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कृषक परिवारों के स्वास्थ्य का स्तर

Author: 
करूणेश प्रताप सिंह
Source: 
डॉ. राजबहादुर सिंह भदौरिया रीडर, अर्थशास्त्र विभाग जनता महाविद्यालय अजीतमल जिला-औरैया (उ.प्र.), सत्र - 2000

स्वस्थ्य जीवन के लिये यह आवश्यक है कि व्यक्ति को ऐसा भोजन मिले जिसमें सभी पोषक तत्व उचित मात्रा में उपस्थित हों, ऐसा तभी संभव है जब उसको संतुलित भोजन प्राप्त हो परंतु हर व्यक्ति का संतुलित भोजन सामान्य नहीं हो सकता है। व्यक्ति भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्य संपादित करता है। अत: कार्य की विभिन्नता के आधार पर उसे भोजन की भी आवश्यकता होती है। समझदार व्यक्ति को अपना भोजन इस आयु, जलवायु, ऋतु तथा लिंग के अनुसार भी भोजन में पोषक तत्वों की आवश्यकताओं में अंतर आता है। जैसे गर्भवती स्त्री या स्तनपान कराने वाली स्त्री की भोजन आवश्यकता साधारण स्त्री की तुलना में अधिक कैलोरीयुक्त भोजन चाहिए। संतुलित आहार समस्त प्राणियों की एक प्रमुख आवश्यकता है। अत: संतुलित भोजन में समस्त तत्वों की उचित मात्रा का होना आवश्यक है।

संतुलित आहार की विभिन्नता :-


विभिन्न व्यक्तियों के लिये विभिन्न प्रकार के भोजन तथा विभिन्न प्रकार की मात्रात्मक आवश्यकता होती है जो निम्न बातों पर निर्भर करती है।

1. आयु : बाल्यावस्था में जब शरीर विकसित होता है तब बालक को वसा और प्रोटीन अधिक मात्रा में चाहिए वृद्धवस्था में पाचन शक्ति दुर्बल हो जाती है तब भोजन की कम मात्रा की आवश्यकता होती है।

2. जलवायु : शीत प्रधान देशों में ग्रीष्म प्रधान देशों की अपेक्षा ताप का अधिक उपयोग होता है। अत: शीत प्रधान देशों में अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में भोजन की आवश्यकता होती है।

3. लिंग : पुरुष की अपेक्षा स्त्रियों में कम भोजन की आवश्यकता होती है।

4. परिश्रम : शारीरिक परिश्रम करने वाले व्यक्तियों के शरीर से अधिक ऊर्जा का ह्रास होता है अत: उसकी पूर्ति के लिये अधिक भोजन चाहिए। इनके भोजन में श्वेतसार की मात्रा अधिक होनी चाहिए। मानसिक श्रम करने वालों को भोजन की कम मात्रा चाहिए परंतु उसमें प्रोटीन की मात्रा अधिक होनी चाहिए।

विभिन्न खाद्य पदार्थों में ऐसा कोई भी पदार्थ नहीं है जिसमें भोजन के सभी पोषक तत्व उपस्थित हों अत: विभिन्न खाद्य पदार्थों के पोषक तत्वों का ज्ञान करके आवश्यक पोषक तत्वों से युक्त भोजन ग्रहण करना चाहिए जिससे शरीर की अधिकतम आवश्यकता पूर्ण हो सके। यदि प्रत्येक व्यक्ति को वांछित शक्ति की प्राप्ति नहीं होगी तो उसकी कार्यक्षमता का ह्रास होता है। और वह निरंतर दुर्बल होता जायेगा।

संतुलित आहार की मात्रायें :-


भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (I. C. M. R.) खाद्य एवं कृषि संगठन (F. A. O.) तथा विश्व स्वास्थ्य संगठन (W. H. O.) ने इस समस्या पर काफी कार्य किया है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने भारत वासियों के लिये दैनिक संतुलित आहार प्रस्तावित किया है जिसे अग्र तालिका में प्रस्तुत किया गया है -

 

तालिका क्रमांक 8.1

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद द्वारा प्रस्तावित दैनिक संतुलित आहार

सं.

खाद्य पदार्थ

मात्रा जो ग्रहण की जानी चाहिए

आहार की पौष्टिकता

1.

अनाज

400 ग्राम

1.

ऊर्जा

3000.0

कैलोरी

2.

दालें

85 ग्राम

2.

प्रोटीन

90.0

ग्राम

3.

हरी पत्तेदार सब्जियाँ

114 ग्राम

3.

कार्बोहाइड्रेटस

450.0

ग्राम

4.

अन्य सब्जियाँ

85 ग्राम

4.

वसा

90.0

ग्राम

5.

तेल/वनस्पति घी

57 ग्राम

5.

कैल्शियम

1.4

ग्राम

6.

दूध तथा दूध से बने पदार्थ

284 ग्राम

6.

फास्फोरस

2.0

ग्राम

7.

चीनी/गुण

57 ग्राम

7.

लोहा

47.0

ग्राम

8.

मांस, मछली, अंडे

125 ग्राम

8.

विटामिन ए

8400.0

आ. रा. ई.

9.

फल

85 ग्राम

9.

बी1

2.1

मि. ग्राम

 

 

 

10.

बी2

1.8

मि. ग्राम

 

 

 

11.

निकोटीन अम्ल

22.0

ग्राम

 

 

 

12.

विटामिन सी

280.0

ग्राम

 

 
श्रोत दि न्यूट्रीशन वैल्यू ऑफ इण्डियन फूड एंड दि प्लानिंग ऑफ सेटिस्फेक्ट्री डाइट्स स्पेशल रिपोर्ट संख्या 42 (1966) की तालिका-2 पृष्ठ 28 तथा तालिका 3 में पृष्ठ 32 सारिणी क्रमांक 8.1 में भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद द्वारा भारतीयों के लिये संतुलित आहार की मात्रा दर्शायी गयी है जिसमें भारतीयों को औसत रूप में 3000 कैलोरी ऊर्जा का मानक निर्धारित किया गया जिसमें प्रोटीन 90 ग्राम वसा 90 ग्राम, कार्बोहाइड्रेड, 450 ग्राम कैल्शियम 1.4 ग्राम फास्फोरस 2.0 ग्राम लोहा 47 मिग्रा तथा विटामिनों की संतुलित मात्रा प्रदर्शित की गयी है जिसके लिये प्रति-व्यक्ति 400 ग्राम खाद्यान्न दालें 85 ग्राम सब्जियाँ लगभग 200 ग्राम और चिकनाई 57 ग्राम दूध या दूध से बने पदार्थ चीनी/गुण 57 ग्राम के साथ मात्र 125 ग्राम तथा फल 85 ग्राम की संस्तुति की गयी है खाद्य सामग्री में यद्यपि खाद्यान्नों की मात्रा कम है और अन्य खाद्य पदार्थों के पोषक तत्वों के संतुलन को संस्तुत किया गया है परंतु भारतीय खाद्य पदार्थों में खाद्यान्नों की अधिकता ही अधिक पाई जाती है।

परिश्रम के आधार पर संस्तुत भोजन तालिका ग्रामों में तालिका क्रमांक 8.2 से ज्ञात होता है कि प्रस्तावित संतुलित आहार में यद्यपि खाद्यान्नों की मात्रा कम है परंतु ऊर्जा प्रदान करने वाले पोषक तत्व कैलोरी की मात्रा अधिक है तालिका से यह तथ्य भी स्पष्ट होता है कि खाद्य पदार्थों में हरे पत्तेदार सब्जियों की मात्रा और दूध की मात्रा अधिक होनी चाहिए। क्योंकि इन खाद्य पदार्थों से प्राप्त होने वाले पोषक तत्व उच्च कोटि के शीघ्र ही पचने वाले होते हैं। अत: संतुलित आहार में इन पदार्थों की मात्रा अधिक होनी चाहिए परंतु जनसंख्या वृद्धि के साथ परंपरागत पत्तेदार सब्जियों का उपभोग तथा दूध की मात्रा भी कम होती जा रही है पोषण विज्ञान के विशेषज्ञ श्री सी. गोपालन तथा एमसीबाल सुब्रमण्यम के मत से प्रस्तावित संतुलित आहार सामान्य भारतीय के लिये अधिक व्यय प्रद और उसकी सामर्थ से अधिक है। अत: सामान्य भारतीय प्रस्तावित संतुलित आहार में संस्तुत खाद्य पदार्थों को सेवन करने में असमर्थ है। इसी कारण कुपोषण जनित बीमारियों का शिकार सरलता से होता जा रहा है।

1. अध्ययन क्षेत्र में कृषकों का पोषण स्तर :-


हमारा भोजन हमारे शरीर को ऊर्जा देता है साथ ही हमारे शरीर की टूट-फूट की मरम्मत में भी सहायता करता है। ऊर्जा शरीर के ताप को स्थिर रखने में सहायक होती है। इसलिये भोजन से पेट भर लेना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि भोजन ऐसा होना चाहिए जिसमें भोजन के विभिन्न पोषक तत्व यथेष्ट मात्रा में उपलब्ध हों इन विभिन्न प्रकार के पौष्टिक पदार्थों का ज्ञान जन साधारण को नहीं होता विशेषकर भारत व अध्ययन क्षेत्र में भारतवासियों में स्वास्थ्य का स्तर अत्यधिक निम्न होने का यही प्रमुख कारण है अज्ञानता के कारण अधिकांश लोग दाल रोटी में ही स्वयं को संतुष्ट कर लेते हैं और अज्ञानतावस पोषक आहार पाने में असमर्थ होने के कारण रोग के शिकार हो जाते हैं। साधारणतया ग्रहस्वामिनियों अपने कुटुम्ब की आवश्यकतानुसार पोषक तत्व से मिश्रित आहार व्यवस्था करने का महत्त्व ही नहीं समझती और न ही विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थों का ज्ञान ही उन्हें होता है। ऐसी स्थिति में वह केवल स्वाद के लिये तथा साधारण शारीरिक वृद्धि के लिये भोजन तैयार करती है।

2. श्रोत के आकार के आधार पर पोषक स्तर में विचलन :-


अध्ययन क्षेत्र की सामाजिक आर्थिक स्थितियों के अंतर्गत कृषकों के पोषण स्तर को उनके कार्य तथा व्यवसाय से प्रभावित होता है क्योंकि कृषकों का खान-पान उनकी जाति उनका व्यवसाय उनकी आर्थिक स्थिति एवं उनकी सामाजिक परम्पराओं द्वारा निर्धारित तथा नियंत्रित होता है। प्रस्तुत शोध अध्ययन में यद्यपि कृषकों की स्रोत के आकार के आधार पर 5 वर्ग बनाये गये हैं, परंतु इन पाँचों वर्गों में लगभग सभी जातियों के कृषक सम्मिलित हुए हैं। जैसा कि पूर्व अध्याय सप्तम में कृषकों द्वारा ग्रहण किये जाने वाले विभिन्न खाद्य पदार्थों का विवरण प्रस्तुत किया गया है। जिसमें विभिन्न वर्गों द्वारा ग्रहण किये जाने वाले खाद्य पदार्थों में पर्याप्त भिन्नता देखने को मिलती है जो न केवल मात्रात्मक अंतर को प्रदर्शित करता है बल्कि भोजन के गुणात्मक अंतर के रूप में भी देखने को मिलता है। एक सामान्य व्यक्ति की न्यूनतम ऊर्जा आवश्यकता को सारिणी 8.3 में प्रस्तुत किया जा रहा है।

 

सारिणी 8.3

एक सामान्य व्यक्ति (55 किग्रा.) की विभिन्न जाति वर्ग के लिये आवश्यक न्यूनतम ऊर्जा

सं.

जाति वर्ग

निद्रा आदि आधारभूत कार्यों में ऊर्जा का क्षय (8x1x55)

हल्के कार्यों में ऊर्जा का क्षय (8x प्र. इ.x55)

भारी कार्यों में ऊर्जा का क्षय (8x प्र. इ.x55)

कुल कैलोरी

1.

अनुसूचित जाति

440

1100

1936

3476

2.

पिछड़ी जाति

440

1100

1936

3476

3.

अन्य पिछड़ी जाति

440

1056

1804

3300

4.

सवर्ण जाति

440

924

1604

2968

5.

मुस्ल्मि जाति

440

1056

1804

3300

 

औसत

440

1047.2

1816.8

3304

स्रोत : आर.एस. थापर, ‘‘हमारा भोजन’’ पृष्ठ 8 अवर फूड

 

सारिणी क्रमांक 8.3 प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन आवश्यक ऊर्जा का विवरण प्रस्तुत कर रही है, उक्त सारिणी डॉ. आरएस थापर की पुस्तक ‘‘अवर फूड’’ के आधार पर तैयार की गयी है। सारिणी में दैनिक कार्यों को तीन वर्गों में विभाजित किया गया है। यह संकल्पना की गई है कि प्रत्येक सामान्य व्यक्ति अपनी दिनचर्या में 8 घंटे निंद्रा, आराम तथा सामान्य विचार विमर्श में व्यय करता है। 8 घंटे का समय सामान्य हल्के घरेलू कार्य में व्यतीत करता है जिसमें विभिन्न आय स्तर जातिगत आधार सामाजिक परंपराओं के कारण अंतर दिखाई पड़ता है। जिसके कारण विभिन्न जातिवर्गों में हल्के कार्य के लिये भिन्न-भिन्न ऊर्जा व्यय करनी पड़ती है। दिनचर्या के शेष 8 घंटे का समय भारी कार्यों में खर्च होता है। इन भारी कार्यों में भी अंतर होने के कारण आवश्यक ऊर्जा में अंतर दिखायी पड़ता है। समग्र रूप में देखें तो एक सामान्य व्यक्ति को प्रतिदिन 3304 कैलोरी ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है अत: इस ऊर्जा की आपूर्ति भोजन से होनी चाहिए।

 

सारिणी क्रमांक 8.4

एक सामान्य महिला की न्यूनतम ऊर्जा आवश्यकता

सं.

जातिवर्ग

सामान्य दिनचर्या में ऊर्जा क्षय (8x.9x45)

हल्के कार्य में ऊर्जा क्षय (8x प्र. इ.x45)

भारी कार्य में ऊर्जा क्षय (8x प्र. इ.x45)

कुल कैलोरी

1.

अनुसूचित जाति

396

1144

1784

3324

2.

पिछड़ी जाति

396

1044

1588

3028

3.

अन्य पिछड़ी जाति

396

972

1516

2884

4.

सवर्ण जाति

396

972

1444

2812

5.

मुस्लिम वर्ग

396

1044

1554

2994

6.

दूध पिलाती महिला

-

-

-

3700

7.

गर्भवती महिला

-

-

-

3000

 

औसत

396

1035.2

1577.2

3106

स्रोत : आरएस थापर, ‘‘हमारा भोजन’’ पृष्ठ 8 (अवर फूड)

 

सारिणी क्रमांक 8.4 से ज्ञात होता है कि सामान्य महिला को औसत रूप में 3106 कैलोरी ऊर्जा चाहिए जिसको वह भोजन से प्राप्त करती है स्वाभाविक है महिलायें जो उक्त तीनों प्रकार के कार्य संपन्न करती हैं उन्हें अपने भोजन में कम से कम इतने पोषक तत्व ग्रहण करने चाहिए जो उनकी दैनिक आवश्यकता 3106 कैलोरी ऊर्जा की आपूर्ति कर सकें, यदि पोषक तत्वों में कमी रह जाती है तो महिलाओं में कुपोषण जनित बीमारियों की संभावना पुरुषों की तुलना में अधिक रहती है।

 

सारिणी 8.5

सामान्य बालकों को ऊर्जा की आवश्यकता

1 से तीन वर्ष

1200

3 से 6 वर्ष

1500

6 से 9 वर्ष

1800

9 से 12 वर्ष

2100

12 से 15 वर्ष

2500

15 से 18 वर्ष

3000

औसत

2017

 

 
सारिणी क्रमांक 8.5 बालकों के लिये प्रतिदिन आवश्यक ऊर्जा को प्रस्तुत कर रही है जिससे ज्ञात होता है कि सर्वाधिक ऊर्जा 15 से 18 वर्ष के बच्चों को आवश्यक होती है इस अवस्था में शारीरिक विकासपूर्णतया की स्थिति को प्राप्त करने वाली अवस्था में होता है। अत: प्रति बालक 3000 कैलोरी ऊर्जा की आवश्यकता होती है और इसके उपरांत कार्य के स्वभाव के अनुसार ऊर्जा की आवश्यकता होती है। 18 वर्ष की आयु से पूर्व भी ऊर्जा की कम आवश्यकता होती है जैसे 1 से 3 वर्ष के बालक को केवल 1200 कैलोरी ऊर्जा आवश्यक होती है।

अध्ययन क्षेत्र में एक व्यापक सर्वेक्षण के आधार पर 25.98 प्रतिशत बच्चे 39.15 प्रतिशत व्यस्क पुरुष तथा 34.87 प्रतिशत महिलायें प्राप्त हुई इस प्रकार की गणना करने पर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन ऊर्जा आवश्यकता 2900.19 कैलोरी प्राप्त हुई प्रस्तुत शोध में 2900 कैलोरी ऊर्जा का मानक मानकर विभिन्न वर्गों में पोषण तत्वों का विचलन निकाला गया जिसे सारिणी क्रमांक 8.6 में प्रस्तुत किया जा रहा है।

जोत के आकार के आधार पर पोषक तत्वों में विचलन स्रोत अध्याय 7 की तालिकाओं से +/- अधिकता/स्वल्पता

सारिणी 8.6 स्रोत के आकार के आधार पर विभिन्न वर्गों में ग्रहण किये जा रहे पोषक तत्वों का चित्र प्रस्तुत कर रही है। सारिणी से ज्ञात होता है ऊर्जा ग्रहण करने के संदर्भ में केवल सीमांत कृषक लाभ की स्थिति में है जो मानक स्तर से 147.19 कैलोरी ऊर्जा अधिक ग्रहण कर रहे हैं जबकि अन्य वर्गों में न्यूनाधिक ऊर्जा की कमी दिखायी पड़ रही है स्वल्पता मध्यम वर्ग के कृषकों में सर्वाधिक 110.61 कैलोरी प्राप्त हुई है। ऊर्जा शरीर को कार्य शक्ति प्रदान करती है। जो दिन प्रतिदिन के विभिन्न कार्यों को संपन्न करने में व्यय होती है। ऊर्जा के उपरांत सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पोषक तत्वों में प्रोटीन तत्व होता है जिसकी सभी वर्गो में संतुलन की स्थिति दिखायी देती है, लघु कृषक, लघु मध्यम कृषक तथा मध्यम कृषक न्यूनाधिक स्वल्पता की स्थिति में है जबकि सीमांत कृषक तथा बड़े कृषक अधिकता की स्थिति में है। सर्वाधिक खराब स्थिति पोषक तत्व वसा ग्रहण करने की है। वसा ग्रहण करने का मानक स्तर 90 ग्राम है। सभी वर्गों में वसा की मात्रा 50 प्रतिशत से कम ग्रहण की जा रही है, सभी वर्गों में सर्वाधिक लघु मध्यम कृषकों की है जिनमें 57.66 ग्राम की स्वल्पता पायी गयी है जबकि मध्यम कृषकों में यह स्वल्पता 47.53 ग्राम की देखी जा रही है यह पोषक तत्व सर्दी व गर्मी से शरीर को सुरक्षित रखने का कार्य करता है, जब शरीर में कार्बोहाइड्रेट की कमी हो जाती है और शरीर को पर्याप्त ऊष्मा प्राप्त नहीं हो पाती है तब वसा इस कमी को पूर्ण करता है इसके साथ ही शरीर को सौंदर्य प्रदान करना मांशपेशियों को शक्ति प्रदान करना वसा का प्रमुख कार्य होता है। इसके अतिरिक्त विटामिन एडीई और के का महत्त्वपूर्ण स्रोत वसा ही है। शारीरिक अंगों को सुचारु रूप से संचालित करने का कार्य खनिज तथा खनिज लवण करते हैं जिसमें फास्फोरस, लोहा, कैल्शियम, सोडियम, पोटैशियम आयोडीन तथा मैग्नीशियम प्रमुख है। इनमें से कैल्शियम अस्थियों और दाँतों को सुरक्षा प्रदान करने के लिये परमावश्यक तत्व है। इसके अतिरिक्त हृदय गति को नियंत्रित करके सामान्य गति बनाये रखने में कैल्शियम सहायता करता है और रुधिर को थक्का बनाने में सहायक होता है परंतु इस तत्व की सभी वर्गों में स्वल्पता देखी जा रही है। इस तत्व को किसी भी वर्ग में 50 प्रतिशत से अधिक ग्रहण नहीं किया जा रहा है विभिन्न वर्गों में इस तत्व की कमी 0.92 ग्राम से लेकर 1.02 ग्राम तक दिखायी पड़ रही है इस तत्व के संदर्भ में सीमांत कृषकों की स्थिति सर्वाधिक खराब देखी जा रही है। जो मानक स्तर 1.4 ग्राम में केवल 0.38 ग्राम मात्रा ग्रहण की जा रही है। फास्फोरस का कार्य स्नायुतंत्र को स्वस्थ रखना होता है रक्त को शुद्ध करना भी फास्फोरस का ही कार्य है। विभिन्न वर्गों में फास्फोरस तत्व संतुलित किया जा रहा है, मानक स्तर से 0.01 ग्राम से लेकर 0.10 ग्राम तक अधिक मात्रा में ग्रहण किया जा रहा है। लोहा रुधिर कणिकाओं के लिये परमावश्यक तत्व है इससे ही लाल रक्त कणों (हीमोग्लोबिन) का निर्माण होता है, महिलाओं को पुरुषों की अपेक्षा लोहा की अधिक आवश्यकता होती है, परंतु इस पोषक तत्व की सभी वर्गों में कमी देखी जा रही है। यह कभी 3.30 मि.ग्राम से लेकर 5.54 मि.ग्राम तक की अल्पता विभिन्न वर्गों में पाई गई। सीमांत कृषकों में इस तत्व की सर्वाधिक कमी देखी जा रही है जो 5.54 मि. ग्राम पाई गई जबकि मध्यम कृषकों में लोहे की 3.30 मि. ग्राम की कमी देखी गई। अन्य खनिजों में सोडिम, पोटैशियम, आयोडीन तथा मैग्नीशियम की भी कमी स्पष्ट रूप से दिखायी पड़ रही है।

शक्तिवर्धक पोषक तत्वों में कार्बोहाइड्रेट का स्थान प्रमुख होता है, शरीर को आवश्यक ऊर्जा प्रदान करने, तंत्रिका तंत्र को पोषित करने शरीर के ताप को स्थिर रखने वसा को पचाने तथा विटामिन ‘बी’ के निर्माण में कार्बोहाइड्रेट सहायक होता है। इस तत्व के संदर्भ में विभिन्न वर्गों में दृष्टिपात करने पर यह पाया गया कि सभी वर्ग कार्बोहाइड्रेट मानक स्तर से अधिक ग्रहण कर रहे हैं। प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 450 ग्राम कार्बोहाइड्रेट आवश्यक होता है। परंतु सभी वर्ग 550.51 ग्राम से लेकर 669.38 ग्राम तक कार्बोहाइड्रेट ग्रहण कर रहे हैं जिससे यह कहा जा सकता है कि सभी वर्ग इस वर्ग की अधिकता के शिकार हो रहे हैं। शरीर के समुचित विकास और वृद्धि के लिये विटामिन्स परमावश्यक तत्व है। क्योंकि ग्रहण किये जाने वाला भोजन उस समय तक अन्य पोषण तत्वों का पूर्ण उपयोग नहीं कर सकता है जब तक कि भोजन में विटामिंस उचित मात्रा में न हो, विटामिन स्वयं में कोई आहार नहीं है। फिर भी इनकी उपस्थिति शारीरिक क्रियाओं में तीव्रता ला देती है। प्रत्येक विटामिन का शरीर में अलग-अलग कार्य और महत्त्व होता है। एक प्रकार का विटामिन अकेला शरीर में बहुत कम उपयोगी होता है, विटामिंस को जीवन तत्व या सुरक्षात्मक तत्व भी कहते हैं। विटामिन को विटामिन बी भी कहते हैं यह हृदय रोगों से रक्षा पाचन शक्ति बढ़ाना नेत्र रोगों से सुरक्षा तथा मांस पेशियों और स्नायुयों को स्वास्थ रखने में सहायता करता है, यह विटामिन सभी वर्गों में मानक स्तर से अधिक ग्रहण किया जा रहा है राइबोफलेविंग को विटामिन बी2 भी कहा जाता है यह तत्व नेत्र की पलकों को स्वस्थ रखता है। शारीरिक विकास में भागेदारी, चर्मरोगों से रक्षा, बालों को झड़ने से रोकना स्वसन तंत्र तथा स्नायु तंत्र की क्रियाओं को प्रभावित करता है। परंतु सभी वर्गों में इस तथ्य की कमी देखी जा रही है यह कभी सीमांत कृषकों में 0.8 मिलीग्राम से लेकर बड़े कृषकों में 0.11 मि. ग्राम तक पाई गयी। नियासिन को निकोटनिक अम्ल भी कहते हैं जिसका कार्य आहार नाल को स्वस्थ रखना, चर्म रोगों से सुरक्षा आदि होते हैं, इस तत्व की एक सामान्य शरीर को 20.33 मि. ग्राम तक आवश्यकता पड़ती है। सभी वर्गों में यह तत्व अधिक रूप में ग्रहण किया जा रहा है और यह अधिकता 8.11 मिलीग्राम से लेकर 11.8 मिलीग्राम तक देखी जा रही है। कैरोटीन हरे पत्तेदार सब्जियों में अधिक पाया जाता है जैसे-जैसे जोत का आकार बढ़ रहा है इसकी सेवन की जाने वाली मात्रा भी बढ़ रही है इसी कारण सीमांत कृषकों में इस तत्व की स्वल्पता पायी गयी वहीं बड़े कृषकों में अधिकता देखी जा रही है।

2. कुपोषण जनित बीमारियों का वर्गीकरण :-


पोषण और स्वास्थ्य का एक दूसरे से घनिष्ठ संबंध है अच्छा स्वास्थ्य रखने के लिये उचित पोषण आवश्यक होता है। उचित पोषण का अर्थ है प्रत्येक व्यक्ति को ऐसा भोजन उचित मात्रा में मिलना जिससे उस व्यक्ति को स्वस्थ रहने तथा अपने दैनिक कार्यों को पूर्ण करने के लिये उपयुक्त मात्रा में पोषक पदार्थ और ऊर्जा प्राप्त हो सके। यदि व्यक्ति को उचित मात्रा में तथा उपयुक्त आहार न मिलने के कारण ऊर्जा और पोषक पदार्थ प्राप्त नहीं हो पाते हैं तब उसे कुपोषण कहा जाता है। यदि व्यक्ति को शरीर की आवश्यकतानुसार उसके आहार से पोषक तत्व नहीं मिल पाते हैं तो शरीर का उचित विकास और क्रियाशीलता में बाधा उत्पन्न होती है और शरीर धीरे-धीरे दुर्बल और क्षीण होता जाता है। यदि शरीर को पोषण पदार्थ आवश्यकता से अधिक मात्रा में मिलते हैं तब भी शरीर मोटा और बेडौल हो जाता है। अत: केवल दुर्बल होना ही कुपोषण नहीं है बल्कि स्थूल और बेडौल होना भी कुपोषण की निशानी है। वास्तव में कुपोषण का असली कारण असंतुलित आहार है परंतु त्रुटिपूर्ण भोजन ग्रहण करना भी कुपोषण को जन्म देता है, अत: कुपोषण के दो कारण हो सकते हैं - प्रथम परिस्थितियों की प्रतिकूलता के कारण असंतुलित भोजन तथा द्वितीय दोषपूर्ण या त्रुटिपूर्ण भोजन प्रतिकूल परिस्थितियों में अत्यधिक श्रम अस्वस्थ वातावरण, प्रतिकूल परिस्थितियों में विश्वसतापूर्ण कार्य करना तथा नींद की कमी प्रमुख कारण हो सकते हैं इन कारणों से मानसिक तनाव उत्पन्न होते हैं जो भोजन के प्रति अरुचि पैदा करता है, तनाव का कारण घर की दयनीय आर्थिक स्थिति भी हो सकती है। अस्वस्थ शरीर भी पाचन तंत्र को प्रभावित करके कुपोषण को जन्म देता है। दोषपूर्ण भोजन में असंतुलित आहार अनुपयुक्त भोजन, गरिष्ठ और सरलता से न पचने वाला भोजन, अपर्याप्त भोजन भोज्य पदार्थों में मिलावट तथा आस्वाभाविक भोजन तथा कुसमय भोजन आदि को रखा जा सकता है। मदिरा पान भी दोषपूर्ण भोजन के अंतर्गत रखा जा सकता है। क्योंकि यह भी पाचन तंत्र को सीधा प्रभावित करता है।

कुपोषण से बचने के लिये सर्वोत्तम उपाय संतुलित आहार है तथा यह भी आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति को नियमित समय पर भोजन करना चाहिए अनियमित भोजन का भी पाचन प्रणाली पर बुरा प्रभाव पड़ता है और अन्यत: व्यक्ति कुपोषण का शिकार हो जाता है। कुपोषण की अवस्था में कुपोषण के कारणों का पता लगाना आवश्यक होता है और कुपोषण वाले व्यक्ति का सही उपचार यही होता है।

1. यदि कुपोषण का कारण भोज्य पदार्थ की कमी है तो भोज्य पदार्थ की मात्रा बढ़ा देनी चाहिए।

2. यदि भोज्य पदार्थों में पोषक तत्वों की कमी से कुपोषण होता है तो पूरक आहार देना उचित होगा। इसके लिये संतुलित भोजन का ज्ञात परमावश्यक हो जाता है। अध्ययन क्षेत्र में जनसाधारण का स्वास्थ्य अत्यंत निम्न कोटि का है जिससे संतुलित भोजन का पूर्व ज्ञान होना चाहिए जिसमें भोजन के विभिन्न आवश्यक पोषक तत्वों का संतुलन हो साथ ही इस बात का भी ज्ञान आवश्यक है कि विभिन्न तत्वों के अभाव में कौन सा रोग उत्पन्न हो सकता है जिससे रोग का उपचार सरलता से संभव हो सके।

1. अ. प्रोटीन की कमी से हानि :-
शारीरिक विकास हेतु प्रोटीन का विशेष महत्त्व है। निर्धनता तथा अज्ञानता के कारण शिशुओं और बालकों को पर्याप्त प्रोटीन की उपलब्धि नहीं हो पाती है जिससे वे निरंतर रोग ग्रस्त बने रहते हैं उन्हें वृक्क तथा यकृत संबंधी अनेकों रोग हो जाते हैं प्रोटीन की कमी से बच्चों का स्वाभाविक एवं उचित विकास नहीं हो पाता।

1. शारीरिक विकास और वृद्धि अवरुद्ध हो जाती है।
2. यकृत बढ़ने और उस पर सूजन आने का खतरा उत्पन्न हो जाता है।
3. सिर के बाल भूरे रंग तथा गंजेपन का रोग हो जाता है।
4. त्वचा पर चकत्ते पड़ने लगते हैं।
5. शरीर की पेशी तंत्र में पानी भरने से शरीर पर सूजन आने का खतरा बढ़ जाता है।
6. प्रौढ़ावस्था में एनीमिया (शरीर में रक्त की कमी) का रोग हो जाता है ऐसा शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी से हो जाता है।
7. रक्ताल्पता की रोगी महिलायें दुर्बल संतान को जन्म देती है जो अल्प विकसित होते हैं।
8. रक्ताल्पता की रोगी गर्भवती महिलाओं में जच्चा-बच्चा के जीवन को खतरा पैदा हो जाता है। 9. शरीर के भार में कमी आ जाती है।

ब. प्रोटीन की अधिकता से हानि :-
प्रोटीन का अधिक मात्रा में सेवन पाचन शक्ति पर बुरा प्रभाव डालता है जिससे अनेक पाचन संबंधी रोग उत्पन्न हो जाते हैं तथा अधिक ऊर्जा उत्पन्न होने से यकृत तथा गुर्दे असमय में ही कमजोर हो जाते हैं तथा अपच रोग हो जाता है। जब अपच रोग हो जाता है तो धीरे-धीरे भोजन के प्रति अरुचि होने लगती है और शरीर दुर्बल होने लगता है साथ ही अपच का रोग गैस्टिक एसिडिटी जैसे रोगों का कारण बनती है।

2. वसा की कमी से हानियाँ :-
वसा भी ऊर्जा का प्रमुख साधन है तथा शरीर की संचित शक्ति मानी जाती है जिसका प्रयोग कार्बोहाइड्रेट्स की कमी के समय होता है। वसा से हमें ऊष्मा तो उपलब्ध होती है साथ में विटामिन ‘ए’ तथा डी भी प्राप्त होता है। जन्तु वसा की अपेक्षा वनस्पति वसा शीघ्र पच जाता है। वसा की कमी से निम्नलिखित हानियों की संभावना रहती है।

1. शारीरिक विकास में कमी आने लगती है।
2. प्रजनन शक्ति क्षीण पड़ जाती है।
3. त्वचा पर स्थान-स्थान पर छोटे-छोटे उभार आते हैं इस रोग को फाइनोइमा कहते हैं।

1. वसा की अधिकता से हानियाँ :-
1. शरीर स्थूल और बेडौल हो जाता है।
2. गुर्दे अपना कार्य ठीक प्रकार से नहीं कर पाते हैं जिससे शरीर में यूरिया और यूरिक अम्ल जैसे हानिकारक पदार्थ बढ़ने से शरीर रोगों के आक्रमण के अनुकूल हो जाता है।
3. शरीर में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ जाने से रक्त वाहनियाँ संकुचित हो जाती है और रुधिर दाब (ब्लड प्रेशर) का रोग होने की संभावना बढ़ जाती है।

3. कार्बोहाइड्रेट्स की कमी से हानियाँ :-
शक्ति वर्धक तत्वों में से कार्बोहाइड्रेट्स का प्रमुख स्थान होता है ये कार्बन, ऑक्सीजन तथा हाइड्रोजन के यौगिक होते हैं। इनकी रासायनिक रचना की विशेषता यह होती है कि इनमें स्टार्च देने वाले पोलीसेकेराइड्स तथा शर्करा देने वाले डाईसेकेराइड्स कहे जाते हैं। वसा की कमी से शरीर में निम्नलितखित हानियाँ होती है।

1. शरीर को पर्याप्त मात्रा में ऊर्जा प्राप्त नहीं होती है।
2. शरीर थकावट और कमजोरी अनुभव करने लगता है।
3. शरीर के विकास पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
4. शरीर में स्फूर्ति के स्थान पर आलस्य छाने लगता है।

3. कार्बोहाइड्रेट्स की अधिकता से हानियाँ :-
अधिक मात्रा में कार्बोहाइड्रेट्स इकट्ठा हो जाने से ग्लाइकोजन अधिक मात्रा में बनने लगता है तत्पश्चात यह त्वचा के नीचे पर्तों के रूप में इकट्ठा होने लगता है। यकृत तथा मांसपेशियों में भी एकत्र होने लगता है जिससे शरीर में मोटापा बढ़ने लगता है और शरीर बेडौल होने लगता है।

4. खनिज लवणों की कमी से हानियाँ :-
शारीरिक अंगों का सुचारु रूप से संचालन करने में खनिज लवणों का विशेष महत्त्व होता है। विभिन्न लवण किसी न किसी अंग का निर्माण करने में सहायक होते हैं। संक्षेप में इनकी कमियों से शारीरिक हानियों का विवरण इस प्रकार है :-

अ. फास्फोरस -
1. अस्थियों एवं दाँतों के निर्माण में बाधा उत्पन्न होती है।
2. तंत्रिकाओं का कार्य सुचारू रूप से नहीं होता है।
3. शारीरिक विकास में बाधा उत्पन्न होती है।
4. व्यस्क स्त्रियों के कूल्हों में सूजन आ जाती है।

ब. लोहा :-
1. शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी हो जाती है।
2. स्वसन क्रिया को प्रभावित करता है।
3. शरीर पीला पड़ने लगता है और एनीमिया हो जाता है।

स. कैल्सियम :-
1. अस्थियाँ कमजोर और आंत कमजोर होने लगते हैं।
2. बच्चों को सूखा रोग हो जाता है।
3. बच्चों की अस्थियाँ कमजोर होकर टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती हैं।
4. दूध पिलाती महिलाओं का दूध कम हो जाता है।
5. चर्मरोग की संभावना बढ़ जाती है।
6. रक्त का थक्का सीघ्र नहीं बन पाता।
7. दाँत आड़े-तिरछे तथा उन पर धब्बे पड़ जाते हैं।

द. आयोडीन :-
1. थाइराइड ग्रंथि पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
2. घेंघा रोग हो जाता है जिसमें गर्दन की ग्रंथि फूल जाने से गांठ या ट्यूमर का रूप ले लेती है।
3. शिशु का विकास प्रभावित होता है।
4. चेहरे पर सूजन आ जाती है।
5. बाल शुष्क और झड़ने लगते हैं।
6. शिशु प्राय: मंदबुद्धि होता है।

य. सोडियम :-
1. शरीर की क्रियाशीलता मंद पड़ने लगती है।
2. पेट में कब्ज रहने लगता है। भूख कम हो जाती है।
3. अधिक मात्रा में सेवन से रक्तचाप की शिकायत बढ़ने लगती है।
4. सोडियम की अधिकता से ऊतकों में सूजन आ जाती है तदोपरांत सारे शरीर में फैल जाती है।
6. सोडियम की कमी से मोतियाबिंद और बहरेपन का रोग बढ़ने की संभावना बढ़ जाती है।
7. तीव्र अतिसार, उल्टी तथा अधिक पसीना निकलने लगता है।
8. शरीर में अम्लता बढ़ जाती है।

र. तांबा :-
1. तांबा की कमी से शरीर में शिथिलता आ जाती है।
2. पाचन क्रिया मंद पड़ जाती है।
3. सांस लेने में कष्ट होने लगता है।
4. हीमोग्लोबिन बनने में रुकावट आती है।

5. विटामिन्स की कमी से हानियाँ :-


प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि वह स्वस्थ रहे। संतुलित भोजन करके ही वह स्वस्थ्य रह सकता है। वैज्ञानिकों ने खोज की है कि विभिन्न पोषक तत्वों का तब तक कोई उपयोग नहीं है जब तक भोजन में विटामिंस न हो। प्रत्येक विटामिन का शरीर में अलग-अलग कार्य होता है। एक प्रकार का विटामिन अकेला शरीर के लिये बहुत कम उपयोगी होता है। यदि भोजन में उचित मात्रा में विटामिन उपस्थित नहीं होते तो विटामिन हीनता जनित रोग उत्पन्न हो जाते हैं।

अ. विटामिन ‘बी’
विटामिन बी में (बी1, बी2, बी3 ..........बी12)
बारह विटामिन आते हैं अत: इस समूह को विटामिन बी काम्पलेक्स कहते हैं। कुछ प्रमुख व महldत्वपूर्ण विटामिनों का विवरण दिया जा रहा है।

1. विटामिन बी1 की कमी से हानियाX :-
1. बेरी-बेरी रोग हो जाता है।
2. भूख कम लगने लगती है।
3. घुटने तथा मांसपेशियाँ शिथिल पड़ने लगती है।
4. स्नायुतंत्र कमजोर होने लगता है।
6. हृदय दुर्बल पड़ने लगता है।
6. हृदय अस्वाभाविक रूप से फैलकर बड़ा हो जाता है।
7. चक्कर आने से आँखों में अंधेरा छाने लगता है।

2. विटामिन बी2 की कमी से हानियाँ :-
1. होंठ सूख जाते हैं तथा उनमें पपड़ी बनने लगती है।
2. त्वचा शुष्क और उसमें दरारें पड़ने लगती है।
3. जीभ में सूजन आ जाती है।
4. नेत्र लाल तथा दृष्टि धुंधली पड़ने लगती है।
5. कानों, मुँह व ओठों की श्लेष्मा का रंग स्वेत पड़ने लगता है।

3. विटामिन बी3 की कमी से हानियाँ :-
1. पैरों में जलन होने लगता है।
2. हाथ-पैर सुन्न और उनमें झनझनाहट होने लगती है।
3. जठरांत्र (गेस्टो इंटेस्टिनल) रोग हो जाते हैं।
4. हृदय में रुधिर परिवहन सुचारु रूप से नहीं होता है।

4. विटामिन बी6 की कमी से हानियाँ :-
1. पेलेग्रा के रोग के लक्षण प्रकट होने लगते हैं।
2. अत्यंत घबराहट अनुभव होती है।
3. अनिद्रा रोग हो जाता है।
4. स्वभाव में चिड़चिड़ापन आ जाता है।

5 विटामिन बी10 की कमी से हानियाँ :-
1. लाल रक्त कोशिकाओं का औसत आकार बढ़ जाता है।
2. रक्ताल्पता का रोग हो जाता है।

6. विटामिन बी12 की कमी से हानियाँ :-
1. घातक एनीमिया रोग हो जाता है।
2. रक्त निर्माण में बाधा उत्पन्न होती है।
3. जीभ में सूजन आ जाती है।
4. मेरुरज्जु से संबंधित स्नायु रोग हो जाता है।

ब. विटामिन सी की कमी से हानियाँ :-


1. स्कर्वी रोग हो जाता है।
2. अधोत्वचीय और अन्तरपेशीय रक्तस्राव होने लगता है।
3. मांसपेशियों तथा जोड़ों में दर्द रहने लगता है।
4. टांगे कमजोर होने लगती है।
5. विटामिन सी की अधिकता से गठिया रोग की संभावना बढ़ जाती है।
6. सी की अधिकता से अतिसार पेट में दर्द तथा पाचन संबंधी विकार उत्पन्न हो जाते हैं।

स. विटामिन ए की कमी से हानियाँ :-


1. रतौंधी रोग हो जाता है।
2. आहारनाल तथा श्वास नली और कार्निया प्रभावित होती है।
3. शारीरिक विकास और वृद्धि में बाधा उत्पन्न होती है।
4. त्वचा सूखी और खुरदरी हो जाती है।
5. नेत्र को कार्निया में सफेद धब्बे पड़ जाते हैं।
6. पथरी और अमाशय में फोड़ा होने की संभावना हो जाती है।
7. इसकी अधिकता से लंबी अस्थियों में दर्द और सूजन रहने लगती है।
8. मिचली आने लगती है।
9. चर्म रोग हो जाता है।
10. इसकी अधिक मात्रा पाचन क्रिया को प्रभावित करती है।

द. विटामिन डी की कमी से हानियाँ :-


1. फास्फोरस तथा कैल्शियम का सही उपापचय नहीं हो पाता है।
2. अस्थियाँ दुर्बल होकर मुड़ जाती है।
3. रिकेट्स या रेकाइटिस रोग हो जाता है।
4. इस विटामिन की अधिकता से ही जी मिचलाना उल्टी आना, सिर में दर्द और आदि रोग हो जाते हैं।

य. विटामिन ‘ई’ की कमी से हानियाँ :-


1. नारियों में बंध्यता तथा पुरुषों में नपुंसकता का कारण इस विटामिन की कमी होती है। क्योंकि इससे शुक्राणु कम व दुर्बल हो जाते हैं।
2. मांसपेशियों में एक विशेष प्रकार का रोग हो जाता है।
3. इसकी अधिकता से जनन ग्रंथिया तथा तंत्रिका पेशी तंत्र प्रभावित होता है।
4. इसी अधिकता से पिटयूटरी ग्रंथि तथा थाइराइड ग्रंथि को भी प्रभावित करता है।

र. विटामिन ‘के’ की कमी से हानियाँ :-


इस विटामिन की कमी से रक्त का थक्का नहीं बन पाता है क्योंकि प्रोथ्राम्बीन नामक प्रोटीन की रुधिर में कमी हो जाती है जिसके कारण चोट लगने पर रक्त स्राव जल्दी होता है।

 

सारिणी क्रमांक 8.7 विभिन्न विटामिनों के प्राप्ति स्रत उपयोगिता एवं अभाव से हानियाँ

विटामिन का नाम

प्राप्ति स्रोत

उपयोगिता

अभाव से हानियाँ

दूध, दही, मक्कखन, हरी सब्जी, लाल गाजर, शकरकंद, मछली का तेल, अण्डे का पीतक आदि

शरीर की समुचित वृद्धि नेत्र, दाँत और त्वचा आदि के स्वास्थ्य की रक्षा

नेत्र में रतौंदी का रोग, दंत विकास अवरुद्ध त्वचा का सूखकर कठोर पड़ जाना आदि।

बी1 (थियामिन)

अनाज के दानों के छिलके में सेम और मटर के बीजों में दूध पनीर और मांस तथा खमीर आदि में

शरीर की समुचित वृद्धि तंत्रिका और पेशियों की क्रियाशीलता के लिये आवश्यक

बेरी-बेरी नामक रोग हो जाना भूख कम हो जाना आदि।

बी2 (राइबोफ्लेविन)

दूध अंडे सब्जियाँ कलेजी (मांस) आदि

शरीर की वृद्धि त्वचा आदि को स्वस्थ रखने में

दृष्टि कमजोर हो जाती है त्वचा फटने लगती है।

बी3

विभिन्न भोज्य पदार्थों में

चयापचयी क्रिया में

त्वचा सूख जाती है तथा दानें पड़ जाते हैं।

बी5 (निकोटानिक अम्ल)

दूध, मट्ठा, सब्जियाँ ताजा मांस अंडे आदि में

पाचन तंत्र और तंत्रिका तंत्र को स्वस्थ रखना

पाचन तंत्र का कमजोर पड़ जाना त्वचा रोग हो जाना।

बी6

दूध व अंडे की जर्दी में

त्वचा को मुलायम रखना

त्वचा के रोग हो जाना

बी12

मांस दूध तथा अंडे आदि में

रक्त कणिकाओं के निर्माण में

रक्त में क्षीणता आ जाती है।

सी (एस्काविन अम्ल)

आंवला, आम, नींबू, संतरा, टमाटर, जामुन आदि

मसूढ़ों और दाँतों को स्वस्थ्य रखना घावों में भरने तथा पाचन क्रिया में सहायक

स्कर्वी रोग तथा एनीमिया (रक्ताल्पता) रोग हो जाना।

डी

दूध मक्खन, मांस, अंडे की जर्दी मछली का तेल आदि में

अस्थियों के स्वास्थ्य एवं विकास में सहायक

सूखा रोग हो जाना, हड्डियों का कमजोर पड़ जाना।

दूध मक्खन, हरी पत्तेदार सब्जियां गेहूं और अंडे की जर्दी मूंगफली आदि में

जनन क्रियाओं (संतानोत्पति में सहायक)

जननांगों का कमजोर पड़ जाना कंकाल पेशियों का कमजोर पड़ जाना

के

दूध हरे पत्तेदार सब्जियाँ टमाटर कलेजी अंडे की जर्दी पनीर आदि में।

रुधिर का थक्का बनाने में सहायक

रक्ता का थक्का न बन पाने के कारण रक्त स्राव न रूक पाना।

 

 
प्राय: कुपोषण से होने वाले अधिकांश रोग पोषक तत्वों की कमी से उत्पन्न होने वाले रोग होते हैं। जिनका विवरण नीचे दिया जा रहा है।

1. क्वाशिओरकोर :-
यह रोग मुख्यतया बच्चों में प्रोटीन की कमी के कारण अथवा उचित मात्रा में कैलोरी न मिल पाने के कारण होता है इससे बच्चों का मानसिक विकास रुक जाता है बाल झड़ने लगते हैं गाल फूलकर कड़े पड़ जाते हैं। गालों के नीचे त्वचा में पानी भर जाने से चमकने लगते हैं।

2. मैरासमस :-
प्राय: बच्चों में यह रोग कैलोरी की अत्यधिक कमी के कारण होता है। इस रोग में त्वचा में चर्बी की कमी के कारण झुर्री पड़ने लगती है और त्वचा लटक जाती है। हाथ पैर बहुत अधिक पतले पड़ जाते हैं और सिर बंदरनुमा हो जाता है।

3. अस्टियो मलेसिया :-
यह रोग अस्थियों में कैल्शियम फास्फोरस तथा विटामिन डी की कमी के कारण होता है। इसे अस्थि विकृत भी कहते हैं।
4. प्रोटीन लौह, लवण, विटामिन सी तथा विटामिन बी की संयुक्त कमी होने पर एनीमिया या रक्ताल्पता रोग हो जाता है।
5. विटामिन सी की कमी से स्कर्वी रोग हो जाता है।
6. विटामिन ए की कमी से नेत्र रोग हो जाते हैं।
7. विटामिन बी1 की कमी से बेरी-बेरी रोग हो जाता है।
8. विटामिन बी2 की कमी से जीभ में छाले पड़ जाते हैं तथा होठों और कानों की त्वचा पर दरारें पड़ जाती है।
9. आयोडीन की कमी से घेंघा रोग हो जाता है।
10. जल में क्लोरीन की मात्रा अधिक हो जाने से फ्लोरोसिस रोग हो जाता है।

3. पोषण संबंधी रोगों से प्रभावित जनसंख्या :-
इस प्रकार के अध्ययनों से यह तथ्य ज्ञात होता है कि जीवन शैली में परिवर्तन के साथ लोग केवल भौतिक सुविधाओं को भी बढ़ाने में लगे हुए हैं। या जिनके लिये भौतिक साधनों का संग्रह किया जा रहा है वे अपने स्वास्थ्य के प्रति भी उतने ही सावधान हैं। सामान्य रूप से यह देखा जाता है कि विभिन्न रोगों का प्रारंभिक कारण उनके खान-पान में ही ढ़ूँढ़ा जा सकता है। यह तथ्य तो सर्वविदित है कि लोगों के स्वरूप का स्तर पूर्णतया भोजन तथा भोजन से प्राप्त किये जाने वाले पोषक तत्वों पर निर्भर करता है। यदि भोजन पोषक तत्वों से युक्त होगा स्वास्थ्य का स्तर भी उतना ही अच्छा होगा। इस दृष्टि से देखा जाये तो अध्ययन क्षेत्र में अधिकांश रोगों का प्राथमिक कारण पोषण संबंधी असंतुलन है और इस असंतुलन के कारण क्षेत्र की एक बड़ी जनसंख्या प्रभावित है स्पष्ट है कि स्वास्थ्य के स्तर को ऊँचा करने के लिये इसके पोषण संबंधी स्तर में सुधार की आवश्यकता है। पिछले अध्याय में हम विभिन्न वर्गों द्वारा ग्रहण किये जाने वाले खाद्य पदार्थों तथा उनके प्राप्त पोषक तत्वों का विश्लेषण कर चुके हैं। जिसमें विभिन्न पोषक तत्वों का आवश्यक मानक स्तर से कम/अधिक ग्रहण किया जाना जिसके परिणाम स्वरूप विभिन्न कुपोषण जनित रोगों की शिकार जनसंख्या का तुलनात्मक विश्लेषण इस शीर्षक में किया जा रहा है। यह तथ्य पिछले अध्याय में स्पष्ट होता है कि अध्ययन क्षेत्र में विभिन्न वर्गों द्वारा ग्रहण किये जाने वाले भोजन को न तो मात्रात्मक दृष्टि से श्रेष्ठ कहा जा सकता है और न उसमें गुणात्मक श्रेष्ठता दिखाई पड़ती है। क्योंकि भोजन में विभिन्न खाद्य पदार्थों का समायोजन लोगों द्वारा केवल उदरपूर्ति की दृष्टि से ही ठीक प्रतीत होता है। किंतु भोजन में विभिन्न पदार्थों से प्राप्त होने वाले पोषक तत्वों में भारी असंतुलन स्पष्ट होता है। विभिन्न खाद्य पदार्थों से प्राप्त पोषक तत्व मात्रात्मक दृष्टि से तो कुछ ठीक लगते हैं परंतु गुणात्मक दृष्टि से अत्यंत निम्न स्तरीय प्रतीत हो रहा है क्योंकि अधिकांश पोषक तत्व खाद्यान्नों से ग्रहण किये जा रहे हैं जो गुणात्मक दृष्टि से श्रेष्ठ नहीं होते हैं। उदाहरण के लिये सभी वर्गों में प्रोटीन आवश्यक मानक स्तर से अधिक ग्रहण की जा रही परंतु इसका अधिकांश हिस्सा खाद्यान्नों से प्राप्त होने के कारण उतना श्रेष्ठ नहीं है जितना श्रेष्ठ प्रोटीन अंडा, दूध, मांस, मछली तथा पनीर आदि खाद्य पदार्थों से प्राप्त होता है, यही तथ्य न्यूनाधिक अन्य पोषक तत्वों के संबंध में दिखाई पड़ता है। पोषक तत्वों की मात्रात्मक एवं गुणात्मक उपलब्धता के आधार पर यह कहा जा सकता है कि अध्ययन क्षेत्र में लोगों की खाद्य आदतें अत्यंत निम्न स्तरीय है जो ग्रामीण निर्धनता की ओर संकेत करती है। सर्वेक्षण के समय विभिन्न वर्गों में पोषक संबंधी रोगों का विवरण सारणी 8.8 में प्रस्तुत किया जा रहा है।

पोषण सम्बन्धी रोगों से प्रबावित जनसंख्या (प्रतिशत में) सारिणी 8.8 इस तथ्य पर प्रकाश डाल रही है कि कुल जनसंख्या का 44.84 प्रतिशत भाग 1 या 1 से अधिक पोषण संबंधी रोगों से ग्रसित है। सर्वाधिक प्रभावित जनसंख्या सीमांत कृषक परिवारों की है। जिनकी कुल जनसंख्या का 47.82 प्रतिशत कुपोषण का शिकार है। मध्यम कृषक परिवारों की प्रभावित जनसंख्या 45.38 प्रतिशत है तथा लघु कृषक परिवारों का 45.25 प्रतिशत लगभग एक समान स्थिति में है। जबकि न्यूनतम कुपोषण जनित रोगों का शिकार बढ़े कृषक परिवारों के सदस्य 37.93 प्रतिशत है। सर्वेक्षण में यह भी पाया गया है कि लगभग सभी परिवारों में महिलाओं की तुलना में पुरुषों पर अधिक ध्यान दिया जाता है जबकि बच्चों के भोजन पर विशेष ध्यान आकर्षित किया जाता है यह भी तथ्य स्पष्ट हुआ कि लगभग सभी परिवारों में संतुलित भोजन तथा संतुलित पोषक तत्व से अनभिज्ञ है जिससे निष्कर्ष यह निकलता है कि शिक्षा के स्तर में वृद्धि के साथ भौतिक प्रगति तो स्पष्ट रूप से दिखायी पड़ती है तथा खान-पान में भी तेजी से परिवर्तन हुआ है परंतु खान-पान में किन खाद्य पदार्थों से श्रेष्ठ कोटि के पोषक तत्व प्राप्त होते हैं। इस तथ्य से लगभग सभी सदस्य अनजान प्राप्त हुये। महिलाओं में भोजन पकाने की आधुनिक विधियों का प्रचलन तो बढ़ा परंतु भोजन में आवश्यकतानुसार पोषक तत्वों से युक्त भोज्य पदार्थों के समायोजन से पूर्णतया अज्ञान है। स्वाभाविक हैं कि परिवार के सदस्यों को कुपोषण या अल्प पोषण से उत्पन्न होने वाले रोगों का भी प्रारंभिक ज्ञान नहीं है तब उपचार भी संभव नहीं है। परिणाम स्वरूप चिकित्सा व्यय बढ़ता जा रहा है। समय पर भोजन करना चाहिए इस तथ्य का ज्ञान सामान्य रूप से सभी को है परंतु भोजन समय पर करें ऐसा प्रयास करने के बाद भी समय नहीं हो पाता है जिसके कारण पोषण समस्याएँ जन्म लेती हैं जिन परिवारों की आय का स्तर ऊँचा है और परिवार के कुछ सदस्य सरकारी अथवा गैर सरकारी सेवाओं में कार्य करके अतिरिक्त आय अर्जित करते हैं उनके परिवारों में भी कुपोषण की समस्या देखी गयी है। जो केवल पोषण संबंधी जानकारी के अभाव के कारण प्रतीत हुई। सर्वेक्षण के समय अध्ययन क्षेत्र में निम्नलिखित रोग प्रकाश में आये -

1. हाथों तथा पैरों में ऐठन :-
इस रोग से प्रभावित सर्वाधिक संख्या 17.32 प्रतिशत लघु कृषक परिवारों में पाई गई, इसके बाद लघु मध्यम कृषक परिवारों में 14.89 प्रतिशत सदस्य इस रोग से ग्रसित देखे गये जबकि मध्यम कृषक परिवारों में न्यूनतम संख्या 11.76 प्रतिशत प्राप्त हुई। बड़े कृषक तथा सीमांत कृषक परिवारों में क्रमश: 13.79 प्रतिशत तथा 13.36 प्रतिशत जनसंख्या इस रोग से प्रभावित है। यद्यपि किसी रोग के लिये अनेक कारण संयुक्त रूप से उत्तरदायी होते हैं परंतु शरीर में विटामिन ‘सी’ (एस्कोविक एसिड) की कमी हाथों तथा पैरों में ऐठन के लिये मुख्य रूप से उत्तरदायी होता है। अध्ययन क्षेत्र में विटामिन ‘सी’ सभी वर्गों में मानक स्तर से कम ग्रहण किया जा रहा है क्योंकि फलाहार में यह अम्ल नींबू, संतरा, आम, जामुन, तथा आंवला और टमाटर का भोजन में कम मात्रा में सेवन किया जा रहा है इस कारण शरीर को आवश्यक विटामिन सी उपलब्ध नहीं हो पाता है।

2. पेट के रोग :-
पेट के रोग का मूल कारण अपच होती है और कब्ज अनेक बीमारियों का मुख्य कारण बनती है। यद्यपि गैस तथा उच्च अम्लता की शिकायत न्यूनाधिक सभी वर्गों में प्राप्त हुई है, परंतु रोग के रूप में सर्वाधिक जनसंख्या मध्यम कृषक परिवारों में 31.93 प्रतिशत प्रभावित देखी गयी। दूसरे स्थान पर बड़े कृषक परिवार के सदस्य 20.70 प्रतिशत प्राप्त हुए जबकि लघु मध्यम कृषक परिवार के 20.21 प्रतिशत सदस्य इस रोग से ग्रसित देखे गये चतुर्थ और पंचम स्थान पर क्रमश: सीमांत कृषक 15.16 प्रतिशत तथा लघु कृषक 14.24 प्रतिशत इस रोग से पीड़ित दिखायी पड़े। इस रोग का मूल कारण विटामिन बी1 (थियामिन) की कमी होती है। यद्यपि अध्ययन क्षेत्र में थियामिन की मात्रा लगभग सभी वर्गों में मानक स्तर से अधिक ग्रहण की जा रही है परंतु यह पोषक तत्व का अधिकांश भाग खाद्यान्नों से प्राप्त किया जा रहा है जो निम्न कोटि का होता है इस कारण शरीर के लिये उतना ही लाभप्रद नहीं होता जितना कि हरी सब्जियों, दूध, फल तथा अंडे से प्राप्त होने वाला थियामिन श्रेष्ठ कोटि का होता है शायद यही कारण है कि पर्याप्त मात्रा में थियामिन ग्रहण करने के बाद भी लोग पेट के रोगों से ग्रसित हो रहे हैं। पेट के रोग अपच से बचने के लिये रेशेदार खाद्य पदार्थों के अधिक सेवन की सलाह दी जा सकती है जिससे लोग पेट के रोगों से मुक्त रह सके। समय पर नियमित भोजन न करने के कारण भी पेट में कब्ज रहने लगती है जो धीरे-धीरे स्थायी हो जाती है।

3. थकान तथा शरीर में सूजन :-
अध्ययन क्षेत्र का 13.53 प्रतिशत भाग इस रोग से प्रभावित देखा गया है जिसमें बड़े कृषक परिवार के कुल सदस्यों में 17.24 प्रतिशत सदस्य थकान तथा शरीर में सूजन के रोग से ग्रसित पाये गये जबकि 15.64 प्रतिशत लोग लघु कृषक परिवारों में प्रभावित देखे गये हैं। मध्यम कृषक परिवार 13.44 प्रतिशत, लघु मध्यम कृषक परिवार 12.77 प्रतिशत और सीमान्त कृषक परिवारों के सदस्यों का 11.83 प्रतिशत हिस्सा इस बीमारी से पीड़ित देखा गया है। इस रोग का कारण भोजन में वसा, ऊष्मा, थियामिन तथा नियासिन का कम मात्रा में ग्रहण करना रहता है। अत: उक्त पोषक तत्वों का संतुलित मात्रा में उपयोग इस रोग से सुरक्षा प्रदान करता है।

4. सर्दी जुकाम तथा मसूढ़ों में सूजन :-
ऋतु परिवर्तन के समय वातावरण में तापमान परिवर्तन का प्रभाव शरीर पर पड़ता है और इस तापमान परिवर्तन के कारण लोगों का सर्दी जुकाम से पीड़ित हो जाना एक सामान्य सी बात है, परंतु जब रोग के फैलाव का समय बढ़ जाता है तो यह सर्दी जुकाम का रोग किसी घातक बीमारी के प्रारंभ का संकेत देने लगता है। और जब खाँसी के साथ रक्त मिश्रित कफ आने लगता है तब यह रोग स्कर्वी जैसे प्रकट होने लगते हैं जिसका मूल कारण भोजन में विटामिन ‘सी’ तत्व की कमी होता है। इस रोग से सर्वाधिक 17.65 प्रतिशत मध्यम कृषक परिवार के सदस्य पीड़ित पाये गये, द्वितीय स्थान पर लघु कृषक परिवार के सदस्य 14.11 प्रतिशत देखे गये, बड़े कृषक परिवार के 13.79 प्रतिशत सदस्यों में 7.71 प्रतिशत लघु मध्यम कृषक परिवार के सदस्यों में जबकि सीमांत कृषक परिवारों के 10.41 प्रतिशत सदस्यों में इस रोग के स्पष्ट लक्षण देखे गये।

5. जीभ तथा होठों के रोग :-
जब लोगों के भोजन में राइबोफ्लेविन (विटामिन बी2) की कमी हो जाती है तब इस रोग के लक्षण प्रकट होने लगते हैं और मुख के किनारे की त्वचा में चटकन प्रारंभ हो जाती है। फोड़ा फुन्सियों का भी प्रकोप बढ़ने लगता है और होठ तथा जीभ का रंग लालसुर्ख रहने लगता है जिससे मुख में कष्ट बढ़ने लगता है और यहाँ तक कि भोजन करने में भी कठिनाई होने लगती है। इस रोग का सर्वाधिक प्रभाव 17.24 प्रतिशत सदस्य इस रोग से पीड़ित प्राप्त हुये मध्यम कृषक 7.56 लघु कृषक 8.10 प्रतिशत और न्यूनतम लघु मध्यम कृषक परिवार के सदस्य 5.58 प्रतिशत इस रोग के मरीज देखे गये।

6. पेलेग्रा :-
निकोटिन एसिड या नियासिन की भोजन में कमी पेलेग्रा रोग के जन्म का एक प्रमुख कारण है। त्वचा के उन भागों में सूजन जो सूर्य के प्रकाश में खुले रहते हैं के द्वारा सरलता से पहचाना जा सकता है, इसका दूसरा प्रमुख लक्षण अतिसार, जीभ में सूजन तथा अनिद्रा द्वारा प्रकट होता है। यह रोग उन क्षेत्रों में अधिक पाया जाता है जहाँ पर मक्का तथा ज्वार प्रमुख खाद्य के रूप में ग्रहण किया जाता है क्योंकि इन दोनों खाद्य पदार्थों में नियासिन की मात्रा अधिक पायी जाती है और नियासिन की मात्रा जब शरीर में आवश्यकता से अधिक पहुँचने लगती है तभी इस रोग के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। इस रोग से ग्रसित रोगी सर्वाधिक 20.70 प्रतिशत बड़े कृषक परिवारों में प्राप्त किये गये जबकि 8.10 प्रतिशत सदस्य लघु कृषक परिवारों में प्राप्त हुए। न्यूनतम 4.52 प्रतिशत सदस्य लघु मध्यम कृषक परिवारों में देखे गये। 5.88 प्रतिशत मध्यम कृषक परिवारों में तथा 7.97 प्रतिशत सदस्य सीमांत कृषक परिवारों के सदस्यों में प्राप्त हुये।

7. बेरी-बेरी :-
इस रोग का प्रमुख कारण भोजन में नियासिन (विटामिन बी) पोषक तत्वों की कमी होती है। जिसके कारण विभिन्न कृषक वर्गों में 2.39 से 6.90 तक का विचलन इस रोग से प्रसार में देखा गया है। इस रोग का सर्वाधिक प्रकोप 6.90 प्रतिशत बड़े कृषक परिवार के सदस्यों में देखा गया है। जबकि न्यूनतम स्तर 2.39 प्रतिशत लघु मध्यम कृषक परिवार के सदस्यों में प्राप्त हुआ है। सीमांत कृषक परिवार के सदस्यों में 6.56 प्रतिशत इस रोग से प्रभावित देखे गये हैं लघु कृषक परिवार के सदस्य 4.33 प्रतिशत तथा मध्यम कृषक 4.20 प्रतिशत इस रोग से पीड़ित पाये गये। अध्ययन क्षेत्र में बेरी-बेरी रोग के दो प्रमुख रूप देखे गये। प्रथम तो गीला रोग द्वितीय सूखा बेरी-बेरी रोग तथा एक तीसरा रोग शिशु संबंधी बेरी-बेरी रोग देखने को मिला। बेरी-बेरी रोग के लक्षण में भूख कम लगना हाथों पैरों में सनसनाहट और चेतना शून्य हो जाना प्रमुख है इस बेरी-बेरी रोग में मांसपेशियाँ नष्ट हो जाती है जिससे घूमने फिरने में कष्ट होता है। शुष्क बेरी-बेरी रोग में पैरों में सूजन हृदय गति का तेज हो जाना, हृदय का बढ़ जाना तथा सांस तेज चलना आदि प्रमुख हैं।

8. रिकेट्स (सूखा रोग) :-
शरीर में विटामिन डी की कमी से बच्चों में सूखा रोग येको तथा स्तनपान कराने वाली महिलाओं के मृदृलास्थी (आस्टोमैलेशिया) रोग हो जाता है इस रोग के लक्षण में कमर तथा रीड की हड्डियों में विकृति आ जाना प्रमुख है जिससे कमर जांघ तथा रीड की हड्डी में पीड़ा होने लगती है। बच्चों के सूखा रोग के प्रारंभिक लक्षणों में कपाल के मुलायम स्थान पर गोल घेरा सा बनने लगता है बाद में यह हड्डियों में आक्रमण करके उनमें विकृति उत्पन्न कर देता है। अध्ययन क्षेत्र में 3.22 प्रतिशत लोग इस रोग से पीड़ित पाये गये जिसमें सर्वाधिक 4.37 प्रतिशत सीमांत कृषक परिवारों के सदस्यों में 3.45 प्रतिशत बड़े कृषक परिवारों में 3.4 प्रतिशत लघु कृषक परिवारों में तथा न्यूनतम 1.33 प्रतिशत लघु मध्यम कृषक परिवारों के सदस्यों में प्राप्त हुआ।

9. रतौंधी (नाइट ब्लाइण्डनेस) :-
शरीर में कैरोटीन या विटामिन ए की कमी से इस रोग को पनपने का अवसर प्राप्त होता है। अंधेरे अथवा कम प्रकाश में आँखों को सामने का दृश्य साफ देखने के लिये विटामिन ए की अत्यंत आवश्यकता होती है। साथ ही बच्चों के शारीरिक विकास के लिये विटामिन ए आवश्यक होता है। इस विटामिन की कमी को कभी प्रारंभ में आँख की काली पुतली के आस-पास स्वेत भाग को बदरंग करती है तत्पश्चात काली पुतली को प्रभावित करती है। यदि रतौंधी का समय रहते इलाज नहीं होता है तो फिर यह अंधेपन में परिवर्तित हो जाती है। रतौंधी के साथ-साथ विटामिन ए की कमी से आँख का लाल होना माडा कैराटोमैलेशिया तथा फालीपुलर कैरोटोटिस आदि रोग भी हो जाते हैं। अध्ययन क्षेत्र में कुल 4.16 प्रतिशत लोग इस रोग से प्रभावित देखे गये हैं। जिससे सर्वाधिक 5.40 प्रतिशत रोगी सीमांत कृषक परिवारों में प्राप्त हुए। 3.91 प्रतिशत रोगी लघु कृषक परिवारों में देखे गये जबकि बड़े कृषक तथा लघु मध्यम कृषक परिवारों में क्रमश: 3.45 प्रतिशत तथा 3.19 प्रतिशत सदस्य इस रोग से पीड़ित पाये गये हैं। रोगियों का न्यूनतम प्रतिशत 1.68 प्रतिशत मध्यम कृषक परिवारों में प्राप्त किया गया।

10. स्कर्वी रोग :-
शरीर में विटामिन सी की कमी से अस्थियों तथा दाँतों में स्कर्वी अर्थात मांसखोरा रोग हो जाता है। यह रोग प्राय: उन व्यक्तियों को अधिक होता है जो सूखा माँस, सूखे फल तथा सूखी सब्जियों का सेवन अधिक मात्रा में करते हैं। स्कर्वी रोग से रक्त वाहिनी नलिकायें कमजोर हो जाती है मसूड़े फूल जाते हैं मस्तिष्क कमजोर पड़ जाता है शरीर में आलस्य और थकान का अनुभव होने लगता है। शरीर पर सूखे-सूखे चकत्ते पड़ जाते हैं सिर के बालों में रुखापन आ जाता है सर्वेक्षण में कुल 4.31 प्रतिशत रोगी पाप्त हुए जिसमें सीमांत कृषक परिवारों के सदस्य 5.1 प्रतिशत इस रोग से ग्रसित पाये गये 4.47 प्रतिशत लघु कृषक परिवारों में तथा 3.48 प्रतिशत लघु मध्यम कृषक परिवारों में 3.45 प्रतिशत बड़े कृषक परिवारों में तथा 3.36 प्रतिशत मध्यम कृषक परिवारों में इस रोग के रोगी देखे गये।

11. हड्डियों के जोड़ों में दर्द :-
चिकित्सा क्षेत्र में इसे गठिया रोग कहा जाता है। ग्रन्थिशोध या वात रोग (हड्डियों के जोड़ों में सूजन) के नाम से भी इसे जाना जाता है यह रोग सभी वर्गों में 50 वर्ष की आयु से अधिक व्यक्तियों में देखा गया। सर्वेक्षण में कुल 9.66 प्रतिशत लोग इस रोग से पीड़ित देखे गये जिसमें सर्वाधिक 17.24 प्रतिशत बड़े कृषक परिवारों के सदस्य रोगी पाये गये जबकि न्यूनतम 7.45 प्रतिशत रोगी लघु मध्यम कृषक परिवारों के सदस्यों में प्राप्त हुए। इसके अतिरिक्त 10.80 प्रतिशत सीमांत कृषकों के मध्य, 13.44 प्रतिशत मध्यम कृषक परिवारों में तथा 8.66 प्रतिशत लघु कृषक परिवारों में सदस्य इस रोग से प्रभावित देखे गये। जब रक्त में पोषक तत्वों के असंतुलित सेवन से यूरिक ऐसिड का उच्च स्तर हो जाता है तो सोडियम यूरेट शरीर के कुछ विशेष तंतुओं में एकत्रित होने लगता है। जिससे हड्डियों के जोड़ों में निरंतर सूजन बनी रहती है। कभी-कभी यह रोग शरीर में यूरिक ऐसिड के अधिक बनने से भी किडनी पर अत्यधिक दबाव पड़ने लगता है जिससे यह रोग हो जाता है मुलायम तथा अस्थि तंतुओं में सोडियम यूरेट का प्रवाह बढ़ जाता है यह सामान्यत: कोयलास्थि तथा हड्डियों के जोड़ों के पास एकत्रित होने लगता है जिससे वृद्धावस्था के समय हड्डियों के जोड़ अत्यंत कड़े पड़ जाते हैं। जिससे वृद्ध लोगों को चलने फिरने में अत्यधिक कठिनाई अनुभव होने लगती है।

12. डाइबिटीज (मधुमेह) :-
यह रोग शरीर में इन्सुलिन की कमी से उत्पन्न होता है। इस बीमारी का मूल कारण जब प्रोटीन और वसा का अत्यधिक उपभोग होने के कारण कार्बोहाइड्रेट सामान्य ढंग से उपयोग होकर ऊर्जा में परिवर्तित नहीं हो पाते हैं तोसपद में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ने लगती है और छोटे-छोटे कणों के रूप में मूत्र के साथ बाहर निकलने लगता है यदि इसका समुचित इलाज नहीं करवाया जाता है तो यह रोग जानलेवा भी हो सकता है। मधुमेह रोग से पीड़ित रोगी का खून जमने में कठिनाई होती है और शरीर में चोट अथवा घाव हो जाने पर उसके भरने में अधिक समय लगता है। सर्वेक्षण में इस रोग से पीड़ित लोगों में सर्वाधिक 6.90 प्रतिशत बड़े कृषक परिवार के सदस्यों में पाये गये, जबकि 3.36 प्रतिशत मध्यम कृषक परिवारों में और 2.31 प्रतिशत सीमांत कृषक परिवारों के सदस्यों में प्राप्त हुए। अन्य दोनों वर्गों में क्रमश: 1.82 प्रतिशत तथा 1.86 प्रतिशत रोगी देखे गये।

उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि विभिन्न व्यक्तियों को उनकी आयु, लिंग तथा कार्यानुसार भोजन में विभिन्न पोषक तत्वों तथा विटामिंश की कितनी मात्रा आवश्यक है यह ज्ञात करना एक कठिन कार्य है। जिससे प्रकृति द्वारा निर्मित इस मानव कारखानें को सामान्य गति से लंबे समय तक संचालित किया जा सके। इस संबंध में केवल इतना कहा जा सकता है कि प्रत्येक परिवार को अपनी आर्थिक स्थिति तथा आय उपार्जन के आधार पर विभिन्न पोषक तत्वों से युक्त खाद्य पदार्थों का चयन करना चाहिए। अनेक खाद्य पदार्थ जो शरीर के लिये कम कीमत पर आवश्यक पोषक तत्वों को उपलब्ध करा सकते हैं क्षेत्रीय उत्पादन द्वारा ही समायोजित किये जा सकते हैं परंतु अज्ञानतावस अथवा उच्च जीवन स्तर के खोखले प्रदर्शन के कारण हम उनका सेवन करने से वंचित रह जाते हैं प्रयास यह किया जाना कि कम कीमत पर उत्तम पोषक तत्वों से युक्त खाद्य पदार्थों का चयन करके शारीरिक विकारों से मुक्त रह सकें।

 

कृषि उत्पादकता, पोषण स्तर एवं कुपोषण जनित बीमारियाँ, शोध-प्रबंध 2002

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

प्रस्तावना : कृषि उत्पादकता, पोषण स्तर एवं कुपोषण जनित बीमारियाँ

2

अध्ययन क्षेत्र की वर्तमान स्थिति

3

सामान्य भूमि उपयोग एवं कृषि भूमि उपयोग

4

सामान्य भूमि उपयोग एवं कृषि भूमि उपयोग

5

कृषि उत्पादकता एवं जनसंख्या संतुलन

6

कृषि उत्पादकता एवं जनसंख्या संतुलन

7

कृषकों का कृषि प्रारूप कृषि उत्पादकता एवं खाद्यान्न उपलब्धि की स्थिति

8

भोजन के पोषक तत्व एवं पोषक स्तर

9

कृषक परिवारों के स्वास्थ्य का स्तर

10

कृषि उत्पादकता में वृद्धि के उपाय

11

कृषि उत्पादकता, पोषण स्तर एवं कुपोषण जनित बीमारियाँ : निष्कर्ष एवं सुझाव

 

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