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ग्‍लोबल वार्मिंग बनाम मानवाधिकार

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चौथी दुनिया, अप्रैल 2010
जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए उठाए गए क़दमों की सुस्त चाल से, इससे प्रभावित हो रहे समुदायों में स्वाभाविक रूप से निराशा बढ़ी. परंपरागत राजनैतिक-वैज्ञानिक पद्धतियों पर आधारित उक्त उपाय ज़्यादा प्रभावी साबित नहीं हो रहे थे, पीड़ित लोगों की समस्याओं की अनदेखी हो रही थी और सबसे बड़ी बात यह थी कि मानवीय गतिविधियों के चलते वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि के लिए ज़िम्मेदारी तय करने की कोई व्यवस्था न होने से प्रभावित समुदायों को लगातार मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था. इन सब कारणों का सम्मिलित नतीजा यह रहा कि दिसंबर 2005 में कनाडा और अमेरिका में सक्रिय इन्युट ने इंटर अमेरिकन कमीशन ऑन ह्यूमन राइट्‌स के समक्ष एक अपील दायर की. अपील में इन्युट ने आरोप लगाया था कि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करने में अमेरिका की विफलता से उसके मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है. हालांकि तत्काल इस अपील को ख़ारिज कर दिया गया, लेकिन फरवरी 2007 में कमीशन ने मानवाधिकारों और ग्लोबल वार्मिंग के बीच संबंध पर अपना पक्ष रखने के लिए इन्युट, सेंटर फॉर इंटरनेशनल एन्वॉयरमेंटल लॉ (सीआईईएल) और अर्थजस्टिस संस्था के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया. इस बैठक के काफी उत्साहजनक परिणाम निकले और पहली बार यह माना गया कि ग्लोबल वार्मिंग के लिए मानवीय गतिविधियां ही ज़िम्मेदार हैं और इससे सबसे ज़्यादा प्रभावित भी इंसान ही होता है. इस लिहाज़ से यह आवश्यक है कि मानवाधिकारों के अंतर्गत ज़िम्मेदारी, उत्तरदायित्व और न्याय के दायरे में रहकर ही इस पर विचार किया जाना चाहिए.

नवंबर 2007 में जारी किया गया माले घोषणापत्र वैश्विक जलवायु परिवर्तन को मानवीय पक्षों से जोड़ने की दिशा में दूसरा बड़ा क़दम था. इस घोषणापत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया कि मानवाधिकारों के पूरे उपभोग के नज़रिए से जलवायु परिवर्तन बेहद महत्वपूर्ण है. इस घोषणापत्र पर यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज के बाली में हुए 13वें सम्मेलन में भी विचार किया गया. यह घोषणा की गई कि जलवायु परिवर्तन को केवल प्रकृति से ही जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह मानव जीवन के अस्तित्व और उसकी सुरक्षा से भी सीधे तौर पर जुड़ा है. यह सही है कि जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी वजह प्रकृति में आने वाले बदलाव हैं, लेकिन प्रकृति में आ रहे इन बदलावों के लिए इंसान और उसकी गतिविधियां ही ज़िम्मेदार हैं. मानवाधिकारों के लिए संयुक्त राष्ट्र के उच्चायुक्त ने भी इसकी हामी भरी और जोर देकर कहा कि जलवायु परिवर्तन के ख़तरे को कम करने और उससे निबटने के लिए मानवाधिकारों के दायरे के अंदर ही प्रयास किया जाना आवश्यक है. इन्हीं सब प्रयासों का नतीजा था कि 28 मार्च 2008 को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने सर्वसम्मति से मानवाधिकार और जलवायु परिवर्तन पर प्रस्ताव संख्या 7/23 को मंजूरी दी. इस प्रस्ताव द्वारा पहली बार आधिकारिक तौर पर यह माना गया कि जलवायु में आ रहे बदलावों से विश्व भर में मानव जीवन पर तात्कालिक एवं दूरगामी प्रभाव पड़ते हैं और इससे मानवाधिकार भी प्रभावित होते हैं. इससे पैदा होने वाली परिस्थितियां मानवाधिकारों के उपभोग में बाधा का काम करती हैं. प्रस्ताव में उच्चायुक्त कार्यालय (ओएचसीएचआर) को यह निर्देश भी दिया गया कि वह जलवायु परिवर्तन और मानवाधिकारों के बीच संबंधों का विश्लेषण करके परिषद के दसवें सत्र में अपनी रिपोर्ट पेश करे. साथ ही परिषद की बैठक में हुए विचार-विमर्श को कोपेनहेगन में होने वाले यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज के 15वें सम्मेलन (सीओपी-15) से पहले सदस्य राष्ट्रों के समक्ष पेश किया जाए, ताकि इस मुद्दे पर आगे विचार-विमर्श हो सके. प्रस्ताव के दिशानिर्देशों के मद्देनज़र 15 जनवरी 2009 को ओएचसीएचआर ने अपने अध्ययन की रिपोर्ट प्रकाशित की. इस रिपोर्ट में बताया गया कि वैसे तो ग्लोबल वार्मिंग सभी तरह के मानवाधिकारों को प्रभावित करती है, लेकिन कुछ ऐसे अधिकार हैं, जो जलवायु परिवर्तन के चलते विशेष रूप से प्रभावित होते हैं, जैसे जीने का अधिकार, भर पेट भोजन का अधिकार, पानी की उपलब्धता, स्वस्थ रहने का अधिकार और रहने के लिए आवास एवं स्वनिर्णय का अधिकार. इसमें यह भी कहा गया कि यूं तो ग्लोबल वार्मिंग पूरी दुनिया के लिए ख़तरा है, लेकिन कुछ ख़ास इलाक़ों जैसे छोटे द्वीपीय राष्ट्र, समुद्र किनारे गहराई में बसे देश, बाढ़ प्रभावित इलाक़े या ऐसे देश, जहां सूखा या मरुस्थलीकरण की समस्या है (मालदीव एवं माली आदि), के लिए यह ज़्यादा ख़तरनाक है. रिपोर्ट में बताया गया कि ख़तरे को कम करने या उससे निबटने के लिए अपनाए गए तरीक़ों जैसे लोगों को दूसरी जगह बसाए जाने में भी मानवाधिकारों का मुद्दा जुड़ा हुआ है.

ओएचसीएचआर की रिपोर्ट के जवाब में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने 25 मार्च 2009 को हुई अपनी दसवीं बैठक में मानवाधिकार और जलवायु परिवर्तन पर प्रस्ताव संख्या 10/4 का सर्वसम्मति से अनुमोदन किया. प्रस्ताव में कई महत्वपूर्ण बातें कही गई हैं. परिषद ने यह स्वीकार किया कि ग्लोबल वार्मिंग से मानवाधिकारों के उपभोग पर प्रत्यक्ष और परोक्ष, दोनों तरह का प्रभाव पड़ता है. प्रस्ताव में उन अधिकारों की भी चर्चा है, जो जलवायु परिवर्तन से विशेष रूप से प्रभावित होते हैं. इसमें यह भी माना गया कि भौगोलिक स्थिति, ग़रीबी, लिंग, उम्र या किसी समुदाय विशेष से संबद्ध लोगों के मानवाधिकार ज़्यादा गंभीर रूप से प्रभावित होते हैं.

पर्यावरणीय प्रदर्शन सूचकांक (एन्वॉयरमेंटल परफॉर्मेंस इंडेक्स) 2010


वर्ष 2010 का पर्यावरणीय प्रदर्शन सूचकांक 27 जनवरी 2010 को वाशिंगटन में हुई विश्व आर्थिक परिषद की सालाना बैठक में जारी किया गया. यह सूचकांक कोलंबिया और येल विश्वविद्यालय से जुड़े पर्यावरण विशेषज्ञों ने तैयार किया था. हर दो साल पर जारी होने वाला यह सूचकांक वर्ष 2006 में पहली बार तैयार किया गया था. प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए उठाए गए क़दमों के आधार पर भारत और चीन को इस सूचकांक में क्रमश: 123वां और 121वां स्थान दिया गया था, जो इस बात को रेखांकित करता है कि तीव्र आर्थिक विकास से पर्यावरण पर भी खासा जोर पड़ता है. हालांकि अन्य नए औद्योगीकृत देशों में ब्राजील 62वें और रूस 69वें स्थान पर थे, जो इस बात की ओर भी इशारा करता है कि प्रदूषण नियंत्रण के लिहाज़ से विकास का स्तर या उसकी गति ही एकमात्र कारक नहीं है. सूचकांक के मुताबिक़, प्रदूषण नियंत्रण और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन की चुनौतियों से निबटने में आइसलैंड शीर्ष पर है. आइसलैंड की इस सफलता का आधार ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करना और जंगलों को दोबारा बसाने की कोशिश है. आइसलैंड के अलावा स्विट्‌जरलैंड, कोस्टारिका, स्वीडन और नॉर्वे जैसे देशों ने भी इस दिशा में प्रभावशाली प्रदर्शन किया है. यहां यह ध्यान रखना जरूरी है कि पर्यावरणीय प्रदर्शन सूचकांक में 163 देशों को दस अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित कुल 25 मानकों के आधार पर जगह दी गई है. इसमें पर्यावरणीय स्वास्थ्य, हवा की गुणवत्ता, जल संसाधनों का प्रबंधन, जैव विविधता, वनीकरण, कृषि और जलवायु परिवर्तन जैसे मानक शामिल हैं.

2006-07 तक विकसित देशों द्वारा कार्बनडाई ऑक्साइड उत्सर्जन में 1.1 प्रतिशत की वृद्धि


1990 से 2007 के बीच 41 विकसित देशों द्वारा कार्बनडाई ऑक्साइड के कुल उत्सर्जन में 16 प्रतिशत की वृद्धि हुई. इसके लिए सबसे ज़्यादा दोषी ऑस्ट्रेलिया (42 प्रतिशत), कनाडा (29 प्रतिशत) और अमेरिका (20 प्रतिशत) जैसे देश हैं. ऊर्जा क्षेत्र में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के आंकड़ों पर नज़र डालें तो 1990 से 2007 के बीच उत्सर्जन में सबसे ज़्यादा वृद्धि ट्रांसपोर्ट यानी यातायात (17.9 प्रतिशत) के क्षेत्र में हुआ तो विनिर्माण एवं उत्पादन उद्योग में सबसे ज़्यादा कमी (17.3 प्रतिशत) आई. विकसित और विकासशील देशों के बीच उत्सर्जन के स्तर में इस भारी अंतर को देखते हुए कई विशेषज्ञों ने सलाह दी कि भारत जैसे विकासशील देशों को ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन से संबंधित किसी भी ऐसे प्रस्ताव को मानने से इंकार कर देना चाहिए, जो 1997 के क्योटो प्रोटोकॉल की तर्ज पर कानूनी रूप से बाध्यकारी हो. विकासशील देश पहले ही ऐसे किसी बाध्यकारी क़ानून के प्रति अपना विरोध दर्ज़ कराते रहे हैं. उनका मानना है कि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन की मात्रा के मद्देनज़र विकसित देशों को पहले और प्रभावशाली क़दम उठाने चाहिए.

वहीं क्योटो प्रोटोकॉल की समाप्ति से पहले 2008-12 के बीच विकसित राष्ट्रों को 1990 के मुक़ाबले अपने उत्सर्जन के स्तर में औसतन 5 प्रतिशत की कमी लानी है. उत्सर्जन के मामले में अग्रणी ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका जैसे देश यूएनएफसीसीसी में शामिल होने के बावजूद क्योटो प्रोटोकॉल को मानने से इंकार कर रहे हैं. इतना ही नहीं, अब वे क्योटो प्रोटोकॉल को निरस्त करने के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश भी कर रहे हैं और इसके लिए अलग-अलग देशों को तैयार करने की जद्दोज़हद जारी है. हालांकि भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील के नेतृत्व वाले जी-77 के सदस्यों सहित कुल 184 देशों में इसे अब तक अनुमोदित किया जा चुका है.

(लेखक सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश हैं)

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