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मध्य भारत के विकास की धुरी नर्मदा

Author: 
डॉ. पंकज श्रीवास्तव
Source: 
नर्मदा के प्राण हैं वन, नर्मदा संरक्षण पहल - 2017

नर्मदा मध्य भारत के आर्थिक-सामाजिक विकास की धुरी है। इसे यूँ ही मध्य प्रदेश की जीवनरेखा नहीं कहा जाता है। आदिम जन जीवन की सांस्कृतिक छटाओं से भरपूर नर्मदा अंचल में खेती, उद्योग और अन्य अनेक व्यावसायिक गतिविधियाँ नर्मदा के जल पर ही निर्भर हैं और यदि नर्मदा के स्वास्थ्य को कोई क्षति पहुँचती है तो उसका खामियाजा अंचल में एक-एक विशाल जनसंख्या के साथ-साथ पूरी अर्थव्यवस्था को भुगतना पड़ेगा।

नर्मदा

नर्मदा : संक्षिप्त परिचय


मध्य भारत में नर्मदा को अन्य सभी नदियों से अधिक पवित्र माना जाता है। मध्य प्रदेश के कई जिलों के गजेटियरों में नर्मदा के बारे इस लोक मान्यता का उल्लेख है कि नर्मदा इतनी पतित पावनी है कि लोगों के पाप धो-धोकर काली पड़ जाने वाली गंगा भी वर्ष में एक बार इसमें स्नान करने के लिये कोयले जैसी काली गाय के रूप में आती है और नर्मदा में स्नान के बाद सभी पापों से मुक्त होकर शुद्ध धवल रूप में वापस चली जाती है। लोक मान्यता यह भी है कि नर्मदा का दर्शन मात्र गंगा में स्नान करने के समान पुण्यदायी है और वह इतने अधिक गुणों वाली (पवित्र) है उसके दर्शन करने वाला या उसमें स्नान करने वाला व्यक्ति सभी पापों से मुक्त हो जाता है। मध्य प्रदेश की जीवनरेखा कहलाने वाली नर्मदा नदी को प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में भारत की सात सर्वाधिक पवित्र नदियों में गिना जाता है। हिन्दुओं के छोटे-बड़े सभी धार्मिक संस्कारों और देवी-देवताओं के पूजन में देव स्नान के लिये चढ़ाए जाने वाले जल को अभिमंत्रित करने के लिये छः अन्य पवित्र नदियों के साथ नर्मदा का भी आह्वान किया जाता है। ‘नर्मदा पुराण’ तो नर्मदा नदी पर एक सम्पूर्ण ग्रन्थ ही है जो किसी नदी को लेकर रचा गया सम्भवतः इकलौता पुराण है।

गंगा से भी करोड़ों वर्ष पुरानी नदी नर्मदा के बारे में वर्णन आता है कि यह कभी नष्ट नहीं होती। कई बार प्रलयकारी अत्यन्त विषम परिस्थितियों में जब पूरी धरती पर अनावृष्टि और अकाल से जीवन समाप्तप्रायः हो चला और सारे जलस्रोत सूख गए तब भी नर्मदा बनी रही। स्कंद पुराण में उल्लेख है कि गंगा आदि नदियाँ कल्पों के बीत जाने पर समाप्त होकर पुनः उत्पन्न होती हैं परन्तु नर्मदा तो अक्षय है अर्थात यह सात कल्पों तक भी क्षय नहीं होती। स्कंदपुराण में इसे सात कल्पों के क्षय होने पर भी नष्ट न होने वाली - ‘सप्तकल्पक्षयेक्षीणे न मृता तेन नर्मदा’ (न मृता अर्थात अमर या न मरने वाली नर्मदा) कहा गया है।

वैज्ञानिक संकेतों के आधार पर उम्र की दृष्टि से देखें तो नर्मदा भारत के अनेक बड़े नदी तंत्रों विशेषकर गंगा की तुलना में बहुत पुरानी है। गंगा की उत्पत्ति जिस हिमालय पर्वत से हुई है उसकी आयु महज 5-6 करोड़ वर्ष है जबकि नर्मदा के बड़े भाई की उपमा प्राप्त विंध्य पर्वत की आयु 172 करोड़ साल व छोटे भाई कहे गए सतपुड़ा पर्वत की आयु 100 करोड़ वर्ष तक आँकी गई है। करोड़ों वर्ष पुरानी नदी होने के कारण यद्यपि किसी के लिये भी नर्मदा की आयु की ठीक-ठीक घोषणा कर पाना सम्भव नहीं है परन्तु अनेक भूवैज्ञानिक घटनाओं, पुराजलवायु और जीवाश्मों के अध्ययनों में यहाँ-वहाँ आये अनेक विवरणों के आधार पर नर्मदा की उम्र लगभग 14 करोड़ वर्ष तो स्पष्टतः मानी जा सकती है।

नर्मदा का उद्गम, प्रवाह पथ व जलग्रहण क्षेत्र


मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले में पुष्पराजगढ़ तहसील में स्थित अमरकंटक पठार पर लगभग 22 डिग्री 40 मिनट उत्तरी अक्षांश तथा 81 डिग्री 46 मिनट पूर्वी देशांतर पर नर्मदा का उद्गम समुद्र तल से 1051 मीटर की ऊँचाई पर स्थित एक कुण्ड से है। उद्गम के प्रारम्भिक क्षेत्र में नर्मदा की मुख्य धारा में छोटी-छोटी अनेक पहाड़ी धाराएँ आ-आकर मिलती जाती हैं जिनसे नर्मदा का नदीशीर्ष (Headwaters) बनता है। नर्मदा के प्रवाह पथ की कुल लम्बाई 1312 किलोमीटर है जबकि जलग्रहण क्षेत्र 98796 वर्ग किमी. में फैला हुआ है।

नर्मदा अंचल


इस पुस्तक में ‘नर्मदा अंचल’ शब्द का अनेक स्थानों पर प्रयोग किया गया है अतः यह खुलासा कर देना आवश्यक है कि ‘नर्मदा अंचल’ से हमारा आशय क्या है? वस्तुतः ‘नर्मदा अंचल’ कोई स्पष्ट परिभाषित राजनीतिक-प्रशासनिक इकाई नहीं है। इससे हमारा आशय है नर्मदा नदी के इर्द-गिर्द का प्राकृतिक, भौगोलिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र। व्यावहारिक तथा तकनीकी दृष्टि से इसे ‘नर्मदा कछार’, ‘नर्मदा थाला’ या ‘नर्मदा बेसिन’ (Narmada Basin) कहा जा सकता है। हम इस पुस्तक में ‘नर्मदा अंचल’ नाम को थोड़ा व्यापक अर्थ में प्रयोग कर रहे हैं जिसमें भौगोलिक-आर्थिक सन्दर्भों के साथ-साथ सामाजिक, धार्मिक व सांस्कृतिक सन्दर्भों को भी समेट लेने की सहजता है।

नर्मदा अंचल में नर्मदा घाटी के साथ-साथ सतपुड़ा और विंध्य पर्वत श्रेणियों का वह भाग भी सम्मिलित है जिसका जल-अपवाह अन्ततः जाकर नर्मदा में मिलता है और जहाँ के निवासियों का जीवन नर्मदा और उसकी सहायक नदियों से प्रत्यक्ष या परोक्ष किसी भी रूप में जुड़ा है। इस व्यापक नजरिए से हम इस पुस्तक के सन्दर्भ में इस भूभाग को ‘नर्मदालय’ कहे जाने में भी आपत्ति नहीं करेंगे।

 

मध्य प्रदेश का जलग्रहण क्षेत्र उत्तर, दक्षिण, पूर्व तथा पश्चिम सभी दिशाओं की नदियों को जल से पोषित करके भारत के संदर्भ में हिमालय से भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस राज्य के उच्च प्रदेशों से सभी दिशाओं में नदियाँ प्रवाहित होती हैं। परन्तु भूमि की बनावट से कहीं ज्यादा इन नदियों को सम्भाले रखने और काफी फैले हुए भू-भाग में आने वाले वर्षा के जल को देश के अन्य भागों के साथ ठीक से बाँटने का काम ये नदियाँ राज्य के वनों के कारण ही कर पाती हैं। सोन और चम्बल के बिना गंगा कैसी होगी? महानदी के बिना उड़ीसा कहाँ होगा या अपनी महत्त्वपूर्ण सहायक नदी इन्द्रावती के बिना गोदावरी का क्या हाल होगा? बेतवा के बिना बुंदेलखंड, ताप्ती के बिना महाराष्ट्र और नर्मदा के बिना गुजरात बंजर हो जायेंगे। - एम. एन. बुच, मध्य प्रदेश के वन

 

नर्मदा मध्य भारत के विकास की धुरी है। खेती, पानी, बिजली, उद्योग, अधोसंरचना विकास सभी का काफी हद तक दारोमदार नर्मदा के कंधों पर ही है। इस नजरिए से मध्य प्रदेश और गुजरात राज्य में टिकाऊ विकास के लिये नर्मदा का पुष्ट और स्वस्थ होना आवश्यक है। लेकिन वर्तमान में प्राप्त हो रहे संकेत तो कम-से-कम इसी ओर इशारा करते हैं कि यहाँ के जंगलों की दशा यदि और बिगड़ी तो नर्मदा और उसकी गोद में रहने वालों के लिये आने वाले समय में काफी गम्भीर समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। जंगल और नर्मदा को लेकर यह चिन्ता निराधार नहीं है। वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट, वाशिंगटन डी.सी. द्वारा अनेक नदी बेसिनों को लेकर कराए गए एक अध्ययन ‘पायलट एनालिसिस ऑफ ग्लोबल इकोसिस्टम’ में नर्मदा को विश्व के सबसे ज्यादा संकटग्रस्त 6 नदी बेसिनों में से एक पाया गया है जिनमें वर्ष के 4 सबसे शुष्क महीनों में कुल वार्षिक प्रवाह का 2 प्रतिशत से भी कम जल रह जाता है। इस अध्ययन में यह आशंका व्यक्त की गई है कि इन नदी बेसिनों में रहने वालों को वर्ष 2025 आते-आते ढंग से जीने के लिये जरूरी पानी की आवश्यक मात्रा भी शायद ही नसीब हो। इसी प्रकार आई.आई.टी., नई दिल्ली द्वारा ग्रीन हाउस गैसों के बढ़ने पर नर्मदा में जल उपलब्धता पर प्रभाव सम्बन्धी अध्ययन के निष्कर्ष भी चिन्ताजनक हैं। भारत के जनगणना महानिदेशक द्वारा मई 2006 में जारी किये गए 2001 से 2026 के बीच जनसंख्या वृद्धि के प्रक्षेपित आँकड़ों को आधार मानकर अनुमान लगाएँ तो नर्मदा अंचल के जिलों की कुल आबादी जो वर्ष 1901 में मात्र 65.69 लाख और 2001 में 3.31 करोड़ थी वह वर्ष 2026 आते-आते लगभग 4.81 करोड़ हो जाने का अनुमान है। इससे नर्मदा अंचल के जल-जंगल-जमीन पर कितना बोझ बढ़ जाएगा यह सोच भी सिहरन पैदा करती है। इस प्रकार के अध्ययनों व प्रतिवेदनों से प्राप्त संकेतों को समझें तो नर्मदा के कल्याणकारी रूप को बचाए रखने के लिये हमें समय रहते कुछ कड़े और बड़े निर्णय लेने के लिये तैयार होना पड़ेगा।

हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि हिम विहीन नदियों के कछार में मौजूद जंगलों में जल जमा होना एक भूमिगत गुल्लक जैसी खास बैंकिंग प्रणाली सा होता है। नर्मदा कछार के जंगलों की इस विशिष्ट जल बैंकिंग प्रणाली के बिना इन नदियों के साथ-साथ इनके आस-पास रहने वाली आबादी की क्या हालत हो सकती है यह सोचकर हमें इन जंगलों का हृदय से शुक्रगुजार होना चाहिए और इनकी सुरक्षा की पक्की व्यवस्था करनी चाहिए ताकि नर्मदा और इसकी सहायक नदियों में जल का प्रवाह निरन्तरता में बना रहे। यदि नर्मदा अंचल के पहाड़ी क्षेत्रों में मौजूद वन आवरण के छीजने के कारण इन वनों की विशिष्ट जल बैंकिंग प्रणाली ध्वस्त या क्षतिग्रस्त हो जाये तो पूरे नर्मदा अंचल में विकास के सपने पंख नुचे पंछी की तरह धराशायी होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।

उपर्युक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि नर्मदा अंचल के जल, जमीन और जंलग के आपसी जुड़ाव और एक-दूसरे पर निर्भरता को देखने-दिखाने और उसके आधार पर विकास के समग्र खाके खींचने की जरूरत है। खेद का विषय है कि विकास की हड़बड़ी में हमारे योजनाकार और विकास के कर्ताधर्ता जंगल और पानी के इस नाजुक प्राकृतिक सम्बन्ध को जाने-अनजाने चोट पहुँचाते रहे हैं। इस बारे में हम सबको प्रकृति द्वारा दी जा रही चेतावनी पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है जिसे हम बहुत ज्यादा समय तक अनदेखा भी नहीं कर सकते। हम धरती के प्राकृतिक सन्तुलन का सम्मान करना सीख कर अपने चिंतन, आचरण और कामकाज के ढर्रे में सकारात्मक बदलाव ला सकें तो ठीक, वरना कुछ दशकों बाद लिखे जाने वाले गीतों के मुखड़े बिगड़कर “हम उस देश के वासी हैं जिस देश में नदियाँ बहती थीं..” होते देर नहीं लगेगी।

नर्मदा अंचल की पारिस्थितिक सुरक्षा के लिये जल और जंगल


किसी देश की पारिस्थितिक सुरक्षा शत्रु से देश की सीमाओं की सुरक्षा से कम महत्त्वपूर्ण नहीं है क्योंकि शत्रु तो घोषित युद्ध के समय अधिक क्षति पहुँचाता है और उससे लड़ाई का स्थान व समय भी नियत होता है जबकि जल-जंगल-जमीन और नाजुक पारिस्थितिक तंत्र की दुर्दशा बिना किसी घोषित युद्ध के चुपचाप देश को हर समय घुन की तरह अन्दर से खोखला करती जाती है। युद्ध काल में शत्रु देश को जो क्षति पहुँचाता है उससे तो देश कुछ समय बाद उबर जाता है परन्तु पारिस्थितिक सुरक्षा के स्तम्भों अर्थात मिट्टी, पानी, जंगल, नदियों, पहाड़ों आदि को जो क्षति हो रही है उससे उबरना बड़ा कठिन होगा। दुर्भाग्य से देश की पारिस्थितिक सुरक्षा को मजबूती देने वाले जंगलों और नदियों को विकास की अधोसंरचना के रूप में अभी उतनी अहमियत नहीं मिल पा रही है जितनी मिलनी चाहिए और नर्मदा भी इसका अपवाद नहीं है। परन्तु विकास को दिशा देने वालों को जितनी जल्दी यह समझ में आ जाये कि समाज को बड़ी मुसीबतों और व्यापक आर्थिक मंदी से बचाने के लिये पारिस्थितिक सुरक्षा को लम्बी अवधि तक नजरअन्दाज करना सम्भव नहीं होगा, उतना ही बेहतर होगा। नर्मदा घाटी की पारिस्थितिक सुरक्षा में यहाँ के वनों की बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। नर्मदा अंचल में विकास की गति अथवा दुर्गति का निर्धारण करने वाले संसाधनों में से एक प्रमुख संसाधन जल की उपलब्धता यहाँ के पहाड़ों और जंगलों की दशा पर काफी हद तक निर्भर है। नर्मदा के उत्तर में स्थित विंध्याचल और दक्षिण में स्थित सतपुड़ा श्रेणियाँ तथा उनमें मौजूद विविध प्रकार के जंगल और उनकी समृद्ध जैविक विविधता नर्मदा अंचल की दीर्घकालिक पारिस्थितिक सुरक्षा की नींव का निर्माण करती हैं। इस पारिस्थितिक सुरक्षा पर यहाँ की खेती और अर्थव्यवस्था भी काफी सीमा तक निर्भर है। वनों के माध्यम से जलीय चक्र का संचालन नर्मदा घाटी की जलवायु और उत्पादकता को सीधे-सीधे प्रभावित करता है। पारिस्थितिकीय सुरक्षा के अभाव में नर्मदा घाटी में जन समुदाय का जीवन और आजीविका दोनों ही गहरे संकट में पड़ जाएँगे। अतः विकास की राह में रोड़ा समझे जाने की बजाय वनों को विकास का संरक्षक और पोषक माना जाना चाहिए, जो जलवायु के खतरनाक उतार-चढ़ाव से अंचल की रक्षा करते हैं और अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक गतिविधियों का ठोस आधार बनते हैं।

अन्य राज्यों को जाने वाली अनेक नदियों के उद्गम स्थल इस प्रदेश के वन अंचलों में होने के कारण यह मुद्दा न केवल मध्य प्रदेश वरन कई पड़ोसी राज्यों की पारिस्थितिक सुरक्षा से भी जुड़ा है। अतः नर्मदा अंचल की पारिस्थितिक सुरक्षा की चौकसी के लिये जल और जंगल को एक ही संसाधन के दो पहलुओं के रूप में देखने और कदम उठाने की जरूरत है। देश की बढ़ती जनसंख्या के फलस्वरूप जल, जंगल और जमीन से जुड़ी पर्यावरणीय चुनौतियों के बढ़ते जाने के कारण इसमें कोई सन्देह नहीं कि आने वाले समय में देश की पारिस्थितिक सुरक्षा सशस्त्र सेना द्वारा देश की सीमाओं की निरन्तर सुरक्षा जैसी ही महत्त्वपूर्ण होती जा रही है। उपरोक्त परिस्थितियाँ देश और प्रदेश के साथ-साथ नर्मदा अंचल के लिये भी उतनी ही प्रासंगिक हैं अतः यहाँ के जल-जंगल और जमीन के बेहतर प्रबन्धन के लिये चिन्तन में नीतिगत बदलाव और क्रियान्वयन में प्रशासनिक चुस्ती के साथ-साथ वित्तीय संसाधनों की कमी को दूर करने की आवश्यकता है।

ये नर्मदा की धारा, धारा है जिन्दगी की…


नर्मदा को उसके प्रवाह की सुन्दरता के लिये सौन्दर्य नदी भी कहा गया है। वन अंचलों, गाँवों और शहरों से होकर गुजरती नर्मदा और उसकी सहायक नदियों जंगलों से काफी गहराई से जुड़ी हैं। हरियाली से लदे, घने जंगल, न केवल नर्मदा और उसकी सहायक नदियों की सुन्दरता बढ़ाने के लिये जरूरी हैं बल्कि उनसे हमारी जीवनदायी नदियों की सेहत भी जुड़ी है। नदियों का प्रवाह और पानी की गुणवत्ता काफी हद तक वनों पर निर्भर करती हैं। नर्मदा की धारा सतत प्रवाहित होती रहें और उसका पारिस्थितिकीय तंत्र जंगल, मिट्टी, पानी और जीव सुरक्षित रहें, यही सन्देश देता गीत।

ये नर्मदा की धारा, धारा है जिन्दगी की;
कहती हुई कहानी, बहती हुई नदी की।
मैकल से बह के निकली पतली सी एक धारा;
जीवन प्रवाहमय है, करती हुई इशारा।
मुड़ती कहीं साँपों सी, लहराती-बलखाती;
कहीं अट्टहास करती, कहीं मन्द सी मुस्काती।
कहीं लीन योगियों सी, गम्भीर धीर धारा;
कहीं सहमी नववधू सी, सिमटा हुआ किनारा।
अल्हड़ किशोरी जैसे कहीं यूँ ही कूद पड़ती,
पथरीली तलहटी पर कहीं गर्व से अकड़ती।
कहीं बच्चियों सी चंचल, कलकल का शोर करती;
कहीं बिफरती गरजती, ऊँचाई से उतरती।
गंगा से भी पुरानी, गाथा है इस नदी की;
उत्पत्ति नर्मदा की, किस युग की, किस सदी की।
ये नर्मदा की धारा…………….
कहीं एक धार बँटकर बनती सहस्रधारा;
कहीं धुआँधार गर्जन से गूँजता किनारा।
अठखेलियाँ करती हुई, चट्टानी बिछौने पर;
वो जा रही है रेवा, मुड़ती किसी कोने पर।
मोहक हैं मोड़ इसके, दाएँ तो कभी बाएँ;
आ-आ के इसमें जुड़तीं छोटी-बड़ी सरिताएँ।
चोरल, तवा, दतौनी, बुढ़नेर, शेर, शक्कर;
कोलार, हिरन, हथनी, गंजाल, डेब, बंजर।
ये नर्मदा की सखियाँ बरसों बरस पुरानी;
खुद रीत जाएँ लेकिन देतीं हैं इसे पानी।
मन मोह लिया करती है छटा इन सभी की;
है ख्याति नर्मदा की, सौन्दर्य की नदी की।
ये नर्मदा की धारा……..
अब नर्मदा में काफी बदलाव आ गए हैं;
जंगल, पहाड़ कितने जल में समा गए हैं।
जो घूमती थी सतपुड़ा और विंध्य के काँधों में;
वो चिरकुँवारी नर्मदा अब बँध गई बाँधों में।
अब तो प्रवाह नर्मदा का जगह-जगह ठहरा;
पानी पे नजर सबकी, संकट ये बड़ा है गहरा।
नदियों से जंगलों की अब बढ़ रही है दूरी;
पर नर्मदा के वास्ते जंगल भी हैं जरूरी।
अंचल में नर्मदा के, फैली रहे हरियाली;
नदियों की धार भी हो, अविरल प्रवाहशाली।
सब हों सुखी, निरोगी छाया न हो बदी की;
दस्तक न पड़ने पाये कभी किसी त्रासदी की।
ये नर्मदा की धारा, धारा है जिन्दगी की;
कहती हुई कहानी, बहती हुई नदी की।


नर्मदा का भौतिक स्वरूप उसके आध्यात्मिक संसार की वाह्य अभिव्यक्ति है। देह के अभाव में कोई भी अपना धार्मिक और आध्यात्मिक स्वरूप कैसे व्यक्त कर सकता है... अनिल माधव दवे, अमरकंटक से अमरकंटक तक

हम शायद यह कभी नहीं समझेंगे कि मिट्टी, पानी और हवा की रक्षा में वन जो सेवाएँ देते हैं उनका मूल्य कितने अरब रुपए हैं। मध्य प्रदेश चूँकि देश का हृदय प्रदेश है इसलिये उसके वनों की पर्यावरण सेवा का लाभ तो समूचा देश उठाता है। यदि दुर्भाग्यवश यहाँ नदियों के जलग्रहण क्षेत्र वन कवच से वंचित हो जाएँ तो देश की अनेक नदी प्रणालियों को क्षिप्रा से मंथरा होने में अधिक समय नहीं लगेगा...महेश श्रीवास्तव, प्रणाम मध्य प्रदेश

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