जल संरक्षण की आवश्यकता (Water Conservation in Hindi)

Submitted by Hindi on Sun, 08/06/2017 - 16:26
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Source
भगीरथ - अप्रैल-जून, 2009, केन्द्रीय जल आयोग, भारत

.जल प्रकृति की अनमोल धरोहर है। बिना पानी के जीवन संभव नहीं है। पीने के लिये शुद्ध जल हमारे लिये जरूरी है। क्योंकि स्वच्छ एवं सुरक्षित जल अच्छे स्वास्थ्य की कुंजी है। धरती के दो तिहाई हिस्से पर पानी भरा हुआ है। फिर भी पीने योग्य शुद्ध जल पृथ्वी पर उपलब्ध जल का मात्र एक प्रतिशत हिस्सा ही है। 97 प्रतिशत जल महासागर में खारे पानी के रूप में भरा हुआ है। शेष रहा दो प्रतिशत जल बर्फ के रूप में जमा है। आज समय है कि हम पानी की कीमत समझें। यदि जल व्यर्थ बहेगा तो आगे वाले समय में पानी की कमी एक महा संकट बन जाएगा। अब प्रश्न यह है कि क्या अब तक नगरों, महानगरों, गाँवों, ढाणियों में पेयजल का उचित व्यवस्था हो चुकी है? यदि नहीं तो आजादी के इतने वर्षों के बाद भी हम यह व्यवस्था क्यों नहीं कर पाए? गाँव की सरकार पंचायत, नगरों की नगरपालिका, राज्यों एवं केन्द्र की सरकारों ने इस प्राथमिक मसले को अब तक हल क्यों नहीं किया है?

बढ़ता जल संकट


आज लोगों को एक-एक घड़े शुद्ध पेयजल के लिये मीलों भटकना पड़ रहा है। जल के टैंकर और ट्रेन से जल प्राप्त करने के लिये घंटों कतार में खड़ा रहना पड़ता है। रोजमर्रा के कामकाज नहाने, कपड़े धोने, खाना बनाने, बर्तन साफ करने, उद्योग धंधा चलाने के लिये तो जल चाहिए वह कहाँ से लाए जबकि नदी, तालाब, ट्यूबवैल, हैण्डपम्प एवं कुएँ बावड़ियाँ सूख गए हैं। पशु-पक्षियों को भी पानी के लिये मीलों भटकना पड़ता है। पेड़-पौधे भी सूखते जा रहे हैं। जल की कमी से अनेक कारखाने बंद होने से लोग बेरोजगार होते जा रहे हैं। खेती-बाड़ी के लिये तो और भी अधिक पानी की जरूरत है परन्तु पानी नहीं मिलने से खेती-बाड़ी चौपट होती जा रही है। जल संकट हमारे पूरे दैनिक जीवन को बुरी तरह से प्रभावित करता है। इसलिये इस मसले पर प्राथमिकता से ध्यान दिए जाने की जरूरत है।

जल संकट के लिये जिम्मेदार कौन?


जल संकट तो हमारी भूलों और लापरवाहियों से ही उपजा है। हम अनावश्यक रूप से तथा अधिक मात्रा में जल का दोहन कर रहे हैं। दैनिक उपयोग में आवश्यकता से अधिक मात्रा में जल का अपव्यय करने की आदत ने जल संकट बढ़ा दिया है। बढ़ती जनसंख्या के कारण भी जल का उपभोग बढ़ता जा रहा है। खेती एवं उद्योगों में अधिक उत्पाद लेने की खातिर जल का उपभोग बढ़ा दिया है। जल स्रोतों से जल के उपभोक्ता तक पहुँच से पहले ही पाँचवा हिस्सा गटर में चला जाता है। वृक्षों की अंधाधुंध कटाई व वनों के लगातार घटने से वर्षा होने की अवधि व साथ ही वर्षा की मात्रा में भी कमी आ रही है। कुओं, नलकूपों, तालाबों से अन्धाधुन्ध जल दोहन के कारण भूजल में कमी आ गई है। धरती में जल स्तर निरन्तर नीचे जा रहा है। कल-कारखानों से निकले दूषित जल व शहरी क्षेत्रों के गटर एवं कूड़े-कचरे ने जलस्रोतों को प्रदूषित कर दिया है जिससे पीने के पानी का संकट खड़ा हो गया है। यह सब कुछ अनियन्त्रित मानवीय गतिविधियों के कारण ही हुआ है। इसका निराकरण भी मानव ही कर सकता है।

जन भागीदारी से जल संरक्षण


हमारे देश के पुरखों से हमें अनेक प्रकार के जलस्रोत विरासत में मिले हैं। यदि हमने इस विरासत को संभाल कर नहीं रखा तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें माफ नहीं करेंगी। हमारे देश के गाँव-गाँव में परम्परागत कुएँ, बावड़ी व तालाब बने हुए हैं। पिछले वर्षों में लम्बे समय से हम इनकी अनदेखी करते आ रहे हैं। इन्हें या तो तोड़फोड़ दिया गया है या प्राकृतिक रूप से नष्ट हो गए हैं। आगे से इन जलस्रोतों की चिन्ता सभी मिलाकर करेंगे तभी जल संकट से निजात मिल सकेगी। हमने अपने ही स्वार्थ में इन्हेें उजाड़कर कंकरीट का जंगल बिछा दिया है। जनता ने जल पूर्ति की जिम्मेदारी अपने कंधों से उतारकर सरकार के कंधों पर रख दी है। जबकि सरकारें योजनाएँ बनाने तक सीमित हो जाती हैं क्योंकि इन्हें कारगर ढंग से लागू करने में लोगों के स्वार्थ आड़े आते हैं।

गाँव-गाँव और शहर-शहर में बने हुए जलस्रोतों का पुनरुद्धार किया जाना आवश्यक है। मोहल्ले, गाँव, शहर जहाँ भी ऐसे स्रोत हैं वहाँ के लोग मिलकर इन जलस्रोतों की जिम्मेदारियाँ अपने ऊपर लें। मिलकर इनमें जमा कूड़े-कचरे, मिट्टी, कंकड़, झाड़-झंखर को हटाएँ। जलस्रोतों के जल मार्ग में आने वाले अवरोध व नाजायज कब्जे हटाएँ। जलस्रोतों के रखरखाव में अपनी व दूसरे लोगों की भागीदारी सुनिश्चित किए जाने की आवश्यकता है। अब तक जो भूलें हमने की है उनका समाधान भी हमें मिलजुल कर ही करना है। हम एक-एक मिलकर अनेक बन सकते हैं। जब इतने हाथ श्रमदान करेंगे तो जलस्रोत अवश्य साफ रहेंगे। उन्हें गंदा करने से भी बचाएँगे। इस कथन पर काम करना है साथी हाथ बटाना, एक अकेला थक जाएगा तो मिलकर बोझ उठाना।

स्थानीय निकायों का दायित्व


गाँवों में पंचायतें, शहरों में नगरपालिका एवं नगरों में नगर एवं महानगर निगम बने हुए हैं। उनको स्थानीय सरकार का अपना दायित्व समझना चाहिए। सभी लोगों को जल शुद्ध एवं पर्याप्त मात्रा में मिले इसका प्रबन्ध उन्हें करना है। इस मद में सभी सरकारी विभाग एवं स्थानीय स्वशासन की इकाइयाँ करोड़ों रुपयों का खर्चा प्रतिवर्ष दिखाती हैं तो जनता को उसका परिणाम देखने परखने का हक है। ये संस्थाएँ लोगों की भागीदारी से जल भण्डारण के लिये उपयुक्त व्यवस्था जैसे- कुएँ, तालाब, एनीकट, बाँध का निर्माण कराएँ एवं उनके रख-रखाव का ध्यान रखे। नदियों में गंदे नालों का पानी न जाने दें उन्हें शुद्ध रखने के सभी उपचार करें। उन्हें गंदा होने से बचाएँ, व्यर्थ में पानी खराब होने एवं अपव्यय करने के कारकों को दूर करें। पेड़ लगाने और उनकी सुरक्षा करने से हरियाली बढ़ेगी जिससे भूमि में पानी को रोकने में मदद मिलेगी। जल प्रकृति की देन है हमें इसका संग्रहण भी करना है, संयोजन भी करना है। इस पर हर व्यक्ति का बराबर का अधिकार है। चाहे वह किसी जाति, धर्म, सम्प्रदाय, क्षेत्र या पार्टी का हो।

लेखक परिचय


प्रतापमल देवपुरापूर्व प्रधानाचार्य, रा.रा.शै.अ.प्र. संस्थान, उदयपुर

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