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दिमागी बुखार यानी इंसेफेलाइटिस - हर-साल की तबाही (Dimagi Bukhar Or Encephalitis - Every year's catastrophe)

Author: 
प्रो. हर्ष सिन्हा
Source: 
हस्तक्षेप, राष्ट्रीय सहारा, 19 अगस्त 2017

गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में मस्तिष्क ज्वर पीड़ित मासूमों की अकाल मौतों ने देश को हिला कर रख दिया है। इसलिये बीमारी भले उनकी सांसें टूटने की पहली वजह बताई जाती रही हो, लेकिन ऑक्सीजन गैस सिलिंडर की जानबूझकर बनाई कमी ने उनको समय से पहले ही मार दिया। अब यह बचाव के लिये व्यर्थ की लीपापोती है कि बच्चे बीमारी से ही मरे। इसलिये अगर कोई कार्रवाई होती है तो उसके दो ही प्रस्थान-बिंदु हो सकते हैं। पहला, कमीशनखोरी पर निर्णायक प्रहार और दूसरा एन्सेफलाइटिस की जड़ खोद देने का अभियान। ये दोनों काम सरकार की पहुँच में हैं। इसी क्रम में प्रदेश के चिकित्सा संस्थानों में संसाधनों की कमी-बेशी के मूल्यांकन के साथ यथायोग्य उनकी आपूर्ति भी तय हो जाएगी। और अगर मस्तिष्क ज्वर उन्मूलन को पोलियो-चेचक जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रम का रूप दिया गया तो सबसे पहले प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को चाक-चौबंद करने का कर्त्तव्य पूरा करना होगा, जो कि इस मामले में उ.प्र. की लचर स्थिति को देखते हुए एकदम अपरिहार्य है। सरकार के लिये गोरखपुर की हृदयविदारक घटना को मथनी मान कर मंथन का सही वक्त है। इसी पर हस्तक्षेप

अक्सर ये सवाल भी जेरे-बहस रहता है कि अगर जापान, ऑस्ट्रेलिया या भारत में भी आंध्र प्रदेश सहित अनेक जगहों पर इस महामारी को नियंत्रित करने में कामयाबी हासिल कर ली गई तो क्या वजह है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में ऐसा नहीं हो सका? इसका जवाब खोजना कठिन नहीं है। इस इलाके में प्राथमिक स्वास्थ्य ढाँचा भ्रष्टाचार और निष्क्रियता के चलते पस्तहाल है। इस मर्ज के शिकार बच्चों को परेशानी शुरू होने के शुरुआती घंटों में कोई चिकित्सकीय मदद नहीं मिल पाती है। लिहाजा जब वे पहले से भीड़ भरे मेडिकल कॉलेज पहुँचते हैं, काल अपने क्रूर पंजे उन पर गड़ा चुका होता है

गोरखपुर के बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज में इस साल कुछ ज्यादा ही अफरा-तफरी है। गोद में बच्चों को लेकर वार्ड की सीढ़ियों पर लपकते या फिर उन्हीं मासूमों को लाश की शक्ल में गोद में उठाए टूटते कदमों से सीढ़ियाँ उतरते लोग हैं। बीच-बीच में हर साल की तरह दैनिक आधार पर लाशों की गिनती करने आया मीडिया है, और कभी-कभी दिल्ली या दूर-दराज से आया विशेषज्ञों का दल भी दिखता है, जो माथे पर हैरत की शिकन चढ़ाए यहाँ से जाता तो है, पर अपने गंतव्य तक शायद इन्हें ढो नहीं पाता और चालीस साल से सालाना मौतों की क्रूर कहानी में एक और अध्याय जुड़ जाता है। मगर इस साल इस कहानी में दर्द और अफसोस के कई ऐसे पन्ने भी जुड़ गए हैं, जो पहले नहीं दिखे थे। हर साल मौतों को ‘नियति’ मानकर अपने बच्चों की बेजान झूलती देह को हाथों में उठाए चुपचाप घर चले जाने वाले कदम इस बार हिल नहीं रहे। सिसकियों में विद्रोह है, और आँखों में इंतजामिया के प्रति नफरत। इसलिये क्योंकि इस बार बहुत सारी मौतों की जिम्मेदार यह मरदूद बीमारी नहीं बल्कि इंसानी लापरवाहियाँ हैं।

गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में बीते 10 अगस्त को 24 घंटे में 23 मौतों ने लोगों को ही नहीं सरकार तक को हिला दिया। इन मौतों में से ज्यादातर के लिये ऑक्सीजन की कमी को जिम्मेदार माना गया। ऐसी नौबत इसलिये आई क्योंकि ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी अपने लाखों के बकाया भुगतान को लेकर लगातार लिखा-पढ़ी कर रही थी और इस पर किसी स्तर से कुछ भी कार्रवाई न होता देख उसने सप्लाई रोक दी थी। ताबड़तोड़ मौतों ने मेडिकल कॉलेज प्रशासन से लेकर प्रदेश शासन तक की नींदें उड़ा दीं। हालिया वक्त में चिकित्सकीय लापरवाही से हुआ ये सबसे बड़ा हादसा था। अब एक से ज्यादा जाँच समितियाँ इस हादसे की पड़ताल में लगा दी गई है। हो सकता है उनकी रिपोर्ट पर कुछ जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई भी हो मगर लाख टके का सवाल फिर भी अपनी जगह कायम रहेगा कि आखिरकार यह नौबत क्यों आई? मासूम बच्चों के साथ आपराधिक किस्म का उपेक्षा भाव आखिर कब तक रहेगा और क्यों रहेगा?

ये सवाल इसलिये क्योंकि ज्यादातर मौतें अस्पताल के 100 नंबर वार्ड के इंटेसिव केयर यूनिट में हुई जहाँ इंसेफ्लाइटिस का इलाज करा रहे बच्चे भर्ती थे। ये वही जगह है, जो पिछले 40 साल से मौत के सालाना तांडव की मूक साक्षी है। इस अवधि में मौतों की संख्या का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले केवल एक दशक में-जब जागरूकता, बचाव और इलाज की अपेक्षाकृत बेहतर स्थितियाँ हैं; इस बीमारी से 5,954 मौतें हो चुकी हैं। यानी औसतन छह सौ प्रति वर्ष। 1978 से हर साल जुलाई से लेकर नवम्बर तक मौत का तांडव रचने वाली जापानी एन्सेफलाइटिस (जेई) नामक ये बीमारी एक मादा मच्छर ‘‘क्यूलेक्स ट्राइटिनीओरिंकस’ के काटने से होती है, जिसमें दिमाग के बाहरी आवरण यानी एन्सेफलान में सूजन हो जाती है। रोगी को तेज बुखार, झटके, कुछ भी निगलने में कठिनाई जैसे लक्षण आने लगते हैं और यदि समुचित इलाज न हो सके तो तीन से सात दिन में उसकी मौत हो जाती है।

जापानी एन्सेफलाइटिस रोग का हमला सबसे पहले जापान में सन 1871 में हुआ पर इसके विषाणुओं की पहचान 1925 में ही हो पाई और 1935 में इस विषाणु का नाम ‘‘जापानी एन्सेफलाइटिस वायरस’ पड़ा। बाद के वर्षों में समय-समय पर इस वायरस ने जापान, कोरिया, चीन, फिलीपींस, जावा, सुमात्रा, मलाया, म्यांमार, श्रीलंका, थाईलैंड और रूस के पूर्वी हिस्सों में समय-समय पर कहर ढाया है।

भारत में 1952 में नागपुर और चिंगिलपुर में कुछ रोगियों के रक्त परीक्षण में इस वायरस की मौजूदगी का पता चला। तमिलनाडु में 1955 में इसके हमले का पता चला। 1973, 1995 और 1976 में पश्चिम बंगाल के बांकुरा और वर्धमान इलाकों में इस विषाणु के तीन भयंकर प्रकोप हुए थे और 1978 में भारत के डिब्रूगढ़, आसनसोल, पूना, तिरुनेलवेली, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश में इसने जमकर कहर मचाया। 1983 और 1990 में गोवा और हरियाणा भी इसकी चपेट में आ गए। पर जहाँ दुनिया और देश के बाकी हिस्सों में इस घातक विषाणु के फैलाव पर काबू पा लिया, वहीं गोरखपुर में इसने स्थायी रूप से अपने पाँव जमा लिये। इस रोग पर सबसे ज्यादा काम करने वालों में से एक बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्राचार्य प्रो. के.पी. कुशवाहा कहते हैं- ‘‘सामाजिक-आर्थिक रूप से अत्यन्त पिछड़े इस क्षेत्र में इस रोग को माकूल माहौल मिला। जहाँ खाने के लाले हों, गंदगी जीवन का हिस्सा हो और पौष्टिक आहार एक सपना हो, जहाँ ऐसे रोग बिन बुलाए मेहमान की तरह जब तक चाहते हैं, बने रहते हैं।”

पर इस बड़ी वजह के अलावा इस रोग के यहाँ डेरा जमा लेने की और भी कई वजहें हैं। इनमें सबसे बड़ी वजह इस समस्या के प्रति राजनीतिक संवेदनहीनता है। पिछले 40 वर्षों में हर साल बरसात से लेकर सर्दियाँ शुरू होने के बीच होने वाली सैकड़ों मौतों के बावजूद आज भी इस रोग पर नियंत्रण सरकारों की कार्य सूची में कभी शामिल नहीं हो सका। शायद इसकी वजह यह रही हो कि मरने वालों की इतनी बड़ी संख्या अभी वोटर लिस्ट में अपना नाम नहीं दर्ज करा पाई थी।

जाँच की प्रक्रिया और परिस्थितियाँ खुद भी इस संवेदनहीनता की ही पुष्टि करती हैं। 1978 से 1993 तक गोरखपुर में संभावित मरीजों की रक्त और सीरम की जाँच के लिये नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (पुणे) की एक प्रयोगशाला काम कर रही थी पर बाद में प्रशासनिक असहयोग के चलते यह बंद हो गई। इस बीमारी के बारे में सबसे बुरी बात ये है कि इसमें मरने वालों से ज्यादा बदकिस्मत वे होते हैं, जिनकी जान बच जाती हैं। गोरखपुर में बच्चों के एक डॉक्टर बी.बी गुप्ता बताते हैं कि एन्सेफलाइटिस के चलते बच्चों में ग्यारह प्रकार की विकलांगता देखी गई हैं। इसमें सबसे ज्यादा तांत्रिक विकार यानी लकवा और बुद्धिमंदता के शिकार होते हैं। इसके अलावा गूंगापन, अकड़पन, शरीर में झटके, मल-मूत्र विसर्जन पर नियंत्रन होने, नींद न आने, बार-बार जीभ निकालने जैसी विकृतियाँ भी देखी जाती हैं। डॉ. गुप्ता के मुताबिक ‘‘रोग के विकार बच्चों में इनमें से एक या एक साथ कई विकृतियाँ आ सकती हैं।” 2005 तक इस बारे में सरकार या स्वास्थ्य संगठनों का रवैया खासी लापरवाही भरा था, लेकिन उस साल मौतों का आंकड़ा एक हजार से भी ज्यादा हो जाने और राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय मीडिया में आई खबरों के चलते सरकार को सक्रियता प्रदर्शित करनी पड़ी थी।

2006 में पहली बार टीकाकरण कार्यक्रम शुरू हुआ और 2009 में पुणे स्थित नेशनल वायरोलॉजी लैब की एक इकाई गोरखपुर में स्थापित हुई ताकि रोग के जिम्मेदार कारणों की सही पहचान की जा सके। 2006 तक तो इस रोग से हुई मौतों का जिम्मेदार अकेले मच्छरों को ही माना जाता था, लेकिन बाद में हुए परीक्षणों से पता चला की सभी मामले जेई के ही नहीं थे। कई मामलों मे वहाँ जल जनित एंटेरो वाइरस की मौजूदगी पाई गई थी। वैज्ञानिकों ने इसे एईएस यानी एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम का नाम दिया। बीते कुछ सालों मे जहाँ जेई के मामलों में कमी आई है, वहीं एईएस के मामले तेजी से बढ़े हैं। टेस्ट किट उपलब्ध होने के चलते जेई की पहचान अब मुश्किल नहीं रही, लेकिन इन एंटेरो विषाणुओं की प्रकृति और प्रभाव की पहचान करने की टेस्ट किट अभी विकसित नहीं हो सकी है।

अमेरिका में अटलांटा स्थित नये जीवाणुओं और विषाणुओं की खोज करने वाले विश्व प्रसिद्ध संगठन सीडीसी (सेंट्रल डिजीज कंट्रोल) के वैज्ञानिक भी इन विषाणुओं का पता लगाने के लिये 2007, 2009 और 2012 में मेडिकल कॉलेज का दौरा कर चुके हैं। अरसे से विशेषज्ञ इस बीमारी के प्रभाव वाले इलाकों में व्यापक टीकाकरण, हवाई फागिंग, सूअर बाड़ों को आबादी से दूर करने और स्वच्छ पेय जलापूर्ति जैसे उपायों की जरूरत बताते रहे हैं।

एन्सेफलाइटिस पर अनेक शोध कर चुके गैर-सरकारी संगठन एपीपीएल के डॉ. संजय श्रीवास्तव और नरेन्द्र मिश्र की मानें तो असली समस्या ‘समन्वय न होने’ से है। वे कहते हैं, ‘‘जरूरत इस बात की है कि इस बीमारी के समूचे चक्र को ध्यान में रखते हुए चिकित्सक, पशु वैज्ञानिकों, पेय जलापूर्ति तंत्र से जुड़े अफसरों और बीमारी के ज्यादा तीव्रता वाले गाँवों में ग्राम प्रधान से लेकर वहाँ के स्वास्थ्य केंद्रों तक को उनकी भूमिकाएँ समझनी होंगी। अगर ऐसा हो सका तो नतीजे बेहतर होंगें।” मगर इन सारी बातों और उपायों से अलग असली मसला संवेदनशीलता का है। राजनीतिक दलों के आरोपों-प्रत्यारोपों को छोड़ भी दें तो कम-से-कम बेहतर अस्पताल प्रबंधन और शासन-प्रशासन के स्तर पर प्रभावी निगरानी बहुत जरूरी है। गोरखपुर का बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज हर साल इन दिनों आस-पास ही नहीं बल्कि बिहार और नेपाल से आने वाले मरीजों की भीड़ से बुरी तरह भर जाता है और अक्सर एन्सेफलाइटिस वार्ड में एक बेड पर 3 से 4 बच्चों को लिटाना पड़ता है। जाहिर है इससे संक्रमण के खतरे बहुत बढ़ जाते हैं।

अक्सर ये सवाल भी जेरे-बहस रहता है कि अगर जापान, ऑस्ट्रेलिया या भारत में भी आंध्र प्रदेश सहित अनेक जगहों पर इस महामारी को नियंत्रित करने में कामयाबी हासिल कर ली गई तो क्या वजह है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में ऐसा नहीं हो सका? इसका जवाब खोजना कठिन नहीं है। इस इलाके में प्राथमिक स्वास्थ्य ढाँचा भ्रष्टाचार और निष्क्रियता के चलते पस्तहाल है। इस मर्ज के शिकार बच्चों को परेशानी शुरू होने के शुरुआती घंटों में कोई चिकित्सकीय मदद नहीं मिल पाती। लिहाजा जब वे पहले से भीड़ भरे मेडिकल कॉलेज पहुँचते हैं, तब तक काल अपने क्रूर पंजे उन पर गड़ा चुका होता है।

गोरखपुर की हालिया अगस्त त्रासदी इस स्थायी बन चुकी समस्या के स्थायी हल निकालने का प्रस्थान बिंदु हो सकती है, बशर्ते इससे जुड़े नीति नियंताओं से लेकर उन नीतियों को क्रियान्वित करने वाले लोग प्रतिबद्धता दिखाएँ। अन्यथा अगले साल इन्हीं दिनों में हम फिर बेशुमार मौतों पर स्यापा कर रहे होंगे।

प्रो. हर्ष सिन्हा स्वास्थ्य मामलों के जानकार, (लेखक दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विवि के रक्षा अध्ययन विभाग में प्रोफेसर हैं और स्वास्थ्य मामलों पर नियमित लिखते हैं)


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