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खेती को प्राथमिकता में लाएँ तो

Author: 
अवधेश कुमार
Source: 
राष्ट्रीय सहारा, 02 दिसम्बर, 2017

. इस बात से इनकार करना कठिन है कि खेती और किसान, दोनों संकट में हैं। भारत जैसे देश की रचना ऐसी है कि जब तक खेती संकट से नहीं उबरेगा, किसान खुशहाल नहीं होंगे, यह वास्तविक प्रगति नहीं कर सकता। विडम्बना देखिए, ज्यादातर नेता एवं नौकरशाह इस बात को समझते हैं, लेकिन खेती और किसान को अर्थनीति में जितना महत्त्व मिलना चाहिए, नहीं दे पाते। हर सरकार, हर पार्टी स्वयं को किसानों का हितैषी बताती है, उसकी बात भी करती है, पर धरातल पर जितना होते दिखना चाहिए, उतना दिखता नहीं। इस संदर्भ में मानना भी गलत है कि केवल 1991 के बाद उदारीकरण की ओर कदम बढ़ाने के समय से खेती और किसान संकट में आए हैं। अगर हम इसे स्वीकार करते हैं, तो मानना होगा कि 1991 के पूर्व खेती पर कोई संकट नहीं था, किसान बिल्कुल खुशहाल थे, खेती को समाज में अन्य पेशों के समतुल्य सम्मान प्राप्त था..। यह सच नहीं है।

अगर आजादी के बाद खेती को केंद्र और राज्य सरकारों की आर्थिक नीतियों में प्राथमिकता मिली होती तो 1990 का अर्थ संकट आता ही नहीं और उसके बाद भारत को उदारीकरण के नाम पर बाजार-आधारित पूँजीवाद की ओर अग्रसर होने को विवश नहीं होना पड़ता। 1991 से भारतीय अर्थ नीति में आमूल बदलाव की शुरुआत विवशता में हुई। नरसिंह राव और मनमोहन सिंह की जोड़ी को ऐसा लगा कि इसके बगैर भारत की अर्थव्यवस्था को संकट से उबारा जा ही नहीं सकता। वास्तव में बाजार पूँजीवाद की नीतियों ने खेती पर पहले से घनीभूत संकटों को ही बढ़ाया और इसके समाधान को जटिल बना दिया है किंतु हम पूर्व की अर्थ नीति को खेती और किसानों के पक्ष का नहीं मान सकते।

आमूल परिवर्तन की जरूरत


खेती को अन्य पेशों की तरह एक पेशा मानना ही भयानक भूल है। पश्चिमी देशों के लिये यह सच हो सकता है, क्योंकि औद्योगिक क्रांति के साथ उन्होंने अपने आर्थिक चरित्र को पूरी तरह बदल दिया। भारत के संदर्भ में यह सच नहीं हो सकता। खेती और उसके साथ पूरी तरह संबद्ध पशुपालन हमारे यहाँ पूरी जीवन प्रणाली का अंग था। आप गहराई से देखेंगे तो भारत के सारे पर्व-त्योहार, रीति-रिवाज, संस्कार की पद्धतियाँ और कर्मकांड आदि सभी खेती से जुड़े हुए हैं। खेती भारत के आत्मनिर्भर होने का मूल आधार थी। अंग्रेजों ने भारत की अर्थव्यवस्था को नष्ट करने के लिये भूमि व्यवस्था को बदल कर जमींदारी प्रथा आरंभ की। खेती का वाणिज्यिकरण किया। इससे वास्तविक किसान कंगाल होते गए, खेती से गाँवों का जीवन संचालन कठिन हो गया। अकाल और भुखमरी भारतीय जीवन की स्थायी त्रासदी बन गई। देश की आत्मनिर्भरता नष्ट कर दी गई। अंग्रेजों ने खेती को अपने आर्थिक शोषण की नीतियों से इतना विकृत कर दिया कि भारत वाकई इस मायने में भारत रहा ही नहीं। भारत की पहचान उन्नत खेती तथा खेती से जुड़े उद्योगों, कलाओं, उत्पादनों और कारोबारों से थी। आजादी के बाद फिर से उसे अपने मूल स्वरूप में लाने की कोशिश होनी चाहिए थी। अंग्रेजों की विनाशकारी नीतियों के बावजूद खेती का मूल चरित्र अनेक स्थानों पर बचा हुआ था, जिसे विकसित करने की कोशिश जरूरी थी।

हम नहीं कहते कि आजादी के बाद खेती को पटरी पर लाने के प्रयास नहीं हुए या नीतियाँ नहीं बनाई गई। किंतु इसके लिये भूमि व्यवस्था एवं अर्थव्यवस्था में आमूल परिवर्तन की आवश्यकता थी। सरकारें वैसा साहस नहीं जुटा सकीं क्योंकि उसमें जोखिम लग रहा था। इन सबमें यहाँ विस्तार से जाना संभव नहीं। इतना बताना पर्याप्त है कि भारत को आजादी मिल गई, लेकिन खेती आजाद नहीं हुई। दुनिया के संपन्न देशों का एक आकर्षण था। सोच बनी कि जितने उद्योग लगेंगे, तकनीकी रूप से हम जितने उन्नत होंगे, उतना ही हमारा विकास होगा। इसलिये खेती प्रधान देश होते हुए भी प्राथमिकता उद्योग एवं उससे जुड़े तकनीकी विकास एवं कारोबार हो गए। इससे हम परनिर्भर भी हो गए। इसमें खेती को और संकट में आना ही था। किसानों को और संकटग्रस्त होना ही था। खेती मजबूरी का काम हो गया। यह कोई आज की स्थिति नहीं है। किसान समाज में सम्मान के पात्र नहीं रहे। यह स्थिति लंबे समय से जारी है।

कुछ करिये कि खेती लाभकारी बने


किसी कार्यालय में काम करने वाला चपरासी भी अपने को किसान से बेहतर और सम्मानित मानता है। यह स्थिति उदारीकरण के काफी पहले बन चुकी थी। हालाँकि आज की माप में जब खेती का योगदान कुल अर्थव्यवस्था में 14 प्रतिशत के आस-पास माना जाता है। तब भी इससे करीब 60 प्रतिशत लोगों को रोजगार मिलता है। यह कितना बड़ा असंतुलन है, और हमारी अर्थव्यवस्था किस प्रकार के कमजोर आधारों पर विकसित हो रही है, इसे समझने के लिये यह सच पर्याप्त है।

सवाल है कि ऐसा क्या किया जाए कि जिससे भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ खेती सशक्त हो, किसान सशक्त हों? आज किसानों के लिये संघर्ष करने वाले जो मांगें सरकारों के सामने रखते हैं, उनमें किसानों के पैदावार का उचित मूल्य मिलना, उनको कम ब्याज पर समय पर कर्ज मुहैया कराना तथा फसल नष्ट होने पर इंश्योरेंस या अन्य स्रोतों से समुचित मुआवजा दिया जाना प्रमुख है। इसके साथ सिंचाई की व्यवस्था, समय पर उचित मूल्य पर उर्वरक की उपलब्धता आदि मांगें भी रखी जा रही हैं। इससे तो कोई असहमत नहीं हो सकता कि किसान जो भी पैदा करते हैं, उनको उचित मूल्य मिलना ही चाहिए ताकि अन्य कारोबारों की तरह लागत के साथ पर्याप्त मुनाफा मिले जिससे वे अपने परिवार का खर्च वहन कर सकें तथा खेती उनके लिये लाभकारी कार्य बने।

आज चूँकि खेती की लागत बढ़ गई है, इसलिये उनको समय पर बिना ब्याज या कम ब्याज और आसान शर्तों पर कर्ज मिल जाए। उनकी फसल नष्ट होती है, तो उनको उसका मुआवजा मिलना ही चाहिए। सिंचाई और उर्वरक तो चाहिए ही। किंतु इतने से खेती और किसानों का संकट दूर नहीं हो सकता। यह तो वर्तमान ढाँचे के अंदर ही किसानी का संकट दूर करने की सोच है। आवश्यकता खेती को वर्तमान ढाँचे से निकालने की है।

जरा विचारें


सबसे पहले तो कुछ समय ठहर कर इस पर विचार करना चाहिए कि हम किस दिशा में देश को ले जाना चाहते हैं। उद्योग एवं उससे जुड़े आधुनिक कारोबारों को हर संभव प्रोत्साहन देते हुए खेती का संकट दूर नहीं हो सकता। जरूरत प्राथमिकता बदलने की है। जितनी लागत, जितने नियम-कानून और जितने व्यापक ढाँचे उद्योगों एवं उनसे जुड़े कारोबारों के लिये अपरिहार्य हैं, उनसे खेती में लागत, नियम-कानून और ढाँचों की तुलना करिए। निष्कर्ष आपके सामने होगा। खेती के लिये न इतनी ज्यादा पूँजी और तकनीक की आवश्यकता है, न नियम-कानूनों और उनका पालन कराने वाली एजेंसियों की और न ही उतने विशालकाय ढाँचों की।

उद्योग और कारोबार संकट में आ गए तो एक साथ लाखों करोड़ डूबते हैं, या उन्हें फिर से खड़ा करने के लिये लगाने पड़ते हैं। खेती के साथ ऐसा नहीं। खेती डूब भी जाए तो कम संसाधन में उसे फिर रास्ते पर लाया जा सकता है। कहने का तात्पर्य यह कि देश खेती को प्राथमिकता बनाएं तथा उद्योग एवं कारोबारों को उसका सहयोगी। इस दिशा में सोच आते ही चमत्कार होने लगेगा। खेती स्वावलंबी काम था। आज वही परावलंबी बन गया है। आप बीज के लिये, उर्वरक के लिये, जुताई के लिये, बुआई के लिये फसल की कटाई के लिये तथा बिक्री के लिये..यानी सब कुछ के लिये दूसरों पर निर्भर हो गए हैं। इससे खेती की लागत इतनी बढ़ गई है कि छोटे किसानों के लिये खेती करना लगभग असंभव हो गया है।

खेती को बनाना होगा स्वावलंबी


तो साफ है कि खेती को फिर से हर हाल में स्वावलंबी बनाना होगा। भारत को सशक्त बनाना है, तो पूरे देश का ढाँचा खेती से शुरू होना चाहिए। पशुपालन खेती का मुख्य आधार एवं किसानों की आय का सबसे बड़ा जरिया रहा है। पशुओं से खेती करते समय हम जुताई, बुआई, ढुलाई और कम्पोस्ट के लिये किसी दूसरे पर निर्भर नहीं थे। तो इसे फिर से अपनाना होगा। शिक्षा व्यवस्था का ढाँचा भी इससे जुड़ेगा। किसानों को सम्मान मिलेगा। खेती प्रतिष्ठा का काम बन जाएगा। लाभकारी भी होगा। खेती से जुड़ी गतिविधियों, उद्योगों तथा कारोबारों को प्राथमिकता देकर आगे लाना होगा। इससे कम लागत में करोड़ों लोगों को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिल सकेगा।

गाँवों से शहरों की ओर पलायन लगभग समाप्त हो जाएगा जो इस समय सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक चुनौतियों का कारण बना हुआ है। इससे ही भारत असली भारत बनेगा। खेती से जुड़ने से ही अपने-आप संस्कार बदल जाते हैं। परिश्रम, प्रकृति से, पशु-पक्षियों से लगाव, जलाशयों से लगाव और सबसे बढ़कर अपनी माटी से लगाव इसमें स्वयमेव पैदा होता है। फिर पर्यावरण संरक्षण के लिये अरबों-खरबों खर्च और प्रचार की आवश्यकता ही नहीं होगी। यह बिना परिश्रम अपने आप होगा। भोगवाद के दुष्चक्र में व्यक्ति फंसेगा नहीं जो इस समय समूची दुनिया के अर्थ संकट का बड़ा कारण है। यह सब तभी होगा जब हम समझें कि खेती में ही हमारी समस्याओं का समाधान है, और यह समझते हुए इसे प्राथमिकता में लाएँ।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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