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नाद स्वरे नदी नाम


वैज्ञानिक दृष्टि से गौर करने लायक तथ्य यह है कि यदि नदी का पानी अपनी गति खो बैठे, तो उसका पानी सड़ने लगता है। यह गतिशीलता ही है, जो नदी को अपना पानी स्वयं स्वच्छ करने की क्षमता प्रदान करती है। ऐसे में सावधानी बरतने की बात यह है कि हम किसी भी नदी प्रवाह के प्रवाह मार्ग और किनारों पर कोई अवरोध न खड़ा न करें।

भारतीय सांस्कृतिक ग्रंथों में नदी शब्द की उत्पत्ति का उल्लेख करते हैं। नदी को सिन्धु पत्नी का नाम देकर नदी का बुनियादी गुण व अपेक्षा भी स्पष्ट करते हैं। आइये, जाने कि क्यों है इस लेख का शीर्षक: नाद स्वरे नदी नाम ?

नदी शब्द की उत्पत्ति


एददः सम्प्रयती रहावनदता हते।
तस्मादा नद्यो3नाम स्थ ता वो नामानि सिन्धवः।।
(सन्दर्भ ग्रंथ: अथर्ववेद, तृतीय काण्ड, सूक्त-13, मंत्र संख्या - 01)

“हे सरिताओं, आप भली प्रकार से सदैव गतिशील रहने वाली हो। मेघों से ताडि़त होने, बरसने के बाद, आप जो कल-कल ध्वनि नाद कर रही हैं; इसीलिये आपका नाम ’नदी’ पड़ा। यह नाम आपके अनुरूप ही है।’’

सनातनी हिंदू सन्दर्भ इसकी पुष्टि करता है। तद्नुसार, नाद स्वर की उत्पत्ति, शिव के डमरू से हुई। इसी नाद स्वर से संगीत की उत्पत्ति मानी गई है और इसी नाद स्वर की भांति ध्वनि उत्पन्न करने के कारण जलधाराओं को ‘नदी’ का सम्बोधन प्रदान किया गया। लोक संस्कृतियों ने जलधाराओं को स्थानीयता और लोक बोली के अनुरूप सम्बोधन दिया।

नदी शब्द की उत्पत्ति के उक्त सांस्कृतिक सन्दर्भ से नदी के दो गुण स्पष्ट हैं:

प्रथम- सदैव गतिशील रहना,
दूसरा- गतिशील रहते हुए नाद ध्वनि उत्पन्न करना।

स्पष्ट है कि ऐसे गुण वाले प्रवाहों को ही हम ‘नदी’ कहकर सम्बोधित कर सकते हैं। गौर करें कि जो गुण किसी नदी को नहर से भिन्न श्रेणी में रखते हैं, उनमें से प्रमुख दो गुण यही हैं। इन गुणों के नाते आप नदी को दुनिया की ऐसी प्रथम संगीतमयी यात्री कह सकते हैं, जो सिर्फ समुद्र से मिलने पर ही विश्राम करना चाहती है।

वैज्ञानिक दृष्टि से गौर करने लायक तथ्य यह है कि यदि नदी का पानी अपनी गति खो बैठे, तो उसका पानी सड़ने लगता है। यह गतिशीलता ही है, जो नदी को अपना पानी स्वयं स्वच्छ करने की क्षमता प्रदान करती है। ऐसे में सावधानी बरतने की बात यह है कि हम किसी भी नदी प्रवाह के प्रवाह मार्ग और किनारों पर कोई अवरोध न खड़ा न करें।

क्या आज हम ऐसी सावधानी बरत रहे हैं ? विचार कीजिए।


ध्यान दें कि कोई भी जल प्रवाह तभी कल-कल नाद ध्वनि उत्पन्न कर सकता है, जब उसमें पर्याप्त जल हो; उसका तल ढालू हो; उसके तल में कटाव हों। जल की मात्रा से उत्पन्न दबाव, तल के ढाल से प्राप्त वेग तथा कटाव के कारण होने वाला घर्षण - इन तीन क्रियाओं के कारण ही नदी कल-कल नाद ध्वनि उत्पन्न करती है। इन तीनों क्रियाओं के जरिए नदी में ऑक्सीकरण की प्रक्रिया निरन्तर बनी रही है। ऑक्सीकरण की यह सतत् प्रक्रिया ही जल को एक स्थान पर टिके हुए जल की तुलना में अधिक गुणकारी बनाती है। पहाड़ी नदियों में बहकर आये पत्थर ऑक्सीकरण की इस प्रक्रिया को तेज करने में सहायक होते हैं। पत्थरों के इस योगदान को देखते हुए ही ‘कंकर-कंकर में शंकर’ की अवधारणा प्रस्तुत की गई। स्पष्ट है कि यदि नदी जल में कमी आ जाये, तल समतल हो जाये अथवा तथा तल में मौजूद कटाव मिट जायें, पहाड़ी नदियों में से पत्थरों का चुगान कर लिया जाये, तो नदियाँ अपने नामकरण का आधार खो बैठेंगी और इसके साथ ही अपने कई गुण भी।

विचार कीजिए कि नदी के मध्य तक जाकर किए जा रहे रेत खनन, पत्थर चुगान और गाद निकासी करके हम नदी को उसके शब्दिक गुण से क्षीण कर रहे हैं अथवा सशक्त ?

आइये, आगे बढें। अन्य सन्दर्भ देखें तो हिमालयी प्रवाहों को ’अप्सरा’ तथा ’पार्वती’का सम्बोधन मिलता है। श्री काका कालेलकर द्वारा लिखित पुस्तक ’जीवन लीला’में नदी नामकरण के ऐसे कई अन्य सन्दर्भों का जिक्र है। सिन्धुपत्नीः अथर्ववेद (सूक्त 24, मंत्र संख्या-तीन) में जलधाराओं को समुद्र पत्नी का नाम दिया गया है।

सिन्धुपत्नीः सिन्धुराज्ञीः सर्वा या नद्यवस्थन।
दव्त नस्तस्य भेषजं तेना वो भुनजामहे।।


अर्थात आप समुद्र की पत्नियाँ हैं। समुद्र आपका सम्राट हैं। हे निरन्तर बहती हुई जलधाराओं, आप हमारे पीड़ा से मुक्त होने वाले रोग का निदान दें, जिससे हम स्वजन निरोग होकर अन्नादि बल देने वाली वस्तुओं का उपभोग कर सकें।

गीता (अध्याय दो, श्लोक -70) में श्रीकृष्ण ने नदी-समुद्र सम्बन्ध की तुलना आत्मा और परमात्मा सम्बन्ध से की है।

आपूर्यमाणम चलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वेस शान्तिमाप्नोन काम कामी।।


भावार्थ यह है कि जैसे नाना नदियों का जल सब ओर परिपूर्ण अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में विचलित न करते हुए समा जाते हैं, वैसे ही जो सब भोग स्थितप्रज्ञ पुरुष में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न किए बिना ही समा जाते हैं, वही पुरुष परम शान्ति को प्राप्त होता है; भोग चाहने वाला नहीं।

हम सभी जानते हैं कि प्रत्येक नदी अन्ततः जाकर समुद्र में ही मिलती है। नदी अपने उद्गम पर नन्ही बालिका सी चंचल और ससुराल के नजदीक पहुंचने पर गहन-गंभीर-शांत दुल्हन की गति व रूप धारण कर लेती है। जाहिर है कि अपने इसी गहन गंभीर रूप के कारण वह समुद्र को विचलित नहीं करती। इसी कारण नदियों को ‘सिन्धु पत्नी’ कहा गया है। यहाँ विचारणीय तथ्य यह है कि यदि नदी ‘सिन्धु पत्नी’ है तो नदियों का जल बहकर समुद्र तक जाने को व्यर्थ बताकर नदी जोड़ परियोजना की वकालत करने वालों तथा बाँध बनाने वालों से क्या यह प्रश्न नहीं पूछा जाना चाहिए कि पति से समुद्र के मिलन मार्ग में बाधा क्यों उत्पन्न कर रहे हैं ? यह प्रश्न पूछते हुए हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि नदी व्यर्थ ही समुद्र तक नहीं जाती। समुद्र मिलन से पूर्व नदियाँ कई दायित्वपूर्ण कार्य सम्पन्न करती हैं। इस दौरान नदियों को अपनी ससुराल यात्रा मार्ग में मैदानों का निर्माण करना होता है; निर्मित मैदानों को सतत् ऊंचा करना होता है; डेल्टा बनाने होते हैं; मिट्टी तथा भूजल का शोधन करना होता है; भूजल का पुनर्भरण करना होता है; समुद्री जल के खारेपन को नियंत्रित करना होता है।

नदी-समुद्र मिलन में बाधा उत्पन्न करना, नदी के दायित्वपूर्ण कार्यों में बाधा उत्पन्न करना है। क्या इसे आत्मा-परमात्मा मिलन में बाधक पापकर्म के स्तर का पापकर्म नहीं मानना चाहिए ?

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