कचरा पैदा करने वाले हों जिम्मेदार

Submitted by editorial on Sat, 06/09/2018 - 18:17
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Source
दैनिक जागरण, 20 मई, 2018


स्वच्छता सर्वेक्षण 2018 इसके पहले हुये सर्वेक्षण से बेहतर है क्योंकि इसने नई तकनीकों और दीर्घकालिक उपायों को बढ़ावा दिया है। हालांकि पुरस्कार के लिये चुने गये शहरों में से कुछ शहर सिर्फ दिखने भर के साफ हुए हैं। यहाँ पर सफाई की दीर्घकालिक पद्धतियों का पालन नहीं किया जाता है।

इन्दौर और भोपाल पिछले वर्ष की सूची में भी शीर्ष पर थे। इन दोनों शहरों ने इस वर्ष कचरे को स्रोत से ही अलग-अलग करने और कचरा प्रबन्धन में विकेन्द्रीकरण की प्रणाली अपनाने में काफी सुधार दिखाया है।

पिछले कुछ वर्षों में साफ-सफाई को लेकर लोगों का परिप्रेक्ष्य बदल गया है। अब गीले और सूखे कचरे को अलग-अलग करने पर और उसे प्रोसेस करने पर अधिक जोर दिया जाता है, बजाय उस कचरे को एकत्र करके लैंडफिल में डम्प कर देने के। यह देखा गया है कि ठोस कचरा प्रबन्धन में सबसे बड़ा मसला है अलग-अलग किये गये कचरे को उठाना। किसी शहर में चन्द सोसायटी या वार्ड में ही कचरा एकत्र करने की यह प्रक्रिया अपनाई जाती है। पूरे शहर से कचरा उठाने का जिम्मा भी गिनी-चुनी स्थानीय संस्थाओं के ऊपर होता है। सभी शहरों में अलग किये हुए कचरे को एकत्र करने और प्रोसेस करने के लिये पर्याप्त बुनियादी ढाँचा भी नहीं है।

स्वच्छता सर्वेक्षण के नतीजों में सबसे बड़ी अनियमितता यह है कि इसमें शहरों को कचरा उठाने की उनकी डोर-टू-डोर प्रणाली के आधार पर अंक दिये गये हैं। जबकि कुछ शहरों में डोर-टू-डोर प्रणाली का चलन नहीं है। इसके बावजूद वे सबसे साफ हैं। यहाँ गीले कचरे का मूल स्थान में ही ट्रीटमेंट किया जाता है और सूखे कचरे को नगरपालिका एकत्र करके ले जाती है। तिरुवनंतपुरम और अलापुझा जैसे इन शहरों में अधिकतम कचरे को कम्पोस्ट और बायोगैस में बदल दिया जाता है। प्लास्टिक, ग्लास, धातु, कागज जैसे अन्य अजैव पदार्थों को रिसाइक्लिंग के लिये भेज दिया जाता है। ये शहर कचरा एकत्र करने और उसे लैंडफिल तक पहुँचाने में करोड़ों रुपए खर्च करने की बजाय ठोस कचरे से धन बना रहे हैं।

स्वच्छता सर्वेक्षण के तहत 52 श्रेणियों में विजेताओं की घोषणा की गई है। इनमें से अधिकतर शहर सिर्फ दिखने भर के साफ हैं और यहाँ प्रोसेसिंग और निस्तारण की कोई प्रणाली मौजूद नहीं है। देश के तीसरे सबसे साफ शहर चंडीगढ़ में अलग किये हुए कचरे को एकत्र करने की कोई प्रभावी प्रणाली मौजूद नही है। शहर का प्रोसेसिंग प्लांट दादू माजरा में लगा है और इसका प्रबन्धन जेपी समूह करता है। इस संयंत्र पर कानूनी कार्रवाई हो चुकी है।

शहरों को अगर स्वच्छता रैंकिंग में स्थान बनाना है तो ऐसी प्रणाली विकसित करनी होगी जहाँ कचरे को अलग करके उसे प्रोसेस करने और निष्पादन का तरीका मौजूद हो। शहरों को ठोस कचरा प्रबन्धन के तहत ऐसे कानून बनाने चाहिए जिसमें कचरे को अलग न करने और यहाँ-वहाँ गन्दगी फैलाने पर जुर्माना लगे।

कचरा प्रबन्धन को लोगों के अभियान में बदलना होगा, जिसमें सबसे अधिक जोर सामाजिक ढाँचे को बदलने पर देना होगा। जब तक नगरपालिकाएँ अपना व्यवहार नहीं बदलेंगी तब तक सिर्फ बुनियादी ढाँचा बनाने में धन खर्च करने से कोई फायदा नहीं होगा। अब यह बेहद जरूरी हो गया है कि कचरा उत्पादन करने वाले उसकी जिम्मेदारी लें, फिर चाहे वे औद्योगिक क्षेत्र हों, होटल हो या सोसायटी हो।
 

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