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किसान पहचानें अपनी शक्ति

Author: 
मनीष शेखर
Source: 
राष्ट्रीय सहारा, 02 दिसम्बर, 2017

खेती एवं कृषि कार्य के समक्ष गंभीर चुनौतियाँ हैं। विकास की अंधी दौड़ में हम कृषि से विमुख होकर शहरों की ओर रोजगार के अवसर तलाश रहे हैं। मान बैठे हैं कि कृषि कार्य से सम्मानजनक आय संभव नहीं है। इसका कारण है कि जहाँ सभी क्षेत्रों ने विकास के लिये समय के साथ अपने भीतर बदलाव किए हैं, वहीं कृषि में हम परंपरागत तरीकों से ही अच्छी आमदनी की अपेक्षा रखते हैं, जिससे हमें निराशा होती है

‘उत्तम खेती मध्यम वाण, नीच चाकरी भीख निदान’- भारत के लोगों के लिये यह पुरानी कहावत थी, जिसमें कृषि कार्य को सबसे उत्तम कार्य तथा वाणिज्य अर्थात व्यवसाय को मध्यम श्रेणी में तथा नौकरी को सबसे निम्न श्रेणी में रखा गया था। कृषि एक व्यवसाय ही नहीं, बल्कि भारत की जीवन शैली है। कृषि हमारे आर्थिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम रहा है। भारत के लोग कृषि कार्य को एक उत्सव के रूप में मनाते आ रहे हैं। साथ ही, प्रकृति एवं पर्यावरण की रक्षा के दायित्व का निर्वहन, जिसमें वृक्ष, नदी, पहाड़, पशुधन, जीव-जन्तु की रक्षा की जिम्मेदारी निभाना, जीवन के महत्त्वपूर्ण आध्यात्मिक कार्य का हिस्सा रहा है। कह सकते हैं कि कृषि हमारे आर्थिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक उन्नति का स्रोत रही है।

वर्तमान में खेती एवं कृषि कार्य के समक्ष गंभीर चुनौतियाँ हैं। विकास की अंधी दौड़ में हम कृषि से विमुख होकर शहरों की ओर रोजगार के अवसर तलाश रहे हैं। मान बैठे हैं कि कृषि कार्य से सम्मानजनक आय संभव नहीं है। इसका कारण है कि जहाँ सभी क्षेत्रों ने विकास के लिये समय के साथ अपने भीतर बदलाव किए हैं, वहीं कृषि में हम परंपरागत तरीकों से ही अच्छी आमदनी की अपेक्षा रखते हैं, जिससे हमें निराशा होती है। कृषि कार्य की चुनौतियों को सरकार के साथ-साथ किसान, राजनीतिक कार्यकर्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी स्वीकार कर योजनाबद्ध तरीकों से कार्य करने पर सफलता निश्चित रूप से मिलनी तय है।

सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य पर किसान अपना उत्पाद सरकार को दे सकें, इसके लिये सिर्फ सरकार की ही जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि राजनीतिक कार्यकर्ताओं को भी यह सुनिश्चित कराने में अपनी भूमिका तय करनी होगी कि किसानों को इसका लाभ सही तरीकों से मिल रहा है। प्राय: देखा जाता है कि अनाज क्रय केंद्र पर दलालों के मिलीभगत से अनाज व्यवसायी ही किसानों से सस्ते दर पर खरीद कर क्रय केंद्र पर अपना अनाज बेचने में सफल हो जाते हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य पर नगण्य किसान अपना अनाज बेचने में सफल हो पाता है। राजनीतिक कार्यकर्ताओं के माध्यम से किसानों को बहुत बड़ी मदद की जा सकती है। जिस प्रकार वोट दिलाने के लिये नेताओं एवं मतदाता के बीच की कड़ी बनते हैं, उसी प्रकार किसानों को सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य दिलाने के लिये किसान एवं क्रय केंद्र के बीच एक मजबूत कड़ी बनना होगा। राजनीतिक कार्यकर्ताओं की सक्रियता से दलाल भाग खड़े होंगे तथा सरकारी क्रय केंद्र के कर्मचारी या अधिकारी कोई अनियमितता करने की हिम्मत नहीं कर पाएँगे।

अनाज खरीद की पद्धति दोषपूर्ण


अनाज खरीद की पद्धति दोषपूर्ण है, जिसमें बदलाव भी अपेक्षित है। सरकार द्वारा अनाजों की खरीद के बाद उसके भंडारण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है, जिससे काफी मात्रा में अनाज बर्बाद हो जाते हैं। सरकारी भंडारण एवं किराये पर लिये गए गोदामों के खर्च काफी होने के बाद भी किसानों के पर्याप्त अनाज खरीदना संभव नहीं हो पाता है एवं अनाजों की बर्बादी को रोका नहीं जा पाता। किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य दिलाने का बहुत ही सरल एवं सहज विकल्प हो सकता है कि यदि किसान को ही इसका केंद्र बना दें। किसान वर्षों वर्ष से अपने अनाज का भंडारण करता आ रहा है, इसलिये अनाज का भंडारण किसान के लिये समस्या नहीं है, बल्कि सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम मूल्य प्राप्त करना किसान के लिये चुनौती है। सरकार यदि निर्णय ले कि किसान अपने घर में भंडारण करता है, और उत्पादित अनाज की घोषणा करता है, तो उसे न्यूनतम समर्थन मूल्य उसके बैंक खाते में स्थानांतरित कर दिया जाएगा तथा सरकार द्वारा मांग करने पर भंडारित अनाज किसान को उपलब्ध कराना होगा।

सरकार इस तरह की नीति बनाए तो किसानों को सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य आसानी से मिल जाएगा और सरकार के लिये भंडारण कोई समस्या नहीं होगी। सरकार इसमें दो तरह के विकल्प पर विचार कर सकती है, जिसमें पहला भंडारण करने वाले किसान को सरकार निर्धारित खर्च देगी तथा दूसरा किसान को छूट होगी कि अनाज का दाम बढ़ने पर सरकार को सूचित कर वह बाजार में अपना अनाज बेच सकता है तथा सरकार द्वारा प्राप्त किया गया न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकार को वापस करेगा। इस योजना से किसानों को सीधे लाभ के साथ अनाजों की बर्बादी रोकने में सफलता मिलेगी।

किसान प्रकृति की रक्षा के साथ सभी जाति वर्ग को कृषि से रोजगार देता था, लेकिन समय के साथ अपने में बदलाव नहीं करने के कारण संकटों से जूझ रहा है। सरकार पर निर्भरता के कारण किसानों को अपनी शक्ति का ज्ञान नहीं हो पाता है। सरकार की सीमाएं हैं, उससे अधिक के लिये किसानों को खुद ही अपने आपको तैयार करना होगा। यदि किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अपने उत्पाद आसानी से सरकार को या बाजार में बेच भी दें तो भी उनकी स्थिति में बहुत कुछ बदलाव नहीं हो सकेगा। कृषि कार्य को पुन: लाभकारी बनाने के लिये सरकार के साथ किसानों को अग्रणी भूमिका निभानी होगी।

पुराने औद्योगिक ग्रुप हैं, उन्हें पैसा कमाने के लिये कई विकल्प हैं, वैसी स्थिति में किसानों पर निर्भरता से कोई व्यवसाय शुरू नहीं करना चाहते हैं। खेती-किसानी को बचाने एवं किसानों की स्थिति सुधारने के लिये अब किसानों को ही संकल्प लेने का समय है, और इसके लिये किसानों के सामूहिक प्रयास एक बेहतर विकल्प है। सहकारिता के माध्यम से किसान खेती को लाभकारी ही नहीं, बल्कि रोजगार सृजित कर भारत की अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचाने में भी सफल होंगे।

जिस प्रकार हर व्यक्ति में कुछ विशेष गुण होता है, उसी प्रकार हर देश, प्रदेश का अपना विशेष गुण होता है, और उसी विशेष गुण को ध्यान में रखकर कार्य करने से सफलता मिलती है। भारत गाँवों का देश है, और इसके विकास के रास्ते खेत-खलिहानों से गुजरते हैं। किसान के बच्चे खेती को छोड़ कर रोजगार के लिये शहरों की तरफ अपना रुख कर रहे हैं, जहाँ वे किसी-किसी तरह अपना जीवनयापन कर पा रहे हैं। किसानों को अपनी स्थिति सुधारने तथा खेती-किसानी को संकट से उबारने के लिये किसान परिवार के युवाओं को अपने अंदर सोये हुए शेर की शक्ति को जगाना होगा। सहकारिता के माध्यम से किसानों को कृषि-आधारित उद्योग लगाना होगा। साथ ही, अपने परंपरागत ग्रामीण एवं कुटीर उद्योग को पुनर्जीवित करना होगा।

भूमंडलीकरण के इस युग में जहाँ भारत दुनिया भर के देशों के उत्पादों का बड़ा बाजार बना हुआ है, वहीं जब किसान-मजदूर अपनी शक्ति को पहचान जाएँगे तो किसान अपने कृषि, ग्रामीण एवं कुटीर उद्योग के माध्यम से भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के देशों को अपना उत्पाद पहुँचा सकते हैं।

लेखक कृषि क्षेत्र में वैकल्पिक बाजार के लिये सक्रिय कार्यकर्ता हैं।

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