोहड़ों और तालाबों को फिर से पुनर्जीवित किया जाए और कौन इस भगीरथ-कार्य को करेगा। हमारी सरकारें पानी के बारे में उतनी भी सचेत नहीं हैं, जितनी देश की रक्षा के बारे में। पानी को लेकर देश में कोई अखिल राष्ट्रीय चेतना तक नहीं है। क्या आपको नहीं लगता कि आज सबसे पहली और जरूरी चीज पानी है, जिस पर गौर करने की, जिसे बचाने की जरूरत है। जब भी आप नल खोलें, कृपया पानी के बारे में सोचें और ईश्वर या प्रकृति को धन्यवाद दें कि पानी आपको मिल रहा है।

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