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हिन्दी सिनेमा में पानी

जल संरक्षण में अल्मोड़ा विलेन तो पौम्दा गाँव हीरो


पौम्दा गाँव का नौलापौम्दा गाँव का नौलावैसे भी प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में उत्तराखण्डवासियों की अग्रणी भूमिका रही है। इस वर्ष के आरम्भ में जब ‘नेशनल साइंस फिल्म फेयर फेस्टिवल’ में उत्तराखण्ड की दो फिल्मों ने पुरस्कार जीता तो वह इस बात का गवाह बन गई कि राज्य के लोग आज भी जल संरक्षण के लिये संवेदनशील हैं। गौरव की बात यह है कि इस फिल्म को बनाने वाले भी उत्तराखण्डी ही थे और फिल्म की कहानी के पात्र भी उत्तराखण्ड के प्राकृतिक संसाधन ही थे। जिसमें ‘जल’ की महत्ता को प्रमुखता से चित्रित किया गया है।

राज्य की शायद यह पहली फिल्म होगी जिसने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी मौजूदगी को न सिर्फ दमदार ढंग से प्रस्तुत किया बल्कि पुरस्कार पाने में भी अग्रणी रही है। ऐसा भी नहीं है कि इस विषय को लेकर कभी काम ना हुआ हो। कई डॉक्यूमेंटरी फिल्में बनाई गईं, कई चल-चित्र और गीत पानी के सवाल पर फिल्माए गए परन्तु वे इस प्रतियोगिता तक अपनी पहुँच नहीं बना पाये। मगर चम्पावत जिले के लोहाघाट निवासी श्रीनिवास ओली द्वारा प्रदर्शित व निर्देशित फिल्म ‘नौला : वाटर टेम्पल ऑफ हिमालयाज’ को इस सफलता पर कांस्य पदक भी मिला है।

दिलचस्प यह है कि एक तरफ अल्मोड़ा शहर जो कभी नौलों के लिये विख्यात था, आज वह पानी के लिये तरस रहा है। वहीं दूसरी ओर चम्पावत जिले का पौम्दा गाँव है जो ग्लोबल वार्मिंग को ललकार रहा है कि उनके नौले सदैव पानी से लबा-लब भरे रहेंगे। अर्थात यह कह सकते हैं कि यह फिल्म अल्मोड़ा को नौलों के सरंक्षण में विलेन बता रही है तो पौम्दा गाँव को हीरो।

‘कड़वी हवा’ का जिक्र एक मीठा एहसास


64वें राष्ट्रीय पुरस्कार में फिल्म कड़वी हवा की सराहना



कड़वी हवाकड़वी हवाइस बार के नेशनल अवार्ड में सामाजिक मुद्दों पर फिल्में बनाने वाले फिल्म निर्देशक नील माधब पांडा की ताजा फिल्म ‘कड़वी हवा’ का विशेष तौर पर जिक्र (स्पेशल मेंशन) किया गया।

स्पेशल मेंशन में फिल्म की सराहना की जाती है और एक सर्टिफिकेट दिया जाता है, बस! बॉलीवुड से गायब होते सामाजिक मुद्दों के बीच सूखा और बढ़ते जलस्तर के मुद्दों पर बनी कड़वी हवा की सराहना और सर्टिफिकेट मिलना राहत देने वाली बात है।

फिल्म की कहानी दो ज्वलन्त मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती है-जलवायु परिवर्तन से बढ़ता जलस्तर व सूखा। फिल्म में एक तरफ सूखाग्रस्त बुन्देलखण्ड है तो दूसरी तरफ ओड़िशा के तटीय क्षेत्र हैं। बुन्देलखण्ड पिछले साल भीषण सूखा पड़ने के कारण सुर्खियों था। खबरें यह भी आई थीं कि अनाज नहीं होने के कारण लोगों को घास की रोटियाँ खानी पड़ी थी। कई खेतिहरों को घर-बार छोड़कर रोजी-रोजगार के लिये शहरों की तरफ पलायन करना पड़ा था।

प्रेरणा जगाती पानी फिल्म - रिसर्जेन्स


रिसर्जेन्सरिसर्जेन्सलोरेन आइसली का एक बयान है - 'यदि धरती पर कोई जादू है, तो वह पानी है।' इस बयान की पुष्टि करते कारनामें भी आज कई हैं और फिल्में भी कई। ऐसी फिल्मों की शृंखला को आगे बढ़ाती एक फिल्म देखने का मौका मुझे मिला। फिल्म का नाम है - रिसर्जेन्स यानी पुनरोत्थान। फिल्म - 'रिसर्जेन्स', पूर्वी राजस्थान के जिला करौली के गाँव भूड़खेडा, गाँव मंडौरा और फैदल का पुरा में हुए एक सफल पानी प्रयास पर केन्द्रित है। दिल्ली स्थित युवा आर्ट्स के बैनर तले बनी यह फिल्म, युवा निर्माता-निदेशक श्री अंकित शर्मा की कल्पनाशीलता और तथ्यपरक समझ का एक सरल-निर्मल प्रतिबिम्ब है।

'रिसर्जेन्स' का भूगोल


कथानक है कि यशोदा की कोख में जन्मी जिस कन्या को कंस ने मारने का प्रयास किया, वह कंस के हाथ से छूटकर जिस स्थान पर आई, वही आज जिला करौली है। उस कन्या के नाम पर आज यहाँ कैलादेवी का प्रसिद्ध मन्दिर है। कभी यहाँ चंबल का पानी पीकर बड़े हुए बागियों की दहाड़ें थी। उन दहाड़ों के कारण ही तथाकथित विकास के लिये भूमि कब्जाने वाली करौली में कम पहुँचे। लिहाजा, यह इलाका लम्बे अरसे तक आधुनिक विकास के संत्रास से बचा रहा। फिल्म, जिला करौली को 'एक अल्प विकसित जिला' कहती है; मैं इस तथाकथित 'अल्प विकास' को ही करौली की प्राकृतिक वैभव संरक्षण की दिशा में राहत की सबसे बड़ी बात मानता हूँ।

'रिसर्जेन्स' की कथावस्तु

मैं नदिया फिर भी प्यासी

वेब/संगठन: 
bhartiyapaksha.com
Source: 
-माहेश्वरी
नीरमहलनीरमहलआज पानी की कमी को लेकर कोहराम मचा हुआ है। तालाब सूख रहे हैं। नदियां अपना रूप बदल रही हैं। भूजल स्तर नीचे जा रहा है। ऐसी आशंका व्यक्त की जा रही है कि अगला विश्वयुद्ध पानी को लेकर होगा। इस सबके बावजूद भारत के हर रंग-ढ़ंग में पानी है।

मैं नदिया फिर भी प्यासी

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-माहेश्वरी
नीरमहलनीरमहलआज पानी की कमी को लेकर कोहराम मचा हुआ है। तालाब सूख रहे हैं। नदियां अपना रूप बदल रही हैं। भूजल स्तर नीचे जा रहा है। ऐसी आशंका व्यक्त की जा रही है कि अगला विश्वयुद्ध पानी को लेकर होगा। इस सबके बावजूद भारत के हर रंग-ढ़ंग में पानी है।

मैं नदिया फिर भी प्यासी

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-माहेश्वरी
नीरमहलनीरमहलआज पानी की कमी को लेकर कोहराम मचा हुआ है। तालाब सूख रहे हैं। नदियां अपना रूप बदल रही हैं। भूजल स्तर नीचे जा रहा है। ऐसी आशंका व्यक्त की जा रही है कि अगला विश्वयुद्ध पानी को लेकर होगा। इस सबके बावजूद भारत के हर रंग-ढ़ंग में पानी है।

लगी आज सावन की . . . . . .

फिल्मों में बरसातफिल्मों में बरसातकौंधती बिजली, गरजते बादल और बरसती बूंदें...यही तो पहचान है मानसून की। मानसून की फुहारें जब तन के साथ मन को भिगोती हैं तो भारतीय जनमानस अलमस्त हो उठता है। सावन की इस ऋतु से हिंदी सिनेमा का एक खास और मधुर रिश्ता रहा है। बालीवुड फिल्मकारों का सावन और बरसात के प्रति अनुराग इस बात से ही झलकता है कि इन्हें केंद्र में रखकर कई फिल्मकारों ने सिनेमाई स्क्रीन पर यादगार प्रस्तुतियां की। कहा जाए तो सावन और बरसात ने भारतीय फिल्मकारों की कल्पनाशीलता को एक नई उड़ान दी है। रोमांस, विरह, चुहलबाजी या गमज़दा प्रेमी की पीड़ा फिल्मकारों ने संवेदन

लगी आज सावन की . . . . . .

फिल्मों में बरसातफिल्मों में बरसातकौंधती बिजली, गरजते बादल और बरसती बूंदें...यही तो पहचान है मानसून की। मानसून की फुहारें जब तन के साथ मन को भिगोती हैं तो भारतीय जनमानस अलमस्त हो उठता है। सावन की इस ऋतु से हिंदी सिनेमा का एक खास और मधुर रिश्ता रहा है। बालीवुड फिल्मकारों का सावन और बरसात के प्रति अनुराग इस बात से ही झलकता है कि इन्हें केंद्र में रखकर कई फिल्मकारों ने सिनेमाई स्क्रीन पर यादगार प्रस्तुतियां की। कहा जाए तो सावन और बरसात ने भारतीय फिल्मकारों की कल्पनाशीलता को एक नई उड़ान दी है। रोमांस, विरह, चुहलबाजी या गमज़दा प्रेमी की पीड़ा फिल्मकारों ने संवेदन

लगी आज सावन की . . . . . .

फिल्मों में बरसातफिल्मों में बरसातकौंधती बिजली, गरजते बादल और बरसती बूंदें...यही तो पहचान है मानसून की। मानसून की फुहारें जब तन के साथ मन को भिगोती हैं तो भारतीय जनमानस अलमस्त हो उठता है। सावन की इस ऋतु से हिंदी सिनेमा का एक खास और मधुर रिश्ता रहा है। बालीवुड फिल्मकारों का सावन और बरसात के प्रति अनुराग इस बात से ही झलकता है कि इन्हें केंद्र में रखकर कई फिल्मकारों ने सिनेमाई स्क्रीन पर यादगार प्रस्तुतियां की। कहा जाए तो सावन और बरसात ने भारतीय फिल्मकारों की कल्पनाशीलता को एक नई उड़ान दी है। रोमांस, विरह, चुहलबाजी या गमज़दा प्रेमी की पीड़ा फिल्मकारों ने संवेदन

फिल्म : जल ही जीवन है

पानी अनमोल हैपानी अनमोल हैशिप्रा सनसिटी, जागरण संवाद केंद्र, गाजियाबाद
पानी की बूंद-बूंद कीमती है, पानी को बर्बाद न करे और जितना संभव हो जल संचय करे क्योंकि जल ही जीवन है..जल की ऐसी ही महत्ता को दर्शाने के लिए शिप्रा सनसिटी आरडब्ल्यूए की ओर से डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाई जा रही है। 20 मिनट की इस फिल्म की खासियत यह होगी कि पानी अनमोल है यह बताने के लिए फिल्म में मनोरंजन जगत से जुड़ी हस्तियों और महानगर की कुछ बड़ी हस्तियों के संदेश शामिल होंगे।