सफाई कर्मचारी नियोजन और शुष्क शौचालय सन्निर्माण (प्रतिषेध) अधिनियम, 1993 (THE EMPLOYMENT OF MANUAL SCAVENGERS AND CONSTRUCTION OF DRY LATRINES (PROHIBITION) ACT, 1993)

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(1993 का अधिनियम संख्यांक 46)


{5, जून 1993}


सफाई कर्मचारियों के नियोजन और साथ ही शुष्क शौचालयों के सन्निर्माण या बनाए रखने का प्रतिषेध करने तथा जल-सील शौचालयों के सन्निर्माण और अनुरक्षण का विनियमनकरने तथा उनसे सम्बन्धित या उनके आनुषंगिक विषयों का उपबन्धकरने के लिये अधिनियम

व्यक्ति की गरिमा सुनिश्चित करने वाली बन्धुता संविधान की उद्देशिका में उल्लिखित की गई है;

और संविधान के अनुच्छेद 47 में अन्य बातों के साथ-साथ यह उपबन्ध है कि राज्य, अपने लोगों के जीवनस्तर को ऊँचा करने और लोक स्वास्थ्य के सुधार को अपने प्राथमिक कर्तव्यों में मानेगा;

और मानव मल-मूत्र का सफाई कार्य करने की अमानवीय प्रथा देश के अनेक भागों में अभी भी प्रचलित है;

और शुष्क शौचालयों के जल-सील शौचालयों में सम्परिवर्तन तथा शुष्क शौचालयों के सन्निर्माण के निवारण के अध्युपाय के रूप में नगरपालिका विधियाँ इस प्रथा को समाप्त करने के लिये पर्याप्ततः कठोर नहीं हैं;

और मानव मल-मूत्र को हटाने के लिये सफाई कर्मचारियों के नियोजन को अपराध घोषित कर सफाई कार्य के हाथ से किये जाने का अन्त करने और तद्द्वारा देश में शुष्क शौचालयों की और वृद्धि पर पाबन्दी लगाने के लिये सम्पूर्ण भारत के लिये एक समान विधान अधिनियमित करना आवश्यक है;

और सफाई कर्मचारी के नियोजन की इस अमानवीय प्रथा को समाप्त करने तथा मानव पर्यावरण के संरक्षण और सुधार के लिये शुष्क शौचालयों का जल-सील शौचालयों में सम्परिवर्तन अथवा नए सन्निर्माणों में जल-सील शौचालयों का सन्निर्माण अनिवार्य करना वांछनीय है;

और संसद को संविधान के अनुच्छेद 249 और अनुच्छेद 250 में जैसा उपबन्धित है उसके सिवाय पूर्वोक्त विषयों के सम्बन्ध में राज्यों के लिये विधि बनाने की शक्ति नहीं है;

और संविधान के अनुच्छेद 252 के खण्ड (1) के अनुसरण में आन्ध्र प्रदेश, गोवा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, त्रिपुुरा और पश्चिमी बंगाल राज्यों के विधान-मण्डलों के सभी सदनों ने संकल्प पारित किये हैं कि पूर्वोक्त विषयों का विनियमन उन राज्यों में संसद विधि द्वारा करे;

भारत गणराज्य के चवालीसवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो:-

अध्याय 1


प्रारम्भिक


1. संक्षिप्त नाम, लागू होना और प्रारम्भ


(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम सफाई कर्मचारी नियोजन और शुष्क शौचालय सन्निर्माण (प्रतिषेध) अधिनियम, 1993 है।

(2) यह पहली बार में सम्पूर्ण आन्ध्र प्रदेश, गोवा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, त्रिपुरा और पश्चिमी बंगाल राज्यों को तथा सभी संघ राज्य क्षेत्रों को लागू होता है और यह ऐसे अन्य राज्य को भी लागू होगा जो संविधान के अनुच्छेद 252 के खण्ड (1) के अधीन उस निमित्त पारित संकल्प द्वारा इस अधिनियम को अंगीकार करता है।

(3) यह आन्ध्र प्रदेश, गोवा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, त्रिपुरा और पश्चिमी बंगाल राज्यों में तथा संघ राज्य क्षेत्रों में उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार अधिसूचना द्वारा, नियत करे और किसी ऐसे अन्य राज्य में जो संविधान के अनुच्छेद 252 के खण्ड (1) के अधीन इस अधिनियम को अंगीकार कर लेता है, ऐसे अंगीकरण की तारीख को प्रवृत्त होगा।

2. परिभाषाएँ


इस अधिनियम में, जब तक कि सन्दर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

(क) इस अधिनियम के किसी उपबन्ध के सम्बन्ध में, “क्षेत्र” से ऐसा क्षेत्र अभिप्रेत है, जो राज्य सरकार, उस उपबन्ध की अपेक्षाओं को ध्यान में रखते हुए, अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे;
(ख) “भवन” से कोई गृह, उपगृह, अस्तबल, शौचालय, मूत्रालय, शीट गृह, झोंपड़ी (सीमा दीवाल से भिन्न), दीवाल या कोई अन्य संरचना चाहे वह पत्थर, ईंटों, लकड़ी, मिट्टी, धातु या अन्य सामग्री से बनी हों, अभिप्रेत है;
(ग) “शुष्क शौचालय” से जल-सील शौचालय से भिन्न शौचालय अभिप्रेत है;
(घ) “पर्यावरण” के अन्तर्गत जल, वायु और भूमि है और वह अन्तर सम्बन्ध भी है जो जल, वायु और भूमि तथा मानवों, अन्य जीवित प्राणियों, पादपों और सूक्ष्म जीव और सम्पत्ति के बीच विद्यमान है;
(ङ) “पर्यावरण प्रदूषक” से ऐसा ठोस, द्रव या गैसीय पदार्थ अभिप्रेत है जो ऐसी सान्द्रता में विद्यमान है जो पर्यावरण के लिये क्षतिकर हो सकता है या जिसका क्षतिकर होना सम्भाव्य है;
(च) “पर्यावरण प्रदूषण” से पर्यावरण में पर्यावरण प्रदूषक का विद्यमान होना अभिप्रेत है;
(छ) “कार्यपालक प्राधिकारी” से धारा 5 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त कार्यपालक प्राधिकारी अभिप्रेत है;
(ज) “हुडको” से आवास और नगरीय विकास निगम लिमिटेड; जो कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन उस नाम से रजिस्ट्रीकृत सरकारी कम्पनी है, अभिप्रेत है;
(झ) “शौचालय” से वह स्थान जो मल त्याग के लिये अलग किया गया है और साथ ही ऐसे स्थान को समाविष्ट करने वाली संरचना, मानव मलमूत्र को एकत्र करने के लिये उसमें का पात्र और उससे संसक्त कोई फिटिंग और साधित्र यदि कोई हो, अभिप्रेत है;
(ञ) “सफाई कर्मचारी” से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो मानव मलमूत्र हाथ से उठाने में लगा है या नियोजित है और सफाई कार्य पद का तद्नुसार अर्थ लगाया जाएगा;
(ट) “अधिसूचना” से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है;
(ठ) “विहित” से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(ड) किसी संघ राज्यक्षेत्र के सम्बन्ध में, “राज्य सरकार” से संविधान के अनुच्छेद 239 के अधीन नियुक्त उसका प्रशासक अभिप्रेत है;
(ढ) “जल-सील शौचालय” से अभिप्रेत है अधःस्त्रवण फ्लश शौचालय, जल फ्लश शौचालय या स्वच्छता शौचालय जिसकी कम-से-कम 20 मिलीमीटर व्यास की न्यूनतम जल-सील है जिसमें मानव मलमूत्र जल द्वारा नीचे धकेला या फ्लश किया जाता है।

अध्याय 2


सफाई कर्मचारियों आदि के नियोजन का प्रतिषेध


3. सफाई कर्मचारियों आदि के नियोजन का प्रतिषेध


(1) इस अधिनियम की उपधारा (2) और अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए, ऐसी तारीख से और ऐसे क्षेत्र में जो राज्य सरकार, इस निमित्त अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे, कोई भी व्यक्ति-

(क) किसी अन्य व्यक्ति को मानव मलमूत्र हाथ से उठाने में नहीं लगाएगा या नियोजित नहीं करेगा अथवा लगाने या नियोजित करने की अनुज्ञा नहीं देगा; या
(ख) किसी शुष्क शौचालय का सन्निर्माण या अनुरक्षण नहीं करेगा।

(2) राज्य सरकार उपधारा (1) के अधीन कोई अधिसूचना तभी जारी करेगी जब-

(i) उसने ऐसा करने के अपने आशय की कम-से-कम नब्बे दिन की सूचना, अधिसूचना द्वारा दे दी है;
(ii) उस क्षेत्र में जल-सील शौचालयों के उपयोग के लिये पर्याप्त सुविधाएँ विद्यमान हैं; और
(iii) उस क्षेत्र में पर्यावरण या लोक-स्वास्थ्य के संरक्षण और सुधार के लिये ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है।

4. छूट देने की शक्ति


राज्य सरकार, राजपत्र में प्रकाशित साधारण या विशेष आदेश द्वारा और ऐसी शर्तों पर, यदि कोई हों, जिन्हें अधिरोपित करना वह ठीक समझे, किसी क्षेत्र, भवनों के प्रवर्ग या व्यक्तियों के वर्ग को इस अधिनियम के किसी उपबन्ध से अथवा इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम, आदेश, अधिसूचना या स्कीम में अन्तर्विष्ट किसी विनिर्दिष्ट अपेक्षा से छूट दे सकेगी अथवा मामलों के किसी वर्ग या वर्गों में ऐसी किसी अपेक्षा के अनुपालन से उस दशा में अभिमुक्ति प्रदान कर सकेगी जब उसका यह समाधान हो जाता है कि ऐसे उपबन्धों या ऐसी अपेक्षा के पालन से किसी मामले की परिस्थितियों में छूट दी जानी है या दी जाये अथवा अभिमुक्ति प्रदान की जानी है या प्रदान की जाये।

अध्याय 3


कार्यान्वयन प्राधिकारी और स्कीम


5. कार्यपालक प्राधिकारियों की नियुक्ति और उनकी शक्तियाँ और कृत्य


(1) राज्य सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, किसी जिला मजिस्ट्रेट या उपखण्ड मजिस्ट्रेट को ऐसे क्षेत्र के भीतर, जो आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाये, अधिकारिता का प्रयोग करने के लिये कार्यपालक प्राधिकारी नियुक्त कर सकेगी तथा उसे ऐसी शक्तियाँ प्रदान कर सकेगी और उस पर ऐसे कर्तव्य अधिरोपित कर सकेगी जो यह सुनिश्चित करने के लिये आवश्यक हो कि इस अधिनियम के उपबन्धों का उचित रूप से कार्यान्वयन किया जा रहा है और कार्यपालक प्राधिकारी अपने अधीनस्थ किसी अधिकारी या अधिकारियों को, जो ऐसी सभी या किन्हीं शक्तियों का प्रयोग करेंगे अथवा ऐसे सभी या किन्हीं कर्तव्यों का पालन करेंगे जो इस प्रकार प्रदत्त या अधिरोपित किये जाएँ तथा ऐसी स्थानीय सीमा को जिसके भीतर इस प्रकार विनिर्दिष्ट अधिकारी या अधिकारियों द्वारा ऐसी शक्तियों का प्रयोग किया जाएगा और ऐसे कर्तव्यों का पालन किया जाएगा, विनिर्दिष्ट कर सकेगा।

(2) उपधारा (1) के अधीन नियुक्त कार्यपालक प्राधिकारी और उस उपधारा के अधीन विनिर्दिष्ट अधिकारी, जहाँ तक साध्य हो, ऐसे व्यक्तियों का, जिन्हें ऐसे किसी क्षेत्र में, जिसके सम्बन्ध में धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन कोई अधिसूचना जारी की गई है, सफाई कर्मचारियों के रूप में लगाया गया था या नियोजित किया गया था उनके आर्थिक हितों को सुनिश्चित और संरक्षित करके उनके पुनर्वास की अभिवृद्धि का और उनके कल्याण का विनियमन करने का प्रयत्न करेंगे।

6. स्कीमें बनाने की राज्य सरकार की शक्ति


(1) राज्य सरकार, एक या अधिक स्कीमें, शुष्क शौचालयों के जल-सील शौचालयों में सम्परिवर्तन का अथवा जल-सील शौचालयों के सन्निर्माण या अनुरक्षण का, ऐसे व्यक्तियों के, जिन्हें ऐसे किसी क्षेत्र में, जिसके सम्बन्ध में धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन कोई अधिसूचना जारी की गई है, सफाई कर्मचारियों के रूप में लगाया गया था या नियोजित किया गया था, लाभप्रद नियोजन में पुनर्वास का और ऐसी स्कीमों के प्रशासन का विनियमन करने लिये, अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी तथा भिन्न-भिन्न क्षेत्रों के सम्बन्ध में और इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न प्रयोजनों के लिये भिन्न-भिन्न स्कीमें बनाई जा सकेंगी:

परन्तु ऐसी कोई स्कीम जिसमें हुडको से वित्तीय सहायता अन्तर्वलित है उसके परामर्श के बिना नहीं बनाई जाएगी।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसी स्कीम में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिये उपबन्ध किया जा सकेगा, अर्थात-

(क) शुष्क शौचालयों का जल-सील शौचालयों में सम्परिवर्तन करने का समयबद्ध क्रमिक कार्यक्रम;
(ख) स्थानीय निकायों या अन्य अभिकरणों को नई या वैकल्पिक कम खर्च की सफाई के लिये तकनीकी और वित्तीय सहायता का उपबन्ध;
(ग) सामुदायिक शौचालयों का सन्निर्माण और अनुरक्षण तथा उनके उपयोग का विनियमन जिनका उपयोग सन्दाय करके ही किया जा सकता है;
(घ) गन्दी बस्ती क्षेत्र में अथवा सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से पिछड़े नागरिकों के वर्गों के फायदे के लिये साझा शौचालयों का सन्निर्माण और अनुरक्षण;

(ङ) सफाई कर्मचारियों का रजिस्ट्रीकरण और उनका पुनर्वास;
(च) जल-सील शौचालयों के विनिर्देश और मानक;
(छ) शुष्क शौचालयों के जल-सील शौचालयों में सम्परिवर्तन की प्रक्रिया;
(ज) सामुदायिक शौचालयों या साझा शौचालयों की बाबत फीस का संग्रहण करने के लिये अनुज्ञप्ति।

7. निदेश देने की राज्य सरकार की शक्ति


किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी किन्तु इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए, राज्य सरकार, इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग और अपने कृत्यों के पालन में, किसी व्यक्ति, अधिकारी अथवा स्थानीय या अन्य प्राधिकारी को लिखित रूप में निदेश दे सकेगी और ऐसा व्यक्ति, अधिकारी अथवा स्थानीय या अन्य प्राधिकारी ऐसे निदेश का पालन करने के लिये बाध्य होगा।

8. कार्यपालक प्राधिकारियों, निरीक्षकों, ऐसे प्राधिकारियों के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों का लोक सेवक होना


सभी कार्यपालक प्राधिकारी, ऐसे प्राधिकारियों के सभी अधिकारी और अन्य कर्मचारी जिनके अन्तर्गत धारा 5 की उपधारा (1) के अधीन प्राधिकृत अधिकारी हैं धारा 9 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त सभी निरीक्षक तथा इस अधिनियम के अधीन बनाई गई स्कीम या निकाले गए आदेश के निष्पादन के लिये प्राधिकृत सभी अधिकारी और अन्य कर्मचारी, जब वे इस अधिनियम के किसी उपबन्ध या उसके अधीन बनाई गई किसी स्कीम या निकाले गए किसी आदेश अथवा दिये गए निदेशों के अधीन कार्य कर रहे हैं या उनका कार्य करना तात्पर्यित है, भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझे जाएँगे।

9. निरीक्षकों की नियुक्ति तथा प्रवेश और निरीक्षण करने की उनकी शक्तियाँ


(1) राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा ऐसे व्यक्तियों को, जिन्हें वह ठीक समझे, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिये निरीक्षक नियुक्त कर सकेगी और वह स्थानीय सीमाएँ परिनिश्चित कर सकेगी जिनके भीतर वे इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग करेंगे।

(2) किसी कार्यपालक प्राधिकारी की अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर प्रत्येक निरीक्षक ऐसे प्राधिकारी का अधीनस्थ होगा।

(3) राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त बनाए गए किन्हीं नियमों के अधीन रहते हुए, कोई निरीक्षक अपनी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर सभी युक्तियुक्त समयों पर, ऐसी सहायता के साथ, जो वह आवश्यक समझे:-

(क) कार्यपालक प्राधिकारी के ऐसे किन्हीं कृत्यों का पालन करने के प्रयोजन के लिये जो उसे सौंपे जाएँ;
(ख) यह अवधारित करने के प्रयोजन के लिये कि क्या और यदि ऐसा है तो वह रीति से जिससे ऐसे कोई कृत्य किये जाने हैं, या क्या इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों, आदेशों या स्कीमों अथवा इस अधिनियम के अधीन तामील की गई किसी सूचना, किये गए किसी आदेश, दिये गए किसी निदेश या प्राधिकारी के किन्हीं उपबन्धों का पालन किया जा रहा है या पालन किया गया है;
(ग) किसी शौचालय की परीक्षा और परीक्षण करने के लिये या ऐसे किसी भवन का निरीक्षण करने के लिये जिसमें उसके पास यह विश्वास करने का कारण है कि इस अधिनियम के अधीन या इसके अधीन बनाए गए नियमों, आदेशों या स्कीमों के अधीन कोई अपराध किया गया है या किया जा रहा है या किया जाने वाला है और पर्यावरण प्रदूषण के निवारण या कम करने के लिये, किसी स्थान में प्रवेश कर सकेगा।

10. कतिपय मामलों में पर्यावरण प्रदूषण के निवारण लिये कार्यपालक प्राधिकारी की शक्ति


(1) धारा 3 के उपबन्धों के उल्लंघन की किसी घटना के तथ्य या आशंका के बारे में चाहे किसी व्यक्ति की सूचना के माध्यम से या निरीक्षक की रिपोर्ट पर या अन्यथा, कार्यपालक प्राधिकारी, यथाशीघ्र इस अधिनियम के अधीन कोई अन्य कार्यवाही करने के अतिरिक्त परिसर के स्वामी या अधिभोगी को ऐसे उपचारी उपाय, जो आवश्यक हों, ऐसे युक्तियुक्त समय के भीतर जो उसमें विनिर्दिष्ट किया जाये करने का निदेश देगा और यदि, यथास्थिति, स्वामी या अधिभोगी ऐसे निदेशों का पालन करने में असफल रहता है तो वह ऐसे उपचारी उपाय, जो पर्यावरण प्रदूषण के निवारण या कम करने के लिये आवश्यक हैं, परिसर के ऐसे स्वामी या अधिभोगी के खर्च पर करवाएगा।

(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट उपचारी उपायों की बाबत कार्यपालक प्राधिकारी द्वारा उपगत व्यय, यदि कोई हो और साथ ही ऐसी दर पर ब्याज जो राज्य सरकार उस तारीख से जब व्यय के लिये कोई माँग की जाती है, उस तारीख तक के लिये जब उसका सन्दाय किया जाता है, विनिर्दिष्ट करे, सम्बन्धित व्यक्ति से ऐसे प्राधिकारी या अधिकरण द्वारा भू-राजस्व या लोकमाँग की बकाया तौर पर वसूल किया जा सकेगा।

11. कतिपय मामलों में वित्तीय सहायता देने का हुडको का कर्तव्य


(1) हुडको का, उनके संगम-ज्ञापन या संगम- अनुच्छेद में अथवा आवास और नगरीय विकास के लिये उधार देने की स्कीम में किसी बात के होते हुए भी, यह कर्तव्य होगा कि वह समुचित मामलों में जल-सील शौचालयों के सन्निर्माण के लिये ऐसी स्कीमों के, जो धारा 6 के अधीन बनाई जाएँ, कार्यान्वयन के लिये वित्तीय सहायता दे।

(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट वित्तीय सहायता, हुडको द्वारा ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर (जिनके अन्तर्गत ब्याज की आसान और रियायती दरें हैं) और ऐसी रीति से, जो वह प्रत्येक मामले में या मामलों के वर्ग में ठीक समझे, दी जा सकेगी।

12. फीस उद्गृहीत करने की शक्ति


किसी ऐसे आदेश या स्कीम में, जिसे बनाने के लिये राज्य सरकार इस अधिनियम के अधीन सशक्त है, उस आशय के किसी अभिव्यक्त उपबन्ध के अभाव में भी, निम्नलिखित की बाबत फीस उद्गृहीत करने के लिये उपबन्ध किया जा सकेगा, अर्थात-

(क) किसी स्कीम के अधीन सन्निर्मित सामुदायिक शौचालय जिनका उपयोग सन्दाय करके ही किया जा सकता है; या
(ख) किसी स्कीम के अधीन सन्निर्माण साझा शौचालय; या
(ग) दस्तावेजों या आदेशों या उनके उद्धरण की प्रतिलिपियों का प्रदाय; या
(घ) जल-सील शौचालयों के सन्निर्माण के लिये ठेकेदारों को अनुज्ञप्ति; या
(ङ) कोई अन्य प्रयोजन या विषय जिसमें इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम, निदेश, आदेश या स्कीम के अधीन किसी अधिकारी, समिति या प्राधिकारी द्वारा सेवाएँ प्रदान करना अन्तर्वलित है:

परन्तु यदि राज्य सरकार लोकहित में ऐसा करना आवश्यक समझती है तो वह, राजपत्र में प्रकाशित किसी साधारण या विशेष आदेश द्वारा, ऐसे आधारों पर, जो वह ठीक समझे, ऐसी किसी फीस के सन्दाय में भागतः या पूणर्तः छूट दे सकेगी।

13. समितियों का गठन


(1) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा,-

(क) देश में जल-सील शौचालयों के सन्निर्माण के लिये स्कीमों के मूल्यांकन के लिये एक या अधिक परियोजना समितियों का,
(ख) ऐसी स्कीमों की प्रगति पर निगरानी रखने के लिये एक या अधिक निगरानी समितियों का,
(ग) अधिनियम के ऐसे प्रयोजनों के लिये और ऐसे नामों से ऐसी अन्य समितियों का जो केन्द्रीय सरकार ठीक समझे, गठन कर सकेगी।

(2) केन्द्रीय सरकार द्वारा गठित समितियों की संरचना, उनकी शक्तियाँ और उनके कृत्य, ऐसी समितियों के सदस्यों की नियुक्ति के निबन्धन और शर्तें तथा उनसे सम्बन्धित अन्य विषय ऐसे होंगे जो केन्द्रीय सरकार विहित करे।

(3) उपधारा (1) के अधीन समितियों के सदस्यों को अधिवेशनों में उपस्थित होने के लिये भी ऐसी फीस और भत्तों का सन्दाय किया जाएगा जो विहित किये जाएँ।

(4) राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा,-

(क) राज्य में जल-सील शौचालयों के सन्निर्माण के कार्यक्रमों का समन्वयन करने और निगरानी रखने के लिये और ऐसे व्यक्तियों के जो ऐसे किसी क्षेत्र में, जिसकी बाबत धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन कोई अधिसूचना जारी की गई है, सफाई कर्मचारियों के रूप में लगाए गए थे या नियोजित किये गए थे, पुनर्वास के लिये एक या अधिक समन्वय समितियों का गठन कर सकेगी;
(ख) अधिनियम के ऐसे प्रयोजनों के लिये और ऐसे नामों से ऐसी अन्य समितियों का गठन कर सकेगी जो राज्य सरकार ठीक समझे।

(5) राज्य सरकार द्वारा गठित समितियों की संरचना, उनकी शक्तियाँ और उनके कृत्य, ऐसी समितियों के सदस्यों के निबन्धन और शर्तें तथा उनसे सम्बन्धित अन्य विषय ऐसे होंगे जो राज्य सरकार विहित करे।

(6) उपधारा (4) के अधीन समितियों के सदस्यों को अधिवेशनों में उपस्थित होने के लिये ऐसी फीस और भत्तों का सन्दाय किया जाएगा जो विहित किये जाएँ।

अध्याय 4


शास्तियाँ और प्रक्रिया


14. अधिनियम के तथा नियमों और स्कीमों के उपबन्धों के तथा आदेशों और निदेशों के उल्लंघन के लिये शास्ति


जो कोई इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों या स्कीमों के किन्हीं उपबन्धों का, अथवा जारी किये गए आदेशों या निदेशों का अनुपालन करने में असफल रहेगा या उल्लंघन करेगा, वह, प्रत्येक ऐसी असफलता या उल्लंघन की बाबत, कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से जो दो हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से और यदि असफलता या उल्लंघन चालू रहता है तो अतिरिक्त जुर्माने से, जो ऐसी प्रथम असफलता या उल्लंघन के लिये दोषसिद्धि के पश्चात ऐसे प्रत्येक दिन के लिये, जिसके दौरान ऐसी असफलता या उल्लंघन चालू रहता है, एक सौ रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा।

15. कम्पनियों द्वारा अपराध


(1) यदि इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध करने वाला व्यक्ति कम्पनी है तो ऐसी कम्पनी और साथ ही उस अपराध के किये जाने के समय उस कम्पनी के कारबार के संचालन के लिये उस कम्पनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी प्रत्येक व्यक्ति भी, ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएँगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किये जाने और दण्डित किये जाने के भागी होंगे:

परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को किसी दण्ड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किये जाने का निवारण के लिये सभी सम्यक तत्परता बरती थी।

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी जहाँ इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध कम्पनी के किसी निदेशक, प्रबन्धक, प्रबन्ध अभिकर्ता या ऐसे अन्य अधिकारी की सहमित या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है वहाँ ऐसा निदेशक, प्रबन्धक, प्रबन्ध अभिकर्ता या ऐसा अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किये जाने और दण्डित किये जाने का भागी होगा।

स्पष्टीकरण


इस धारा के प्रयोजनों के लिये-

(क) “कम्पनी” से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम है; और
(ख) फर्म के सम्बन्ध में “निदेशक” से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है।

16. अपराधों का संज्ञेय होना


दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अधीन प्रत्येक अपराध संज्ञेय होगा।

17. अधिकारिता के सम्बन्ध में उपबन्ध


(1) महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय से अवर कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का विचारण नहीं करेगा।

(2) इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के लिये कोई अभियोजन, कार्यपालक प्राधिकारी द्वारा या उसकी पूर्व मंजूरी से ही संस्थित किया जाएगा, अन्यथा नहीं।

(3) कोई न्यायालय, इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का संज्ञान कार्यपालक प्राधिकारी द्वारा इस निमित्त साधारणतया या विशेष रूप से प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा किये गए परिवाद पर ही करेगा, अन्यथा नहीं।

18. अभियोजन की परिसीमा


कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का संज्ञान तभी करेगा जब उसका परिवाद उस तारीख से, जिसको अभिकथित अपराध का किया जाना परिवादी की जानकारी में आया या तीन मास के भीतर किया जाता है।

अध्याय 5


प्रकीर्ण


19. जानकारी, रिपोर्टें या विवरणियाँ


केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के सम्बन्ध में समय-समय पर, किसी व्यक्ति, अधिकारी, राज्य सरकार या अन्य प्राधिकारी से, यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह उसे, किसी विहित प्राधिकारी या अधिकारी को कोई रिपोर्टें, विवरणियाँ, आँकड़े, लेखा और ऐसी अन्य जानकारी, जो वह आवश्यक समझे, दे और, यथास्थिति, ऐसा व्यक्ति, अधिकारी, राज्य सरकार या अन्य प्राधिकारी ऐसा करने के लिये आबद्ध होगा।

20. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिये संरक्षण


इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों या स्कीमों अथवा जारी किये गए आदेशों या निदेशों के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिये आशयित किसी बात की बाबत कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही, सरकार या सरकार के किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी या इस अधिनियम के अधीन गठित किसी प्राधिकारी या इस अधिनियम के अधीन बनाई गई किसी स्कीम को निष्पादित करने वाले प्राधिकरण या ऐसे प्राधिकरण या प्राधिकारी के किसी सदस्य, अधिकारी या अन्य कर्मचारी के विरुद्ध नहीं होगी।

21. इस अधिनियम से असंगत अन्य विधियों और करारों का प्रभाव


(1) उपधारा (2) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, इस अधिनियम, इसके अधीन बनाए गए नियमों, स्कीमों के उपबन्ध या किये गए आदेश, इस अधिनियम से भिन्न किसी अधिनियमिति, रूढ़ि, परम्परा, संविदा, करार या अन्य लिखत में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे।

(2) यदि कोई कार्य या लोप इस अधिनियम और किसी अन्य अधिनियम के अधीन दण्डनीय कोई अपराध गठित करता है, वहाँ ऐसे अपराध का दोषी पाया गया अपराधी अन्य अधिनियम के अधीन दण्डित किये जाने का भागी होगा न कि इस अधिनियम के अधीन।

22. नियम बनाने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति


(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के लिये नियम, अधिसूचना द्वारा बना सकेगी।

(2) पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिये उपबन्ध किया जा सकेगा, अर्थात-

(i) केन्द्रीय सरकार द्वारा धारा 13 की उपधारा (1) के अधीन गठित परियोजना समितियों, निगरानी समितियों और अन्य समितियों की संरचना, उनकी शक्तियाँ और उनके कृत्य, सदस्यों की संख्या और उनकी नियुक्ति के निबन्धन और शर्तें तथा उनसे सम्बन्धित अन्य विषय;
(ii) धारा 13 की उपधारा (1) के अधीन गठित समितियों के सदस्यों को सन्दत्त की जाने वाली फीस और भत्ते।

(3) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात यथाशीघ्र संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिये रखा जाएगा। यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी। यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिये सहमत हो जाएँ तो तत्पश्चात वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा। यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएँ कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात वह निष्प्रभाव हो जाएगा किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

23. नियम बनाने की राज्य सरकार की शक्ति


(1) राज्य सरकार, इस अधिनियम के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के लिये, नियम, अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी, जो ऐसे विषय नहीं हैं जिनके लिये नियम केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाए जाने हैं या बनाए जाने अपेक्षित हैं।

(2) पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिये उपबन्ध किया जा सकेगा, अर्थात-

(i) राज्य सरकार द्वारा धारा 13 की उपधारा (4) के अधीन गठित राज्य समन्वयन समितियों और अन्य समितियों की संरचना, उनकी शक्तियाँ और उनके कृत्य, सदस्यों की संख्या और उनकी नियुक्ति के निबन्धन और शर्तें तथा उनसे सम्बन्धित अन्य विषय;
(ii) धारा 13 की उपधारा (4) के अधीन गठित समितियों के सदस्यों को सन्दत्त की जाने वाली फीस और भत्ते;
(iii) कोई अन्य विषय जिसका विहित किया जाना अपेक्षित है या जो विहित किया जाये।

(3) इस अधिनियम के अधीन राज्य सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम और स्कीम, बनाए जाने के पश्चात यथाशीघ्र राज्य विधानमण्डल के समक्ष रखी जाएगी।

24. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति


(1) यदि इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबन्ध कर सकेगी, जो इस अधिनियम के उपबन्धों से असंगत न हों और जो उस कठिनाई को दूर करने के लिये उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों:

परन्तु किसी राज्य के सम्बन्ध में, ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के उस राज्य में प्रारम्भ से तीन वर्ष की समाप्ति के पश्चात नहीं किया जाएगा।

(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किये जाने के पश्चात यथाशीघ्र संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा।

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Submitted by Raj kamal (not verified) on Sun, 05/27/2018 - 23:42

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