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कृषि में कारपोरेट का दबदबा

Author: 
रविशंकर
Source: 
राष्ट्रीय सहारा, 02 दिसम्बर, 2017

सरकार जनता की सुविधाएँ और सब्सिडी घटा रही है। खेती से जीविका नहीं चलती। फसल संबंधित उद्योग-धंधों पर, जो पहले लघु क्षेत्र के लिये आरक्षित थे, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का वर्चस्व है। मनरेगा में काम घटा दिया गया है। रसोई गैस और मिट्टी के तेल में पहले कैश ट्रांसफर शुरू किया गया, फिर सब्सिडी हटाकर सिलेंडर महँगे कर दिए

स्वतंत्र भारत से पूर्व और स्वतंत्र भारत के पश्चात एक लंबी अवधि व्यतीत होने के बाद भी भारतीय किसानों की दशा में सिर्फ 19-20 का ही अंतर दिखाई देता है। जिन अच्छे किसानों की बात की जाती है, उनकी गिनती उंगलियों पर की जा सकती है। बहरहाल, देश की 70 फीसदी आबादी गाँवों में रहती है, और कृषि पर ही निर्भर है। ऐसे में किसानों की खुशहाली की बात सभी करते हैं, और उनके लिये योजानाएँ भी बनाते हैं किन्तु उनकी मूलभूत समस्या ज्यों की त्यों बनी रहती है क्योंकि आज भी खेती-किसानी गहरे संकट में है। फसलों की लागत और बिक्री का लेन-देन किसानों के विरुद्ध और कंपनियों के पक्ष में है। खेती के विकास का ‘हरित क्रांति’ प्रारूप साम्राज्यवादी कंपनियों के पक्ष का साबित हुआ है। यही वजह है कि अक्सर किसानों की आत्महत्या की खबरें सुनने को मिलती हैं, जबकि देश की कुल जीडीपी में कृषि का हिस्सा गिरते जाने के बावजूद यह रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत है।

जबकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चुनावों में 5 सालों में किसानों की आमदनी दोगुनी करने, कर्ज माफ करने, स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार समर्थन मूल्य लागत का दोगुना करने के वादे किए थे। लेकिन भाजपा सरकार 2014 के अपने चुनाव घोषणा पत्र और चुनाव वादों से पीछे हटती हुई दिखाई दे रही है। मोदी ने यह तो ठीक ही दावा किया था कि 60 सालों से कांग्रेस ने किसानों को बर्बाद किया, उन्हें मरने दिया है पर 3 साल के मोदी शासन में भी किसान मर रहे हैं। उन पर सरकारी कर्ज 8.11 लाख करोड़ से 55 फीसद बढ़कर 12.6 लाख करोड़ रुपये हो गया। 1995 से लगभग 4 लाख किसान और इतने ही मजदूर आत्महत्या कर चुके हैं। यह ठीक है कि जब किसान लड़े, तब कर्जमाफी की कुछ घोषणाएँ हुई, जो कई शर्तों के साथ देने की बात कही गई। उत्तर प्रदेश में तो 1 व 2 रुपये जैसी तुच्छ रकमें माफ की गईं जबकि वर्तमान सरकार से किसानों ने काफी उम्मीदें लगा रखी थीं। बेशक, कुछ राज्यों ने जनांदोलन के दबाव में कुछ कर्ज माफ किए गए पर केंद्र सरकार की घोषणाएँ कर्जमाफी के खिलाफ हैं, सरकार कहती है कि कर्जमाफी और सब्सिडी के लिये उसके पास पैसा नहीं है। इससे बैंकों को घाटा होगा। इतना ही नहीं, विदेशी कंपनियों के बीज, खाद, कीटनाशक दवा बहुत महँगे हैं। सरकार हर वस्तु पर सब्सिडी घटा रही है, टैक्स बढ़ा रही है। महँगाई के कारण कर्जदारी बढ़ रही है।

किसान की बेहाली का अंदाजा


खैर, किसान की बेहाली का अंदाजा उन पर कर्ज के आंकड़ों से भी लगाया जा सकता है। मौजूदा वक्त में देश भर के किसानों पर 12 लाख 60 हजार करोड़ का कर्ज है, जिसे माफ करने के लिये तमाम राज्य सरकारों के पास पैसा है नहीं। तो दूसरी तरफ 17 लाख 15 हजार करोड़ की टैक्स में माफी उद्योग सेक्टर को सिर्फ बीते तीन वित्तीय वर्ष में दे दी गई यानी उद्योगों को डायरेक्ट या इनडायरेक्ट टैक्स में अगर कोई माफी सिर्फ 2013 से 2016 के दौरान न दी गई होती तो उसी पैसे से देश भर के किसानों के कर्ज की माफी हो सकती थी। तो ऐसे में क्या कहा जाए। किसान सरकार की प्राथमिकता में कभी रहा ही नहीं। यह सवाल इसलिये क्योंकि एक तरफ एनपीए या उद्योगों को टैक्स में रियायत देने पर सरकार से लेकर बैंक तक खामोश रहते हैं, लेकिन दूसरी तरफ किसानों की कर्जमाफी का सवाल आते ही महाराष्ट्र से लेकर पंजाब के सीएम तक केंद्र सरकार से मुलाकात कर पैसों की मांग करते हैं। और केंद्र सरकार किसानों का मुद्दा राज्य का बताकर पल्ला झाड़ती हुई दिखाई देती है। तो अहम सवाल है कि क्या किसान देश की प्राथमिकता में है ही नहीं।

केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार ने राज्य सभा में 16 जून, 2016 को बताया था कि उद्योगों को तीन साल (2013-2016) में 17 लाख 15 हजार करोड़ रुपये की टैक्स माफी दी गई। तो दूसरी तरफ कृषि राज्य मंत्री पुरुषोत्तम रुपाला ने नवम्बर, 2016 में जानकारी दी कि किसानों पर 12 लाख 60 हजार रुपये का कर्ज है, जिसमें 9 लाख 57 हजार करोड़ रुपये कॉमर्शियल बैंक से लिये गए हैं यानी एक तरफ उद्योगों को राहत तो दूसरी तरफ उद्योगों और कॉरपोरेट को कर्ज देने में किसी बैंक को कोई परेशानी नहीं है। लेकिन किसानों के कर्जमाफी को लेकर बैंक से लेकर हर सरकार को परेशानी जबकि देश का सच यह भी है कि जितना लाभ उठाकर उद्योग जितना रोजगार देश को दे नहीं पाते, उससे 10 गुना ज्यादा लोग खेती से देश में सीधे जुड़े हैं। फिर भी वैश्वीकरण की आंधी ने तो अब किसानों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाकर छोड़ दिया है। किसान पहले से कहीं ज्यादा असंगठित हैं, और कर्ज के बोझ तले दबकर आत्महत्या करने को विवश हैं।

इस बीच, आर्थिक मंदी और बेरोजगारी तेजी से बढ़े हैं। सरकार जनता की सुविधाएँ और सब्सिडी घटा रही है। खेती से जीविका नहीं चलती। फसल संबंधित उद्योग-धंधों पर, जो पहले लघु क्षेत्र के लिये आरक्षित थे, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का वर्चस्व है। मनरेगा में काम घटा दिया गया है। रसोई गैस और मिट्टी के तेल में पहले कैश ट्रांसफर शुरू किया गया, फिर सब्सिडी हटाकर सिलेंडर महँगे कर दिए। इस साल उसने खाद की सब्सिडी को भी नकद ट्रांसफर में डाल दिया है। खाद अब खुले रेट पर (3-4 गुना) बिकेगी। इतना ही नहीं, सरकार ने राशन में भी सस्ता गल्ला बंद कर छूट का नकद भुगतान शुरू किया है ताकि गल्ला सस्ते में न बिके और बड़े व्यापारी व कंपनियां मनमाने रेट पर अनाज बेच सकें। सरकारी राशन समाप्त होगा तो किसानों से समर्थन मूल्य पर खरीद भी बंद हो जाएगी और फसल सस्ते में बिकेगी। शांता कुमार समिति ने 2015 में ऐसा करने को कहा था। विदेशी कंपनियों के पक्ष में संचालित विश्व व्यापार संगठन की शर्तों में भी 2018 तक ऐसा करने का निर्देश है।

कई राज्य सरकारें कॉरपोरेट खेती को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही हैं। सरकार द्वारा की गई नोटबंदी और जीएसटी तथा कैशलेस लेन-देन योजना के कारण किसानों को अपनी फसल का बाजारी रेट भी मिलना मुश्किल हो गया। इससे छोटे दुकानदार, व्यापारी और उत्पादक भी बर्बाद हो गए हैं। इससे भी बड़े व्यापारियों, विदेशी और घरेलू कॉरपोरेटों को भारी लाभ मिल रहा है। वे किसानों की उपज सस्ते में खरीद कर महँगे में बेच रहे हैं। सरकार किसानों और मजदूरों से उनके संसाधन छीनकर भी कॉरपोरेटों को दे रही है। खेती की जमीन अधिग्रहण कर स्मार्ट शहर, उद्योगों के लिये दे रही है। खेती के नाम पर बड़े बांध बना कर पानी कंपनियों को दे रही है। साफ है, खेती अब आकर्षक पेशा नहीं रही और किसान दूसरे क्षेत्रों में जाने की कोशिश कर रहे हैं। सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना के आंकड़ों से पता चलता है कि 75 फीसद किसान परिवारों की आय 5000 रुपये मासिक से कम है, और सिर्फ 10 फीसद किसान परिवारों की आय 10 हजार रुपये प्रति महीने से ज्यादा है। यों कहें कृषि अर्थव्यवस्था तो अब सारी बाजार और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पास चली गई है। आखिर, क्या कारण है किसान खेती से बाहर आना चाहते हैं? इस पर विचार होना ही चाहिए। अगर 130 करोड़ जनता को अन्न चाहिए तो अन्नदाता को गाँव में रोकना होगा, उसे बेहतर जीने का अवसर देना होगा, जैसा दुनिया के विकसित राष्ट्र अपने किसानों को देते हैं, वैसी व्यवस्था लानी ही होगी।

लेखक सेंटर फॉर इन्वायरनमेंट एंड फूड सिक्योरिटी से संबद्ध हैं।

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