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जानलेवा हवा

Author: 
अनिल अश्विनी शर्मा
Source: 
डाउन टू अर्थ, मई, 2018
भारत में हीटवेव तीसरी सबसे बड़ी ‘हत्यारन’ के रूप में उभरी है। इसका दायरा बढ़ रहा है और यह नए-नए क्षेत्रों को चपेट में ले रही है। क्या इसके लिये जलवायु परिवर्तन जिम्मेदार है? देश के 13 हीटवेव प्रभावित राज्यों के 43 जिलों के लोगों, मौसम व तकनीकी विशेषज्ञों से मिलकर अनिल अश्विनी शर्मा ने हीटवेव की बढ़ती ताकत का आकलन किया। धौलपुर का नाम उन लोगों के लिये भी अनजाना नहीं है जो यहाँ से बहुत दूर रहते हैं। सबसे ज्यादा तापमान के कारण पिछले चार सालों में से यह शहर सुर्खियों में रहा है। गर्मियों में यहाँ का तापमान 46 से 48 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान होने पर लू या गर्म हवा (हीटवेव) शुरू हो जाती है। धौलपुर में तापमान की झुलसन महसूस करने के लिये शहर के बीचो-बीच स्थित न्यायालय में जाया जा सकता है। यहाँ बड़ी संख्या में वकील और मुवक्किल खुले आसमान के नीचे बैठने पर मजबूर होते हैं। सूरज की गर्मी से राहत के लिये टीनशेड लगाया गया है जो तपने में सूरज से भरपूर मुकाबला करता है। यहाँ 52 वर्षीय रामकुटी अपने दुधमुँहे बच्चे को आँचल की छाँव में छुपाए हुए है। खुले आसमान के नीचे हीटवेव के थपेड़ों के बीच अपनी दूसरी बच्ची को भी साड़ी में समेटे लम्बे घूँघट की ओट में अदालती बुलावे की बाट जोह रही है। हीटवेव से बीमार होने का डर नहीं लग रहा? यह सवाल सुनते ही घूँघट को और नीचे खींचते हुए कहती है, “मौत तो इधर भी है और उधर भी। यहाँ बैठी हूँ कि आज मेरे खेत की सुनवाई है। अगर खेत नहीं मिले तो वैसे भी भूख से ही मर जाएँगे। हाँ डर लगता है कि यह हीटवेव मेरे बच्चे को लील न जाए।” पिछले चार सालों से यहाँ का तापमान गर्मियों में लगातार 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक रहा है। इसी बात की पुष्टि करते हुए स्थानीय पर्यावरणविद अरविंद शर्मा ने बताया कि इस साल (2018) के मार्च में ही यहाँ का तापमान 39 डिग्री सेल्सियस तक जा पहुँचा था। धौलपुर जिला अस्पताल में पदस्थ सर्जन धर्म सिंह ने बताया कि मार्च में ही यहाँ हीटवेव जैसी स्थिति पैदा हो गई है। यही कारण है कि इस साल जनवरी-फरवरी के मुकाबले मार्च-अप्रैल में 40 फीसद अधिक बच्चे व बूढ़े अस्पताल आये हैं। इनमें भी बच्चों के मामले 70 फीसद है। अस्पताल आने वाले ज्यादातर बच्चों को दस्त, बेचैनी और चक्कर आने की शिकायतें हैं। धौलपुर के पत्थर राजस्थान ही नहीं देशभर में मशहूर हैं। यहाँ पत्थर की खदानों में काम करने से पैसा तो मिलता है लेकिन इस पत्थर की गर्मी हम जैसे मजदूरों का शरीर जला डालती है। धर्म सिंह कहते हैं कि मैं उस इलाके से आता हूँ जो हीटवेव का सबसे अधिक प्रभावित इलाका है क्योंकि वहाँ चारों ओर जमीन के नीचे पत्थर हैं। यहाँ पर काम करने वाले 80 फीसद ग्रामीण हीटवेव के शिकार होते हैं। मनरेगा में काम करने वाले मजदूर भी इसकी चपेट में आते हैं। हालांकि राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने हीटवेव प्रभावित सभी 17 राज्यों को 3 मार्च, 2018 को हीटवेव सम्बन्धी नये दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि मनरेगा के तहत काम करने वाले मजदूर सुबह व शाम की पाली में ही काम करेंगे। निर्देश में कहा गया है, जहाँ पानी की पूरी व्यवस्था होगी, वहीं पर काम होगा। सिंह बताते हैं कि हीटवेव की समयावधि में पिछले चार सालों में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है। यह समयावधि 2015 में जहाँ 40-45 दिन होती थी, अब बढ़कर 60-70 दिन हो गई है। सिर्फ पथरीला भूगोल ही पिछले चार साल में धौलपुर को देश का सबसे गर्म जिला बनाने का जिम्मेदार नहीं है। एक समय चम्बल के डाकुओं के लिये वरदान बने बीहड़ अब धौलपुर में गर्मी बढ़ा रहे हैं। बीहड़ से लगे पिपरिया गाँव के बुजुर्ग मुल्कराज सिर से लेकर पैर तक सफेद धोती से अपने को लपेटे हुए अपनी पान की गुमटी में बैठे बीहड़ की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि न जाने ये बीहड़ कब खत्म होंगे। पहले इनमें डाकुअन राज करते थे अब यहाँ गर्मी की लहर का राज है। राजस्थान विश्वविद्यालय के पर्यावरण विभाग के प्रमुख टीआई खान कहते हैं कि यहाँ दूर-दूर तक जंगल नहीं हैं और बीहड़ों के कारण यहाँ की जमीन और अधिक ताप छोड़ती है। अरविंद शर्मा कहते हैं कि धौलपुर में हीटवेव के लगातार बहने रहने का एक बड़ा कारण यह है कि चम्बल के बीहड़ों के कारण हवा क्रॉस नहीं हो पाती। वह कहते हैं कि एक समय बीहड़ के डाकू देशभर के लिये दहशत का अवतार माने जाते थे। लेकिन आज यहाँ के आम लोगों के लिये सबसे खूंखार जानलेवा हीटवेव है। यहाँ के सरकारी कर्मचारी हीटवेव से बचने के लिये तड़के 3-4 बजे ही दफ्तर के लिये निकल पड़ते हैं। हीटवेव के सामने बीहड़ का डर भी कम हो गया है। गरम हवा के खौफ ने डाकुओं का खौफ मिटा दिया है। हीटवेव का दायरा अकेले धौलपुर ही नहीं, राष्ट्रीय स्तर पर भी हीटवेव प्रभावित राज्यों में इजाफा हुआ है। एनडीएमए के अनुसार, वर्तमान में देशभर के कुल 17 राज्य हीटवेव से प्रभावित हैं। 2016 में प्रभावित राज्यों की संख्या 13 थी। गुजरात उन राज्यों में शामिल है जहाँ हीटवेव के मामलों में सबसे ज्यादा तेजी आई है। 2015 में 58, 2016 में 447 और 2017 में यह आँकड़ा 463 पर पहुँच गया है। पूरे देश के आँकड़ों पर भी नजर डालें तो पाएँगे कि पिछले तीन सालों में हीटवेव प्रभावितों की संख्या बढ़ी है। 2015 में देश के 17 राज्यों में कुल 32,831 मामले थे जो 2017 में बढ़कर 39,563 हो गए हैं। ये सरकारी आँकड़े हैं। इस बारे में टीआई खान कहते हैं कि सरकारी आँकड़े हमेशा कम करके दिखाए जाते हैं। खासकर हीटवेव से होने वाली मौतों के मामले में सरकारी आँकड़ों पर कई सवालिया निशान लगे होते हैं। सरकारी आँकड़ों से यह बात स्पष्ट है कि सरकार के पास भी कोई तय पैमाना हीटवेव से मरने वालों की संख्या बताने का नहीं है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट कुछ और बयान करती है जबकि पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की रिपोर्ट कुछ और आँकड़े पेश करती है। इस सम्बन्ध में गाँधी नगर स्थित इण्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ के निदेशक दिलीप मावलंकर का कहना है कि देशभर में यह आँकड़ा कहीं अधिक है क्योंकि हीटवेव तथा निर्जलीकरण जैसे सीधे कारणों के अलावा अन्य मामलों की रिपोर्ट कम ही आती है। खान कहते हैं कि सरकार अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिये हमेशा आँकड़ों से खिलवाड़ करती है।

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