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दिमागी बुखार पर सीएजी की रिपोर्ट (CAG report on Encephalitis)

Author: 
नयनतारा नारायणन
Source: 
राष्ट्रीय सहारा, हस्तक्षेप, 19 अगस्त 2017

एक साल पहले सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि बीआरडी मेडिकल कॉलेज तथा उत्तर प्रदेश के अन्य अस्पतालों में पर्याप्त उपचार और पर्याप्त उपकरणों का अभाव है। कुछविशेषज्ञों का मत है कि बीआरडी में इस महामारी के शुरू होने के बाद से प्रति बिस्तर औसतन 200 मौतें हो चुकी हैं। सरकार इस व्याधि को काबू कर पाने में विफल है।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ घोषणा कर चुके हैं कि बीते दिनों गोरखपुर स्थित बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में सत्तर से ज्यादा बच्चों की मौत की जाँच विशेषज्ञ डॉक्टरों की एक टीम करेगी। राज्य सरकार इस आरोप से इनकार कर चुकी है कि बच्चों की मौत आपूर्तिकर्ता द्वारा भुगतान में विलंब के चलते सिलेंडरों की आपूर्ति रोक दिए जाने से पैदा हुई ऑक्सीजन की कमी से हुई। लेकिन कंट्रोलर ऑडिटर जनरल ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट से पता चलता है कि ऑक्सीजन की आपूर्ति सुनिश्चित किया जाना ही एकमात्र चुनौती नहीं है, जिसका इस अस्पताल को सामना कर पड़ा। यह रिपोर्ट 2016 में तैयार की गई थी, जिसमें राज्य में सामान्य तथा सामाजिक क्षेत्र में कार्यरत संस्थानों के प्रदर्शन का विश्लेषण किया गया था। कहा गया था कि राज्य के चार सरकारी मेडिकल कॉलेजों, जिनमें बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज भी शामिल था, ने क्लिीनिकल और शिक्षण उपकरण खरीदने के लिये मुहैया कराए धन का यूज नहीं किया था।

रिपोर्ट के मुताबिक, बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज को 2011 और 2016 के बीच 452.35 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया था। इसमें से उसने 426.13 करोड़ रुपये का इस्तेमाल किया। आवंटित धन का करीब 95% व्यय किए जाने के बावजूद ऑडिट में पाया गया कि कॉलेज में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा निर्धारित मानक के मद्देनजर 29% चिकित्सकीय उपकरण कम थे। अलबत्ता, रिपोर्ट से स्पष्ट नहीं होता कि उपकरणों की कमी क्या धन के कुप्रबंधन का नतीजा थी, या अपर्याप्त आवंटन का। बाल रोग विभाग में यह अभाव सर्वाधिक कम था, जहाँ हाल में 70 बच्चों की मृत्यु हुई। रिपोर्ट से स्पष्ट हुआ कि उपकरणों के वार्षिक रखरखाव संबंधी अनुबंधों के अभाव के चलते गले/गर्भाश्य कैंसर के मामलों का पता लगाने में इस्तेमाल होने वाले कोल्पोस्कोप्स जैसे उपकरण, इंटराएपिथेलियल लेसन के उपचार में इस्तेमाल होने वले एनडी-वाईएजी लेजर, प्रसवावस्था में भ्रूण की निगरानी के लिये इस्तेमाल होने वाली एनएसटी मशीन, जन्म-पूर्व तथा स्त्री रोग संबंधी निदान में इस्तेमाल होने वाली अल्ट्रासाउंड मशीन बीते पाँच साल से उपयोग के लायक नहीं थीं। ग्यारह विभागों में लगाए गए इन उपकरणों में से 200 रखरखाव अनुबंध की जद में नहीं थे। रिपोर्ट से यह भी पता चला कि मैग्नेटिक रिजोनेंस इमेजिंग मशीन और कोबाल्ट-60 यूनिट जैसे उपकरणों की खरीदी में अनुबंध प्रक्रिया में अनियमितताएं बरती गईं।

बीआरडी की हालत है लचर


रिपोर्ट से 950 बिस्तरों के इस अस्पताल, जो गोरखपुर और पूर्वी उत्तर प्रदेश के अन्य हिस्सों, बिहार और नेपाल तक के लोगों के लिये सेवा मुहैया कराने वाला जिले में सबसे बड़ा अस्पताल है, में पसरी खराब स्थिति का पता चलता है। अपर्याप्त उपकरण और अनियमितताएं केवल गोरखपुर मेडिकल कॉलेज तक ही सीमित नहीं हैं। मेरठ, झांसी और लखनऊ के तीन अन्य मेडिकल कॉलेजों में तो स्थिति और भी खराब है। बड़े राज्यों में सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं और ढाँचागत आधार की दृष्टि से उत्तर प्रदेश नीचे के तीन राज्यों में शुमार होता है। यह निष्कर्ष ब्रुकिंग्स इंडिया द्वारा जुटाए गए आंकड़ों से मिलता है। उदाहरण के लिये गोरखपुर के 3,319 गाँवों में से मात्र 1,114 गाँवों में पाँच किमी. के दायरे में स्वास्य उपकेंद्र की सुविधा उपलब्ध है। जिले में कम से कम 120 प्राथमिक स्वास्य केंद्रों की जरूरत है, लेकिन अभी तक मात्र 90 केंद्र ही कार्यरत हैं यानी 26% की कमी है। ब्रुकिंग्स के विश्लेषकों ने सुविधाओं की कमी के लिहाज से इन गाँवों की पहचान सर्वाधिक कमी वाले इलाकों के तौर पर की है।

समूचे उत्तर प्रदेश में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की 54% कमी है, और समूचे प्रदेश में स्वास्थ्य संबंधी ढाँचागत आधार में खासी कमी परिलक्षित होती है। इस परिदृश्य के मद्देनजर हैरत नहीं है कि उत्तर प्रदेश के स्वास्य संकेतक बेहद खराब हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के नवीनतम चक्र से पता चलता है कि राज्य में जीवित जन्मने वाले प्रति एक हजार शिशुओं में मृत्यु दर 64 है, और पाँच साल से कम आयु में काल का ग्रास बनने वाले शिशुओं की दर प्रति हजार 78 है। यह आंकड़ा भारत के सभी राज्यों में सबसे बदतर है। सर्वे से यह भी पता चलता है कि 46 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे ऐसे हैं, जिनका वजन उनकी आयु के मद्देनजर मानक वजन से कम होता है, जबकि 17.9% ऐसे हैं जो अपनी लंबाई के मद्देनजर कम वजनी हैं। 39% से ज्यादा कम वजन वाले हैं। राज्य में मातृ मृत्यु दर भी खासी ज्यादा है। प्रति लाख जीवित जन्म पर यह आंकड़ा 258 मृत्यु होने का है।

उत्तर प्रदेश का गोरखपुर मंडल 1970 के दशक के बाद के वर्षों से इन्सेफलाइटिस से होने वाली मौतों का केंद्र बना हुआ है। कुछ विशेषज्ञों ने आकलन किया है कि बाबा राघव दास अस्पताल में इस महामारी के शुरू होने के बाद से प्रति बिस्तर औसतन 200 मौतें हो चुकी हैं। इस बहुत ज्यादा और बार-बार की मौतों की संख्या के बावजूद केंद्र तथा राज्य सरकार इस व्याधि को नियंत्रित कर पाने में विफल हैं। बाबा राघव दास अस्पताल में हाल में हुई मौतों के कारण चाहे जो भी रहे हों, लेकिन तय यह है कि इस बीमारी, जो हर साल हजारों लोगों को चपेट में लेती है और सैकड़ों को मार डालती है, से निजात पाने में अपनी जिम्मेदारी से राज्य सरकार नहीं बच सकती।

नयनतारा नारायणन, वरिष्ठ पत्रकार

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