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सफाई के मन्दिर में बलि प्रथा

Author: 
सोपान जोशी
Source: 
'जल थल मल' किताब, जुलाई 2016, गाँधी शांति प्रतिष्ठान से साभार

सीवर की नालियों में कई जहरीली गैसें पाई जाती हैं। इनमें खास है हाइड्रोजन सल्फाइड। इसे सीवर गैस भी कहते हैं। जब नाली जैसी किसी बन्द जगह में मैला पानी अटक जाता है तब उससे यह गैस निकलती है। हवा से भारी होने के कारण यह नीचे की ओर ही बनी रहती है। हमारे शहरों के नदी-नालों के आसपास इसकी दुर्गन्ध आसानी से पकड़ी जा सकती है। मनुष्य की नाक इस जहरीली गैस की सड़े अंडे जैसी बदबू को तुरन्त भाँप लेती है। लेकिन सीवर के भीतर बार-बार उतरने वालों का सम्पर्क इस गैस से लगातार होता रहता है, जिससे उनकी सूँघने की शक्ति क्षीण हो जाती है। अखबार के किसी कोने में एक छोटी सी सुर्खी से ज्यादा जगह इस तरह की दुर्घटनाओं को नहीं मिलती है। कैसी घटनाएँ? जैसी 14 जुलाई 2013 को घटी थी। जगह थी इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, नई दिल्ली का एक प्रसिद्ध संस्थान। वहाँ से शाम साढ़े सात बजे संसद मार्ग थाने पर फोन से खबर पहुँची कि शौचालय की टंकी साफ करते हुए एक आदमी की मृत्यु हो गई है। पुलिस की तफ्तीश से मामला धीरे-धीरे निकल कर आया और बहुत जल्दी से अखबारों के कोनों में खो गया।

संस्थान के छह सेप्टिक टैंक साफ करने का काम एक ठेकेदार को दिया गया था। 300 रुपए की दिहाड़ी पर चार मजदूरों को लेकर ठेकेदार रविवार के दिन वहाँ पहुँचा। पाँच टैंक साफ करने के बाद छठवें में उतरने के बाद चारों बेहोश हो गए। उन्हें निकाल कर अस्पताल पहुँचाने तक तीन की मौत हो चुकी थी।

जिस एक मजदूर की जान बच गई उसने बताया कि छठे टैंक में घुसने से पहले उन्होंने ठेकेदार को बताया था कि उसमें गैस की गन्ध है। उन्होंने ठेकेदार से कहा कि वे अगली सुबह, उजाले में आकर छठी टंकी साफ कर देंगे। ठेकेदार रविवार को ही काम निपटाना चाहता था। उसने मजदूरों को धमकी दी कि काम उसी समय पूरा नहीं किया तो उन्हें दिहाड़ी नहीं मिलेगी। छठी टंकी की सफाई उसी समय शुरू हुई।

नीचे उतरने वालों के पास किसी तरह के सुरक्षा उपकरण नहीं थे। नियम तो यह है कि इस तरह के काम केवल नगर निगम या सीवर का प्रबन्ध करने वाली एजेंसी के कर्मचारी करें, जिनका प्रशिक्षण हुआ हो और जो सुरक्षा उपकरण, गैस मास्क और खास कपड़ों से लैस हों। पर ऐसा होता नहीं है। हमारे हर शहर में सीवर की नालियाँ रुकती हैं और इन्हें खोलने के लिये प्रशिक्षित लोग नहीं, दिहाड़ी के सफाई कर्मचारी ही ज्यादातर काम पर रखे जाते हैं।

कुछ नगर निगम और जल बोर्ड इस तरह के काम करने के लिये पक्की नौकरी पर प्रशिक्षित कर्मचारी रखते हैं। ऐसा भी देखने में आता है कि अनुभवी कर्मचारी खुद ऐसे काम करने के बजाय ठेके पर दूसरे मजदूरों को भेज देते हैं। इतना घिनौना और जोखिम भरा काम तो वही व्यक्ति करता है जो इसे करने के लिये विवश हो। हमारे शहरों में इतने लाचार लोग आसानी से मिल जाते हैं।

सीवर की नालियों में कई जहरीली गैसें पाई जाती हैं। इनमें खास है हाइड्रोजन सल्फाइड। इसे सीवर गैस भी कहते हैं। जब नाली जैसी किसी बन्द जगह में मैला पानी अटक जाता है तब उससे यह गैस निकलती है। हवा से भारी होने के कारण यह नीचे की ओर ही बनी रहती है। हमारे शहरों के नदी-नालों के आसपास इसकी दुर्गन्ध आसानी से पकड़ी जा सकती है।

मनुष्य की नाक इस जहरीली गैस की सड़े अंडे जैसी बदबू को तुरन्त भाँप लेती है। लेकिन सीवर के भीतर बार-बार उतरने वालों का सम्पर्क इस गैस से लगातार होता रहता है, जिससे उनकी सूँघने की शक्ति क्षीण हो जाती है। उन्हें पता भी नहीं चलता कि कब यह जहर उनके फेफड़ों से होता हुआ शरीर के भीतर तक पहुँच जाता है।

अगर सीवर के किसी हिस्से में यह गैस अटकी हो तो वहाँ पहुँचते ही सफाई कर्मचारी का दम घुटना शुरू हो जाता है, शरीर निढाल पड़ जाता है। संकरी नालियों से बाहर आने के लिये जितनी शक्ति की जरूरत होती है वह उसके शरीर में बचती नहीं है। कम मात्रा में भी हाइड्रोजन सल्फाइड शरीर को कई तरह से नुकसान पहुँचाती है और बेहोश कर देती है।

अधिक मात्रा में यह गैस शरीर के अंगों को प्राणवायु सोखने नहीं देती और आदमी तड़पने लगता है। फिर ऐसी हालत में फँसे सफाई कर्मचारी की जान किसी साथी की फुर्ती पर टिकी रहती है, जो उसे बाहर खींच ले। कई बार एक फँसे हुए कर्मचारी को निकालने के लिये दूसरे भी नाली के भीतर उतरते हैं। ऐसे में कभी-कभी एक को बचाने के फेर में दो से ज्यादा जानें चली जाती हैं। अगर गैस की मात्रा अधिक हो तो कितनी भी दर्दनाक क्यूँ न हो, मौत जल्दी आ जाती है।

विदेशों में भी कर्मचारी सीवरों में उतरते हैं पर ज्यादातर देशों में यह काम सावधानी से होता है। सीवर में घुसने वालों को साँस लेने के लिये गैस मास्क और पूरा शरीर ढँकने वाले बख्तरबन्द जैसे कपड़े दिये जाते हैं। हमारे शहरों में सफाई कर्मचारी कपड़े खोलकर एक लंगोट में ही गोता लगाते हैं। काम खतरनाक हो तो उनकी कमर से एक रस्सी बाँध दी जाती है, जिसके इशारे पर उन्हें बाहर खींचा जा सके। जोखिम और ज्यादा हो तो सफाई कर्मचारी को सीवर में उतरने के पहले कहीं-कहीं शराब पिलाने की जिम्मेदारी भी ठेकेदार निभाते हैं। नशे में आत्मरक्षा का कवच उतर जाता है।

जो लोग इस नरक में उतरने या दूसरों को उतारने का काम करते हैं वे खतरों से खेलने के आदी हो जाते हैं। मैले पानी के इतने अन्तरंग स्पर्श से सहज ही आने वाली चमड़ी और श्वास तंत्र कई बीमारियों को सहने का अभ्यास भी उन्हें हो जाता है। उनके लिये सीवर की नाली ही कारखाना बन जाती है, दफ्तर भी। दिहाड़ी के मजदूर ठेकेदार की दया पर निर्भर होते हैं। दुर्घटना होने पर उन्हें या उनके परिवार को मुआवजा देना किसी का दायित्व नहीं होता।

दो-तीन सौ रुपए के लिये किसी मुहल्ले की नाली खोलते हुए अगर कोई सफाई कर्मचारी मारा जाता है तो उसकी मौत में किसी को शहादत नहीं दिखती। उसे राष्ट्रसेवा के लिये कोई पुरस्कार नहीं मिलता, उसकी बेवा का कोई सम्मान नहीं करता। उसके बलिदान के लिये किसी सड़क या मुहल्ले को उसके नाम पर रख देना तो दूर, उस मैनहोल पर भी उसका नाम नहीं टांका जाता है। बस अखबार के किसी कोने में एक छोटी सी खबर छपती है। मामला आया-गया हो जाता है।

सन 1993 में केन्द्र सरकार ने मैला ढोने का रिवाज बन्द करने के लिये एक कानून बनाया था जिसे संसद ने पास भी किया था। उसमें सीवर साफ करने वालों के बारे में सीधे तो कुछ नहीं कहा गया था, लेकिन इसे भी मैला ढोने के अन्याय का एक हिस्सा माना जाता है। सो सीवर में गोता लगाने का काम भी गैरकानूनी होना चाहिए। पर इस कानून को लागू करना राज्य सरकारों की जिम्मेदारी थी, केन्द्र की नहीं। दिल्ली सरकार ने कर्मचारियों के सीवर में घुसने पर प्रतिबन्ध लगाया है और ऐसे ट्रक भी खरीदे हैं जिनमें पाइप द्वारा मैला पानी खींचने की ताकत होती है।शहरों के नीचे बनी सीवर की नालियों में रुकावटें आती ही रहती हैं। अगर इन रुकावटों को खोला न जाय तो नालियों में गैस और मैला पानी उलटा शौचालयों की तरफ चलने लगता है। इसकी विस्फोटक ताकत से कभी-कभी शौचालयों की छत तक मैले से सन जाती है। नाली ही क्या, सीवर से अलग-थलग सेप्टिक टैंक भी भर जाने पर उन्हें खाली करने के लिये सफाई कामगार ही बुलाये जाते हैं।

ऐसा काम करने वालों को हमारा देश और समाज अपने मानस की नालियों में ही रखता है, वहाँ से बाहर नहीं आने देता। कुछ खास जातियों के ही लोग यह काम करते पाये जाते हैं। ये वही जातियाँ हैं जो न जाने कब से सूखे शौचालयों से मल निकालने के काम में लगी हैं।

वैसे सन 1993 में केन्द्र सरकार ने मैला ढोने का रिवाज बन्द करने के लिये एक कानून बनाया था जिसे संसद ने पास भी किया था। उसमें सीवर साफ करने वालों के बारे में सीधे तो कुछ नहीं कहा गया था, लेकिन इसे भी मैला ढोने के अन्याय का एक हिस्सा माना जाता है। सो सीवर में गोता लगाने का काम भी गैरकानूनी होना चाहिए। पर इस कानून को लागू करना राज्य सरकारों की जिम्मेदारी थी, केन्द्र की नहीं।

दिल्ली सरकार ने कर्मचारियों के सीवर में घुसने पर प्रतिबन्ध लगाया है और ऐसे ट्रक भी खरीदे हैं जिनमें पाइप द्वारा मैला पानी खींचने की ताकत होती है। इसके बाद से दिल्ली जल बोर्ड में पक्की नौकरी कर रहे सफाई कर्मचारियों के साथ कोई गम्भीर दुर्घटना नहीं हुई है। लेकिन हर सीवर और सेप्टिक टैंक दिल्ली जल बोर्ड ही तो साफ नहीं करवाता।

दिल्ली में ही हर साल सीवर की नाली खोलते हुए दिहाड़ी पर काम करने वाले कुछ सफाई कर्मचारियों की जान जाती है। नई दिल्ली के जिस इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र में जुलाई 2013 में तीन लोग मारे गए थे वह उस संसद भवन के एकदम करीब है जिसमें 20 साल पहले इस काम को रोकने का कानून पारित हुआ था।

अगर ऐसी दुर्घटनाएँ आये दिन नहीं होती हैं तो इसका मतलब यह कतई नहीं है कि मैला ढोने, सीवर की नाली खोलने या सेप्टिक टैंक साफ करने का काम कहीं-कहीं ही होता हो। हर शहर में किसी-न-किसी रूप में यह काम होता ही रहता है। मल-मूत्र को साफ करने के लिये लोगों को हर उस जगह लगाया जाता है जहाँ रेल की पटरी हो। पटरी का रख-रखाव इसके बिना हो ही नहीं सकता। रेलगाड़ियों के शौचालय से गिरे मैल की सफाई के लिये रेलवे हजारों सफाई कामगार रखता है। कुछ को पक्की नौकरी मिलती है, पर ज्यादातर तो ठेकेदारी पर रखे दिहाड़ी मजदूर होते हैं।

भारतीय रेल देश का सबसे बड़ा सरकारी संस्थान है। जब रेलवे भी 1993 के कानून की अवमानना करता है तो बाकी लोगों पर इसका कितना असर होगा इसकी कल्पना की जा सकती है। इस विधेयक का इतिहास एक बड़ा उदाहरण है, कानून की सीमाएँ समझने के लिये। कार्यपालिका ही क्या, इस विषय में न्यायपालिका में भी बहुत कुछ होता रहा है। उच्चतम न्यायालय में सन 2003 एक मामला आया था। इसके पीछे सफाई कर्मचारी आन्दोलन नामक संस्था थी, जो देश के कई हिस्सों में मैला ढोने वालों की मुक्ति के लिये काम करती है।

अदालत ने केन्द्र सरकार के सामाजिक न्याय मंत्रालय से मैला ढोने की प्रथा का लेखा-जोखा माँगा। इस मंत्रालय पर कमजोर लोगों की पैरोकारी का जिम्मा है, सो उनकी बदहाली की सच्चाई बताने से उसे कोई आपत्ति नहीं है। मंत्रालय ने बताया कि देश भर में करीब सात लाख लोग हाथ से मैला ढोने के काम में लगे हैं और 92 लाख ऐसे सूखे शौचालय हैं जिनका मैला सीवर की नाली में नहीं बहता।

यानी इनका मैला या तो सफाई कर्मचारियों को ढोना पड़ता है, या सीधे किसी खुली नाली में जाता है, या उसे जानवर खाते हैं। ऐसा 21 राज्य और केन्द्र शासित प्रदेशों में होता है, यह मंत्रालय ने सन 2003 में ही स्पष्ट कर दिया था।

याचिका सुनने के बाद न्यायालय ने राज्य सरकारों से उनके राज्य की परिस्थिति पूछी। राज्य सरकारें एकदम मुकर गईं। उन्होंने दावे किये कि उनके राज्यों में सूखे शौचालय और मैला ढोने की प्रथा कब की बन्द हो चुकी है और इस काम में लगे लोगों को दूसरे रोजगार मिल चुके हैं। उसके बाद राज्य सरकारें तरह-तरह के दावे न्यायालय में करती रही हैं।

तीन साल तक न्यायालय की फटकार सुनने के बाद राज्य सरकारों ने यह मानना शुरू किया कि उनके राज में अभी तक लोगों से मैला साफ करवाया जा रहा है। लेकिन इस स्वीकृति के बाद भी सरकारों ने मैला ढोने वाले लोगों की हालत बेहतर बनाने के लिये कुछ किया हो, ऐसा नहीं है। जिस अन्याय को सरकारें मानने तक को तैयार नहीं हैं, उसे मिटाने के लिये वे काम कैसे करें?

फरवरी 2013 की संसद की एक रपट में दर्ज है कि भारत में 26 लाख सूखे शौचालय हैं। इनमें कोई आठ लाख ऐसे हैं जिन्हें सफाई कर्मचारी अपने हाथों से साफ करते हैं। ये आँकड़े 2011 की जनगणना से निकले हैं।

सन 2012 में सरकार ने संसद में एक नया विधेयक पेश किया जो पिछले कानून की कमियाँ पूरी करने के लिये बना था। सितम्बर 2013 में संसद ने इसे पास भी कर दिया। इसके लागू होते ही जिस किसी के पास सूखा शौचालय हो उसको सीवर से जुड़ा शौचालय बनाना होगा। जो न बनाए उस पर आपराधिक मामला शुरू किया जा सकता है।

जगह-जगह खुलते सुलभ शौचालयों में भी सफाई का काम अधिकतर इन्हीं जातियों के लोग करते हैं फिर शहरों में ऐसी बहुत सी जमीन है जो सार्वजनिक शौचालय ही कही जा सकती है, जहाँ अनगिनत लोग खुले में मलत्याग करते हैं। इन जगहों में झाड़ू लगाना मैला ढोना ही है, क्योंकि गीले-सूखे मल को उठाकर कचरे की गाड़ी में डालना पड़ता है। मुम्बई जैसे बड़े शहर के कुछ वार्ड ऐसे हैं जिनमें आज भी भंगी बस्ती मौजूद है। इन बस्तियों में रहने वाले परिवारों को अपनी किसी एक सन्तान को सफाई कर्मचारी ही बनाना पड़ता है।एक साल की कैद और पचास हजार रुपए जुर्माना भी इसके लिये तय किया गया है। सीवर या सेप्टिक टैंक की जोखिम भरी सफाई के लिये किसी भी व्यक्ति को काम पर रखना गैरकानूनी है। ऐसा करने वाले को दो से पाँच साल तक की सजा हो सकती है।

मार्च 2014 को उच्चतम न्यायालय में 10 साल से चल रहे मुकदमे का फैसला आ गया। सरकार को निर्देश दिया गया कि सीवर के काम में मारे गए हर सफाई कर्मचारी के परिवार को 10 लाख रुपए का मुआवजा दिया जाय। रेलवे को समयबद्ध तरीके से मैला सफाई बन्द करने को कहा गया है। लेकिन सफाई कर्मचारियों के साथ काम करने वाले जानते हैं कि न्यायालय के निर्णय और संसद के कानून से ही यह अन्याय रुकने वाला नहीं है।

सरकार के पास कोई आधिकारिक सर्वेक्षण तक नहीं है यह पता करने के लिये कि मैला ढोने की प्रथा देश में कहाँ-कहाँ प्रचलित है, कितने लोग मैला ढोने के काम में लगे हैं। कितने लोग विवश हैं हर रोज ऐसा काम करने के लिये जिसका विचार भी घिन पैदा करता है।

सफाई कर्मचारी आन्दोलन ने अदालत को बताया था कि देश भर में करीब 12 लाख लोग इस काम में आज भी लगे हुए हैं। इनमें कुछ को झाड़ू से मैल समेट कर, टोकरियों में डालकर, दूर ले जाकर फेंकना पड़ता है। कुछ के पास हाथगाड़ियाँ होती हैं, कुछ बाल्टी या टोकरी में उठाकर मल फेंकते हैं। कुछ को ये टोकरियाँ अपने सिर पर ही उठानी पड़ती हैं। बरसात के दिनों में मैले में पानी मिल जाता है और वह टोकरियों से रिसता हुआ सफाई कर्मचारियों के शरीर पर भी गिरता है।

कौन हैं ये लोग जो दूसरों की सफाई की इतनी गन्दी, इतनी भारी कीमत चुकाते हैं? कुछ खास जातियों के ही पल्ले पड़ता है यह काम। अलग-अलग जगहों पर इनके कई नाम रहे हैं। पहले इनके लिये भंगी, चूड़ा, मेहतर, लालबेगी, हलालखोर जैसे नाम इस्तेमाल होते थे। आज नाम बदल गए हैं। कोई खुद को वाल्मीकि कहता है, कोई दलित बतलाता है। संविधान इन्हें ‘अनुसूचित जाति’ की श्रेणी में रखता है। नाम बदलने भर से इन समाजों की परिस्थिति बहुत बेहतर नहीं हुई है।

जगह-जगह खुलते सुलभ शौचालयों में भी सफाई का काम अधिकतर इन्हीं जातियों के लोग करते हैं फिर शहरों में ऐसी बहुत सी जमीन है जो सार्वजनिक शौचालय ही कही जा सकती है, जहाँ अनगिनत लोग खुले में मलत्याग करते हैं। इन जगहों में झाड़ू लगाना मैला ढोना ही है, क्योंकि गीले-सूखे मल को उठाकर कचरे की गाड़ी में डालना पड़ता है।

मुम्बई जैसे बड़े शहर के कुछ वार्ड ऐसे हैं जिनमें आज भी भंगी बस्ती मौजूद है। इन बस्तियों में रहने वाले परिवारों को अपनी किसी एक सन्तान को सफाई कर्मचारी ही बनाना पड़ता है। अगर न बने तो नगरपालिका द्वारा घर छीने जाने का खतरा रहता है। मुम्बई जैसे महानगर में घर से बड़ा सहारा कुछ नहीं होता, सो अगली पीढ़ी भी इसी काम में लगती है, फिर चाहे उसने कुछ और काम करके एक बेहतर भविष्य बनाने की कितनी भी तैयारी क्यों न की हो।

ऐसा आम होता है कि नगर निगम में पक्की नौकरी करने वाले भी ऐसे काम करने के लिये किसी कमजोर व्यक्ति को कम वेतन देकर भेज देते हैं। पक्की सरकारी नौकरी रिश्वत के बिना मिलनी आसान नहीं होती है। ये नौकरियाँ दबंग जाति के उन लोगों को भी मिल जाती हैं जिनके पास रिश्वत देने के लिये धन हो। कर्मचारी यूनियन में धौंस भी इन्हीं की चलती है। पर अक्सर ऐसे लोग मैला सफाई का काम खुद नहीं करते हैं। अपनी पगार लेते हैं और सफाई का काम कम पैसे देकर करवाते हैं किसी कमजोर व्यक्ति से, जो वाल्मीकि या लालबेगी जैसी जातियों से होते हैं।

इन जातियों के कुछ लोग इतनी मलिनता में जीते हैं कि उन्हें ऐसा काम भी ‘आउटसोर्स’ किया जा सकता है। यह सब आम जानकारी है, फिर भी इस पर कोई कार्यवाई नहीं होती। इन समाजों के लोगों को कोई और काम या नौकरी मिलना बहुत ही कठिन होता है। रेलवे हो या नगरपालिका, मैला ढोने के काम में अधिकांश महिलाएँ ही लगती हैं, चाहे पक्की नौकरियाँ आदमियों को दी गई हों। इन जातियों में यह काम पीढ़ी-दर-पीढ़ी होता रहा है। अंग्रेज हुकूमत आने के पहले इन जातियों का इतिहास बहुत ठीक पता नहीं चलता है। और जो थोड़ी-बहुत जानकारी इतिहास के पन्नों में मिल भी जाती है उसमें पहेलियाँ ज्यादा होती हैं, जवाब कम।

सिंधु घाटी सभ्यता के शहरों के अवशेषों में तो सूझ-बूझ से बनी नालियों के प्रमाण मिले हैं, जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय यह प्रथा नहीं थी। उसके बाद के इतिहास के प्रामाणिक स्रोत चीन से आये कुछ यात्रियों के वृत्तान्त माने जाते हैं, पर उनमें भी मैला ढोने की बात नहीं मिलती। मध्यकाल से इस प्रथा का वर्णन मिलना शुरू होता है।

पक्की जानकारी की कमी में लोग शोषण की इस परम्परा को विचारधारा की आँखों से देखते हैं। जिसकी जैसी विचारधारा उसका वैसा निष्कर्ष। इसका नतीजा यह होता है कि इस अन्याय को रोकने की बजाय तरह-तरह की ऊर्जा यह बताने में जाती है कि इस शोषण के पीछे जिम्मेदारी किसकी है, जिसके राजनीतिक मायने निकाले जाते हैं। शायद यही कारण है कि आजादी के इतने सालों के बाद भी देश का ध्यान मैला ढोने वालों की व्यथा पर कम गया, आरोप-प्रत्यारोप की कूटनीति पर ज्यादा।

एक विचारधारा के कुछ लोग इस प्रथा को हिन्दू समाज की वर्ण व्यवस्था से निकला मानते हैं। इसके समर्थन में मनुस्मृति, नारद संहिता या वाजसनेयी संहिता जैसे ग्रंथों से कुछ चुनी हुई पंक्तियाँ उदाहरण के तौर पर रखी जाती हैं। ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में वर्ण की व्याख्या भी इसी सन्दर्भ में की जाती है।

आपस में ही नहीं, इन ग्रंथों के भीतर भी कई अन्तर्विरोध हैं जिन्हें ठीक से समझा पाना कतई आसान नहीं है। जैसे मनुस्मृति ही लीजिए, जिसमें कुछ हिस्से चांडालों के प्रति व्यवहार में भेदभाव दिखाते हैं। उसी मनुस्मृति में ऐसे सूक्त भी हैं जो कहते हैं कि जन्मजात गुण से ही मनुष्य नहीं बनता, संस्कार और शिक्षकों का भी योगदान होता है। इसमें जो जैसा मतलब निकालना चाहे, निकाल सकता है।

वर्तमान की बदसलूकी को किसी भूतकाल में जा कर किसी और के माथे मढ़ना केवल इस कुरूप सच से पल्ला झाड़ना है। फिर चाहे वह भूतकाल ऐतिहासिक हो या काल्पनिक। ऐसा करना हमें उन राज्य सरकारों के साथ खड़ा कर देगा जो उच्चतम न्यायालय के सामने झूठ बोलने से नहीं कतराई। न जाने कब से मैला ढुलवाने का चलन दुनिया के कई इलाकों में रहा है। इंग्लैंड की राजधानी लंदन में मैला ढुलवाने का चलन 18वीं शताब्दी तक था। लेकिन अब भारत के सिवा ऐसा शायद ही दुनिया के किसी और हिस्से में होता होगा।ऐसे ग्रंथों की ऐतिहासिक समझ बनाना और भी कठिन है क्योंकि इनके इतिहास के प्रमाण अगर हैं भी, तो बहुत कम हैं। हमें यह ठीक से नहीं पता कि कौन सा ग्रंथ किसने लिखा, कब और कहाँ लिखा गया। ऐसे में ये ग्रंथ केवल शोध, व्याख्या और विवेचन का विषय हो सकते हैं। इन ग्रंथों को लेकर कई लोगों में तरह-तरह की ग्रंथियाँ भी हैं।

कुछ इतिहासकारों का अनुमान है कि मनुस्मृति किसी एक व्यक्ति का लिखा ग्रंथ नहीं है। इसके कई लेखक थे जिन्होंने कई सालों के अन्तराल में इसके अलग-अलग हिस्से लिखे और उन्हें मनु नामक किसी पात्र के नाम समर्पित कर दिया। अगर ऐसा है तो इस ग्रंथ में लिखी बातें ऐतिहासिक प्रमाण कैसे मानी जा सकती हैं?

बहुत से लोग मानते हैं कि हिन्दू विचार में स्मृति परम्परा के ग्रंथों से बड़ा स्थान श्रुति परम्परा से प्रकट हुए तत्व का है। इतिहास का चश्मा उतार कर, केवल विश्वास की आँखों से देखें तो मनुस्मृति या नारद संहिता या वाजसनेयी संहिता अपने आप में धर्म की सम्पूर्ण परिभाषा नहीं है। हिन्दू आस्था किसी एक ग्रंथ से नहीं बनी है।

इन ग्रंथों की जगह हिन्दू आस्था में वैसी नहीं है जैसी ईसाई धर्म में बाइबल या इस्लाम में कुरान की है। धार्मिक ग्रंथों में वेद इनसे कहीं ऊपर आते हैं और वे भी चार हैं। छह वेदांग हैं, 100 से अधिक उपनिषद हैं, ‘इतिहास ग्रंथ’ कहलाए जाने वाले रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्य हैं जिनमें ‘भगवद्गीता’ भी आती है। अलग-अलग पंथों के आरण्यक ग्रंथ हैं, 19 ब्राम्हण श्रुतियाँ हैं, 18 महापुराण हैं। शैव, वैष्णव, शाक्त और जैन जैसे कई पंथों के भाँति-भाँति के आगम शास्त्र हैं। और 22 स्मृतियाँ हैं, जिनमें मनुस्मृति एक है।

हमारे धार्मिक विचार में कई नास्तिक और निरीश्वरवादी परम्पराएँ रही हैं, जिनमें जैन और बौद्ध ही नहीं, लोकायत या चार्वाक और आजिविक भी आते हैं। वेदों को न मानने वालों की बात वेदों में ही बतलाई गई है। श्रमण दर्शन तो प्राचीन काल से रहा है। जैन और बौद्ध परम्पराओं पर उसका प्रभाव गहरा है।

तरह-तरह के दर्शन, विचार और परम्पराएँ रही हैं जिनका एक-दूसरे से मूलभूत विरोध तो था ही, एक-दूसरे पर गहरा प्रभाव भी था। ‘मोक्ष’, ‘माया’ और ‘संसार’ जैसे सिद्धान्त नास्तिक और निरीश्वरवादी परम्पराओं में उपजे और फिर आस्तिक और ईश्वरवादी दर्शन के अभिन्न अंग बन गए। नास्तिक पंथों ने भी आस्तिक विचार अपनाए। ये तो वह बातें हैं जिनका प्रमाण हमें मिला है। न जाने कितने पंथ, कितने ग्रंथ, कितने दर्शन, कितनी परम्पराओं के बारे में हमें आज अनुमान तक नहीं है। फिर यह भी हमें नहीं पता है कि इन धार्मिक बातों को साधारण लोगों ने कैसे अपनाया था, लोक व्यवहार में इनका असर कितना और कैसा था।

चलिए, एक बार के लिये इस सबको पुराने जमाने की बात कहकर नकार दें और आज के हिन्दू लोगों के धार्मिक व्यवहार को देखें। उसमें ग्रंथों की जगह बहुत ज्यादा नहीं है। अगर है भी तो इसमें सबसे पहला स्थान गीता का आता है जो वेद और उपनिषद के बहुत बाद रचा गया ग्रंथ है।

न्यायालय में हिन्दू इसी पर हाथ रखकर शपथ लेते हैं। हिन्दू विश्वास में कई सन्त और उनके भक्ति कवित्त का प्रभाव है। इनमें कई सन्त अनपढ़ थे और कई तो हिन्दू कहे ही नहीं जा सकते हैं। बल्कि धर्म ग्रंथों में ‘हिन्दू’ संज्ञा आती ही नहीं है। यह बहुत पुराना शब्द नहीं है। धार्मिक आचार के लिये यह शब्द बहुत बाद में आया। ऐसा अन्दाजा लगाया जाता है कि यह बाहर से आये लोगों का दिया नाम है, खुद यहाँ के लोगों का अपने लिये इस्तेमाल होने वाला नाम नहीं था।

इतनी अनबूझ पहेलियों के बीच यह कहना मुश्किल है कि हिन्दू समाज में मैला ढोने की प्रथा कब और कैसे आई। अगर यह प्रथा हिन्दुओं की है और वर्ण व्यवस्था से निकली है तो धर्म बदलने पर मिट जानी चाहिए थी। लेकिन मैला ढोने वाली जातियाँ मुसलमानों में भी मिलती हैं। मुस्लिम समाज में इन जातियों के लोगों की हालत कोई बहुत बेहतर नहीं है। उनकी बस्तियाँ भी मुख्य बस्ती से हटकर होती हैं। उनके साथ भी छुआछूत होती है। उनकी मस्जिद अलग होने तक का उल्लेख मिलता है।

सिख समाज के भीतर भी जातिगत भेदभाव मिलता है। भारत के विभिन्न ईसाई समाज भी इससे अछूते नहीं हैं। कुछ विशेष जातियों के हजारे-लाखों लोगों को मैला उठाने में झोंकने की जिम्मेदारी हिन्दू समाज की तो निश्चित ही है, लेकिन इसकी जवाबदेही से कोई भी धर्म, कोई भी सम्प्रदाय अछूता नहीं है।

एक दूसरी विचारधारा के कुछ लोग इस प्रथा की उत्पत्ति उत्तर-पश्चिम से आये मुसलमान आक्रान्ताओं में देखते हैं। वे मानते हैं कि इन आक्रान्ताओं ने हारे हुए भारतीय लड़ाकों का अपमान करने के लिये उनसे मल-मूत्र उठवाया। ऐसा करने की वजह से बाद में हिन्दू समाज ने उनका बहिष्कार कर दिया, वे जाति से ‘भंग’ हो गए, इसलिये भंगी कहलाए। ऐसा भी बताया गया कि मुस्लिम बस्तियों में पर्दे में रहने वाली महिलाएँ मलत्याग करने के लिये बाहर नहीं जाती थीं, वे सूखे शौचालय इस्तेमाल करती थीं।

कालान्तर में जनाना और फौजी छावनी के शौचालय साफ करने का काम युद्धबन्दियों से कराया जाता था, उनके अपमान के लिये इस तरह की बात यह जताने की कोशिश भी करती है कि मुस्लिम आक्रान्ताओं के आने के पहले इस जमीन पर इस तरह के अत्याचार थे ही नहीं।

यह तो सही है कि मुस्लिम शासकों के समय से कुछ विशेष जातियों के मल-मूत्र हटाने और मैला ढोने के प्रमाण मिलते हैं और उसके पहले के नहीं मिलते। परन्तु ऐतिहासिक प्रमाण न मिलना किसी सच्चाई का संकेत नहीं हो सकता। कथा साहित्य में और प्राचीन ग्रंथों में तरह-तरह के जातिगत भेदभाव और अत्याचारों के अनेकानेक किस्से मिलते हैं, जो एक व्यापक और कड़वे सच की ओर इशारा करते हैं। हारे हुए हिन्दू लड़ाकों से मल-मूत्र उठवाने के किस्सों के पीछे भी कोई पक्के प्रमाण नहीं मिलते हैं।

पिछले 150 साल में इन जातियों के लोगों और उनके समाजों की हालत बहुत बदली हैं। मैला ढोने की प्रथा चाहे कितनी भी पुरानी हो, ये जातियाँ सदा से इतनी शोषित और विवश नहीं थीं। मुम्बई के कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने 1990 के दशक में एक सर्वेक्षण किया था, यह जानने के लिये कि महाराष्ट्र में मैला ढोने वाले समाज इस काम में कैसे आये। सर्वे की रपट सन 1996 में एक किताब के रूप में छपी, जिसका शीर्षक है ‘नरक सफाई’।अगर यह सही है भी तो हिन्दू समाज को इन लड़ाकों को फिर अपनाने से कौन रोक रहा है? ताकतवर हिन्दू जातियों के लोग मैला ढोने का काम अपने हाथ में क्यों नहीं ले लेते? जातिगत भेदभाव कई रूपों में हमारे आसपास व्याप्त हैं, चाहे अखबारों में वर्गीकृत वैवाहिक विज्ञापन हों या आये दिन दलितों के साथ अत्याचार की खबरें।

इस अधर्म का ठीकरा किसी भी दूसरे समाज या समुदाय के सिर फोड़ने का कोई ऐतिहासिक कारण नहीं है। अगर कारण मिल जाएँ तो भी ऐसा करना न्यायसंगत नहीं है।

वर्तमान की बदसलूकी को किसी भूतकाल में जा कर किसी और के माथे मढ़ना केवल इस कुरूप सच से पल्ला झाड़ना है। फिर चाहे वह भूतकाल ऐतिहासिक हो या काल्पनिक। ऐसा करना हमें उन राज्य सरकारों के साथ खड़ा कर देगा जो उच्चतम न्यायालय के सामने झूठ बोलने से नहीं कतराई। न जाने कब से मैला ढुलवाने का चलन दुनिया के कई इलाकों में रहा है।

इंग्लैंड की राजधानी लंदन में मैला ढुलवाने का चलन 18वीं शताब्दी तक था। लेकिन अब भारत के सिवा ऐसा शायद ही दुनिया के किसी और हिस्से में होता होगा। जन्म और जाति के आधार पर तो बिल्कुल नहीं।

जिन जातियों ने यह शोषण सहा है उनकी अपनी कथा-स्मृति भी है। ऐसी कथाएँ जगह और समय के हिसाब से बदलती भी हैं। अलग-अलग समूहों में इनके कई संस्करण मिलते हैं। इन जातियों में कई गोत्र भी हैं, ठीक वैसे ही जैसे ताकतवर जातियों के मिलते हैं। कहीं ये समाज अपना उद्गम ऋषियों से जोड़ते हैं, कहीं किसी पैगम्बर या पीर से, कहीं पांडवों से। कुछ समाजशास्त्रियों ने इन कहानियों को इकट्ठा भी किया है।

साधारणतया इनमें वर्णन होता है कि एक समय ये जातियाँ गौरवशाली और समृद्ध थीं और किसी धोखे के कारण इनका पतन हुआ। इनमें एक कथानक यह भी आता है कि एक समय किसी अशुद्ध और घृणित काम करने की जरूरत आई, जैसे किसी मृत पशु का शरीर हटाना। जिन लोगों ने यह काम एक समझौते के तहत स्वीकार किया, उनके त्याग को सम्मान देने की बजाय उनके साथ दुर्व्यवहार हुआ। वह अशुद्ध काम ही उनकी जातीय पहचान बन गया। घिनौने माने जाने वाले काम में फँसने की वजह से वे खुद घृणा के पात्र बन गए।

कथा-साहित्य को अलग रख दें तो भी इसका प्रमाण है कि पिछले 150 साल में इन जातियों के लोगों और उनके समाजों की हालत बहुत बदली हैं। मैला ढोने की प्रथा चाहे कितनी भी पुरानी हो, ये जातियाँ सदा से इतनी शोषित और विवश नहीं थीं। मुम्बई के कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने 1990 के दशक में एक सर्वेक्षण किया था, यह जानने के लिये कि महाराष्ट्र में मैला ढोने वाले समाज इस काम में कैसे आये। सर्वे की रपट सन 1996 में एक किताब के रूप में छपी, जिसका शीर्षक है ‘नरक सफाई’।

उन्हें पता यह चला कि 19वीं सदी में जब मुम्बई शहर उद्योग और व्यापार के कारण बढ़ रहा था तब कई तरह के कारीगरों को वहाँ बुलाकर बसाया गया। इनमें गुजरात के वणकर, यानी बुनकर लोग भी थे। इनके कारोबार पर कई तरह की मार पड़ी। इंग्लैंड की कपड़ा मिलों से लाकर माल भारत में बेचा जाने लगा था। लाचारी में ये लोग नगरपालिका में सफाई के काम में लग गए।

ऐसे ही मुम्बई में बसे मेघवालों की कहानी है। इस जाति के लोग चमड़े का काम भी करते रहे हैं और कई जगहों पर उनका खास स्थान रहा है। आज भी राजस्थान के कई हिस्सों में मंगल कारज का पहला न्यौता मेघवालों के यहाँ जाता है, जबकि कई दूसरी जगह पहला न्यौता गणपति मन्दिर जाता है। महाराष्ट्र में मैला ढोने के काम में लगे मेघवाल वहाँ अकाल की चपेट से बचने के लिये आये थे। केवल उत्तर भारत से मुम्बई आये वाल्मीकि लोगों ने सर्वे करने वालों से यह कहा कि वे वहाँ भी मैला उठाते थे, यहाँ भी मैला उठाते हैं।

19वीं सदी में जब उद्योगों की वजह से शहर फैल रहे थे उसी समय गाँवों से कई तरह के कारीगर जातियों के लोग उजड़ रहे थे। ऐसे कई लोग विवशता में मैला ढोने के काम में लगे। इन लोगों की सामाजिक स्मृति में अपने उजड़ने के किस्से पूरी तरह मिटे नहीं हैं। कुछ ऐसी ही स्थिति पंजाब के चूड़ा लोगों की है। उनके इतिहास का अध्ययन समाजशास्त्री विजय प्रसाद ने 1990 के दशक में किया था।

दिल्ली के वाल्मीकि और पंजाब के चूड़ा समाजों के साथ मिलकर किया उनका शोध प्रामाणिक माना जाता है। 19वीं शताब्दी के शुरू में चूड़ा समाज के लोग कई तरह के कारीगर थे और उनकी खास पहचान खेती से थी। जिनके पास अपनी जमीन नहीं होती, उनका हुनर दूसरों की जमीन पर बँटाई के काम से चलता था। इसके अलावा चूड़ा लोग कुम्हार, चर्मकार गवैए और संगीतकार तो होते ही थे, दाई और हरकारे का काम भी करते थे।

उस समय के विवरण बताते हैं कि इस जाति के बहुत थोड़े ही लोग जमादारी या सफाई का काम करते थे। लेकिन 19वीं सदी के अन्त तक जब अंग्रेज सरकार ने जनगणना शुरू की तो चूड़ा लोगों को सफाई कामगार और मैला ढोने का ही दर्जा दिया गया। यही उनकी पहचान बन गई। कुछ अंग्रेज अफसरों और मिशनरियों ने इस गलती की तरफ जनगणना करने वालों का ध्यान खींचा था, बताया था कि चूड़ा वास्तव में खेतिहर जाति है, जमादार नहीं। फिर भी जनगणना वालों ने इसे सफाई करने वाली जाति बताया। तब से आज तक चूड़ा लोगों की यही पहचान बन गई।

तेजी से फैलते हुए नगरों में घनी आबादी वाली बस्तियाँ बनती जा रही थीं। इनमें सीवर व्यवस्था थी नहीं। बल्कि दुनिया का पहला आधुनिक सीवर लंदन में इसी दौर में बनना शुरू हुआ था। भारत में ऐसे सीवर बनाने का खर्च अंग्रेज सरकार उठाना नहीं चाहती थी। शहरों को साफ रखने के लिये नगरपालिकाएँ बन रही थीं और मल-मूत्र निकालने के लिये मेहतरों की जरूरत थी। जनगणना की वजह से चूड़ा लोगों की पहचान तो पहले ही मैला ढोने वालों की बन चुकी थी। उनका इस काम में जाना लगभग तय हो चुका था।यह क्यों और कैसे हुआ? कारण किसी षडयंत्र में नहीं, अंग्रेज शासन की आर्थिक नीतियों में मिलता है। इसे समझने के लिये पंजाब के इतिहास की ओर रुख करना होगा। यह खेती की बढ़त का समय था पंजाब में। सिंचाई नहरों से पश्चिमी पंजाब की बंजर जमीन भी खेती लायक बन रही थी। खेती करना फायदे का सौदा बन चुका था, जमीन का दाम बढ़ रहा था।

छोटे किसानों की जमीन बड़े किसानों के हाथ में जा रही थी, शहर के व्यापारियों के हाथ भी। सरकार जमीन पर ज्यादा लगान वसूलने के लालच में उन लोगों का साथ दे रही थी जो इन बदलावों का फायदा उठाने में सक्षम थे। व्यापारियों को जमीन से दूर रखने के लिये कानून बने, लेकिन इनका लाभ मिला बड़ी जमीन वाले किसानों को। छोटी जमीन के किसान कई तरह की कारीगरी के साथ खोड़ी खेती करते थे। ऐसे लोगों को इस कानून से अथाह नुकसान हुआ।

छोटे किसानों और कारीगरों के लिये यह समय भारी उथल-पुथल का था। अकाल, जमीन पर लगान और अनाज के अन्तरराष्ट्रीय बाजार तक का बुरा असर उन पर पड़ रहा था, पंजाब के चूड़ा समाज पर भी। सन 1876 से 1879 के बीच दुनिया-भर में ऐसा घोर सूखा पड़ा कि इसे मानव इतिहास का सबसे दारुण अकाल कहा जाता है।

मिस्र से लेकर चीन तक इस अकाल का तांडव बरपा, पर इसका सबसे विदारक असर भारत पर ही हुआ। करोड़ों उजड़ते और मरते लोगों को बचाने की बजाय अंग्रेज सरकार को अपने व्यापार की चिन्ता थी। उसने खाद्यान्न के अन्तरराष्ट्रीय व्यापार पर रोक नहीं लगाई, उसे खुला ही रखा। हमारे यहाँ लाखों भूखे मर रहे थे पर हमारे ही व्यापारी अनाज का निर्यात कर रहे थे, क्योंकि अन्तरराष्ट्रीय बाजार में दाम हमारे यहाँ से ज्यादा था।

इसी दौर में शहरों में नए उद्योग खुल रहे थे। तेजी से फैलते हुए नगरों में घनी आबादी वाली बस्तियाँ बनती जा रही थीं। इनमें सीवर व्यवस्था थी नहीं। बल्कि दुनिया का पहला आधुनिक सीवर लंदन में इसी दौर में बनना शुरू हुआ था। भारत में ऐसे सीवर बनाने का खर्च अंग्रेज सरकार उठाना नहीं चाहती थी। शहरों को साफ रखने के लिये नगरपालिकाएँ बन रही थीं और मल-मूत्र निकालने के लिये मेहतरों की जरूरत थी। जनगणना की वजह से चूड़ा लोगों की पहचान तो पहले ही मैला ढोने वालों की बन चुकी थी। उनका इस काम में जाना लगभग तय हो चुका था।

नगरपालिकाओं के आने के बाद मैला ढोने वालों की हालत और बिगड़ी। दिल्ली का इतिहास तो यही बताता है। मैला ढोने का काम दिल्ली में न जाने कब से होता आ रहा था। पहले के समय मेहतर कौन थे इस पर जानकारी नहीं मिल पाती है। मुहल्लों के मेहतर तय होते थे और उनका वेतन हर घर से आता था, चाहे महीने की पगार हो या रोज का भोजन। यही नहीं, शादी-ब्याह में पारिवारिक कारज में मेहतरों का मान किया जाता था, उन्हें कुछ उपयोग का सामान देकर। छोटे-बड़े का लिहाज भी होता था, जैसे वृद्ध मेहतरों के पाँव छुए न भी जाते हों तो भी दूर से उनके पाँव पड़े जाते थे। किसी भी जाति के नवजात शिशु का मुँह मेहतरानी धोती थी ऐसे विवरण भी मिलते हैं।

मेहतरों की स्थिति खराब थी। उनकी बस्तियाँ अलग होती थीं, उनके साथ छुआछूत होती थी और मल-मूत्र उठाने का घिनौना काम तो उन्हें करना ही पड़ता था। जातिभेद से उपजे कई कष्ट उन्हें सहने पड़ते थे। लेकिन जिन लोगों के लिये वे काम करते थे उनसे उनका सम्बन्ध चाहे यजमानी का ही रहा हो, पर वह सीधा सम्बन्ध था।

किसी तरह की अवमानना या ज्यादती होने पर मेहतर मैला हटाने का काम बन्द कर देते थे। घनी आबादी का इलाका मैला साफ न होने से बदहवास हो जाता और मुहल्ले वालों को मेहतरों से मोलभाव करना पड़ता, समझौता करना पड़ता। मैला ढोने वाले और मुहल्ले में रहने वालों के बीच सीधा लेन-देन था, सुख और दुख का भी। फिर मेहतरों की कमाई का एक स्रोत और भी था।

दिल्ली के निकट के गाँवों में किसानों को खाद के रूप में वे मैला बेचते थे। सन 1636 में दिल्ली में एक नया शहर बसना शुरू हुआ, शाहजहाँनाबाद, जो आज पुरानी दिल्ली में आता है। तब दिल्ली के आसपास हजारों गाँव होने का वर्णन मिलता है। इनके खेतों की पैदाइश दिल्ली का पेट भरती थी। दिल्ली में रहने वालों का मल-मूत्र इन खेतों को उर्वर बनाता था। पंजाबी में एक पुरानी कहावत है : दल राजा, मल खेती। यानि जितना जरूरी राजा के लिये सैनिक दल होता है, खेती के लिये मल उतना ही जरूरी है क्योंकि गाय-भैंस के गोबर की कमी रहती थी। गोबर का इस्तेमाल कंडा बनाने में होता था। जिनके खाना पकाने के बर्तन मिट्टी के ही होते हैं उनके लिये कंडों की धीमी आँच लकड़ी की तेज आँच से बेहतर होती है।

दिल्ली शहर बढ़ रहा था और आसपास के गाँवों की जमीन खा रहा था। 1844 तक गाँवों की संख्या 400 ही बची थी। 1880 तक लेकर केवल 288 गाँव बचे थे। शहर से मैला भी ज्यादा निकल रहा था। सन 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजी हुकूमत ने दिल्ली में कई तरह से ज्यादती की थी, शहर में बदहाली छा गई थी।

दिल्ली के पुराने लोगों को शहर से उखाड़ बाहर कर अंग्रेज शासन उन व्यापारियों को बढ़ावा देने लगा जिन्होंने गदर के दौरान उसका साथ दिया था। सन 1863 में सरकार ने शहरी प्रबन्धन के लिये दिल्ली म्यूनिसिपल कमेटी बनाई। इस नगरपालिका में उन लोगों को चुना गया जिन्होंने गदर और उसके बाद शासन का साथ दिया था। अंग्रेज शासन ने अपनी बस्ती शहर के बाहर, उत्तर में बसाई और दिल्ली को सड़ने के लिये छोड़ दिया।

20वीं सदी की शुरुआत तक तो दिल्ली के मैला ढोने वालों की हालत बहुत ही कमजोर हो गई थी क्योंकि नगरपालिका कमेटी ने खाद के लिये मैले को सीधे किसानों को बेचने की बजाय इकट्ठा कर, दाम बढ़ाकर बेचना शुरू कर दिया था। इस समय पाइप भी डाले गए मैले को चलाने के लिये। पड़ोस के गाँवों को उजाड़कर जब नई दिल्ली बनने लगी तो उसमें आधुनिक सीवर व्यवस्था पहले से ही डाली गई थी। इन जातियों की हालत आजादी की लड़ाई में भी बेहतर नहीं हुई।दिल्ली के मेहतरों को भेदभाव तो पहले से ही सहना पड़ता था, जो उनके काम के साथ उन्हें विरासत में मिला था। अब तो उनकी अपने हिसाब से काम करने की आजादी भी चली गई थी। बदहाली में आकर मेहतरों ने कई हड़तालें की, इस उम्मीद में कि पहले की तरह ताकतवर लोगों को उनके साथ समझौता करना पड़ेगा और वे अपनी माँगें मनवा लेंगे। पर नगरपालिका कमेटी और अंग्रेज सरकार मेहतरों के साथ किसी तरह का सीधा सम्बन्ध नहीं चाहते थे। उल्टा उन्होंने शहर में फैलती गन्दगी का ठीकरा मेहतरों के सिर फोड़ा। उन्हें काबू करने के लिये ओवरसियर नियुक्त किये, जिनका काम ही था मेहतरों का संकल्प तोड़ना, उन्हें और विवश कर देना।

1870 के दशक में मेहतरों की हड़तालों के बाद उनके और नगरपालिका कमेटी के बीच कशमकश कई साल चलती रही कमेटी ने हर तरह का हथकंडा अपनाया उन्हें कमजोर करके अपने वश में लाने का। मेहतर कमेटी के मुलाजिम नहीं बनना चाहते थे। ऐसा माना जाता है कि दिल्ली के पुराने बाशिन्दे ही नहीं, पुराने रईस भी उनके साथ थे। लेकिन धीरे-धीरे शहर के धनवान लोगों ने मेहतरों का साथ छोड़ दिया। सन 1884 में दिल्ली के मेहतरों पर तब गाज गिरी जब कमेटी ने अपने मुलाजिमों के अलावा किसी को भी शहर के मुहल्लों के सूखे शौचालयों से मल-मूत्र हटाने और उसे बेचने पर प्रतिबन्ध लगा दिया।

अब मेहतरों की कमर टूट गई और वे कमेटी के गुलाम बनकर रह गए। इस नई व्यवस्था में उनकी जाति की पहचान नहीं गई पुरानी व्यवस्था के हिसाब से वे अभी भी नीच जाति के थे, पर मुहल्लों से सीधे सम्बन्ध के फायदे खत्म हो गए थे। नई व्यवस्था ने उन्हें आत्मसम्मान देने की बजाय और तुच्छ बना दिया था।

20वीं सदी की शुरुआत तक तो दिल्ली के मैला ढोने वालों की हालत बहुत ही कमजोर हो गई थी क्योंकि नगरपालिका कमेटी ने खाद के लिये मैले को सीधे किसानों को बेचने की बजाय इकट्ठा कर, दाम बढ़ाकर बेचना शुरू कर दिया था। इस समय पाइप भी डाले गए मैले को चलाने के लिये। पड़ोस के गाँवों को उजाड़कर जब नई दिल्ली बनने लगी तो उसमें आधुनिक सीवर व्यवस्था पहले से ही डाली गई थी।

इन जातियों की हालत आजादी की लड़ाई में भी बेहतर नहीं हुई। राजनीति बदल रही थी। हर किसी को भान होने लगा था कि अंग्रेज हुकूमत जाने वाली है।

हिन्दू-मुस्लिम सम्बन्धों में खटास लगातार बढ़ रही थी। दोनों खेमे अपनी ताकत बढ़ाने के लिये अछूत और दलित समाजों को अपने साथ रखना चाहते थे। लेकिन केवल उतना ही साथ चाहिए था उन्हें कि जिससे उनके सम्प्रदाय की ताकत बढ़े। इसमें प्रायश्चित का भाव नहीं था, ऐसा नहीं था कि समाज के उस हिस्से को अपनाया जाये जिससे बाहर कर उसके साथ अन्याय किया गया था। चाहे वे हिन्दू हों या मुस्लिम, हर तरह के धर्म के लोगों ने मैला ढोने वाले को बाहर ही रखा।

आजादी के बाद भी उनके साथ सलूक कमोबेश वैसा ही हुआ है जैसा अंग्रेज हुकूमत के समय हुआ था। लेकिन अब इन जातियों की हालत सुधारने के लिये उन्हें संविधान में अनुसूचित कर दिया गया।

कई तरह के कानून बनने के बाद भी जातियों में दूरियाँ और भेदभाव कम नहीं हुआ है। छुआछूत आज भी होती है। सीवर की नालियाँ बनने से सूखे शौचालयों से मल-मूत्र हटाने की जरूरत कम तो हुई है, पर मिटी नहीं है। इसीलिये सरकार को सन 2013 में एक और कानून बनाना पड़ा। इस तरह एक सामाजिक समस्या का बार-बार कानूनी हल खोजा जा रहा है।

आधुनिकता के आने से जात-पात और भेदभाव खत्म नहीं हुए हैं। जाति की पहचान जनगणना शुरू होने के बाद से कमजोर होने की बजाय और पक्की हुई है। जातिगत अन्याय दूर करने के बहुत से नारे, बहुत से आन्दोलन फीके पड़ते रहे हैं। उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की सरकार के राज में आने के बाद भी कानपुर में अनुसूचित जातियों की महिलाएँ बाल्टियों से मैला ढो रही थीं।

कामगारों के अधिकारों की रक्षा के लिये खड़ी हुई कम्यूनिस्ट पार्टी के सालों-साल राज के बाद आज भी पश्चिम बंगाल में मैला ढोने की परम्परा का अन्त नहीं हुआ है। भारतीय जनता पार्टी के हिन्दुत्व दर्शन की सच्चाई तो यह है कि उसके गढ़ गुजरात में आज भी हाथ से मैला ढोया जा रहा है। इतने साल राज करने के बाद भी कांग्रेस पार्टी अस्पृश्यता मिटाने और शुचिता लाने के मोहनदास गाँधी के उद्देश्य को व्यवहार में उतार नहीं पाई।

खुद दलित समाज के नेताओं की जिम्मेदारी भी है इसमें। कुछ दलित नेताओं को पहचान की राजनीति में ही ज्यादा लाभ दिखता है, समाज को न्याय के रास्ते लाने पर नहीं। इसी कारण कुछ इस तरह की बातें सुनने मिलती हैं कि दलित ही भारत के आदिवासी हैं, द्रविड़ हैं। इसके कारणों में सिंधु घाटी सभ्यता के शहरों की खोज और उस पर अंग्रेज पुरातनशास्त्रियों की परिकल्पनाएँ हैं।

सन 1924 में जॉन मार्शल की हड़प्पा की खोज के बाद कुछ लोगों ने कहा कि आज के दलित ही सिंधु घाटी सभ्यता के लोग थे, जिन्हें बाहर से आये आर्य लोगों ने हरा कर दास और अछूत बना दिया। श्री जॉन के शिक्षक थे मॉर्टिमर व्हीलर, जो जर्मन भाषाशास्त्री मैक्स मुलर की आर्य भाषा और आर्य लोगों पर परिकल्पनाएँ पढ़ते थे। इन्हें श्री मॉर्टिमर ने अपने हिसाब से ढाल लिया और यह विचार रखा कि आर्यों का देव इंद्र क्रूर था और शहरों को मिटाता था, जबकि सिंधु घाटी के शहरी आदिवासियों के देव शिव थे।

समय के साथ यह साफ हो गया कि इन विचारों के पीछे कोई पुरातत्वशास्त्रीय खोज नहीं, बल्कि कुछ यूरोपीय लोगों की भारत की अधूरी समझ थी। उन दिनों यूरोप में आर्यों को लेकर तरह-तरह की अटकलें लग रहीं थीं। कुछ का विश्वास था कि यूरोप के लोग भी उत्तर भारत के लोगों की ही तरह एक ही नस्ल के थे और इस नस्ल का नाम आर्य रख दिया गया था। इससे यूरोप में जो नस्लवाद फैला सो फैला, भारत में भी कई तरह की परिकल्पनाएँ उभर आईं जिनका असर भारत की राजनीति पर ही नहीं, कई सामाजिक और धार्मिक पंथों पर भी पड़ा।

आज के हर एक मनुष्य को इथियोपिया या तनजानिया का आदिवासी कहा जा सकता है, चाहे उसकी चमड़ी का रंग और शरीर का आकार-प्रकार कैसा भी हो। जीवाश्म और अवशेषों से तो यही समझ आता है कि भारत ही नहीं, हर महाद्वीप पर मनुष्य अफ्रीका से ही आ कर बसा है। भारत में कुछ लोग थोड़ा पहले आ गए, कुछ थोड़ा बाद में। लेकिन आधुनिकता से निकली मनुष्य के क्रमिक विकास की समझ उतनी नहीं फैली है जितना आधुनिकता से ही निकला नस्लवाद फैला है।आजादी की लड़ाई चल रही थी और भाँति-भाँति के लोग आधुनिकता के आईने में अपने आप को देख रहे थे, राष्ट्रवाद और सभ्यता की अपनी-अपनी समझ बना रहे थे। इन परिकल्पनाओं को धर्मशास्त्रों के कुछ चुने हुए सूक्तों से जोड़कर कुछ दलित नेताओं ने अर्थ यह निकाला कि वे ही भारत के आदिवासी हैं और स्वर्ण हिन्दू हैं बाहर से आये आर्यों की सन्तति। इस तरह की बातचीत आज भी होती है। कई समाजों को तो पहले ही आदिवासी दर्जा दिया जा चुका है। मिसाल के तौर पर गोंड।

मध्य भारत के एक खासे बड़े हिस्से पर कुछ सौ साल तक गोंड वंशों का शासन रहा था। कालान्तर में इनके हाथ से राज चला गया। आज कुछ मानवविज्ञानी गुटों में गोंड समाज की बात ऐसे होती है जैसे यह बाकी लोगों से एकदम अलग-थलग रही शोषित प्रजाति है। गोंड समाज का गौरव याद करके, उसे सहज सम्मान देना ऐसे में असम्भव है। भारत में हर तरह की जाति के लोगों का राज रहा है और समय-समय पर यह बदलता भी रहा है। लेकिन इसका कोई प्रमाण नहीं है कि इस जमीन के आदिवासियों के वंशज आज कौन हैं। आनुवंशिकी की जाँच करने के बाद भी।

जीवविज्ञान अब जो बता रहा है वह हर तरह की विशेष पहचान की हवा निकाल रहा है, चाहे वह जाति हो, जनजाति हो या नस्ल। जीवाश्म के प्रमाण तो यहाँ तक बताते हैं कि आधुनिक मनुष्य का उद्गम कोई दो लाख साल पहले पूर्वी अफ्रीका के घास के मैदानों में हुआ था। यानी आज के हर एक मनुष्य को इथियोपिया या तनजानिया का आदिवासी कहा जा सकता है, चाहे उसकी चमड़ी का रंग और शरीर का आकार-प्रकार कैसा भी हो। जीवाश्म और अवशेषों से तो यही समझ आता है कि भारत ही नहीं, हर महाद्वीप पर मनुष्य अफ्रीका से ही आ कर बसा है। भारत में कुछ लोग थोड़ा पहले आ गए, कुछ थोड़ा बाद में। लेकिन आधुनिकता से निकली मनुष्य के क्रमिक विकास की समझ उतनी नहीं फैली है जितना आधुनिकता से ही निकला नस्लवाद फैला है।

नस्लवाद और आधुनिकता ने जाति की समझ पर भी असर डाला है। जाति को वर्णाश्रम का ही एक हिस्सा मान लिया गया है, जबकि जाति के बहुत अर्थ हैं और उसका व्यवहार विविध और जटिल रहा है। देश और काल के साथ-साथ यह व्यवहार बदलता भी रहा है। साधारण बातचीत में ‘मनुष्य की जात’, ‘आदमी की जात’, ‘औरत की जात’ जैसे जुमले आज भी इस्तेमाल होते हैं, जिनका वर्णाश्रम से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। उर्दू शायरी में तो ‘खुदा की जात’ तक मिल जाती है।

कुछ जाने-माने शोधकर्ताओं ने ऐतिहासिक अभिलेखों की मदद से यह दिखलाया है कि 18वीं शताब्दी में जाति और धर्म का व्यवहार समझने में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अंग्रेज प्रशासकों को ढेर सी मुश्किलें आई थीं। यूरोपीय समाज वर्ग के आधार पर बँटा हुआ था और वहाँ धर्म की समझ चर्च और उसकी आधिकारिक पुस्तकों से निकलती थी। उसकी तुलना में भारत में सामाजिक व्यवस्था वर्ग से नहीं, जाति से बनी थी। लेकिन जातियों का आपसी व्यवहार गाँव-गाँव, शहर-शहर में अलग था।

अंग्रेज शासकों को खोज थी उन विधि ग्रंथों की जिनके आधार पर वे भारत में अपने बढ़ते उपनिवेश पर शासन कर सकें। उन्हें लगा कि भारत में कोई आदर्श प्राचीन सामाजिक व्यवस्था रही थी जो ग्रंथों में पढ़कर मालूम की जा सकती है। ऐसे लोगों में बंगाल में कम्पनी के पहले गर्वनर-जनरल वॉरन हेस्टिंग्स मुख्य थे। इन्हीं के निर्देश पर कोलकाता में 18वीं शताब्दी में 11 ब्राह्मणों को इकट्ठा करके हिन्दू विधि संयोजित करने कीी पहली कोशिश हुई।

इस दौर के पत्राचार में पता लगता है कि ये अफसर बाह्मणों को धर्माचार्य या पंडित की तरह नहीं, वकील की हैसियत से देखते थे। विधि बनाने के पीछे कारण था अंग्रेज न्यायाधीशों की उलझन। जब उनके पास हिन्दुओं के मामले अदालत में आते तो उन्हें हिन्दू व्यवहार के बारे में कुछ पता ही नहीं था। उन्हें जरूरत थी ऐसे एक संग्रह की जिसकी मदद से वे हिन्दुओं के मामले अदालत में निपटा सकें।

इस तरह से संयोजित हुई ‘हिन्दू विधि’ का पहले संस्कृत से फारसी में अनुवाद हुआ, फिर फारसी से अंग्रेजी में। इसके बाद अंग्रेज शासकों को समझ में आने लगा कि हिन्दू ग्रंथों में टीका और टिप्पणी ढेर थी, एक ही बात की कई व्याख्याएँ भी थीं। अब वे ब्राह्मण ‘वकीलों’ की बजाय खुद ग्रंथों की सही व्याख्या करना चाहते थे। इसके लिये संस्कृत सीखने की जरूरत मालूम हो रही थी।

कोलकाता में न्यायाधीश रहे विलियम जोन्स ने संस्कृत सीखी। वे आगे चलकर प्रसिद्ध भाषाशास्त्री हुए और एशियाटिक सोसाइटी के संस्थापक भी। उन्हीं ने ‘मनुस्मृति’ का पहला अंग्रेजी अनुवाद किया। इस अनुवाद को पढ़ कर कुछ यूरोपीय विचारकों की भारत में रुचि बढ़ी। जर्मन दार्शनिक-लेखक फ्रीदरिख नीत्स्क को मनुस्मृति में मनुष्य समाज के लिये एक आदर्श और भव्य व्यवस्था दिखी। तरह-तरह के यूरोपीय लोगों ने मनुस्मृति और दूसरे धार्मिक ग्रंथों को अपने-अपने ढंग से पढ़ा और समझा।

हिन्दू धर्म का कोई चर्च नहीं था और धर्मग्रंथों की कोई चर्च-प्रमाणित पांडुलिपि नहीं थी। इसलिये यूरोपीय विचारकों की व्याख्या गम्भीरता से ली जाने लगी। इसमें कुछ सहृदय लोगों का भाव यह भी था कि अपनी परम्परा से अनभिज्ञ हिन्दुओं को उनकी प्राचीनता और महानता का अहसास दिलाया जाये। इसी आपाधापी में मनु के धर्मशास्त्र को प्राचीन भारत में कानून व्यवस्था का आधार मान लिया गया।

मनुस्मृति में और कुछ भी रहा हो, किसी कानून व्यवस्था का खाका उसमें कतई नहीं था। अंग्रेज शासन के संरक्षण में मनु का धर्मशास्त्र उन लोगों के विचारों का भी आधार बन गया जिनका उससे कोई सम्बन्ध नहीं था। यह नजरअन्दाज कर दिया गया कि न जाने कितनी जातियाँ न तो वर्णाश्रम के खाके में बैठती हैं और न ही चांडलों की परिभाषा में आती है। यही नहीं, कुछ जातियाँ तो एक से ज्यादा वर्णों में मिलती हैं।

केवल शौचालय और सीवर की नालियाँ बनाने से भारत स्वच्छ और निर्मल नहीं हो सकता, चाहे किसी भी राजनीतिक दल की सरकार कितने भी अभियान किसी भी नाम से चलाए। अगर सारे सूखे शौचालय बन्द कर दिये जाएँ तो फिर मैला ढोने वाले सफाई कर्मचारियों को कौन सी सरकार, कौन सी गैर-सरकारी संस्था रोजगार देगी? शौचालय से मैला पानी जिन नालियों में जाएगा उन्हें साफ करने कौन उतरेगा उनके भीतर? क्या यह जाति के आधार पर ही तय होता रहेगा? सफाई के मन्दिर में यह बलि प्रथा कब तक चलेगी?हमारे यहाँ धर्म की ही तरह जाति को बदलने के भी उदाहरण मिलते हैं और इसके भी कि धर्म बदलने पर भी जाति नहीं बदलती। धर्म और जाति की कोई आईएसआई मार्क अवधारणा हमारे यहाँ कभी नहीं रही है। हमारी आबादी का एक हिस्सा मनुस्मृति जैसे ग्रंथों को जरूर मानता था, लेकिन यह केवल एक हिस्सा भर था।

ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि यह ग्रंथ किसी तरह की कानूनी व्यवस्था का सर्वमान्य स्रोत था। हमारे कई पंथों और समाजों में कई तरह की सामाजिक व्यवस्थाएँ रही हैं और समय-समय पर ये बदली भी हैं। संस्कृत के कुछ विद्वान बताते हैं कि जातिभेद को तोड़ने की परम्परा भी शायद जाति जितनी ही पुरानी है।

इतनी जटिलता समझना और समझाना यूरोपीय शासकों के लिये बहुत कठिन था। विलियम जोन्स जैसे सहृदय लोगों के लिये भी, जो भारतीय लोगों का भला ही चाहते थे। उन्हें सरल और सीमित परिभाषाएँ चाहिए थीं, जो जनगणना से और पक्की हो गईं। पंजाब में चूड़ा लोगों के साथ ऐसा ही हुआ।

कई तरह के काम करने वाली इस जाति को केवल उस एक काम से पहचाना गया जिसकी वजह से अंग्रेज प्रशासन उन्हें जानता था। फिर यही पहचान उनकी छाप बनकर जनगणना में तराश दी गई। जिन लोगों को चमार की श्रेणी में डाला गया वे सब चमड़े का काम नहीं करते थे। इतिहासकार सिद्ध कर चुके हैं कि उत्तर प्रदेश में खेती करने वाले समाज को जनगणना में चमार की श्रेणी में डाला गया। कालान्तर में इस जातीय पहचान से ही लोगों का कारोबार जुड़ गया। कुछ पीढ़ियों में इसे अपना भी लिया गया।

इसका एक प्रमाण है जाति का नाम। अंग्रेज शासन में जनगणना के पहले हमारे यहाँ नाम के साथ कुलनाम या जाति का नाम नहीं जुड़ता था। उदाहरण के तौर पर किसी भी राम कथा में राजा राम का वर्णन देखिए। उन्हें कौशल्यानंदन और दशरथसुत तो कहा जाता है, लेकिन कहीं भी उन्हें ‘राम सिंह’ या ‘राम सिंह सूर्यवंशी’ के नाम से नहीं पुकारा जाता। कुछ ऐसे ही हाल बृजभूमि के प्रिय कृष्ण के हैं। न जाने कितनी जातियों के लोग देश के कितने कोनों में उन्हें अथाह प्यार से याद करते आये हैं। ‘कान्हा’ से लेकर ‘रणछोड़’ जैसे नाम भी उन्हें दिये गए हैं। पर कहीं भी उन्हें ‘कृष्ण कुमार यादव’ या ‘केके यादव’ के नाम से याद नहीं किया जाता।

जाति का भेदभाव जनगणना की वजह से नहीं पनपा है। ये तो बहुत पुराना है, लेकिन जनगणना की वजह से रूढ़ हो गया है। जाति की पहचान वर्ण से जुड़ कर जैसे अचल ही हो गई है।

आधुनिकता के युग ने भी शोषित जातियों और समाजों के साथ न्याय नहीं किया है। तमाम तरह के कानून और न्यायालयों के निर्देशों के बावजूद किसी जाति की पहचान से जुड़े अन्याय को रोकना बहुत आसान नहीं हुआ है। मैला ढोने वालों की जातिगत पहचान तो उनके लिये अभिशाप ही बनी हुई है।

यह एक बीमार, टूटे हुए समाज का लक्षण है कि शोषित और कमजोर लोगों को अपनी मुक्ति के लिये संघर्ष खुद ही करना पड़ता है, ताकतवर जातियों के लोग उनका साथ नहीं निभा रहे हैं। न संवेदना से, न प्रायश्चित के भाव से। सफाई-कर्मचारी आन्दोलन जैसी मंडलियाँ बिना साधनों के भी चुपचाप, अलग-थलग रह कर भी अपना काम कर रही हैं। ‘सेनिटेशन’ पर काम करने वाली संस्थाओं का उनसे सम्बन्ध कम है, हालांकि शौचालयों पर काम करने वालों के पास ढेर से साधन हैं, सरकारी भी और गैर-सरकारी भी।

केवल शौचालय और सीवर की नालियाँ बनाने से भारत स्वच्छ और निर्मल नहीं हो सकता, चाहे किसी भी राजनीतिक दल की सरकार कितने भी अभियान किसी भी नाम से चलाए। अगर सारे सूखे शौचालय बन्द कर दिये जाएँ तो फिर मैला ढोने वाले सफाई कर्मचारियों को कौन सी सरकार, कौन सी गैर-सरकारी संस्था रोजगार देगी? शौचालय से मैला पानी जिन नालियों में जाएगा उन्हें साफ करने कौन उतरेगा उनके भीतर? क्या यह जाति के आधार पर ही तय होता रहेगा? सफाई के मन्दिर में यह बलि प्रथा कब तक चलेगी?

सरकारी स्वच्छता अभियानों के फ्लश से निकला मैला पानी किसी सामाजिक सीवर की नाली में अटका हुआ है। उनमें गोता लगाने वाले सफाई कर्मचारियों का क्या होगा? अगर किसी चमत्कार से नगरपालिकाओं के पास ढेर सा धन आ जाये तो वे सीवर साफ करने की मशीनें खरीद सकती हैं। लेकिन हमारी शहरों के सभी शौचालय सीवर से जुड़े नहीं हैं। अगर जोड़ दिये गए तो हमारे जलस्रोतों का क्या होगा, जो मैले पानी से पहले से ही दूषित हैं?

स्वच्छता के लिये नए शौचालय और मैला ढुलाई बन्द करने के कानून ही नहीं, शुचिता का सामाजिक विचार भी चाहिए।

यह आलेख 'जल थल मल' से लिया गया है। किताब खरीदने के लिये यहाँ सम्पर्क करें


मूल्य - तीन सौ रुपए
प्रकाशक - गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान, 221 दीन दयाल उपाध्याय मार्ग, नई दिल्ली 110002


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