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सूचना या समय बद्ध सही सूचना का अधिकार

Author: 
चन्द्र प्रकाश महलवाला
Source: 
सिटिज़न न्यूज़ सर्विस
सूचना के अधिकार को लागू हुये लगभग 5 वर्ष हो गए, किन्तु विदित है कि अभी तक उच्च पदों पर आसीन जिम्मेदार लोग यहाँ तक की कुछ अधिवक्ता यह समझते है, कि यह अधिकार केवल सरकारी विभागों में उपलब्ध दस्तावेजों की प्रतियां प्राप्त करने या उनका मुआइना करने या किसी वस्तु का नमूना प्राप्त करने तक ही सीमित है। यदि सूचना अधिनियम 8, 9 और 10 (१), २४ बाधित न हो।

इस अधिनियम की धारा 4 (१) घ के अनुसार प्रत्येक लोक प्राधिकारी को अपने हर निर्णय का कारण चाहे वो प्रशासनिक हो अथवा अर्द्ध न्यायिक, प्रभावित व्यक्तियों को बताना होगा। यह सबसे महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी धारा हैं इस धारा तथा 8 (१) घ ने प्रशासन को आम आदमी के प्रति उतना ही जवाब देह बना दिया है जितना वह सांसद, विधायक के प्रति है। इसने तो मालिक और नौकर का समीकरण ही बदल दिया है। इसने सही माने में सत्ता जनता के हाथ में दे दी है अब कोई भी जागरूक नागरिक नियम या कानून तोड़ने वाली किसी भी प्रशासनिक या अर्द्ध न्यायिक संस्था के मनमाने कामों पर अंकुश लगाकर, सही तरह से काम करने को बाध्य कर सकता है । गलत निर्णयों को बदलवा सकता है, उसके अपने हित में हो या जनहित में हो।

चूँकि एस अधिनियम के अनुसार केवल सूचना मांगी जा सकती हैं, प्रार्थी को सम्पूर्ण विवेक का प्रयोग करना होगा ताकि प्रशासन को उसका काम करने के अलावा कोई विकल्प न बचे । और उसे न्यायालय की शरण न लेनी पड़े । यदि जरूरी है । तो किसी विषय के विभिन्न पहलुओं पर स्पष्टीकरण हेतु अनेक प्रार्थना पत्र देते रहना चाहिए । यह कानून सिर्फ सरकारी विभागों पर ही लागू नहीं होता बल्कि धारा २ ज की उपधारा (ब) के अंतर्गत किसी प्राइवेट संस्था से सम्बन्धित ऐसी सूचना, जिस तक किसी अन्य कानून के जरिये किसी लोक प्राधिकारी की पंहुच हो, पर भी लागू होता है ।

धारा २ झ के अंतर्गत अभिलेख, कोई दस्तावेज पाडुलिपि और फाइल माइक्रोफिल्म, माइक्रोफिशे या प्रतिकृत, कम्प्यूटर द्वारा या किसी अन्य युक्ति द्वारा उत्पादित कोई अन्य सामग्री इस प्रकार वीडियों कैमरा और माइक्रोफोने द्वारा प्राप्त की जा सकने वाली सूचना भी इस कानून के दायरे में आती है । धारा ४ (१) क में लोक प्राधिकारियों कों निर्देश दिया गया है कि वे शीघ्र अपने सभी अभिलेख कों सूचीबद्ध इस प्रकार करे कि वे आसानी से अपने संसाधनों के अनुसार कंप्यूटर नेटवर्क पर देश भर में उपलब्ध हो सकें । तथा यह अपेक्षा की गयी है कि सभी जनसूचना अधिकारी अधिनियम के लागू होने के १२० दिनों के भीतर धारा ४ (१) ख के तहत वर्णित सोलह बिन्दुओं पर स्वत : सूचना प्रकाशित करेगा व प्रत्येक वर्ष अघतन करेगा ।

धारा ४ (२) में सभी सूचना स्व प्रेरणा से सभी संचार माध्यमों समेत पर उपलब्ध कराई जाय ताकि जनता कों इस कानून का कम से कम इस्तेमाल करना पड़े। धारा ४ (४) के तहत इस अधिनियम में किसी भी घटना का वीडियों ऑडियों मीडिया ब्राडकास्ट्स इन्टरनेट आदि का उल्लेख है । ब्राडकास्ट्स टी.वी. /इन्टरनेट पर पाना भी अधिकार है । यदि धारा ८ का उल्लंघन न होता हो, अत : जिस प्रकार देश की संसद की कार्यवाही की सूचना टेलीविजन पर प्रसारित की जाती है । उसी प्रकार राज्यों की विधान सभाओं न्यायालयों, उच्च कार्यालयों व अन्य सरकारी अर्द्धसरकारी या निजी संस्थानों जहाँ नियम कानून के उल्लंघन की सम्भावना है और जहाँ महत्वपूर्ण काम होतें है कि कार्यवाही की सूचना टी.वी./इन्टरनेट पर उपलब्ध कराई जाय । इससे उनकी जवाब देही स्वत: सुनिश्चित हो जाएगी । यदि सरकार के पास इस काम के लिए संसाधनों का अभाव है तो निजी क्षेत्र का स्वेच्छा से इस क्षेत्र में आवाहन किया जाय और उन्हीं टैक्स में छुट दी जाय ताकि अपराधों और कुशासन से देश कों राहत मिल सके ।

यह खेद की बात है कि एक न्यायालय ने इस अधिनियम की अनदेखी कर एक अधिवक्ता कों इसलिए सजा दी क्योंकि उसके पास कैमरा मोबाइल था । जबकि न्यायालय में जन सुनवाई होती है और उसकी कार्यवाही धारा ८ में नही आती इससे स्पष्ट होता है कि न्यायाधीश सूचना के अधिकार की समुचित जानकारी नही रखते । मेरे एक मित्र जो हाई कोर्ट जज ने स्वीकारा की कई जजों ने तो आर.टी.आई. कों पढ़ा ही नहीं है यदि सभी न्यायालयों, अर्द्धन्यायिक संस्थाओं में हो रही कार्यवाही इंटरनेट पर उपलब्ध करा दी जाय तो आम आदमी सही अधिवक्ता का चुनाव कर सकेगा, सभी मौखिक तर्क और बयान सही रिकार्ड हो सकेगे और सही न्याय सुनिश्चित हो सकेगा । इससे विधि के विधार्थियों और नए अधिवक्ताओं कों भी लाभ होगा ।

कई सरकारी कार्यालयों भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के गढ़ हैं के बाहर नोटिस देखा जा सकता है कि वहाँ कैमरा मोबाइल ले जाना वर्जित है । वे भी धारा 8 में नहीं आते और इस प्रकार के नोटिस गैर कानूनी है। यदि सभी जेलों और पुलिस स्टेशनों में हो रहे कृत्य इन्टरनेंट पर देखे, सुने जा सके तो सर्वाधिक मानव अधिकारों का हनन एवं नियम, कानूनों का उल्लंघन रोका जा सकता है। यदि सभी पुलिस कर्मियों को कैमरा मोबाइल उपलब्ध हो तो बहुत कम खर्च पर सही विवेचना होगी और उनकी गैरकानूनी गतिविधियों पर अंकुश लग सकेगा।

दुनिया के सबसे धनी और शक्ति शाली देश अमेरिका के राष्ट्रपति निक्सन को वाटर गेट घोटाले के उजागर होने पर अपना पद छोड़ना पड़ा था क्योंकि उनके सरकारी आवास व्हाइट हाउस में जगह-जगह माक्रोंफोने लगे हुए थे ताकि सभी वार्तालाप रिकार्ड किया जा सके और उसके ऊपर उनका कोई नियंत्रण नहीं था। वही के राष्ट्रपति बिल किंलटन भी अपना जुर्म कबूल नहीं किया जब तक मोनिका लेविस्की की पैन्टी के डी.एन.ए. टेस्ट से सब कुछ साबित नहीं हो गया। यदि व्हाइट हाउस में वेब कैमरा माइक के साथ इन्टरनेट से जुड़े होते तो न्यायिक प्रक्रिया में इतना विलम्ब न होता और उनका निष्कासन तुरन्त हो गया होता जैसा विकसित देशों में दुकानों में चोरी आदि को सी। सी. टी. वी. कैमरा द्वारा उजागर हुए मामलों में हुआ है।

धारा ८(३) में २० वर्ष तक पहिले की सूचना प्राप्त की जा सकती है । अत: किसी हो रही घटना का सजीव इलेक्टिकल मीडिम द्वारा पा सकना भी इसके अन्तर्गत आता है । यदि धारा ८ (१), ९ और १० (१) व २४ में न पड़ता हो सुप्रीम कोर्ट के अनुसार सूचना का अधिकार मौलिक अधिकार है अत: इसे सीधे हाई कोर्ट या सुप्रीम भी ले जाया जा सकता है । धारा २२ के अनुसार यह कानून सभी कानूनों के ऊपर प्रभावी है धारा ६ (२) के अनुसार सूचना पाने के लिए कारण नहीं देना होगा । धारा ७ (९) के अनुसार साधारणतया सूचना उसी प्रारूप में दी जाएगी जिसमें मांगी गई है । धारा ७ (१) के अनुसार जन सूचना अधिकारी को निर्धारित फीस जो अधिकतर संस्थानों में १० रुपया है और दस्तावेजों की प्रतियों पर २ रुपया प्रति पेज प्रति कापी है फलापी आदि पर ५० रूपये की दर से और सी.डी. २० रुपया प्रति की दर से मिलेगी मुआइना करने पर समयावधि के अनुसार प्रथम एक घंटे का दस रुपया व अगले एक घंटे का बीस रूपये देना होगा ।

मांगी गई सूचना ३० में देनी होगी या न देने का कारण बताना होगा। यदि मांगी गई सूचना किसी व्यक्ति की जिन्दगी या स्वतंत्रता से सम्बन्धित है तो ४८ घंटों में देनी होगी । यदि इस अवधि में सूचना नही दी गई तो वो मुफ्त में देनी होगी धारा ७ (६) के अनुसार वैसे भी धारा ७ (५) के अनुसार गरीबी रेखा से नीचे व्यक्तियों कों मुफ्त सूचना का प्रावधान है । धारा १८ (१) में दी हुई किसी भी परिस्थिति के लागू होने पर कोई व्यक्ति सीधे सूचना आयोग में शिकायत कर सकता है । यदि आयोग संतुष्ट होगा कि समुचित कारण विद्यमान है तो धारा १८ (२) में वह उस सम्बन्ध में युक्ति-युक्ति आधार पाता है तो जाँच कर सकता है । जाँच के दौरान आयोग को सिविल प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत सिविल कोर्ट कों प्रदत्त धारा १८ (३) व १८ (४) में वर्णित अधिकार प्राप्त होगे।

धारा १९ (१) के अंतर्गत यदि किसी व्यक्ति को जन सूचना अधिकारी द्वारा ३० दिन में सूचना उपलब्ध नहीं कराई जाती या वह जनसूचना अधिकारी के निर्णय से असंतुष्ट है या उसे अतिरिक्त देय फीस नही बताई जाती तो वह उनके ऊपर के अपीलीय अधिकारी को प्रथम अपील उक्त अवधि में कर सकता है। अपीलीय अधिकारी को धारा १९ (६) के अनुसार अपील प्राप्त होने के ३० दिन या अधिकतम, ४५ दिन कारण बताने पर के अन्दर निस्तारण करना होगा। धारा १९ (३) के अनुसार अपीलीय अधिकारी के निर्णय के विरुद्ध द्वितीय अपील आयोग में ९० दिन उस तारीख से जब तक निर्णय ले लेना चाहिय था अथवा जब निर्णय प्राप्त हुआ हो, में की जा सकेगी।

धारा २० (१) के अनुसार यदि सूचना आयोग किसी शिकायत या अपील पर निर्णय लेते समय यह मानता है कि जनसूचना अधिकारी ने अकारण सूचना हेतु कोई प्रार्थना पत्र लेने से मना किया है या सूचना धारा ७ (१) में निर्धारित अवधि में उपलब्ध नही कराई या द्वेष वश सूचना देने से मना किया या जान बुझकर गलत, अधूरी या भ्रामक सूचना दी या मांगी हुई। सूचना नष्ट कर दी या किसी प्रकार सूचना उपलब्ध कराने में बाधा डाली तो वो २५० रूपये प्रति दिन की दर से जुर्माना लगाएगा जब तक प्रार्थना पत्र स्वीकार न हो जाय या सही सूचना उपलब्ध न करा दी जाय। जुर्माने की रकम २५००० रूपये से अधिक नहीं हो सकेगी । जुर्माना लगानें के पूर्व जन सूचना प्राधिकारी को सुनवाई का अवसर देना होगा। यह साबित करने का दायित्व उसी पर होगा की उसने सम्बंधित कानूनों और नियमों के अनुसार सही सूचना समय पर दी है। धारा २० (१) में वर्णित किसी भी कारण के पाए जाने पर आयोग सेवा नियमावली के अनुसार जन सूचना प्राधिकारी पर धारा २० (१) के अंतर्गत अनुशासनात्मक कारवाही की संस्तुति करेगा ।

धारा १९ (८) ख में आयोग कों यह अधिकार है की वो वादी कों हुई हानि या अन्य नुकसान की क्षति पूर्ति दिलाए। वादी कों चाहिए की वो आयोग कों अपने आवेदन में बताए कि धारा १९ (८) ख में किन किन मदों में वो कितनी राशि की मांग कर रहा है। क्षति पूर्ति में आने जाने का खर्च अतिरिक्त रहने खाने का खर्च सुनवाई पर उपस्थित होने के कारण दैनिक कमाई का हर्ज, सूचना न देने या गलत, अधूरी भ्रामक सूचना पाने या सूचना नष्ट किये जाने का हर्ज यदि कोई वकील किये हो तो उसकी फीस, डाक टाइप आदि कराने का खर्च, मानसिक उत्पीड़न की क्षति पूर्ति आदी सम्मलित है। वादी उपस्थित न होने का भी विकल्प चुन सकता है उस स्थिति में आयोग कों प्रस्तुत अभिलेख पर एक पक्षिर्य निर्णय देना होगा। ऐसे में कई में मदों में देय क्षति पूर्ति भी बचेगी।

कोई भी आरोप सही पाए जाने पर आयोग का धारा २० (१) में वर्णित दंड देना होगा। आयोग न तो उससे कम और न उससे अधिक दंड दे सकता है। आयोग कों धारा २० (२) में भी कारवाही करनी होगी सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश संख्या २० नियम संख्या ४ (२) के अंतर्गत उठाए गए सभी बिन्दुओं पर कारण सहित निर्णय देना होगा। मांगी गई क्षति पूर्ति दिलाने का आदेश देना होगा या न दिलाने का कारण बताना होगा ।

यदि कोई सूचना आयुक्त इस प्रक्रिया का पालन नहीं करेगा तो धारा १४/१७ में राष्ट्रपति /राज्यपाल से उसी सुप्रीम कोर्ट द्वारा जाँच में दोषी पाए जाने पर अक्षमता के आधार पर पदमुक्त कर सकता है। राष्ट्रपति /राज्यपाल से उसे भारतीय दंड संहिता की धारा १६६, १६७, २१९ में मुकदमा दायर करने की अनुमति भी मांगी जा सकती है। इससे गलत प्रक्रिया द्वारा नियुक्त अक्षम और संभवत: भ्रष्ट सूचना आयुक्तों से शीघ्र छुटकारा मिल सकेगा और योग्य, कर्मठ लोग ही भविष्य में इस पद कों स्वीकारेंगे।

इससे उन अक्षम सूचना आयुक्तों पर तुरंत अंकुश लग सकेगा जो इस प्रकार के निर्णय देते है कि प्रतिवादी का कहना है कि उसने मांगी गई सूचना उपलब्ध करा दी है। वादी का कहना है कि उसे कानून और नियमों के अनुसार गलत सूचना दी गई है। वादी सूचनाओं से संतुष्ट न हो तो किसी सक्षम फोरम की शरण ले सकता है। वाद निस्तारित किया जाता है। यह दायित्व सुचना आयुक्त का है की वो दोनों पक्षों की दलीलें पढ़ने सुनने के बाद निर्णय दे कि दी गई सूचना गलत, अधूरी या भ्रामक है या नही । यदि इतने उच्च पद पर आसीन अधिकारी उदघृत कानूनों, नियमों आर. टी. आई. के प्रावधानों तक कों समझने में अक्षम हैं या जान बुझकर उनकी अनदेखी करते है

RTI K TAHAT SOOCHNA NA DENA

SIR I AM  MAHENDRA YADAV FROM SITAPUR(UP)MERE GANV MAI NALI KHARANJA KUCH BHI NAHI HAI SARKAR NE JO BHI PAISA  GANV K VIKAS K LIYE DIYAHAI VO SAB DAKAR MAINE 02/06/2017 KORTI DALA THA LEQNABHI TAK KOI BHI JANKARI NAHI MILI HAI AB HUM KYA KARE PLZHELP ME  

sebi gov.ka contect no.

Sebi gov ka contect no. Chahiye sir khi se koi jankari nhi mil rhi h.

सुचना का अधिकार का नहीं पालन करते लोक सुचना अधिकारी

सुचना का अधिकार अधिनियम २००५ जो की आम नागरिक का हथियार है पर इसे लोक सुचना पदाधिकारी देना ही नहीं चाहते ? ऐसा क्यों ?राज्य सुचना आयोग भी मौन धारण किये हुए है जिससे की आम आदमी को सुचना के लिए दर दर भटकना परता है ! यंहा तक की सुचना मांगने वाले आवेदकों पर झूठा मुकदमा तक दर्ज करवा दिया जाता है ! जब आवेदक द्वारा सुचना आयुक्त को जानकारी दी जाती है तो भी जाँच के नाम पर समय की बर्वादी करवाया जाता है जिससे सिर्फ और सिर्फ आवेदक का बर्वादी होता है न की लोक सुचना पदाधिकारी का ? मेरे द्वारा 15.10.2012 को जो सुचना मांगी गई थी जिलाधिकारी किशनगंज से ओ आज तक नहीं उपलब्ध कराया गया ? जो की गबन है ! सरकार आर० टी० आई० कार्यकर्ता पर ध्यान नहीं देती है जब की एक तरह देखा जाये तो आरटीआई कार्यकर्ता सरकार का ही काम करता है जिससे सरकारी राशी का गबन न हो...पर यह सब मात्र लोगो को उल्लू बनाने के लिए हकीकत देखा जाये तो निचे से उपर तक के अधिकारी आर०टी०आई० कार्यकर्ता को दरकिनार किये हुए रहता है जिससे उनकी पोल न खुले ! पुरे भारत देश में में देखे की आज आर०टी०आई० कार्यकर्ता में कितना मुकदमा है आप एक का भी नाम बता दे की उसके उपर मुकदमा न हो क्या ओ लोग सभी के सभी दोषी है ? नहीं ! उसे दोषी बनाया जा रहा है जानबुज कर की कही लोक सुचना पदाधिकारी का गबन जो किया उसका पोल न खुल जाये ! पर सच को भी कितना दिन दबाया जा सकता है ! एक न एक दिन सामने तो आना ही है ! सुचना का अधिकार अधिनियम का प्रावधान जो बनाया गया है उस प्रावधान पर अगर ठीक से सुचना आयोग ध्यान दे तो सही मायने में भ्रष्टाचार ख़त्म हो जायेगा ! पर ऐसा नहीं किया जाता जिससे आरटीआई कार्यकर्ता का मनोबल टूटता जा रहा है!

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