होली है . . . . .

प्रकृति पर्व होली पर प्रकृति के रंगों से विमुख क्यों हैं हम


ईको फ्रेंडली रंग होली का पर्व यथार्थ में ऋतु परिवर्तन से जुड़ा हुआ है। इसकी सम्पूर्ण भारत के मंगल उत्सव के रूप में ख्याति है। इसको यदि भारतीय पर्व परम्परा में आनंदोत्सव का सर्वोपरि पर्व कहा जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। देखा जाये तो शिशिर और हेमंत काल की शरीर को अंदर तक कंपकपा और ठिठुरा देने वाली जकड़न के बाद वसंत के आगमन की सूचना देता फाल्गुन मास वातावरण में एक अजीब सा मौजमस्ती, हर्षोल्लास का रंग घोलने लगता है। वसंत ऋतु का यह काल असलियत में जीवन की नीरसता दूर कर उसमें मधुरता के संचरण का काल माना जाता है। इस मास में जब प्रकृति भिन्न-भिन्न प्रकार की कुसुम-समृद्धि से नयी-नवेली दुल्हन की तरह सजने लगती है, पवन मत्त-मयूर सा वृक्षों की डालियों के साथ अठखेलियाँ करने लगता है और अपने स्पर्श से जन-मन को पुलकित-प्रफुल्लित करने लगता है और यही नहीं शस्यश्री से झूमते हुए सम्पूर्ण क्षेत्र हर्ष और उल्लास के मनमोहक वातावरण की सृष्टि करने को तत्पर रहते हैं, उसे क्रियान्वित करने लगते हैं, ऐसे मनोहारी वातावरण में मनुष्य अपने को कैसे दूर रख सकता है। उस स्थिति में जबकि हास्य जीवन का अति सहज मनोभाव है। इसके स्वतः दर्शन होते हैं।

होली के दिन दिल . . .

Author: 
केसर सिंह
होलीहोलीफाल्गुन आते ही फाल्गुनी हवा मौसम के बदलने का एहसास करा देती है। कंपकपाती ठंड से राहत लेकर आने वाला फाल्गुन मास लोगों के बीच एक नया सुख का एहसास कराता है। फाल्गुन मास से शुरू होने वाली बसंत ऋतु किसानों के खेतों में नई फसलों की सौगात देता है। पतझड़ के बाद धरती के चारों तरफ हरियाली की एक नई चुनरी ओढ़ा देता है बसंत, हर छोटे–बड़े पौधों में फूल खिला देता है बसंत, ऐसा लगता है एक नये सृजन की तैयारी लेकर आता है बसंत। ऐसे में हर कोई बसंत में अपनी जिंदगी में भी हँसी, खुशी और नयापन भर लेना चाहता हैं। इसी माहौल को भारतीय चित्त ने एक त्योहार का नाम दिया होली। जैसे बसंत प्रकृति के हर रूप में रंग बिखेर देता है। ऐसे ही होली मानव के तन-मन में रंग बिखेर देती है। जीवन को नये उल्लास से भर देती है।

होली नई फसलों का त्योहार है, प्रकृति के रंगो में सराबोर होने का त्योहार है। मूलतः होली का त्योहार प्रकृति का पर्व है। इस पर्व को भक्ति और भावना से इसीलिए जोड़ा जाता है कि ताकि प्रकृति के इस रूप से आदमी जुडे और उसके अमूल्य धरोहरों को समझे जिनसे ही आदमी का जीवन है।

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बच्चों ने मनाया ईको फ्रेंडली होली

ईको फ्रेंडली होलीईको फ्रेंडली होलीभारत उदय एजुकेशन सोसाइटी ने 22 मार्च विश्व जल दिवस के उपलक्ष्य में जल साक्षरता अभियान में के.एल.सी. प्ले स्कूल सरधना बाईपास कंकरखेड़ा में बच्चों को जल की महत्ता के बारे में बताया गया। इस अभियान के अंतर्गत बच्चों के बीच जैव विविधता, जल, कचरा प्रबंधन आदि विषय पर भी ध्यान केन्द्रित किया गया।

आपत काल बिरस भयो फागुन… …उचित होय सो की जै

Author: 
प्रयाग जोशी
Source: 
नैनीताल समाचार, 07 मई 2011
बोनासाही आमों व देसी लीचियों में बौर आ गई हैं। लाई-सरसों, मूली और धनियाँ के फूलों से घरबाड़े और खेत भरे हुए हैं। तोतों और गोंतालों की चहचहाहट से यूक्लिप्टस का पेड़ चारबाग स्टेशन की तरह शोरियाया हुआ है परन्तु कोयल नहीं दिख रही। हेमंत में, काले कौवों और कोयलों के झुण्ड बाबा रामदेव के शिविर की तरफ एफटीआई की ओर उड़ते हुए देखे थे। तब से उन्हें अपने आस-पड़ौस के पेड़ों में बैठते नहीं देखा। अनुमान कर रहा हूँ वे उन्हीं के साथ मध्यप्रदेश, झारखण्ड, उड़ीसा होकर असम-अरुणांचल की तरफ चले गये हैं। हो सकता है एक दल बाबा साहेब अन्ना हजारे की तरफ पश्चिम की ओर और दूसरा पूरब हो गया हो। भारत स्वाभिमान का जगराता हो रहा है।
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http://www.nainitalsamachar.in/

रंग बरसे

Author: 
गृहलक्ष्मी
Source: 
अभिव्यक्ति हिन्दी
बदरंग सर्दी विदा लेने को है और होली के रंग आँखों में तैरने लगे हैं। मौसम बदल तो रहा है पर संसार के हर कोने में शायद रंगभरी होली नहीं खेली जा सके। सिर्फ रंग लगा लेने या रंग में नहा लेने से ही तो होली नहीं हो जाती, रंगों की विविधता वाले इस पर्व को जीवन के अनेक रंगों में शामिल किया जा सकता है।

कुछ दावतें तो होंगी ही मेहमान आएँगे और सबकुछ सामान्य ही रहा तो होली कैसे पता लगेगी? क्यों न कुछ ऐसा नया किया जाय कि बिन भीगे होली का रंग सब कुछ रंग जाए। प्रस्तुत हैं दस नए अंदाज, कुछ शायद आपको भी जम जाएँ।


प्राकृतिक रंगों की खोज घर - बाहर

Author: 
अरुणा घवाना
Source: 
अभिव्यक्ति हिन्दी, 17 मार्च 2000
होली के सूखे रंगों को गुलाल कहा जाता है। मूल रूप से यह रंग फूलों और अन्य प्राकृतिक पदार्थों से बनता है जिनमें रंगने की प्रवृत्ति होती है। समय के साथ इसमें बदलाव आया और होली के ये रंग अब रसायन भी होते हैं और कुछ तेज़ रासायनिक पदार्थों से तैयार किए जाते हैं। ये रासायनिक रंग हमारे शरीर के लिए हानिकारक होते हैं, विशेषतौर पर आँखों और त्वचा के लिए। इन्हीं सब समस्याओं ने फिर से हमें प्राकृतिक रंगों की ओर रुख करने को मजबूर कर दिया है।
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http://www.abhivyakti-hindi.org/gharparivar/

रस ही जीवन / जीवन रस है

साल भर हमारे कोमल मनों में जो तनाव जमा होते रहते हैं, उनसे उल्लासपूर्ण विमुक्ति का दुर्लभ मौका, जब आप कोयले को कोयला और कीचड़ को कीचड़ कह सकते हैं। होली के दिन कोई किसी का गुसैयां नहीं रह जाता। किसी से भी प्यार किया जा सकता है और किसी पर भी छींटाकशी की जा सकती है। लेकिन यह छींटाकशी भी विनोद भाव के परिणामस्वरूप मृदु और सहनीय हो जाती है। बल्कि जिसका परिहास किया जाता है, वह भी बुरा न मानने का अभिनय करते हुए बरबस हंस पड़ता है। शायद यही 'बुरा न मानो होली है' के हर्ष-विनोद घोष का उद्गम स्थल है। भारत में होली सबसे सरस पर्व है। दशहरा और दीपावली से भी ज्यादा। दूसरे त्योहारों में कोई न कोई वांछा है। या वांछा की पूर्ति का सुख। होली दोनों से परे है। यह बस है, जैसे प्रकृति है। अस्तित्व के आनंद का उत्सव। वांछा और वांछा की पूर्ति, दोनों में द्वंद्व है। यह जय-पराजय से जुड़ा हुआ है। दोनों ही एक अधूरी दास्तान हैं। सच यह है कि दूसरा हारे, तब भी हमारी पराजय है। कोई भी सज्जन किसी और को दुखी देखना नहीं चाहता। किसी का वध करके उसे खुशी नहीं होती। करुणानिधान राम ने जब रावण पर अंतिम प्राणहंता तीर चलाया होगा, तो उनका हृदय विषाद से भर गया होगा। उनके दिल में हूक उठी होगी कि काश, रावण ने ऐसा कुछ न किया होता जो उसके लिए मृत्यु का आह्वान बन जाए; काश, उसने अंगद के माध्यम से भेजे गए संधि प्रस्ताव को मंजूर कर लिया होता; काश, उसने विभीषण की सत सलाह का तिरस्कार नहीं किया होता। अर्जुन का विषाद तो बहुत ही प्रसिद्ध है। युद्ध छिड़ने के ऐन पहले उसे अपने तीर-तूरीण भारी लगने लगे।

केमिकल न डाल दें होली के रंग में भंग

Author: 
नीतू सिंह नई दिल्ली / 10 Mar 2009, नवभारत टाइम्स
रंगों के त्योहार होली पर जमकर धमाल करें, पर कलर में मिले केमिकल से रहें सावधान। दिल्ली के ज्यादातर बड़े बाजारों में मिलने वाले फेस्टिव कलर्स में गाढ़े केमिकल कलर के ऑप्शन में सिर्फ चाइनीज रंग-गुलाल ही मौजूद हैं, जिनमें टॉक्सिक की मात्रा होती है।

सीनियर डर्मेटोलॉजिस्ट डॉ. अनिल गोयल कहते हैं कि आजकल लोकल दुकानदार केमिकल के साथ-साथ डिटरजंट और रेत मिलाकर भी गुलाल तैयार करने लगे हैं, जो कि न सिर्फ स्किन बल्कि आंखों, सांस की नली और बालों के लिए भी खतरनाक साबित हो सकता है। श्रेया आई सेंटर के हेड

स्वयं अपने घर पर प्राकृतिक रंग बनायें

होली रंगों का त्योहार है जितने अधिक से अधिक रंग उतना ही आनन्द, लेकिन इस आनन्द को दोगुना भी किया जा सकता है प्राकृतिक रंगों से खेलकर, पर्यावरण मित्र रंगों के उपयोग द्वारा भी होली खेली जा सकती है और यह रंग घर पर ही बनाना एकदम आसान भी है। इन प्राकृतिक रंगों के उपयोग से न सिर्फ़ आपकी त्वचा को कोई खतरा नहीं होगा, परन्तु रासायनिक रंगों के इस्तेमाल न करने से कई प्रकार की बीमारियों से भी बचाव होता है।

गहरा लाल -


लाल सुर्ख रंग, उत्सवप्रियता, शक्ति और उर्जा का रंग है। होली के अवसर पर यह रंग सबसे अधिक उपयोग किया जाता है। इस होली में लाल रंग घर पर ही बनाने के लिये निम्न तरीका अपनायें -

इको फ्रैंडली होली प्लीज!

Author: 
प्रतिभा वाजपेयी
इको फ्रैंडली होलीइको फ्रैंडली होली होली देश का एकमात्र ऐसा त्योहार है जिसे देश के सभी नागरिक उन्मुक्त भाव और सौर्हादपूर्ण तरीके से मनाते है। यह एक ऐसा त्योहार है जिसमें भाषा, जाति और धर्म का सभी दीवारें गिर जाती हैं। और बुरा न मानो होली है कह कर हम किसी भी अजनबी को रंगों से सराबोर कर देते है। सही मायने में यही इस त्योहार की विशेषता है। परंतु दुर्भाग्यवश, आधुनिक जीवन में होली अब उतनी खूबसूरत नहीं रही। दूसरे त्योहारों की तरह इस त्योहार पर भी बाजारवाद का प्रभाव स्पष्ट दिखाई दे रहा है। मुनाफा कमाने की आड़ में रसायनिक रंग बहुतायत से बाजार में बेचे जा रहे हैं।
इस खबर के स्रोत का लिंक: 
http://pratibhaba-bhagwanbharose.blogspot.com/