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“पानी पंचायत” ने बदल दी तस्वीर और तकदीर…

पानी पंचायत का प्रतीकपानी पंचायत का प्रतीकमहाराष्ट्र के पुणे जिले की पुरन्दर तहसील का एक गाँव है -माहुर। झुलसा देने वाले सूखे से त्रस्त इस जिले में चारों तरफ़ हरियाली की चादर वाला माहुर नामक यह गाँव एक प्रकार से रेगिस्तान में नखलिस्तान जैसा ही लगता है। पास की छोटी सी पहाड़ी पर खड़े होकर देखें तो पूरा का पूरा क्षेत्र मानो हरा-भरा मैदान ही लगता है। इसी पहाड़ी के सबसे शुरुआती पायदान पर स्थित है एक छोटा सा तालाब, इसी तालाब में वर्षा का अमूल्य जल संग्रहीत किया जाता है, या कहें कि एक तरह से “पानी की खेती” करता है यह अनूठा गाँव। इस तालाब का जल माहुर गाँव की जीवनरेखा के समान है, इस बात की पुष्टि करता है सभी गाँववासियों को इस जल के एक समान वितरण का सिद्धांत।

यह एक “खामोश क्रांति” के समान ही है। जो किसान मुश्किल से 50 किलो बाजरा और ज्वार की वार्षिक फ़सल ले पाते थे और जिनकी कमाई 2500 से 4000 रुपये तक ही थी, अब वही किसान उतनी ही जमीन की जोत से 10,000 रुपये से लेकर 1 लाख रुपये तक कमा रहे हैं, क्या यह कमाल नहीं है? अपनी परम्परागत खेती फ़सल के अलावा यहाँ के किसान अब गेहूँ, प्याज़, सब्जियाँ, मौसमी फ़ूल और फ़लों की भी फ़सलें ले रहे हैं। अब गाँव वाले जैविक खेती के भी नये-नये प्रयोग कर रहे हैं। अब यहाँ के किसान इतने सक्षम हो रहे हैं कि वे मजदूरों और अन्य कर्मियों को नौकरियाँ भी देने लगे हैं, इससे उत्साहित होकर पुणे और आसपास के शहरों में गये गाँव के नौजवान उधर की नौकरियाँ छोड़कर वापस इस गाँव में आने लगे हैं। आखिर यह चमत्कार हुआ कैसे? आइये देखते हैं……

विलासराव सालुंखे - पानी पंचायत के प्रणेताविलासराव सालुंखे - पानी पंचायत के प्रणेता

इंजीनियरी छोड़ी, बने किसान –


इस चमत्कार के पीछे जिस व्यक्ति का सबसे बड़ा हाथ है, उनका नाम है विलासराव सालुंखे। अपने तकनीकी कौशल, इंजीनियरी दिमाग और गाँववासियों की भलाई के जज़्बे ने उन्हें इस “जल योजना” का अगुआ बनने की प्रेरणा दी। सन् 1972 में जब इस इलाके में भीषण सूखा पड़ा और महाराष्ट्र के लगभग चार लाख लोग भुखमरी के कगार पर पहुँच गये थे, तब सालुंखे जो कि एक फ़ैक्ट्री के मालिक थे और इंजीनियर भी, अपना सब कुछ झोंकने के इरादे से इलाके में उतर गये। उन्होंने देखा कि खेती करना तो दूर, पीने का पानी भी आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाता था। मूलभूत जरूरतों के लिये भी पूरे क्षेत्र में टैंकरों से जलप्रदाय किया जाता था।

सालुंखे ने गाँवों का सघन दौरा करके देखा कि गाँव वाले सड़क किनारे पत्थर तोड़कर सरकारी योजनाओं के भरोसे चन्द रुपये कमाने के लिये हाड़तोड़ मेहनत करते थे। उनके “इंजीनियर दिमाग” ने तत्काल भाँप लिया कि जब तक समाज के सहयोग से और सहकारिता के आदर्शों के अनुसार समूचे क्षेत्र में जल संरचनायें, तालाब का जाल नहीं बिछाया जायेगा इस सूखे का कोई स्थायी इलाज मिलने वाला नहीं है। इस क्षेत्र का वर्षाजल का आँकड़ा सामान्य तौर पर 250मिमी से लेकर 500मिमी वार्षिक रहता है। सबसे पहले उन्होंने अपना प्रयोग पहाड़ी के एक तरफ़ पुरन्दर तहसील में नायगाँव नामक गाँव से 16 हैक्टेयर की भूमि पर शुरु किया। यह ज़मीन उस समय एक मन्दिर की सम्पत्ति थी, लेकिन पूरी तरह से बंजर और अनुपजाऊ थी। सालुंखे ने वह जमीन मन्दिर ट्रस्ट से पचास साल के लीज़ पर ले ली और वहाँ अपनी झोंपड़ी बनाकर रहने लगे तथा गाँव वालों को अपनी योजना समझाकर साथ लेने लगे।

दो क्विंटल से सौ क्विंटल –


मिट्टी का वैज्ञानिक उपचार और वर्षाजल का संरक्षण करके भू-जल का स्तर बढ़ाना उनका सबसे पहला लक्ष्य था। गाँववालों के साथ मिलकर उन्होंने छोटे-छोटे बाँधों की संरचना तैयार करना शुरु कर दिया, ताकि मिट्टी का क्षरण और कटाव रोका जा सके और मिट्टी उपजाऊ बने। पहाड़ी के निचले सिरे पर लगभग 10 लाख क्यूबिक फ़ुट का एक तालाब निर्माण किया। चट्टानी इलाकों में फ़लदार पेड़ लगाने की शुरुआत की गई, जिस भूमि पर खेती नहीं होना थी वहाँ घास और छोटे पौधे लगाये गये। धीरे-धीरे मिट्टी उपजाऊ होने लगी और फ़लदार वृक्ष आकार लेने लगे। जिस ज़मीन से मुश्किल से दो से चार बोरी वार्षिक अनाज निकलता था, वे उतनी ही जमीन से सौ बोरी अनाज लेने लगे। यह सौ बोरी अनाज सिर्फ़ “अनाज” नहीं था, बल्कि यह पाँच परिवारों और उनके पालतू जानवरों का पूरे साल का दाना-पानी था, साथ ही साथ पाँच परिवारों का रोजगार भी, यानी एक पंथ दो काज…

नयागाँव के सफ़ल प्रयोग के बाद तो उनका उत्साह चार गुना बढ़ गया, और इसी प्रकार की जल-संरचनायें राज्य के अन्य गाँवों में भी उन्होंने शुरु कर दीं। एक “सहकारिता का मॉडल” तैयार किया गया। गाँव में एकत्रित पानी पर समूचे गाँव वालों का अधिकार है और “पानी” एक सामूहिक सम्पत्ति है जिसका उपभोग सभी मिल-बाँटकर करेंगे, यह तय किया गया। पानी के बँटवारे और सार्थक उपयोग हेतु पाँच सामान्य नियम बनाये गये जिसे नाम दिया गया “पानी पंचायत”, जिसमें “ग्राम गौरव प्रतिष्ठान” नामक संस्था एक प्रमुख अधिकार संस्था के रूप में अस्तित्व में आई। आईये देखें कि यह “पानी पंचायत” कैसे काम करती है और इनके “नियम-कानून” क्या हैं…

- सिंचाई की योजना को प्रति किसान को व्यक्तिगत रूप से बाँटने की बजाय किसानों का एक समूह बनाकर इसे अमल में लाया गया। पानी का वितरण परिवार में उपस्थित सदस्यों के आधार पर किया गया, ना कि ज़मीन के आकार के आधार पर…। पाँच व्यक्तियों के एक परिवार को एक हैक्टेयर की ज़मीन पर सिंचाई के अधिकार दिये गये। - खेती के प्रकार को सिर्फ़ कम पानी वाली “मौसमी खेती” के लिये ही बन्धनकारी बना दिया गया, जिन उपजों में पानी की खपत अधिक होती है जैसे गन्ना, केला और हल्दी, उसे प्रतिबन्धित कर दिया गया और “पानी पंचायत” के इलाके में किसी किसान को इस प्रकार की फ़सल लेने का अधिकार नहीं है।

- “पानी का अधिकार” ज़मीन के अधिकार से जोड़कर नहीं रखा गया है, अर्थात यदि कोई अपनी ज़मीन बेच देता है तो उसके सिंचाई अधिकार भी स्वतः खत्म हो जायेंगे, और उतना पानी पुनः सहकारी समिति के पास माना जायेगा।

- पूरे समुदाय या कहें कि पानी पंचायत के सभी सदस्यों, चाहे वह भूमिहीन किसान हो, को पानी के अधिकार दिये गये हैं।

- जिन्हें इस योजना का लाभ मिलता है वे अपने लाभ में से 20 प्रतिशत का हिस्सा पंचायत को देते हैं, ताकि योजना का खर्च आदि निकाला जा सके। पंचायत यह पैसा विभिन्न योजनायें बनाने, उन्हें ठीक से चलाने और पानी के समान वितरण की व्यवस्था में खर्च करती है।

किसानों की इस अनूठी पहल को देखते हुए सरकार भी आगे आई है, और किसान जो सिंचाई और रखरखाव पर अपना 20 प्रतिशत खर्च करते हैं, सरकार ने भी 50 प्रतिशत अनुदान देना शुरु कर दिया है, बाकी का 30 प्रतिशत खर्च पानी पंचायत “ब्याजमुक्त ॠण” के रुप में देती है। माहुर गाँव के लगभग आधा दर्जन भूमिहीन किसान इस पानी पंचायत योजना से जुड़े, उन्होंने बड़े भूमि मालिकों से कुछ भूमि लीज़ पर ली और पानी के भरपूर “सदुपयोग” से जमकर खेती की। आज की तारीख में वे भूमिहीन किसान अच्छा-खासा कमा रहे हैं और कुछ ने तो वही लीज़ की जमीन स्वतः के पैसों से खरीद ही ली।

सफ़लता की सुगन्ध चारों ओर फ़ैलने लगी –

अस्सी के दशक की शुरु में माहुर में स्थित एकमात्र कपड़े की फ़ैक्ट्री, जिसमें अधिकतर गाँववासी काम करते थे, बन्द हो गई, तभी वे सभी एकत्रित हुए और अपनी खुद की “पानी पंचायत” स्थापित की। शुरु में अधिकतर ग्रामीणों का सोचना था कि इस प्रकार की योजनाएं, निर्माण कार्य और उसमें लगने वाली लागत के मुकाबले शायद फ़ायदा ज्यादा नहीं दे पाएंगी, लेकिन वे कितने गलत थे, यह इस योजना की सफ़लता ने साबित कर दिया।

सालुंखे के साथ सतत काम करने वाले लक्ष्मण खेडार कहते हैं कि फ़िर भी हमने हिम्मत नहीं हारी और योजना को पूरा करके ही दम लिया। एक समय इस इलाके में 1100मिमी तक की वर्षा भी होती थी, लेकिन उसे एकत्रित करने का कोई जरिया नहीं था, और सारा पानी ऐसे ही व्यर्थ बह जाता था। माहुर की इस पानी पंचायत योजना के एक और लाभार्थी किसान रामचन्द्र श्रीपति चव्हाण पुराने दिनों को याद करते हुए गर्व से बताते हैं कि “उन दिनों मैं एक कच्ची झोंपड़ी में रहता था, लेकिन इस योजना का सदस्य बनने के कुछ ही वर्षों में अब मेरा दो कमरे का पक्का मकान हो गया है और मेरा वह पुराना झोंपड़ा अब मेरा प्याज का गोदाम है, और मेरे पास अब एक टीवी भी है…”।

सिर्फ़ चार एकड़ की उनकी जमीन पर वे अपने भाईयों के साथ खेती करते थे, लेकिन अब इसमें से दो एकड़ की जमीन को भरपूर पानी मिल जाता है, पहले वे साल भर में 5-6 क्विंटल बाजरा और ज्वार ही उगा पाते थे, जबकि आज वे कई प्रकार की फ़सलें लेते हैं और उनकी कमाई कई गुना बढ़ गई है।

इस प्रकार की उत्साहवर्धक कहानियाँ अकेले रामचन्द्र चव्हाण की नहीं हैं, एक और किसान हैं निरंजन गणपतराव चव्हाण। उनके पास 12 एकड़ जमीन है उसमें से साढ़े चार एकड़ जमीन उन्होंने पानी पंचायत योजना में सिंचाई हेतु रखी है। पूर्व में वे इस जमीन पर मूंगफ़ली, बाजरा और ज्वार उगाकर लगभग 6000 रुपये सालाना की बचत कर पाते थे, अब वे इस जमीन पर मोगरा और लिली जैसे फ़ूलों का उत्पादन करते हैं तथा प्रति एकड़ सिंचित खेती से उनकी कमाई लगभग 70,000 रुपये हो गई है।

निरंजन नामक एक युवक जो कि एमए एलएलबी तक शिक्षित है, ने 1984 में गाँव छोड़ दिया था और रत्नागिरी और पुणे में विभिन्न दफ़्तरों में काम करके घर पैसे भेजा करता था। 1987 में अपनी सिंचित जमीन की देखभाल हेतु वह माहुर लौटा और यहीं का होकर रह गया, लगभग यही स्थिति सत्यवान गोले की है जो मुम्बई से लौटकर खेती करने लगे हैं, और अब वे अपने बेटे को इंजीनियरिंग की शिक्षा दिलवाने में सक्षम हो गये हैं।

बालासाहब चव्हाण और उनके भाई की 11 एकड़ जमीन है जिसमें से तीन एकड़ की जमीन “पानी पंचायत” योजना में है। बालासाहब की पढ़ाई 12वीं तक ही हुई है, लेकिन पानी पंचायत में “लिफ़्ट इरिगेशन” से सम्बन्धित सभी काम वे बखूबी सम्भाल लेते हैं, गाँव वालों को बिल बाँटते हैं, पैसा एकत्रित करते हैं, हिसाब-किताब रखते हैं और यह सुनिश्चित भी करते हैं कि प्रत्येक सदस्य को उसके हिस्से का पानी बराबर मिलता रहे। समिति का मोटर पम्प लगभग पूरे दिन चलता रहता है और बालासाहेब की यह ड्यूटी है कि वे देखते हैं कि कम से कम तीन घण्टे तक पानी प्रत्येक खेत को मिले। बालासाहेब ने मोटर-पंप सुधारने तथा इलेक्ट्रिसिटी के कामों की ट्रेनिंग भी ले रखी है, समिति की तरफ़ से उन्हें 1500 रुपये की तनख्वाह दी जाती है। समिति का प्रत्येक सदस्य पंचायत को 1000 रुपये वार्षिक का चन्दा देता है, जिससे तमाम रखरखाव के काम सुचारु रूप से चलते रहते हैं। बालासाहेब जो पहले 9000 रुपये वार्षिक ही कमा पाते थे आज 2 लाख रुपये से अधिक कमा लेते हैं, साथ ही बालासाहब का गाँव और इलाके में एक अलग ही “रुतबा” भी है… इससे अधिक और क्या चाहिये?

शहरी लोग अभी भी पानी का मोल नहीं पहचान रहे हैं, न तो वे भूजल के गिरते स्तर को लेकर चिंतित हैं न ही घर में होने वाले पानी के अपव्यय को रोकने में गंभीर हैं, लेकिन शायद उन्हें भारत की ग्रामीण जनता से पानी की बचत, पानी की “खेती”, पानी की सहकारिता आदि बातों की सीख लेने की सख्त जरूरत है, सिर्फ़ यह कहने भर से काम नहीं चलेगा कि “अगला विश्व युद्ध पानी के मुद्दे पर लड़ा जायेगा…” अब तो कुछ करने का वक्त आ चुका है…

- मूल रिपोर्ट : उषा राय (पत्रिका “ग्रासरूट”)

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Ph. No. : +91 20 66039245
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Sustainable water management and support to reduce the vulnerabi

hamare work area me pani panchayat banai hai to ise adhik majbut karane ke liye hme aapke disha nirdesh ki jarurat hai please 

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