पर्यावरण के दोहन की कीमत

Submitted by editorial on Sat, 06/09/2018 - 15:32
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भारत के पास आज आर्थिक विकास और पर्यावरणीय सन्तुलन को जोड़ने वाली नीतियाँ बनाने की क्षमता है। हमारे अनुसन्धान संस्थानों के पास ऐसे शानदार वैज्ञानिक हैं जोकि हमारी सरकारों (केन्द्र और राज्यों की) को औद्योगिक, कृषि, वन, जल, ऊर्जा, आवासीय और परिवहन सम्बन्धी नीतियाँ बनाने में मदद कर सकते हैं, जोकि हमारे दीर्घकालीन भविष्य को नुकसान पहुँचाए बिना हमारी वृद्धि को बढ़ा सकते हैं।

महात्मा गाँधी ने 1928 में ही उत्पादन और खपत के पश्चिमी तरीकों के कारण वैश्विक स्तर पर असन्तुलन की चेतावनी दी थी। उन्होंने टिप्पणी की, “ईश्वर नहीं चाहता कि भारत कभी पश्चिम की तरह औद्योगीकरण को अपनाये” और इसके साथ कहा, “एक छोटे से द्वीप साम्राज्य (इंग्लैंड) के आर्थिक साम्राज्यवाद ने आज दुनिया को जंजीरों से जकड़ रखा है। यदि तीस करोड़ के देश ने ऐसा आर्थिक शोषण किया, तो पूरी दुनिया टिड्डियों की तरह बेकार हो जाएगी।”

इस बयान का अहम हिस्सा है, पश्चिम की तरह। गाँधी जानते थे कि आजाद होने पर भारत को गरीबी को खत्म करने और अपने नागरिकों के सम्मानजनक जीवनयापन के लिये आर्थिक रूप से विकास करना ही होगा। लेकिन चूँकि उसके यहाँ पश्चिम की तुलना में आबादी का घनत्व अधिक है तथा नियंत्रण और शोषण करने के लिये उसके पास उपनिवेश नहीं हैं, भारत को अपने प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग के प्रति कहीं अधिक जिम्मेदारी दिखानी होगी, उसे पर्यावरण को कम-से-कम नुकसान पहुँचाना होगा, जिस पर कि हर तरह का जीवन विशेष रूप से मानव जीवन निर्भर है।

पर्यावरण पर गाँधी के विचारों को उनके अपने समय में समाजशास्त्री राधाकमल मुखर्जी और अर्थशास्त्री जे.सी. कुमारप्पा जैसे दूरदृष्टा विचारकों ने आगे बढ़ाया। हालांकि स्वतंत्र भारत की सरकारों ने उन्हें पूरी तरह से भुला दिया और अहंकार के साथ भारतीय सच्चाइयों से इतर संसाधन और ऊर्जा के सघन दोहन वाली नीतियों को अपनाया। इसने भारी मानव पीड़ा को जन्म दिया, जोकि संसाधनों पर कॉर्पोरेट के कब्जा कर लेने के कारण ग्रामीण और आदिवासी समुदायों की बेदखली या फिर प्रदूषण फैलाने वाली परियोजनाओं से हुए नुकसान के रूप में सामने आईं।

प्रकृति और मानवीय जीवन की इस बर्बादी के विरोध में चिपको और नर्मदा बचाओ जैसे लोकप्रिय आन्दोलन खड़े हुए और मछुआरों का आन्दोलन सामने आया। ‘गरीबों के इस पर्यावरवाद’ के कारण ही देर से ही सही 1980 में पर्यावरण मंत्रालय की स्थापना हुई और पारिस्थितिकी को निहित स्वार्थी तत्वों से हो रहे नुकसान को रोकने के लिये अनेक कानून बनाये गये।

हालांकि 1980 के दशक में पर्यावरण के मामले में जो उपलब्धियाँ हासिल की गई थीं, उन्हें हाल के दशकों में केन्द्र में रही यूपीए और एनडीए, दोनों सरकारों के साथ ही राज्य सरकारों ने गँवा दिया। कुछ इस गलत धारणा के कारण कि भारत जब तक अमीर नहीं हो जाता वह स्वच्छता को वहन नहीं कर सकता और कुछ राजनीतिक दलों के निजी कॉर्पोरेट के शरणागत होने के कारण, जिन्हें समाज के व्यापक हित के बजाय अपने तात्कालिक मुनाफे की फिक्र होती है। पर्यावरण की बर्बादी के इस ताजा युग ने नुकसान को बढ़ाया है, जैसा कि हमारे प्रदूषित शहरों, हमारी मर रही नदियों, हमारे सिकुड़ते जल-स्तर, हमारी प्रदूषित मिट्टी आदि से साफ है।

जॉन मेनार्ड कीन्स की लोकप्रिय टिप्पणी थी, “ऐसे व्यावहारिक व्यक्ति जो खुद को किसी भी बौद्धिक प्रभाव से मुक्त मानते हैं, आमतौर पर किन्हीं मृत या निष्क्रिय अर्थशास्त्री के गुलाम हैं।” यह बात आज भारत के सारे राजनेताओं के बारे में सही है। वे 1950 के दशक के अर्थशास्त्रियों के गुलाम हैं, जोकि यह मानते थे कि गरीब देशों को पर्यावरण के क्षरण को लेकर अमीर देशों की तुलना में कम चिन्तित होना चाहिए।

दूसरी ओर 21वीं सदी के अर्थशास्त्रियों ने निर्णायक रूप से दिखाया कि भारत जैसे देश को अमेरिका की तुलना में पर्यावरण के लिहाज से कहीं अधिक जवाबदेह होना चाहिए। इसके तीन कारण हैं- क्योंकि हमारी आबादी का घनत्व काफी अधिक है, क्योंकि उष्ण कटिबन्धीय पारिस्थितिकी तंत्र समशीतोष्ण की तुलना में कम लचीला है और इसलिये क्योंकि प्रदूषण, जंगलों की कटाई, मिट्टी के क्षरण आदि की अनुपातहीन कीमत गरीबों को चुकानी पड़ती है।

भारत में हमारे शासन नासमझी तो दिखाते ही हैं, वे विद्वेष भी रखते हैं और अपने पसन्दीदा और कॉर्पोरेट मित्रों के लालच के आगे आम आदमी के हितों को त्यागने के लिये तैयार रहते हैं। पुराने पड़ चुके अर्थशास्त्रियों और प्रेस के कॉर्पोरेट समर्थकों से दिगभ्रमित भारतीय मीडिया यह मानने लगा कि पर्यावरण सन्तुलन ऐसी विलासिता है, जिसे हम वहन नहीं कर सकते।

लेकिन हाल के वर्षों में इस पर सवाल उठे हैं, क्योंकि पर्यावरण के दोहन से हो रहा नुकसान स्पष्ट रूप से हमारे सामने है और इससे पीड़ित लोगों ने इसका विरोध शुरू कर दिया है। अकादमिक अध्ययनों ने दिखाया है कि भारतीय शहरों में प्रदूषण की दर दुनिया में सर्वाधिक है। इस बीच, गरीबों का पर्यावरणवाद फिर से उभरता दिख रहा है, आदिवासियों (और अन्य समूहों) को खुली खदानों से बेदखल किया जा रहा है और औद्योगिक प्रदूषण के कारण किसानों का जीवन-यापन खतरे में है।

हाल ही में तूतीकोरिन में हुए प्रदर्शन के पीछे पर्यावरण के दोहन से पीड़ित कामकाजी वर्ग था। इसका अन्त जिस त्रासदी से हुआ उससे तो पर्यावरण के प्रति जागरुकता की शुरुआत होनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा लगता है कि हमारे नीति नियंता और उन्हें संचालित करने वाले सबक सीखने को तैयार नहीं हैं।

इस मुद्दे पर जहाँ वाकई कुछ अच्छी मैदानी रिपोर्टिंग की गई, लेकिन जमीनी हकीकत से अनभिज्ञ सम्पादकीय लेखक चाहते थे कि स्टरलाइट और उसके अपराधों को बख्श दिया जाये। ऐसे समर्थकों ने दावे किये (अपर्याप्त साक्ष्यों के साथ) कि प्रदर्शन हिंसक था और विदेश से प्रेरित था, जबकि बड़े कॉर्पोरेट पर पर्यावरणीय जिम्मेदारी (अपर्याप्त साक्ष्यों के साथ) सौंपना आर्थिक बर्बादी लाएगा।

भारत के पास आज आर्थिक विकास और पर्यावरणीय सन्तुलन को जोड़ने वाली नीतियाँ बनाने की क्षमता है। हमारे अनुसन्धान संस्थानों के पास ऐसे शानदार वैज्ञानिक हैं जोकि हमारी सरकारों (केन्द्र और राज्यों की) को औद्योगिक, कृषि, वन, जल, ऊर्जा, आवासीय और परिवहन सम्बन्धी नीतियाँ बनाने में मदद कर सकते हैं, जोकि हमारे दीर्घकालीन भविष्य को नुकसान पहुँचाए बिना हमारी वृद्धि को बढ़ाएँ।

यह दुखद है कि हमारे पास ऐसे राजनीतिज्ञ नहीं है, जो इन विशेषज्ञों को सुनना चाहें। तूतीकोरिन में राज्य द्वारा की गई नागरिकों की हत्या, एक पारदर्शी और जवाबदेह लोकतंत्र में चेतावनी होनी चाहिए। लेकिन मुझे भय है कि हमारी दोषपूर्ण राजनीतिक व्यवस्था में इसे जल्द ही भुला दिया जाएगा, खासकर इसलिये क्योंकि आम चुनाव नजदीक हैं और राजनीतिक दलों को अपने खजाने भरने हैं।

(रामचंद्र गुहा कई किताबों के लेखक हैं, जिनमें एनवायरनमेंटलिज्म : ए ग्लोबल हिस्ट्री भी शामिल है।)

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