सहरसा में चल रही है लूट की योजना

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चौथी दुनिया ब्यूरो
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महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना यानि मनरेगा की तस्वीर सहरसा, सुपौल व मधेपुरा जिलों में काफी धुंधली नजर आ रही है। पलायन रोककर स्थायी परिसंपत्ति निर्माण कराए जाने की सरकार की गरीब हितकारी योजना मनरेगा को इसमें जारी लूट-खसोट ने पूरी तरह विकृत कर रख दिया है। हकीकत यह है कि आज भी कोशी क्षेत्र से गरीब-मजदूर बड़ी संख्या में रोजी-रोटी के लिए दूसरे राज्यों में पलायन कर रहे हैं। पलायन करने वाले गरीब-मजदूरों की भीड़ से सहरसा से अमृतसर जाने वाली 5209 अप जनसेवा एक्सप्रेस ट्रेन भी छोटी पड़ जा रही है।

हाल में पलायन करने वाले हजारों मजदूरों को चार दिन बाद भी जब जनसेवा एक्सप्रेस ट्रेन में जगह नहीं मिली, तो क्रोधित होकर करीब चार घंटे तक सहरसा जंक्शन पर न सिर्फ बवाल मचाया बल्कि नियंत्रित करने पहुंची सदर पुलिस व सैप के जवानों पर जमकर पथराव भी किया। केन्द्र सरकार ने मनरेगा योजना को काम के अधिकार के तहत लागू कर गरीब, मजदूर व बेरोजगारों को साल में 100 दिनों के रोजगार की गारंटी का वादा दिया था। लेकिन यह महत्वाकांक्षी योजना कतिपय पदाधिकारियों, पंचायत रोजगार सेवक, जनप्रतिनिधि व जिला मुख्यालय में बैठे उप विकास आयुक्त के लिए सोने की अंडा देने वाली मुर्गी बनकर रह गई है।

गरीबों को कुछ रोजगार तो अवश्य मिला लेकिन बिचौलियों व कुछ भ्रष्ट पोस्ट मास्टरों की मिलीभगत से खाता से मिलने वाली रकम उनके हाथों तक नहीं पहुंच पाई। कुछ पोस्ट मास्टर व बिचौलिये साक्ष्य हेतु मजदूरी भुगतान की रसीद पर अंगूठे का निशान या हस्ताक्षर कराने में पीछे नहीं रहे लेकिन पोस्ट आफिस में संचालित मजदूरों के खातों व जॉब कार्ड की सूक्ष्मता पूर्वक तहकीकात की जाए तो घपलेबाजी व शोषण स्पष्ट उजागर हो जाएगा। पंचायतों के कुछ जनप्रतिनिधि भी मनरेगा की हालत को पस्त करने में पीछे नहीं हैं।

जॉब कार्ड बनवाने में उन्होंने नियमों का खयाल नहीं रखा। आम तौर पर सहरसा व मधेपुरा में मनरेगा योजना के तहत वैसे ही रोजगारों का सृजन कार्यक्रम पदाधिकारी(पीओ) के द्वारा होता है, जिसमें लूट-खसोट का हिसाब-किताब ज्यादा बनता हो। खेतों में सड़क, पुल, बिना पानी वाले जगहों में पटवन हेतु नाला बनाने के नाम पर पूरे प्रमंडल में यह लूट देखा जा सकता है। आधा-अधूरा काम और पूरा भूगतान योजना की हकीकत है। हालांकि सहरसा के डीएम आर। लक्ष्मणन ने अभियान चलाकर जिले के विभिन्न प्रखंडों में मनरेगा योजना की स्थलीय जांच पदाधिकारियों की टीम के साथ किया है।

घपला सामने आने पर प्राथमिकी भी दर्ज हुई, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात है। पिछले साढ़े चार साल में जिला ग्रामीण विकास अभिकरण विभाग के माध्यम से सहरसा जिले में कुल 9 लाख 34 हजार 904 लोगों को जॉब कार्ड वितरित कर 169।719 लाख मानव दिवस का सृजन किया गया और एक करोड़ 56 लाख 6 हजार 844 रुपया मजदूरी के रूप में भुगतान किया गया। योजना के तहत उपलब्धि के रूप में सौ दिनों का रोजगार देने के बाद सात हजार 228 परिसंपत्तियों का निर्माण किया गया, लेकिन इन परिसंपत्तियों का स्थलीय अवलोकन किया जाए तो कुछ कहने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी, सारे आंकड़े बेमानी होकर रह जाएंगे।

उदाकिशनगंज अनुमंडल में भी मनरेगा की तस्वीर धुंधली ही नजर आ रही है। इस योजना से जहां मजदूरों को सौ दिनों का रोजगार नहीं मिल सका है, वहीं पलायन का ग्राफ भी पहले से ब़ढ गया है।

डीएम श्री लक्ष्मणन ने अपने मासिक निरीक्षण कार्यक्रम के दौरान सदर प्रखंड कहरा अन्तर्गत मनरेगा योजना से क्रियान्वित बरियाही पंचायत के महावीर स्थान से बरियाही बस्ती चौवट्‌टी तक ईंट सोलिंग सड़क का मरम्मती कार्य एवं वार्ड सं। नौ के सहरसा उप शाखा नहर से फुलेश्वर यादव के घर तक सड़क में पुलिया निर्माण कार्य के गुणवत्ता का प्राक्कलन के अनुरूप होने की स्थलीय जांच की। साथ ही मनरेगा के तहत कार्यान्वित योजना सं। 01/09-10 प्राक्कलित राशि 4 लाख 70 हजार 360 एवं योजना सं। 02/09-10 प्राक्कलित राशि 4 लाख 93 हजार 300 के अनुरूप गुणवत्तापूर्ण कार्य पूरा किये जाने की भी जांच की।

जगह-जगह निर्मित सड़क की ईंट उखाड़कर व मिट्‌टी हटाकर तकनीकी अधिकारी आरईओ के एसडीओ अरविंद कुमार सिंह के सहयोग से सूक्ष्मतापूर्वक जांच किया गया। जांच में पुरानी ईंटों के उपयोग व मिट्टी कम होने की बातें प्रकाश में आईं। आरईओ के एसडीओ श्री सिंह के द्वारा जांच की विस्तृत व अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत करने के बाद संबंधित पंचायत रोजगार सेवक सह अभिकर्ता व कनीय अभियंता के विरूद्ध कार्रवाई भी शुरू की गई और बनगांव थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई गई। फिर भी, सब कुछ पहले की तरह ही चल रहा है और पीओ व पीआरएस के साथ वरीय अधिकारी भी मालामाल हो रहे हैं।

कहा जाता है कि जांच व बैठक, आदेश व निर्देश का खेल जिले में कनीय अधिकारियों से कमीशन वसूली के लिए ही खेला जाता है। उदाकिशनगंज अनुमंडल में भी मनरेगा की तस्वीर धुंधली ही नजर आ रही है। इस योजना से जहां मजदूरों को सौ दिनों का रोजगार नहीं मिल सका है, वहीं पलायन का ग्राफ भी पहले से ब़ढ गया है। पलायन का ब़ढता ग्राफ बता रहा है कि अनुमंडल में मनरेगा की परिभाषा मनचाहे रोजगार सृजन कर गारंटी के साथ राशि लूट लो’ बनकर रह गयी है।

अनुमंडल के आलमनगर, चौसा, पुरैनी, बिहारीगंज, उदाकिशनगंज एवं ग्वालपाड़ा में मनरेगा योजना की जमीनी हालत तमाम सरकारी दावों को खोखला साबित करती है। आलमनगर, चौसा, पुरैनी एवं बिहारीगंज प्रखंडों में कुल जॉब कार्डधारी परिवारों की संख्या 82 हजार 815 , कुल खाताधारी मजदूरों की संख्या 33 हजार 834 एवं वर्ष 2009-10 में व्यय राशि 5,49,97,572 रुपया और 2 लाख 76 हजार 253 सृजित मानव दिवस के तहत 335 परिवारों को 100 दिनों का रोजगार उपलब्ध कराया गया। लेकिन अनुमंडल के विभिन्न हिस्सों में जहां अधिकांश कार्य आधे-अधूरे प़डे हैं, वहीं मजदूरों को भुगतान की गई राशि भी दलालों की भेंट च़ढ गई है।

पंचायत स्तर पर कार्यरत पंचायत रोजगार सेवक, स्थानीय जनप्रतिनिधि एवं कार्यक्रम पदाधिकारी की सांठ-गांठ से राशि की लूट कर ली जाती है। सरकार ने डाक घर के माध्यम से मजदूरी भुगतान का नियम बनाया है, लेकिन पोस्ट मास्टर की मिलीभगत से राशि की लूट-खसोट की जाती है। उदाकिशुनगंज प्रखंड के आनंदपुर पंचायत के रोजगार सेवक द्वारा मरनेगा मजदूरों की राशि डाकघर की मिलीभगत से 19 मजदूरों के पासबुक से फर्जी तरीके से निकाल लिया गया। इस बाबत मजदूरों ने उदाकिशनगंज के एसडीओ, कार्यक्रम पदाधिकारी समेत अन्य अधिकारियों से जांच की गुहार लगाई, परंतु उनकी यह गुहार खानापूर्ति में गुम हो कर रह गई है। हालांकि कार्यक्रम पदाधिकारी कुमार शैलेन्द्र ने कहा कि जांच के बाद 19 मजदूरों के मजदूरी भुगतान मंा किसी को भी दोषी नहीं पाया गया है।

मजदूरों को अक्सर शिकायत रहती है कि रोजगार सेवक के द्वारा जॉब कार्ड व पासबुक रख लिया जाता है और मनमाने ढंग से खाते से राशि की निकासी कर ली जाती है। अधिकारी दबी जुबान से बताते हैं कि प्राक्कलित राशि का 40 प्रतिशत पीओ, जेई, खजांची व रोजगार सेवक एवं डाककर्मी समेत अन्य पदाधिकारियों के बीच बंदरबांट कर ली जाती है। लूट का जब यह आलम हो तो मनरेगा की जमीनी हकीकत की सहज ही कल्पना की जा सकती है। अनुबंध पर बहाल रोजगार सेवकों का कहना है कि सरकार द्वारा मजदूरों को 114 रुपए भुगतान किया जाता है, मजदूरों के मेठ को 125 रुपया और रोजगार सेवक को 100 रुपये रोज यानि महीने के 3 हजार का भुगतान किया जाता है।

ऐसे में लूट-खसोट लाजिमी ही है। आलमनगर सह चौसा के पीओ देवेश गुप्ता व बिहारीगंज पीओ बिनोद बैठा ने कहा कि मनरेगा की उपलब्धि का लोग बखान कम दुष्प्रचार ज्यादा करते हैं। कांग्रेसी नेता सर्वेश्वर प्रसाद सिंह का कहना है कि केन्द्र सरकार ने नरेगा का नाम बदलकर मनरेगा रख दिया है, लेकिन इसमें इतने व्यापक पैमाने पर लूट-खसोट हो रही है कि महात्मा गांधी का नाम भी कलंकित हो रहा है।

इस खबर के स्रोत का लिंक: 
http://www.chauthiduniya.com/2010/

Mnrega

Mnrega me agar sirf loot hi hai to fir Nitish sarkar kiske bal pr vikash ki tasveer dikha rhi hai...aaj aap village me jayenge to aapko sirf Mnrega k kaam aur board hi milenge aur dekhenge wo v pahle se gunwatta purn. Mnrega k kaam aanaya yojnao se jyada acche hote hai...sirf sahi aur positive nazar se dekhne ki zarurat hai.

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