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कमजोर ‘लैला’ से प्रभावित हो सकता है मानसून

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मई 2010, संवेदनाओं के पंख
हवा की दिशाहवा की दिशाचारों ओर लैला की ही चर्चा है। हर कोई लैला के बारे में ही बात कर रहा है। कोई इसे जबर्दस्त चक्रवाती तूफान करार देता है, तो कोई इसके कमजोर होने पर राहत महसूस कर रहा है। अब तक करीब 25 जानें लेने वाला यह तूफान भले ही कमजोर पड़ गया हो, पर सच तो यह हे कि इसके हमारे मेहमान मानसून का मिजाज बिगाड़ दिया है। अब मानसून हमसे रुठ जाएगा, जो पहले आने वाला था, अब उसे आने में कुछ देर हो जाएगी। हमारे देश में मानसून एक ऐसी शक्ति है, जो अच्छे से अच्छे बजट को बिगाड़ सकती है। कोई भी तुर्रमखाँ वित्तमंत्री इसके बिना अपना बजट बना ही नहीं सकता। पूरे देश का भविष्य मानसून पर निर्भर करता है। इसलिए इस बार मानसून को लेकर की जाने वाली तमाम भविष्यवाणियों को प्रभावित कर सकती है, लैला की सक्रियता। मानसून सक्रिय होता है, समुद्र पर, किंतु वह सभी देशों को विशेष रूप से प्रभावित करता है। मानसून की सक्रियता छोटे-छोटे देशों, राज्यों को मालामाल कर सकती है और इसकी निष्क्रियता कई देशों को कंगाल भी बना सकती है।

लैला ने मानसून मानसून एक्सप्रेस की रफ्तार पर थोड़ा ब्रेक लगा दिया है। इससे मानसून के केरल तट पर पहुंचने में दो से तीन दिन की देरी हो सकती है, जिसका असर दिल्ली तक के सफर पर पड़ेगा। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल मानसून के पूरे सीजन पर लैला का कोई खास असर पड़ने का अंदेशा नहीं है, क्योंकि इस साइक्लोन का प्रभाव लगभग खत्म हो गया है। मौसम विशेषज्ञ रंजीत सिंह के अनुसार साइक्लोन मानसून को पुश करने में अहम भूमिका निभाने वाली समुद्रतटीय इलाकों की एनर्जी को सोख लेता है। मानसून के केरल तट पर पहुंचने की सामान्य तारीख 1 जून है। इसमें अभी 10 दिन का वक्त है। अगर इन दिनों के अंदर दोबारा उतनी एनर्जी डेवलप हो गई, तो मानसून सामान्य स्पीड से आगे बढ़ पाएगा, वरना यह लेट हो सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार वातावरण (सर्फेस) टेंपरेचर और सी-लेवल (समुद्र तल) के टेंपरेचर के बीच के अंतर को थर्मल ग्रेडिएंट कहते हैं। यह ग्रेडिएंट जितना ज्यादा होता है, मानसून उतनी ही तेजी से आगे बढ़ता है। इसीलिए कहा जाता है कि मैदानी इलाकों में जितनी गर्मी होगी, मानसून में उतनी ही अच्छी बारिश होगी। मौसम विभाग के वैज्ञानिक अशोक कुमार के अनुसार दो- तीन दिन में पता लग जाएगा कि मानसून केरल को कब तक हिट करेगा। दिल्ली में मानसून के पहुंचने की नॉर्मल डेट 29 जून है। एक-दो दिन में वेस्टर्न डिस्टबेर्ंस प्रभावी होने वाला है। ऐसे में अगले दो-तीन दिन दिल्ली का टेंपरेचर बढ़ेगा, मगर इसके बाद तापमान गिरेगा। ऐसे में पारा 45 डिग्री से ऊपर पहुंचने के कोई आसार नहीं हैं।

अच्छी बारिश होगी, तो ये होगा


1. पिछले साल 37 साल के सबसे खराब मानसून से तिलहन व गन्ने की फसलों की बर्बादी ने खाद्यान्न सूचकांक दो अंकों में पहुंचा दिया था। ताजा आंकड़ों के मुताबिक रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दर बढ़ाने की आशंका से खाद्यान्न की कीमतें 17 मार्च की तुलना में 17.70 फीसदी अधिक है। अच्छे मानसून की उम्मीद से इसमें सुधार होगा।
2. अच्छे मानसून की उम्मीद से गेहूं के निर्यात की संभावना बढ़ गई है। वरना देश में कमी के डर से गेहूं निर्यात पर तीन साल से पाबंदी लगी हुई है।
3. हम दुनिया के दूसरे सबसे बड़े चीनी उत्पादक हैं और खपत सबसे यादा है लेकिन पिछले साल कम बारिश से 50 लाख टन चीनी आयात करनी पड़ी थी। इससे न्यूयॉर्क के चीनी के वायदा कारोबार में उछाल आ गया था।
4. तिलहन के कम उत्पादन के कारण हमने खाद्य तेल के सबसे बड़े खरीदार चीन को भी पीछे छोड़ दिया था। अब अच्छी बारिश से खाद्य तेल कम आयात करना पड़ेगा।

कैसे पड़ा लैला का नाम लैला


यह सवाल आपके मन में आ रहा होगा कि आखिर इस तूफान का नाम लैला क्यों पड़ा? इसका जवाब पाकिस्तान के पास है, क्योंकि इस तूफान का नाम पाकिस्तान ने ही सुझाया है। फारसी में लैला का मतलब काले बालों वाली सुंदरी या रात होता है। अरबी भाषा में लैला काली अंधेरी रात को कहते हैं। इस तूफान के प्रभाव के कारण आंध्र के तटीय इलाकों में घना अंधेरा छाया हुआ है। गाड़ियां दिन में भी बिना लाइट जलाए नहीं चल पा रही हैं।

भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी)के एक अधिकारी ने बताया कि लैला का नाम पाकिस्तान ने भारतीय मौसम विभाग को सुझाया है। विश्व मौसम संगठन ने आईएमडी को हिन्द महासागर में आने वाले तूफानों पर नजर रखने और उसका नाम रखने की जिम्मेदारी सौंपी है। अधिकारी के अनुसार तूफानों की आसानी से पहचान करने और इसके तंत्र का विश्लेषण करने के लिए मौसम वैज्ञानिकों ने उनके नाम रखने की परंपरा शुरू की। अब तूफानों के नाम विश्व मौसम संगठन द्वारा तैयार प्रRिया के अनुसार रखे जाते हैं। गौरतलब है कि अमेरिका में तूफानों को नाम देने की प्रक्रिया 1953 में शुरू हुई और बंगाल की खाड़ी और अरब सागर के ऊपर बनने वाले तूफानों के नाम 2004 से रखे जाने लगे।

क्षेत्रीय विशेषीकृत मौसम केंद्र होने की वजह से आईएमडी भारत के अलावा 7 अन्य देशों बांग्लादेश, मालदीव, म्यांमार, ओमान, पाकिस्तान, थाइलैंड तथा श्रीलंका को मौसम संबंधी परामर्श जारी करता है। अधिकारी के अनुसार, आईएमडी ने इन देशों से साल दर साल हिंद महासागर और अरब सागर में आनेवाले तूफानों के लिए नाम की लिस्ट मांगी थी। इन देशों ने अंग्रेजी वर्णमाला के Rम के अनुसार नामों की एक लंबी लिस्ट आईएमडी को दी है। अब तक ये देश तूफानों की पहचान करने के लिए 64 नाम दे चुके हैं, जिसमें से 22 का उपयोग हो चुका है। इसी लिस्ट के हिसाब से हिंद महासागर में आनेवाले इस तूफान का नाम लैला रखा गया है, जो कि पाकिस्तान ने सुझाया है। आंध्रप्रदेश में सबसे विनाशकारी तूफान 1977 में कृष्णा जिले में आया था। इसमें 10,000 से यादा लोगों की मौत हुई थी। अगले चRवाती तूफान का नाम ‘बंडू’ रहेगा। यह नाम श्रीलंका के सुझाव के अनुरूप रखा गया है। खतरा तो है, लेकिन.

चक्रवात का कम दबाव वाला केंद्र हवा में से पूरी नमी चुरा सकता है। पिछले साल आए तूफान ‘आइला’ ने यही किया था। जिसके कारण मानूसनी बारिश में 22 फीसदी कमी आ गई थी। हालांकि इस बार ‘लैला’ के साथ ही अरब सागर में बनी चRवातीय स्थिति कर्नाटक-कोकण के तट पर आ रही है। उम्मीद है यह ‘लैला’ को बेअसर कर देगी। भुवनेश्वर. बंगाल की खाड़ी में दक्षिण पूर्व तथा अन्य क्षेत्नों में बना दबाव गोपालपुर से करीब 875 किलोमीटर दूर उत्तर पश्चिम की तरफ बढ़ता हुआ चक्रवात लैला के रूप में फैल गया जिससे उत्तर तमिलनाडु तथा आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्न में भारी बारिश की संभावना बन गई है। मौसम विभाग का कहना है कि फिलहाल जो स्थिति बन रही है और मौसम के की तरफ पश्चिम उत्तर दिशा में और बढेगा। लैला चRवात की वजह से अगले 24 घंटे के दौरान उड़ीसा के दूरवर्ती क्षेत्नों में भारी बारिश हो सकती है। सभी तटीय इलाकों को आवश्यक सतर्कता बरतने के निर्देश दिए गए हैं। हमारे वैज्ञानिक लैला की एक-एक गतिविधि पर नजर रखे हुए हैं। कमजोर होने के बाद इसने सभी दिशाओं में अपना प्रभाव छोड़ा है। अब इसके आकलन की आवश्यकता है। जो इसके थमते या आगे बढ़ते ही शुरू हो जाएगा। बहरहाल यही सोचें कि लैला हम सबके लिए आइला नहीं, बल्कि प्राणदायी लैला बने।

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