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जीवनतीर्थ हरिद्वार

Author: 
काका कालेलकर
Source: 
गांधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा
हरिकी पैंड़ी के आसपास बनारस की शोभा का सौवां हिस्सा भी आपको नहीं मिलेगा। फिर भी यहां पर प्रकृति और मनुष्य ने एक-दूसरे के बैरी न होते हुए गंगा की शोभा बढ़ाने का काम सहयोग से किया है। त्रिपथगा गंगा के तीन अवतार हैं। गंगोत्री या गोमुख से लेकर हरिद्वार तक की गंगा उसका प्रथम अवतार है। हरिद्वार से लेकर प्रयागराज तक की गंगा उसका दूसरा अवतार है प्रथम अवतार में वह पहाड़ के बंधन से-शिवजी की जटाओं से-मुक्त होने के लिए प्रयत्न करती है। दूसरे अवतार में वह अपनी बहन यमुना से मिलने के लिए आतुर है। प्रयागराज से गंगा यमुना से मिलकर अपने बड़े प्रवाह के साथ सरित्पति सागर में विलीन होने की चाह रखती है। यह है उसका तीसरा अवतार। गंगोत्री, हरिद्वार, प्रयाग और गंगासागर, गंगापुत्र आर्यों के लिए चार बड़े से बड़े तीर्थस्थान हैं। जितना ऊपर चढ़े उतना तीर्थ का माहात्म्य अधिक, ऐसा माना जाता है। एक प्रकार से यह सही भी है। किन्तु मेरी दृष्टि में तो भारत-जाति के लिए अत्यंत आकर्षक स्थान हरिद्वार ही है। हरिद्वार में भी पांच तीर्थ प्रसिद्ध हैं। पुराणकारों ने हरेक के माहात्म्य का वर्णन श्रद्धा और रस से किया है। किन्तु यह महत्त्व कुछ भी न जानते हुए भी मनुष्य कह सकता है कि ‘हरकि पैडी’ में ही गंगा का माहात्म्य और काव्य कहें तो काव्य अधिक दिखाई देता है।

यों तो हरेक नदी की लंबाई में काव्यमय भूमिभाग होते ही हैं। मेरा कहने का यह आशय नहीं है कि गंगा के किनारे हरिद्वार से अधिक सुंदर स्थान हो ही नहीं सकता। हरिकी पैंड़ी के आसपास बनारस की शोभा का सौवां हिस्सा भी आपको नहीं मिलेगा। फिर भी यहां पर प्रकृति और मनुष्य ने एक-दूसरे के बैरी न होते हुए गंगा की शोभा बढ़ाने का काम सहयोग से किया है। गंगा का वह सादा और स्वच्छ प्रवाह मंदिर के पास का वह दौड़ता घाट, घाट के नीचे का वह छोटा टेढ़ामेढ़ा दह, इस तरफ हजारों लोग आसानी से बैठ सकें ऐसा नदी के पट जैसा घाट, उस तरफ छोटे बेट के जैसा टुकड़ा और दोनों बाजुओं को सांधने वाला पुराना पुल, सभी काव्यमय हैं। किनारे पर के मंदिरों और धर्मशालाओं के सादे शिखर गंगा की तरफ चिपका हुआ है। हमारा ध्यान अपनी तरफ नहीं खींचते। फिर भी वे गंगा की शोभा में वृद्धि ही करते हैं। बनारस के बाजार में बैठने वाले आलसी बैल अलग हैं और शांति से जुगाली करने वाले यहां के बैल अलग हैं। यहां गंगा में कहीं पर भी कीचड़ का नामोनिशान आपको नहीं मिलेगा। अनंतकाल से एक-दूसरे के साथ टकरा-टकरा कर गोल बने हुए सफेद पत्थर ही सर्वत्र देख लीजिये।

हरिकी पैड़ी में सबसे आकर्षक वस्तु की ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता। हम उसका महज असर ही अनुभव करते हैं। वह है यहां की हवा। हिमालय के दूर-दूर के हिमाच्छादित शिखरों पर से जो दक्षिण की ओर बहते हैं, वे सबसे पहले यहां की ही मनुष्य बस्ती को स्पर्श करते हैं। इतना पावन पवन अन्यत्र कहां मिलें? हरिकी पैड़ी के पास पुल पर खड़े रहिए, आपके फेफड़ों में और दिल में केवल आह्लाद ही भर जायेगा। उन्मादक नहीं बल्कि प्राणदायी; फिर भी प्रशम-कारी।

जितनी बार मैं यहां आया हूं, उतनी ही बार वही शांति, वही आह्लाद, वही स्फूर्ति मैंने अनुभव की है। चंद लोग बम्बई की चौपाटी के साथ इस घाट का मुकाबला करते है। आत्यांतिक विरोध का सादृश्य इन दोनों के बीच जरूर है। यहां यात्री लोग मछलियों को आहार देते हैं, जब कि वहां मछुए आहार के लिए मछलियों को पकड़ने जाते हैं।

हरिकी पैड़ी देखनी हो तो शाम को सूर्यास्त के बाद जाना चाहिये। चांदनी है या नहीं, यह सोचने की आवश्यकता नहीं है। चांदनी होगी तो एक प्रकार की शोभा मिलेगी, नहीं होगी तो दूसरे प्रकार की मिलेगी। इन दोनों में जो पसंदगी करने बैठेगा वह कलाप्रेमी नहीं है। संध्याकाश में एक के बाद एक सितारे प्रकट होते हैं, और नीचे से एक के बाद एक जलते दीये उनका जवाब देते हैं। इस दृश्य की गूढ़ शांति मन पर कुछ अद्भुत असर करती है। इतने में मंदिर से टींग टांSग, टींग टांSग करते घंटे आरती क लिए न्यौता देते हैं। इस घंटनाद का मानों अंत ही नहीं है। टींग टांSग, टींग टांSग चलता ही रहता है। और भक्तजन तरह-तरह की आरतियां गाते ही रहते हैं। पुरुष गाते हैं, स्त्रियां गाती हैं, ब्रह्मचारी गाते हैं और सन्यासी भी गाते हैं; स्थानिक लोग गाते हैं और प्रांत-प्रांत के यात्री भी गाते हैं। कोई किसी की परवाह नहीं करता। कोई किसी से नहीं अकुलाता। हरेक अपने-अपने भक्तिभाव में तल्लीन। सनातनी स्रोत गाते हैं, आर्यसमाजी उपदेश देते हैं। सिख लोग ग्रंथसाहब के एकाध ‘महोल्ले’ में से आसा-दि-वार जोर से गाते हैं। गोरक्षा-प्रचारक आपकों यहां बतायेंगे कि संसार में सफेद रंग इसीलिए है कि गाय का दूध सफेद है। गाये के पेट से तैंतीस कोटि देवता है; सिर्फ वहां पेटभर घास नहीं है। चंत नास्तिक इस भीड़ का फायदा उठाकर प्रमाण के साथ यह सिद्ध कर देते हैं कि ईश्वर नहीं है। और उदार हिन्दूधर्म यह सब सद्भावपूर्वक चलने देता है। गंगा मैया के वातावरण में किसी का भी तिरस्कार नहीं है। सभी का सत्कार है। लाल गेरुवा पहनकर मुक्त होने का दावा करने वाले मुक्ति फौज के मिशनरी भी यहां आकर यदि हिन्दूधर्म के विरुद्ध प्रचार करें तो भी हमारे यात्री उनकी बात शांति से सुनेंगे और कहेंगे कि भगवान ने जैसी बुद्धि दी है वैसा बेचारे बोलते हैं; उनका क्या अपराध है?

हिन्दू समाज में अनेक दोष हैं और इन दोषों के कारण हिन्दू समाज ने काफी सहा भी है। किन्तु उदाररता, सहिष्णुता और सद्भाव आदि हिन्दू समाज की विशेषतायें हरगिज दोषरूप नहीं है। यह कहने वाले कि उदारता के कारण हिन्दू समाज ने बहुत कुछ सहा है, हिन्दू धर्म की जड़ ही काट डालते हैं।

अब भी वह घंटा बज रहा है और आलसी लोगों को यह कहकर कि आरती का समय अभी बीता नहीं है, जीवन का कल्याण करने के लिए मनाता है।

और वे बालायें खाखरे के पत्तों के बड़े-बड़े दोनों में फूलों के बीच घी के दीये रखकर उन्हें प्रवाह में छोड़ देती हैं, मानो अपने भाग्य की परिक्षा करती हों। और ये दोने तुरन्त नाव की तरह डोलते-डोलते- इस तह डोलते हुए मानों अपने भीतर-की ज्योति का महत्त्व जानते हों, जीवन यात्रा शुरू कर देते हैं।

चली! वह जीवन-यात्रा चली! एक के बाद एक, एक के बाद एक, ये दीये अपने को और अपने भाग्य को जीवन-प्रवाह में छोड़ देते हैं। जो बात मनुष्य जीवन में व्यक्ति की होती है वही यहां दीयों की होती है। कई अभागे यात्रा के आरंभ में ही पवन के वश हो जाते हैं। और चारों ओर विषाद फैलाते हैं। कुछ काफी आशायें दिखाकर निराश करते हैं। कुछ आजन्म मरीजों की तरह डगमग करते-करते दूर तक पहुंचते हैं। कभी-कभी दो दोने पास-पास आकर एक दूसरे से चिपक जाते हैं और बाद में यह जोड़ा-नाव दंपती की तरह लंबी-लंबी यात्रा करती है। उनको गोल-गोल चक्कर काटते देखकर मन में जो भाव प्रकट होते हैं उन्हें व्यक्त करना कठिन है। कई तो जीवन-ज्योति बुझने से पहले ही दृष्टि से ओझल हो जाते हैं। मृत्यु और अदृष्ट दोनों मनुष्य-जीवन के आखिरी अध्याय हैं। इनके सामने किसी की चलती नहीं, इसीलिए मनुष्य को ईश्वर का स्मरण होता है। मरण न होता तो शायद ईश्वर का स्मरण भी न होता।

हिम्मत हो तो किसी दिन सुबह चार बजे अकेले-अकेले इस घाट पर आकर बैठिये। कुछ अलग ही किस्म के भक्त आपकों यहां दिखाई देंगे। सुबह तीन बजे से लेकर सूर्योदय तक विशिष्ट लोग ही यहां आयेंगे। वाजिनीवती उषा सूर्यनारायण को जन्म देती है और तुरन्त व्यावहरिक दुनिया इस घाट पर कब्जा कर लेती है। उसके पहले ही यहां से खिसक जाना अच्छा है। आकाश के सितारे भी खुश होंगे।

मार्च, 1936

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