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खतरे में पड़ी जैवविविधता

Author: 
रविन्द्र गिन्नौरे
Source: 
सर्वोदय प्रेस सर्विस, मार्च 2018

जैवविविधता की दृष्टि से भारत विश्व के समृद्धतम राष्ट्रों में प्रमुख है। भारत की विशिष्ट भौगोलिक स्थिति होने के कारण पशु-पक्षियों एवं पेड़-पौधों को जितनी अधिक प्रजातियों पाई जाती हैं, उतनी विश्व के गिने-चुने राष्ट्रों में ही मिलती हैं। पृथ्वी पर उपलब्ध चार जैव भौगोलिक परिमंडलों में तीन पराध्रुव तटीय, अफ्रीकी, तथा इण्डोमलयान के प्रतिनिधि क्षेत्र भारत में पाये जाते हैं। घटते संसाधन और बढ़ते हुए खतरे से आज पूरा विश्व अवगत हो चुका है। परन्तु प्रकृति को, उसकी जैवविविधता को संजोने का प्रयास आज भी शैशवावस्था में है।

परम्परागत ज्ञान, हमारी सांस्कृतिक धरोहर से सरोकार रखने वाली प्राकृतिक सम्पदा उपभोक्ता संस्कृति के बाजार में मूल्यवान हो गई हैं। जैवविविधता की दृष्टि से सम्पन्न भारत के उन क्षेत्र में घुसपैठ हो चुकी है, जहाँ दुर्लभ जड़ी-बूटियाँ और मूल्यवान जीवाश्म मौजूद है। भौगोलिक विभिन्नताओं से परिपूर्ण हर इलाकोें में पेड़-पौधों के साथ वन्य पशु-पक्षियों का बसेरा अब छिनता जा रहा है। प्रकृति चक्र के साथ जिन वनवासियों का जीव निहित है, अब वही बाजारवाद के कुचक्र में फँस कर अवैध तस्करी के लिये सामान उपलब्ध करा रहे हैं। अपनी अनमोल विरासत से वनवासी अनभिज्ञ हैं, लेकिन जैवविविधता की कीमत जो समझते हैं, उसी समुदाय के कुछ लोग बेचने में लगे हैं। घटते संसाधन और बढ़ते हुए खतरे से आज पूरा विश्व अवगत हो चुका है। परन्तु प्रकृति को, उसकी जैवविविधता को संजोने का प्रयास आज भी शैशवावस्था में है।

पृथ्वी के समृद्ध जीवन का मनोहारी स्वरूप को मानव जितना देख सका है, आँकड़ों की सत्यता में उतना अभी तक परखा नहीं गया है। असंख्य ताने-बाने में बुना है प्रकृति का स्वरूप। वैज्ञानिकों को पृथ्वी पर 16 लाख जीव-जन्तुओं की प्रजातियों की जानकारी है, जिसकी संख्या तो दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। मगर इसके ठीक विपरीत हजारों प्रजातियाँ विलुप्त होती जा रही हैं। पशु-पक्षी किसी जन्तु की प्रजाति विलुप्त होने के बाद उसकी अहमियत का पता हमें चलता है।

पृथ्वी के आनुवांशिक संसाधन साझा विरासत है, जिन्हें सम्पूर्ण मानव जाति के द्वारा उपयोग में लाया जाना चाहिए। जैव प्रौद्योगिकी उत्पादों के महत्त्वपूर्ण इन स्रोतों से भारी-भरकम व्यापारिक लाभ हैं। विकासशील राष्ट्र जैवविविधता से सम्पन्न राष्ट्रों से लेने के लिये अपना दबाव बना रहे हैं। जबकि जैविक संसाधन उस राष्ट्र की सम्पत्ति है, जहाँ यह आनुवांशिक संसाधन मूल रूप से पाये जाते हैं।

जैवविविधता के संरक्षण का प्रश्न तभी से उठ खड़ा हुआ, जब इसके अनुचित दोहन के विरोधी स्वर उठे। जैवविविधता के संरक्षण का अर्थ, ‘किसी भी राष्ट्र की भौगोलिक सीमाओं में पाये जाने वाले पशु-पक्षियों एवं पेड़-पौधों की जातियों को विलुप्त होने से बचाना।’ इन जातियों के लगभग पाँच प्रतिशत को ही मानव खेतों व बागों में बोता है, उगाता और पालता है, शेष 95 प्रतिशत जातियों प्राकृतिक रूप से वन क्षेत्रों, नदी-नालों एवं समुद्री तटों में उगती एवं पलती हैं।

संयुक्त राष्ट्र संघ के आह्वान पर ब्राजील के रियो-डि-जेनेरा ‘पृथ्वी शिखर सम्मेलन’ में उपस्थित राष्ट्रों ने सामूहिक रूप से निर्णय लिया, वह था धरती की जैवविविधता के संरक्षण का निर्णय। जून 1992 में यह निर्णय लिया गया, जो 29 दिसम्बर 1993 में लागू हो गया। भारत ने भी इस समझौते को स्वीकृति दे दी है।

जैवविविधता की दृष्टि से भारत विश्व के समृद्धतम राष्ट्रों में प्रमुख है। भारत की विशिष्ट भौगोलिक स्थिति होने के कारण पशु-पक्षियों एवं पेड़-पौधों की जितनी अधिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं, उतनी विश्व के गिने-चुने राष्ट्रों में ही मिलती हैं। पृथ्वी पर उपलब्ध चार जैव भौगोलिक परिमंडलों में तीन पराध्रुव तटीय, अफ्रीकी, तथा इण्डोमलयान के प्रतिनिधि क्षेत्र भारत में पाये जाते हैं। विश्व के किसी भी देश में दो अधिक परिमण्डलों के क्षेत्र नहीं मिलते। यह कारण है कि यूरोप और उत्तरी अमेरिका की भाँति भारत में हिरणों की आठ प्रजातियाँ पाई जाती हैं। दुर्लभ विश्व का सबसे छोटा चूहा हिरण (माउस डियर) भारत में ही पाया जाता है। अफ्रीकी महाद्वीप में हिरणों की एक भी जाति नहीं पाई जाती। वहीं सम्पूर्ण यूरोप एवं उत्तरी अमरीकी महाद्वीप में बब्बर शेर एवं एंटीलोप की जातियाँ नहीं पाई जातीं। मानव जाति के निकटस्थ चार प्राकृतिक सम्बन्धियों में गुरिल्ला, चिम्पैंजी, ओरंग उटान और गिब्बन में अन्तिम जाति गिब्बन भारत के अरुणाचल प्रदेश के वनों में पाई जाती है। यह सभी जीव विषुवत रेखा के सदाबहार वनों के हैं। जलवायु की विविधता के साथ-साथ धरातल की विविधता, लम्बा सागरतट एवं अनेक समुद्री द्वीप के कारण भारत में पशु-पक्षियों एवं वनस्पतियों की विभिन्न जातियों का उत्क्रमण भारत में सम्भव हो सका।

भारत में अभी तक पशु-पक्षियों की 65 हजार जातियों (मछलियाँ 2 हजार, रेंगने वाले जीव 420, जल स्थल चर जीव 150, पक्षियों की 120, स्तनपायी पशुओं की 240 तथा शेष पतंगों की जातियों) एवं पुष्पधारी वनस्पतियों की 13 हजार जातियाँ पहचानी जा चुकी हैं। जैवविविधता की दृष्टि से सम्पन्न भारत में तीव्रतर औद्योगिक विकास, कुप्रबन्ध से इनके अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया है। पुश-पक्षियों की अनेक प्रजातियाँ तेजी से विलुप्त हो रही हैं।

लगभग 1186 पक्षियों की प्रजातियाँ सम्पूर्ण विश्व में अब समाप्ति की ओर अग्रसर हैं। यह विचार मुम्बई नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी ने व्यक्त किये हैं। एम.एन.एच.एस. के अनुसार इनमें से 78 पक्षियों की प्रजातियाँ केवल भारत में विलुप्ति के कगार पर हैं। उपरोक्त संख्या में 182 प्रजातियाँ आने वाले दस वर्षों के भीतर खत्म हो जाएँगी।

भारत में औषधीय पौधों की लगभग 9500 प्रजातियाँ हैं जिनमें से 7500 औषधीय पौधों की प्रजातियों का उपयोग दवाओं के रूप में किया जाता है। एथनो मेडिसीन के इतिहास में मुंड जनजातियों द्वारा इनके इस्तेमाल का प्रमाण मिलता है। 3900 औषधीय पौधों का सम्बन्ध वनवासियों की खाद्य सम्बन्धी जरूरतों से है। 250 पौधों के बारे में तो इतना तक कहा जाता है। कि भोजन के विकल्प के रूप में भविष्य में ये ही मनुष्य की जरूरतों को पूरा करेंगे।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक अमरीका में 33 फीसदी और एशिया में 65 फीसदी लोग आयुर्वेद चिकित्सा पर विश्वास करते हैं। मारीशस, नेपाल और श्रीलंका में तो इस चिकित्सा प्रणाली को सरकारी मान्यता प्राप्त है। भारत, चीन, थाईलैंड, मलेशिया, दक्षिण अफ्रीका, नाइजीरिया और इंडोनेशिया में तो प्राचीनकाल से ही जड़ी-बूटियों से इलाज की परम्परा रही है। किन्तु आज अमरीका, जर्मनी जैसे विकसित देशों में इसकी बढ़ती लोकप्रियता ने एक बहुत बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। इन वनौषधियों को लूटा जा रहा है। भारी पैमाने पर इनकी तस्करी हो रही है। परिणामस्वरूप हमारे वनवासी प्रकृति की इस अमूल्य धरोहर से वंचित होेेते जा रहे हैं।

अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, बेल्जियम, ब्राजील, अमरीका, इंग्लैंड, कनाडा, चीन, फ्रांस, रूस, इजराइल, इटली, थाईलैंड, जापान, स्विटजरलैंड, जॉर्डन, कीनिया, कोरिया, लेबनान, मोरक्को, वेनेजुएला आदि ऐसे देश हैं जहाँ काफी बड़ी कीमत देकर इन वनौषधियों को खरीदा जा रहा है। मिलने वाली बड़ी कीमत ने ही इनकी तस्करी को बढ़ाया है। दो वर्ष पूर्ण हुए एक अध्ययन के मुताबिक हर वर्ष 80 हजार टन वनस्पति, जिसमें दुर्लभ जड़ी-बूटियाँ भी शामिल हैं, वैध और अवैध तरीके से भारत से बाहर ले जाई गई हैं।

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम द्वारा आँके गए एक अनुमान के अनुसार प्रतिवर्ष 5.4 बिलियन मूल्य के जैव संसाधन तीसरी दुनिया के देशों से चुराए जाते हैं। इसका 60 प्रतिशत भाग सिर्फ अमेरीका हड़पता है, जिसका मूल्य लगभग 3.25 बिलियन डॉलर मूल्य के बराबर वनस्पतियों में से एक बिलियन डॉलर मूल्य की जैव सम्पदा भारत से अमेरीकियों द्वारा चुराई जाती है। जर्मन की दवा कम्पनी होकिस्ट पिछले कुछ वर्षों से अपने भारतीय उपक्रम हाकिस्ट इण्डिया के नाम पर केरल के वनों से लेकर हिमालय के पर्वतों तक समूचे भारत के पौधों, पादपों और मिट्टी के नमूने इकट्ठा कर रही है। दो वर्ष पूर्ण तक यह कम्पनी लगभग 90 हजार नमूनों की जाँच कर चुकी थी। विदेशी बाजार में इन जड़ी-बूटियों की बढ़ती माँग और अधिक मूल्य ने हमारे अपने ही देश में इन कम्पनियों के एजेंट व गुर्गे पैदा कर दिये हैं, जो वनवासियों से पाँच-दस रुपए में वनौषधियों को खरीदकर बड़ी रकम बना रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों से छत्तीसगढ़ क्षेत्र से बड़े पैमाने पर जड़ी-बूटियाँ खरीदने वाले दलाल पैदा हो गए हैं, जो अंधाधुंध इन जड़ी-बूटियों को बाहर भेज रहे हैं।

मानव जिन्दगी के लिये जिस तरह जमीन, हवा, पानी जरूरी है, उसी तरह वनस्पति और प्राणी भी जरूरी है। प्रकृति का सम्पूर्ण तंत्र एक विशालकाय मशीन जैसा है, जिसमें कीड़े-मकोड़े, केंचुआ, पक्षी, जंगली जानवर से लेकर पौधे और विशालकाय वृक्ष तक शामिल हैं। सभी प्रकृति रूपी मशीन के कलपुर्जे हैं। यही जलीय ग्रह पर जीवन की प्राकृतिक क्रिया का निर्धारण करते हैं। किन्हीं कारणों से पौधे या प्राणी को क्षति पहुँचाती है तो इसका दुष्परिणाम प्रकृति के सारे क्रियाकलाप में अनुभव किया जाता है, जिसकी हमें अभी तक ठीक-ठीक जानकारी नहीं है।

जीवन निर्वाह के लिये धन-दौलत से अधिक हवा, पानी ज्यादा जरूरी है। शुद्ध हवा, पानी व प्राकृतिक सन्तुलन तभी बना रह सकता है, जब हम सही मायने में वसुंधरा को माता समझें और वैसा ही व्यवहार करें। धरती की गोद में मानव तभी सुखी रह सकता है, जब वह दोहन करने की नीति छोड़कर प्रकृति के अनुकूल चले। भविष्य में इसी लीक पर मानव चलने को मजबूर होगा, लेकिन तब तक प्रकृति के उग्रतम रूप देख चुका होगा।

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