लेखक की और रचनाएं

SIMILAR TOPIC WISE

तो कैसे मिटेगी इण्डिया और भारत के बीच की खाई

Author: 
देवेन्दर शर्मा
Source: 
सर्वोदय प्रेस सर्विस, अप्रैल 2018

अब तो बाजार की अर्थव्यवस्था भी धर्म का अंग बन गई है। जो इस पर विश्वास रखते हैं वो राष्ट्रीयकृत बैंकों के कारपोरेट डिफॉल्ट्स का भी समर्थन करने के लिये तैयार हैं। यहाँ तक कि आर्थिक सलाहकार ने भी कह दिया कि कारपोरेट ऋण की माफी आर्थिक विकास का हिस्सा है जबकि किसानों की ऋण माफी से ऋण अनुशासनहीनता बढ़ती है? शहरी इण्डिया और ग्रामीण भारत के बीच बहुत दूरी है। दोनों एक-दूसरे को नहीं समझते हैं और ये खाई बढ़ती ही जा रही है। शहरों में रहने वाले लोग ग्रामीण परिवेश से बहुत दूर होते चले गए हैं। उन्हें गाँव की जीवनशैली का जरा भी आभास नहीं है।

हम सब जानते हैं कि हम ऐसे देश में रहते हैं जो ‘इण्डिया’ और ‘भारत’ में बँटा हुआ है। ‘इण्डिया’ मेट्रोपोलिस शहरों में रहता है जिसमें छह लेन के राजमार्ग हैं, गंगनचुम्बी इमारतें हैं, महंगी कारें हैं और जाने क्या-क्या हैं जबकि ‘भारत’ 6.40 लाख गाँवों में रहता है जहाँ धूल भरी सड़कें हैं, जहाँ ट्रैक्टर और बैलगाड़ियों के साथ कई हजार गरीब लोग जो अधिकांशतः किसान हैं।

आप पूछेंगे कि मैं ‘इण्डिया’ और ‘भारत’ की बात क्यों कर रहा हूँ। आखिरकार हम सभी ‘इण्डिया’ और ‘भारत’ के बीच की गहरी खाई से भली-भाँति परिचित हैं। मैंने ये विषय इसलिये उठाया क्योंकि मुझे लगता है कि शहरी इण्डिया और ग्रामीण भारत के बीच बहुत दूरी है। दोनों एक-दूसरे को नहीं समझते हैं और ये खाई बढ़ती ही जा रही है। शहरों में रहने वाले लोग ग्रामीण परिवेश से बहुत दूर होते चले गए हैं। उन्हें गाँव की जीवनशैली का जरा भी आभास नहीं है। उन्हें लगता है कि ग्रामीण भारत एक तरह से अलग ही देश है- अफ्रीका जितना दूर। यहाँ तक कि अब बॉलीवुड भी भारत की बात नहीं करता है।

कभी-कभी तो मुझे घिन आने लगती है। जब भी मैं किसानों द्वारा आत्महत्याओं के मामलों में इजाफे के बारे में ट्वीट करता हूँ मुझे चौंकाने वाले ही नहीं बल्कि भयावह उत्तर मिलते हैं। कुछ लोग लिखते हैं कि इन लोगों को तो यूँ भी मर ही जाना चाहिए क्योंकि ये देश पर भार हैं, कुछ कहते हैं कि किसान पैरासाइट हैं जो देश का खून चूस रहे हैं, कई कहते हैं कि किसान सरकार की खैरात पर जिन्दा हैं और उन्हें उद्यमिता न अपनाने की कीमत तो चुकानी ही होगी। संवेदना की ये कमी इतनी ज्यादा है कि सोशल मीडिया पर मुझसे बात करने वाले कई लोग कहते हैं कि मुझे किसानों के बारे में बात करनी ही बन्द कर देनी चाहिए और आर्थिक उन्नति कर रही शहरी जनसंख्या पर अपना ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।

जब मैं उत्तर पूर्वी क्षेत्र के बाढ़ प्रभावित किसानों की बात करता हूँ या मध्य और दक्षिण भारत में सूखे से जूझ रहे किसानों का मुद्दा उठता हूँ तो उन लोगों को कतई दुख नहीं पहुँचता है। जब कीमतें गिरतीं हैं, जब किसान सड़कों पर टमाटर फेंक देते हैं, जब किसान कीमतें गिरने के कारण हृदयाघात से मर जाते हैं या आत्महत्या कर लेते हैं तो मुझे कहा जाता है कि ग्रामीण भारत में तो ये सामान्य घटनाएँ हैं, मुझे इनके बारे में इतना लिखने की आवश्यकता नहीं है।

जब मैं इस प्रकार की बातों को सुनता हूँ तो मुझे ये चिन्ता सताती है कि शहरी इण्डिया और किसानों के बीच इतनी दूरी कैसे हो गई? किसानों के नेताओं ने क्यों इस दूरी को इतना बढ़ने दिया, क्यों नहीं ऐसा कुछ किया की शहर के लोग गँवों के मुद्दों से जुड़े रहे। मेरे पास इसका उत्तर नहीं है पर मुझे शिद्दत से लगता है कि शहरी लोगों से दूरी बढ़ने के लिये कहीं-न-कहीं किसान नेताओं को भी अपनी जिम्मेदारी स्वीकारनी होगी।

क्यों किसानों ने अपने संघर्षों, अपनी तकलीफों को किसान समुदायों तक ही सीमित रखा, क्यों नहीं उन लोगों ने समाज के अन्य वर्गों तक अपनी बात पहुँचाने का प्रयत्न किया? स्कूलों और कॉलेजों की बात करें तो उन छात्रों के मन मस्तिष्क में, उन्हें दी जा रही शिक्षा में किसानों की कोई खास भूमिका नहीं है। मात्र पाठ्यक्रम की पुस्तकों से उन्हें किसानों के बारे में टूटी-फूटी जानकारी मिलती है। क्यों नहीं छात्रों और किसानों के बीच सीधे बातचीत के सत्र रखवाये जाते हैं। वार्षिक महोत्सवों अथवा पठन-पाठन से सम्बन्धित अन्य कार्यक्रमों में बिरले ही मैंने किसानों और छात्रों में बीच कोई विचार विमर्श होते देखा है।

युवाओं के लिये किये गए कार्यक्रमों में भी शहरी युवाओं पर ध्यान केन्द्रित रहता है, ग्रामीण युवक तो जैसे महत्त्वहीन हैं। हर बात शहरी भारत के बारे में होती है, जैसे कि ग्रामीण भारत का कोई वजूद ही नहीं है। एक दिन मैं नई दिल्ली में एक निजी विश्वविद्यालय में व्याख्यान दे रहा था। मैंने पूछा कि आप में से कितने लोग कभी गाँव गए हैं। 60 लोगों से अधिक की क्लास में मात्र 3 हाथ ऊपर उठे। वे तीनों भी किसी शादी में गाँव या तहसील मुख्यालय गए थे और एक अपनी माँ के साथ अपने नाना नानी से मिलने गाँव गई थी। जब मैंने उनसे कहा कि उन्हें गाँव तक पहुँचने के लिये नोएडा से मात्र 40 किलोमीटर बाहर जाना पड़ेगा तो उन्हें ये मजाक के रूप में भी अच्छा नहीं लगा। इन युवाओं के लिये उनका जीवन शहरों में सिमटा हुआ अच्छा था। वे शहरों में ही खुश थे।

यही आज के शिक्षित युवा हैं जो किसी दिन नौकरशाही चलाएँगे अथवा किसी अन्तरराष्ट्रीय कम्पनी या किसी निर्णायक मंडल में अवस्थित होंगे। उन्हें 70 प्रतिशत आबादी युक्त ग्रामीण भारत के बारे में कुछ पता नहीं है। उन्हें क्यों दोष दें। आज के निर्णयकर्ता, जिनमें जाने माने अर्थशास्त्री जो आये दिन टीवी चर्चाओं में हाजिर होते हैं अथवा अंग्रेजी के अखबारों में नियमित कॉलम लिखते हैं, उनका भी गाँवों से कोई सीधा नाता नहीं है। एक अर्थशास्त्री जो अब प्रधानमंत्री की परामर्शदात्री समिति के सदस्य हैं उन्होंने इण्डियन एक्सप्रेस में एक आर्टिकल में किसानों के बारे में अपने तर्कों के समर्थन में ये कहकर मुझे भौचक्का कर दिया कि उनकी जानकारी इसलिये पुख्ता है क्योंकि उनकी पत्नी मशरुम की खेती कर रही अंशकालिक किसान है। खेती के बारे में उनकी जानकारी केवल वहीं तक सीमित थी जितनी उनकी पत्नी ने उन्हें दी थी जो खुद शहरी समृद्ध वर्ग से ताल्लुक रखती थी और शौकिया तौर पर मशरुम की खेती करती थी।

बात यहीं खत्म नहीं होती है। जब भी मैं कृषि संकट और किसानों द्वारा आत्महत्या में बढ़ोत्तरी की बात करता हूँ ट्रोल मुझसे पूछते हैं कि क्या कांग्रेस के समय पर आत्महत्याएँ नहीं हो रही थीं? जब मैं किसानों पर सूखे की मार की बात करता हूँ तो मुझसे पूछा जाता है कि क्या बारिश न आने के लिये नरेंद्र मोदी जिम्मेदार हैं? पब्लिक डिबेट का इतना ध्रुवीकरण हो गया है कि बाढ़ और सूखे समेत हर मुद्दे को राजनीतिक रुझान के नजरिए से देखा जाने लगा है।

अब तो बाजार की अर्थव्यवस्था भी धर्म का अंग बन गई है। जो इस पर विश्वास रखते हैं वो राष्ट्रीयकृत बैंकों के कारपोरेट डिफॉल्ट्स का भी समर्थन करने के लिये तैयार हैं। यहाँ तक कि आर्थिक सलाहकार ने भी कह दिया कि कारपोरेट ऋण की माफी आर्थिक विकास का हिस्सा है जबकि किसानों की ऋण माफी से ऋण अनुशासनहीनता बढ़ती है और राष्ट्रीय बैलेंस शीट खराब होती है। प्रतिवर्ष कई सौ करोड़ के बैंक डिफॉल्ट्स के बारे में यदि आप तथ्यपरक बहस करो तो वो आपको सीधे-सीधे कम्युनिस्ट भी कह सकते हैं और नहीं तो सोशलिस्ट का तमगा तो दे ही डालेंगे। इतनी चतुराई से इस प्रकार की बातें लोगों के मन में बैठाई गई हैं। क्या ये खाई कभी भी पट पाएगी?

श्री देवेन्दर शर्मा प्रख्यात कृषि विशेषज्ञ एवं पर्यावरणविद हैं।


TAGS

corporate defaulters, agriculture loan, grim situation of farmers, uncontrolled urbanisation, rural urban divide in india ppt, causes of imbalance between rural and urban areas, rural urban disparity in education in india, comparative study of rural and urban life in india, rural urban disparity in india pdf, rural urban disparities in india, rural-urban disparity meaning, urban rural disparity introduction, corporate defaulters list, top 10 corporate defaulters in india, mca defaulter list 2017, mca defaulter company list, rbi defaulter list 2017 download, mca defaulters - directors list, rbi defaulter list of companies, mca defaulter list 2016, agriculture loan sbi, agriculture loan interest rates, agriculture loan interest rates in sbi, agriculture loan calculator, agriculture loan subsidy, how to get agriculture loan, agriculture loan interest rate 2017, agriculture loan interest rates in canara bank, urbanization problems, urbanization problems and remedies, solutions to prevent urbanisation, factors responsible for urbanization, causes of urbanization pdf, solution to urbanization problems, causes of urbanisation in points, factors that cause urbanization, What is the cause of Urbanisation?, What were some of the negative effects of urbanization?, What are the problems associated with Urbanisation?, How does natural increase affect Urbanisation?, Where is Urbanisation happening?, What led to urbanization?, Is urbanization good?, What would be an example of urbanization?, How can we prevent urbanization?, What are the factors that contribute to urbanization?, What is a natural increase?, Where are most megacities located?, What are squatter settlements made of?, What are some factors that contribute to urban sprawl?, What causes urbanization in America?, Why did the urbanization happen?, What is the trend of urbanization?, What were the effects of urbanization during the industrial revolution?, What is the process of urbanization?, What was the main cause of urbanization during the industrial revolution?, What is the meaning of suburbanisation?, Why is the urbanization important?, What are 4 push factors?, What are some pull factors?, What country has the highest rate of natural increase?, What is the rate of natural increase?, What are the 10 largest cities in the world?, What are the megacities of the world?.


Post new comment

The content of this field is kept private and will not be shown publicly.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Lines and paragraphs break automatically.

More information about formatting options

CAPTCHA
यह सवाल इस परीक्षण के लिए है कि क्या आप एक इंसान हैं या मशीनी स्वचालित स्पैम प्रस्तुतियाँ डालने वाली चीज
इस सरल गणितीय समस्या का समाधान करें. जैसे- उदाहरण 1+ 3= 4 और अपना पोस्ट करें
1 + 9 =
Solve this simple math problem and enter the result. E.g. for 1+3, enter 4.