आदिवासियों ने विकसित किया वाटर सप्लाई सिस्टम

Submitted by editorial on Sun, 07/29/2018 - 15:18
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ग्रामीणों की मेहनत से पानीदार हुआ मामाडोहएक गाँव ने अपना खुद का वाटर सप्लाई सिस्टम विकसित कर सबको चौंका दिया है। यह गाँव बीते 15 सालों से भीषण जलसंकट का सामना कर रहा था लेकिन कुछ ही दिनों की मेहनत में गाँव के लोगों ने पानी का खजाना ढूँढकर उसे सहेज लिया। जहाँ पहले पानी की तलाश में औरतें तीन से पाँच किमी तक की दूरी तय करती थीं अब उन्हें अपने घर के दरवाजे पर लगे नल से ही पानी मिल जाता है। अब न किसी को पलायन करना पड़ रहा है और न ही अपने मवेशी बेचने पड़ रहे हैं।

मध्य प्रदेश के खंडवा जिले के आदिवासी बाहुल्य इलाके खालवा विकासखण्ड में 32 किमी दूर जंगल के बीच एक छोटा-सा गाँव है, मामाडोह। धावड़ी पंचायत के इस गाँव की आबादी करीब डेढ़ हजार है जिसमें ज्यादातर कोरकू जनजाति के आदिवासी परिवार ही हैं।

पच्चीस साल पहले तक पानी की कोई दिक्कत ही नहीं थी। एक कुआँ एवं आसपास कुछ और कुएँ या झिरियाँ थीं। दो-चार हाथ की रस्सी पर पानी आसानी से मिल जाया करता था। गाँव से कुछ दूरी पर जनवरी तक नाला बहता था। आसपास घना जंगल हुआ करता था और इनके पूर्वज उसी जंगल के प्राकृतिक परिवेश में घुल-मिलकर रहते आये थे। जंगल के कई राज इन्हें पता हैं और यहाँ के चप्पे-चप्पे से इनकी गहरी पहचान है। वनोपज पर आश्रित रहते हुए भी इन्होंने हमेशा जंगलों को संरक्षित किया है।

लेकिन बीते सालों में पेड़ों की अन्धाधुन्ध कटाई के बाद अब इलाके में भी पहले जैसे जंगल नहीं बचे हैं। अब इनके परिवार का पालन-पोषण छोटी जोत वाली खेती और मेहनत-मजदूरी के कामों के बल पर होता है। इनके सामने रोटी के साथ ही पानी का भी संकट था। परम्परागत जलस्रोतों की उपेक्षा तथा पानी के लापरवाहीपूर्ण उपयोग ने इस आदिवासी क्षेत्र में पानी अब बड़ी समस्या बनता जा रहा है। साफ पानी नहीं मिलने से इलाके के लोगों को झीरी या खेतों के कुओं, हैण्डपम्पों आदि के अलावा जहाँ से भी जैसा पानी मिले, उसे ही पीना पड़ता है। कई बार दूषित पानी पीने से इलाके में लोगों को कई तरह की बीमारियों का सामना भी करना पड़ता है।

स्पंदन समाज सेवा समिति की सीमा प्रकाश बताती हैं कि बीते कुछ सालों में इधर का पर्यावरण भी खराब हुआ है तथा जमीनी पानी का स्तर लगातार नीचे गया है। अकेले मामाडोह गाँव की ही बात नहीं, इस पूरे ब्लॉक में ही कमोबेश यही स्थिति है। लेकिन खुशी की बात यह है कि अब यहाँ के आदिवासियों ने पानी की कीमत पहचान ली है और वे गाँव-गाँव पानी बचाने की जुगत में लगे हैं। इस क्षेत्र के महिलाओं के हौसले की भी दाद देनी होगी। 11 गाँवों की 500 से ज्यादा औरतों ने खुद अपनी मेहनत से 10 जलस्रोतों को पुनर्जीवित किया है और जल संकट से मुक्ति पाई है। इससे करीब 10 हजार आदिवासियों को फायदा हुआ है और ये गाँव अब पानी के लिये आत्मनिर्भर हो चुके हैं।

हमारे साथ चल रहे प्रकाश भाई बात को आगे बढ़ाते हुए बताते हैं कि इसकी बानगी खंडवा से सौ किमी दूर चबूतरा गाँव के तालाब में देखी जा सकती है। कभी दिसम्बर-जनवरी में सूख जाने वाला तालाब इस गर्मी में भी सूखा नहीं है। महीने भर पहले तक यहाँ गाँव की औरतें मछलीपालन करती रहीं। इस तालाब को खुद औरतों ने गैंती-तगारी उठाकर जिन्दा किया है। बीते साल इस गाँव में पीने के पानी तक की किल्लत रही। औरतें दूर-दूर के खेतों से पानी लाती थी। लेकिन इस बार तालाब में पानी होने से ऐसी कोई परेशानी नहीं हुई। लोग बुधियाबाई की तारीफ करते नहीं अघाते, जिसने सबसे पहले स्पन्दन की प्रेरणा से गाँव में तालाब सँवारने का बीड़ा उठाया। फिर तो औरतें जुटती गई।

इलाके के जमाधड और जमोदा में भी लोगों ने तालाब सहेजा तो पानी की कमी नहीं रही, जलस्तर बढ़ गया और पुराने ट्यूबवेल भी पानी देने लगे। इसी तरह मीरपुर, मोहन्या ढाना, फोकटपुरा, जमोदा और मातापुरा में गाँव के लोगों ने पीढ़ियों पुराने उपेक्षित पड़े कुओं को सँवारा और अब गर्मियों में बिना किसी परेशानी के उन्हें पानी मिल रहा है। इतना ही नहीं इलाके के कई गाँवों से होकर एक छोटी-सी नदी बहती है, इसका नाम है बंगला नदी। कुछ सालों पहले तक इस नदी में मार्च के महीने तक अच्छा पानी रहता था, लेकिन अब तो यह बारिश के बाद ही सूखने लगी है।

कुछ गाँव की औरतों ने अपने नजदीक से बहने वाली इस नदी में भी अपनी गैंती चलाई और देखते-ही-देखते बरसों से जमा गाद को हटाया तो इस साल से इसमें भी पर्याप्त पानी रहने लगा है। यहाँ की महिलाओं ने बीते साल खूब काम किया है। उसी से प्रेरणा लेकर अब आसपास के गाँव के लोग भी इस साल अपने गाँवों में यही कहानी दोहरा रहे हैं। इस बार छोटी नदियों और नालों पर लोग कई जगह बोरी बंधान बन रहे हैं ताकि बरसात के व्यर्थ बह जाने वाले पानी को गाँव के नजदीक ही रोका जा सके। इसका पानी तो काम आएगा ही, इलाके का जलस्तर भी बढ़ा देगा।

अब बात मामाडोह की, यहाँ दस-पन्द्रह साल पहले गर्मियों के दौरान कुएँ में पानी की कमी आने लगी तो सरकारी अफसरों ने कुछ हैण्डपम्प लगा दिये। हैण्डपम्प से पानी भरना आसान हो गया तो लोगों ने कुएँ की ओर ध्यान देना कम कर दिया। धीरे-धीरे पूरा गाँव ही यहाँ के चार हैण्डपम्प पर निर्भर हो गया। उधर साल-दर-साल कुआँ गाद और कचरे से भरता रहा।

थोड़े ही दिनों में चार में से दो हैण्डपम्प बन्द हो गए तो पानी की किल्लत महसूस हुई। देखा तो हैण्डपम्प में पानी ही नहीं था। जलस्तर नीचे चला गया। खैर, दो हैण्डपम्प अभी भी पानी दे रहे थे। लेकिन कुछ साल पहले इनमें भी पानी की उपलब्धता कम हो गई। गर्मियों में तो ये आधे गाँव को भी पानी नहीं पिला पाते थे। ऐसे में शुरू हुई गाँव के लिये पानी की तलाश। कोई किसी खेत के कुएँ से पानी भर लाता तो कोई किसी ट्यूबवेल से। तीन से पाँच किमी तक घूम-घूम कर औरतों को अपने सिर पर घड़े रखकर लाना पड़ता था। बच्चों को भी स्कूल के बदले पानी लेने जाना पड़ता था जिससे परिवार में एक घडा पानी ज्यादा आता था।

कुएँ की सफाई करते ग्रामीणपीने के पानी का इन्तजाम तो फिर भी जैसे-तैसे हो जाया करता लेकिन मवेशियों को क्या पिलाएँ। हालात इतने गम्भीर हो गए कि यहाँ के कई मवेशी पालकों को अपने बाड़े के अधिकांश दुधारू गाय-भैंसों को औने-पौने दामों में बेच देना पड़ा। इतना ही नहीं कई परिवार तो हर साल गर्मियों में यहाँ से पानी और रोटी की तलाश में बाहर पलायन करने लगे। साल-दर-साल घर के कमाने लायक महिला-पुरुष बाहर चले जाते और गर्मियों के दिनों में बुजुर्ग ही बच जाया करते। पूरा गाँव वीरान हो जाया करता था। बीते दस सालों से इस गाँव में ऐसा ही चल रहा था। पानी नहीं होने से लोगों की परेशानियाँ बढ़ रही थीं। ग्रामीण आदिवासियों ने तहसील से लगाकर जिला मुख्यालय तक पानी के लिये गुहार लगाई लेकिन पानी था कहाँ? जब गाँव की जमीन में ही पानी नहीं बचा तो सरकारी अफसर भी पानी कहाँ से लाते।

इसी बीच कोरकू आदिवासियों के बीच काम करने वाली संस्था स्पंदन समाज सेवा समिति के कार्यकर्ता गाँव पहुँचे तो औरतों ने उन्हें साफ तौर पर बताया कि पानी के बिना यहाँ किसी तरह का कोई विकास सम्भव नहीं है। स्पंदन के कार्यकर्ताओं ने भी यह बात मानी कि गाँव में पानी ही नहीं तो विकास की बात बेमानी है।

सीमा प्रकाश ने गाँव के सब लोगों की एक बैठक बुलाकर कहा कि पानी के लिये काम करना है तो हम सबको एकजुट होकर मेहनत करना पड़ेगा। पानी कहीं बाहर से नहीं आएगा। वह तो यहीं की जमीन से निकलेगा पर हम सबको अपनी गलती का प्रायश्चित करते हुए अब पानी के मोल को पहचानना पड़ेगा।

आदिवासी आदमी-औरतों ने इस बात पर सहमति तो जताई लेकिन उनके सामने बड़ा सवाल यह था कि वे पन्द्रह-बीस दिनों तक गाँव में पानी के लिये काम करेंगे तो मजदूरी पर नहीं जा पाएँगे और इस बीच अपने परिवार की रोटी का इन्तजाम कैसे होगा?

इस पर स्पंदन ने भरोसा दिलाया कि वे गूँज के सहयोग से जितने दिन भी गाँव के लोग श्रमदान करेंगे, उनके लिये अनाज उपलब्ध कराएँगे। बात बन गई और तब शुरू हुई गाँव में पानी की खोजबीन। बुजुर्गों ने बताया कि गाँव में करणसिंह का कुआँ मिट्टी के ढेर में बदलता जा रहा है। यदि उसे किसी तरह साफ कर बारिश के पानी से भर लिया जाये तो अगले साल से पानी की किल्लत नहीं होगी। यह कुआँ हमारी पिछली पीढ़ियों की प्यास बुझाता रहा है।

ग्रामीणों ने उसी बैठक में तय किया कि सबसे पहले पानी के काम की शुरुआत यहीं से की जाएगी। यह बात ज्यादा पुरानी नहीं है। इसी साल के फरवरी महीने की है। इस कुएँ को साफ करना और फिर से जमीन में मिट्टी से पट चुकी इसकी आव (जलधारा) को ढूँढना मुश्किल काम था लेकिन जब पूरा गाँव गैंती-तगारी लेकर जुट गया तो फिर क्या मुश्किल। सामूहिक प्रयासों ने अपना रंग दिखाया और पन्द्रह दिनों में ही इसकी काया पलट हो गई। इस काम में 144 मानव दिवस लगे और यही काम यदि सरकारी प्रयासों से किया जाता तो करीब दो से तीन लाख रुपए खर्च होते।

ग्रामीणों के उत्साह का ठिकाना न रहा जब कुएँ की गाद हटाते हुए अनायास बरसों पुरानी आव (जलधारा) फिर से फूट पड़ी। फरवरी के महीने में कुएँ में पानी देखकर गाँव के लोग चकित थे। पानी धीरे-धीरे बढ़ता गया और देखते-ही-देखते कुआँ भरने लगा। अब आगे खुदाई करना मुश्किल था, लिहाजा काम रोक दिया गया।

कुएँ में पर्याप्त पानी आ गया तो ग्रामीणों ने स्थानीय पंचायत से आग्रह किया कि वे कुएँ में मोटर लगा दें तो गाँव में पाइपलाइन से पानी की आपूर्ति की जा सकती है। इसके लिये जरूरी बिजली खर्च आदि के लिये वे हर महीने बिल दे सकते हैं। पंचायत ने अफसरों से बात की और एक महीने में पानी घर-घर तक पहुँचने लगा। श्रमदान करने वाली राधाबाई ने बताया “पहले हमें पानी के लिये दूर-दूर खेतों तक जाना पड़ता था। लेकिन इस साल इस भीषण गर्मी के बावजूद भी गाँव की औरतों को पानी की तलाश में भटकना नहीं पड़ा”। उसने कहा कि हमें तो लगता था कि बारिश के बाद हमें इस कुएँ से पानी मिल सकेगा लेकिन हमें तो पन्द्रह दिनों में ही मिल गया। बरसों तक हम सरकारों और अफसरों से गुहार लगाते रहे। काश यह काम हम पहले ही कर लेते तो सालों तक यूँ तकलीफ नहीं भुगतनी पड़ती।

बड़ी बात यह है कि अब ग्रामीण पानी का मोल समझ गए हैं और उन्हें लगता है कि यह सब उन्हीं के प्रयासों से हुआ है तो वे खुद इस वाटर सप्लाई सिस्टम की मानिटरिंग करते हैं। कहीं पानी बह रहा हो तो सब मिलकर उसे रोकते हैं। अब तक गाँव के 80 में से पचास परिवारों के घर के दरवाजे पर नल लगे हैं। बाकी 30 परिवार इन्हीं नलों से पानी भर लेते हैं। हर दिन सुबह एक घंटे और शाम को एक घंटे नल खोले जाते हैं।

दूरस्थ अंचल में बसे मामाडोह जैसे छोटे से गाँव के कोरकू आदिवासी समाज के लोग, जिन्हें हम आमतौर पर अनपढ़ या कम पढ़ा लिखा मानते हैं, पानी की समझ के मामले में कई पढ़े-लिखे और समृद्ध गाँवों के लिये मिसाल बन गए हैं। ग्रामीणों के इस कारनामे के आगे नत-मस्तक हुआ जा सकता है। खुद का पसीना बहाकर ही हम पानीदार बन सकते हैं। पसीने के सिवा इसका कोई विकल्प नहीं। सच भी है जो समाज पानी के लिये एकजुट होकर प्रयास नहीं करेगा तो उसे पानी मिल ही नहीं सकता।

देश के लाखों गाँव नासमझी के चलते आज भयावह जल संकट का सामना कर रहे हैं। ऐसे तमाम गाँवों को मामाडोह और इसके आसपास के गाँवों से पानी को सहेजना और उसके मोल की पहचान करने का तरीका सीखने की जरूरत है। किसी भी सूरत में पानी को बनाया नहीं जा सकता, सिर्फ बचाया जा सकता है। इतनी छोटी-सी बात भी हमारे पढ़े-लिखे समझदार तबके को आखिर कब समझ आएगी। यह जिम्मेदारी समाज को ही खुद अपने हाथों में लेनी होगी, इसे कोई भी सरकार ठीक ढंग से नहीं कर सकती।

 

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मनीष वैद्यमनीष वैद्यमनीष वैद्य जमीनी स्तर पर काम करते हुए बीते बीस सालों से लगातार पानी और पर्यावरण सहित जन सरोकारों के मुद्दे पर शिद्दत से लिखते–छपते रहे हैं। देश के प्रमुख अखबारों से छोटी-बड़ी पत्रिकाओं तक उन्होंने अब तक करीब साढ़े तीन सौ से ज़्यादा आलेख लिखे हैं। वे नव भारत तथा देशबन्धु के प्रथम पृष्ठ के लिये मुद्दों पर आधारित अ

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