लेखक की और रचनाएं

SIMILAR TOPIC WISE

Latest

शैतानी गैसों के साए में

Source: 
जनसत्ता, रविवारी, 5 दिसम्बर-2010

दुनिया भर में इलेक्ट्रानिक और औद्योगिक कचरे के निपटान को लेकर बहस चल रही है। विकसित देश अपना कचरा विकासशील और अविकसित देशों के मत्थे मढ़ रहे हैं और उन देशों को बीमार और बदहाल बना रहे हैं। भारत में भी कई देश अपना कचरा डाल रहे हैं। इसका जायजा ले रहे हैं

‘जितनी तरक्की, उतना कचरा’ यह जुमला औद्योगिक समाज की नियति बनता जा रहा है। लंबे समय से आलीशान बस्तियों, बहुमंजिली इमारतों और साफ-सुथरी बस्तियों में एक नए किस्म की समस्या अपने पैर पसार रही है। यह समस्या है लैंडफिल गैसों की। इन्हें कचरा मैदानों से फूटती शैतानी गैसें भी कहा जाता है। ये गैसें न केवल मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा हैं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके कंप्यूटर, मोबाइल जैसे उपकरणों को भी क्षति पहुंचा रही हैं। जरूरत है हालात के ज्यादा बिगड़ने से पहले सचेत होने का।

बात अब घरेलू कचरे से उठकर इलेक्ट्रानिक कचरे तक जा पहुंची है। मुंबई, दिल्ली, बेंगलूर, अहमदाबाद, गुड़गांव और नोएडा जैसे तेजी से पनपते और विकसित होते शहरों में यह कचरा नई समस्या बनकर कर उभरा है। कचरा मैदानों (डंपिंग ग्राउंडों) पर बने आलीशान और बहुमंजिला इमारतों में आईटी, वीपीओ, कॉल सेंटर और सायबर कैफे इस समस्या के खासतौर से शिकार हैं। सीमेंट, कंक्रीट और लोहे से निर्मित इन इमारती भूखंडों में कंम्प्यूटर, लैपटॉप, एसी, टीवी, प्रिंटर, फ्रिज, माइक्रोवेव और दूसरे इलेक्ट्रानिक उपकरण चलते-चलते एकाएक जबाव देने लग जाते हैं। ऐसा उन भू-खंडों पर ज्यादा देखने में आ रहा है, जहां एक-डेढ़ दशक के भीतर इमारती जंगल उगा है। यहां चांदी, पीतल और तांबे के बर्तन और इलेक्ट्रोनिक उपकरणों में इस्तेमाल होने वाले कल-पुर्जे काले पड़ जाते हैं। नतीजतन इन पुर्जों की संवेदन-क्षमता कुंद हो जाती है। इससे कंम्प्यूटर, लैपटाप, मोबाइल जैसे यंत्र प्रभावित हो रहे हैं। समस्या का ज्यादा विस्फोटक पहलू यह है कि तमाम लोगों को यह पता ही नहीं चल पाता कि उनकी सेहत और उनके उपकरण क्यों तबाह हो रहे हैं।

आखिर में इस ‘अनंग-अशरीरी प्रेत’ की पड़ताल ‘नेशनल सॉलिड वेस्ट एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ के रसायन विशेषज्ञों ने की तो वे दंग रह गए। इस भयावहता का पर्दाफाश होने पर पता चला कि इलेक्ट्रानिक उपकरणों में पैदा होने वाली हरकतें डंपिंग ग्राउंड में दफन कचरे से लगातार रिस रहीं ‘लैंडफिल गैस’ की देन हैं। दरअसल लैंडफिल गैसें उन स्थलों से उत्सर्जित होती हैं, जहां गड्ढों और ऊबड-खाबड़ जमीन का समतलीकरण शहरी कचरे से किया गया हो। इस कचरे में औद्योगिक और घरों में उपयोग में लाए जाने वाले इलेक्ट्रानिक उपकरणों का कचरा भी शामिल हो तो इसमें प्रदूषण की भयानकता और बढ़ जाती है। नियम-कानूनों को ताक पर रखकर लापरवाही से तैयार भूखंडों पर खड़ी इमारतों में चल रहे सूचना तकनीक के कारोबार में प्रयोग में लाए जाने वाले ई-कचरे का अपशिष्ट चांदी, तांबा, प्लेडियम, टिन, सीसा, सोना, और पीतल के कल-पुर्जे लैंडफिल गैसों के रूप में रिसकर हवा में तैरने लगती हैं। ये गैसें इन कल-पुर्जों के संपर्क में आकर इनकी सेहत बिगाड़ देती हैं। इनका हमला यांत्रिक उपकरणों पर ही नहीं मानव सवास्थ्य पर भी बुरा पड़ता है। इनके दुष्प्रभाव से कैंसर, एलर्जी, गर्भपात और तंत्रिका तंत्र के गड़बड़ा जाने की समस्या पैदा हो सकती है।

आधुनिक जीवन शैली, कचरा उत्पादक शैली भी है। भारत ही नहीं, दुनिया के ज्यादातर विकसित और विकासशील देश कचरे को ठिकाने लगाने की समस्या से जूझ रहे हैं। देश में किसी भी ऊंची-नीची जमीन को समतल करने के लिए महापालिकाएं हों या सरकारी या निजी भवन-निर्माता कंपनियां, सभी एक ही तरीका अपनाती हैं। अच्छी और शुद्ध मिट्टी तलाशने की बजाय वे घरों से निकलने वाले घरेलू और इलेक्ट्रॉनिक कचरों से ही गड्ढों को पाट देते हैं। यह कचरा उन्हें मुफ्त में मिल जाता है। इन कचरों का न कोई रासायनिक शोधन किया जाता है और न ही कोई अन्य उपचार विभिन्न तत्वों और रसायनों से लबरेज नीचे दबा कचरा जब पांच-छह साल बाद रासायनिक प्रक्रिया शुरू करता है तो इसमें से जहरीली लैंडफिल गैसें वजूद में आने लगती हैं। ये हाइड्रोजन ऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, मीथेन, कार्बन मोनो ऑक्साइड और सल्फर-डाय ऑक्साइड गैसें होती हैं। कचरे के सड़ने से बनने वाली इन गंधाती गैसों को वैज्ञानिकों ने ‘लैंडफिल गैस’ कहकर एक अलग ही श्रेणी बना दी है। दफन कचरे में भीतर ही भीतर कुदरती प्रक्रिया के चलते लीचेड नामक जहरीला तरल पदार्थ जमीन की दरारों से रिसता है। लीचेड इतना खतरनाक होता है कि यह जमीन के जीव-जगत के लिए उपयोगी सहज गुणों का विनाश भी करता है। भू-गर्भ में निरंतर बहते रहने वाले जल-स्रोतों में भी लीचेड घुलकर शुद्ध पानी को जहरीला कर देता है। गंधक के अनेक जीवाणुनाशक यौगिक भूमि में फैलकर इसकी उर्वरा क्षमता को नष्ट कर देते हैं। इन यौगिकों को वैज्ञानिक ‘मेरकैप्टैंस’ कहते हैं।

आधुनिक जीवन शैली, कचरा उत्पादक शैली भी है। भारत ही नहीं, दुनिया के ज्यादातर विकसित और विकासशील देश कचरे को ठिकाने लगाने की समस्या से जूझ रहे हैं। ज्यादातर विकसित देशों ने समझदारी बरतते हुए औद्योगिक–प्रौद्योगिक कचरे को अपने देशों में ही नष्ट कर देने की कार्रवाई पर रोक लगा दी है। दरअसल पहले इन देशों में भी इस कचरे को धरती में गड्ढे खोदकर दबा दिया जाता था, लेकिन जिन-जिन क्षेत्रों में यह कचरा दफनाया गया, उन-उन क्षेत्रों में लैंडफिल गैसों के उत्सर्जन से पर्यावरण बुरी तरह प्रभावित होकर खतरनाक बीमारियों का जनक बन गया। जब ये रोग लाईलाज बीमारियों के रूप में पहचाने जाने लगे तो इन देशों का शासन-प्रशासन जागा और उसने कानून बनाकर इस तरह के कूड़े-कचरे को अपने ही देश में दफन करने पर सख्ती से प्रतिबंध लगा दिया। तब इन देशों ने इस कचरे को ठिकाने लगाने के लिए लाचार देशों की तलाश की।

जानकर हैरानी होगी कि सबसे लाचार देश निकला भारत, जहां दुनिया के एक सौ पांच से भी ज्यादा देश अपना औद्योगिक कचरा समुद्रतटीय इलाकों में जहाजों से भेजकर नष्ट करते हैं। इन देशों में अमेरिका, चीन, ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और ब्रिटेन प्रमुख हैं।

नेशनल एनवायरमेंट इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट के शोध में पाया गया कि 1997 से 2005 के बीच भारत में प्लास्टिक कचरे के आयात में 62 फीसद की बढ़ोतरी हुई है। यह आयात देश में पुनर्शोधन व्यापार को बढ़ावा देने के बहाने किया जाता है। इस क्रम में चिंतनीय पहलू यह है कि इस आयातित कचरे में खतरनाक माने जाने वाले आगर्नों-मरक्यूरी यौगिक निर्धारित मात्रा से पंद्रह गुणा अधिक पाया गया है। यह कैंसर जैसी लाइलाज और भयानक बीमारी को जन्म देता है। भारत में कचरे की निर्बाध निपटान के पीछे विकसित देशों की मंशा भी ठीक नहीं लगती। कहीं न कहीं भारत को बीमार देश बनाए रखने की दुर्भावना भी नजर आती है। ये देश पहले किसी भी देश में बीमारियां बोते हैं और फिर वैक्सीन, टीके और एंटी बॉयोटिक दवाओं का निर्यात कर मुनाफा कमाते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय की मूल्यांकन समिति के मुताबिक देश में हर साल 44 लाख टन कचरा पैदा होता है। ऑर्गनाइजेशन फॉर कारपोरेशन एंड डवलपमेंट ने इस मात्रा को 50 लाख टन बताया है। इसमें से केवल 38.3 फीसद कचरे का ही पुनर्शोधन किया जा सकता है, जबकि 4.3 फीसद कचरे को जलाकर नष्ट किया जा सकता है। लेकिन इस कचरे को औद्योगिक इकाइयों द्वारा ईमानदारी से शोधित न करके ज्यादातर जल स्रोतों में धकेल दिया जाता है। मेन्यूफैक्चरर्स एसोशियशन ऑफ इन्फॉरमेशन टेक्नोलॉजी के एक अध्ययन में बताया गया है कि इलेक्ट्रानिक उपकरणों के बढ़ते इस्तेमाल को देखते हुए अनुमान है कि 2011 में भारत में निकलने वाले ई-कचरे की मात्रा 470 हजार टन से भी अधिक हो सकती है। ई-कचरा बच्चों के खिलौनों, पुराने टीवी, कंप्यूटर, माइक्रोवेव और मोबाइल के रूप में भी निकलता है। कचरा भंडारों को नष्ट करने के ऐसे ही फौरी उपायों के चलते एक सर्वे में ‘पर्यावरण नियोजन एवं समन्वय संगठन’ ने पाया है कि हमारे देश के पेयजल में 750 से 1000 मिलीग्राम तक प्रति लीटर नाइट्रेट पानी में मिला हुआ है और अधिकांश आबादी को बिना किसी रासायनिक उपचार के पानी सप्लाई किया जाता है। यह पेयजल लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा असर डालता है। एप्को के अनुसार नाइट्रेट बढ़ने का प्रमुख कारण औद्यौगिक कचरा, मानव और पशु मल है। ई-कचरे का निपटारा भी खतरों से जुड़ा है क्योंकि इनसे खतरनाक और जानलेवा तत्व निकलते हैं। ट्रांजिस्टर की पिन में लगा कॉपर अलग करते समय डाई-ऑक्सिन गैस निकलती है। कंप्यूटर के कल-पुर्जों से यलो मेटल अलग करते समय साइनाइट गैस निकलती है। ये गैसें मानव स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक हैं।

ऐसे ही कारणों से लैंडफिल गैसों का उत्सर्जन बढ़ रहा है। नतीजतन बच्चों में ब्लू बेबी सिंड्रोम जैसी बीमारी फैल रही है। इन गैसों के आंख, गले और नाक में स्थित श्लेष्मा परत के संपर्क में आने से दमा, सांस, त्वचा और एलर्जी की बीमारियां बढ़ रही हैं। कचरा मैदानों के ऊपर बने भवनों में रहने वाले लोगों में मूत्राशय का कैंसर घर कर लेने की आशंका ज्यादा बढ़ जाती है, वह भी खास तौर से महिलाओं में। लैंडफिल गैसें इन खतरों को चार गुना ज्यादा बढ़ा देती हैं। प्रदूषण गर्भ में पल रहे शिशु को भी प्रभावित करता है।

प्राकृतिक रूप से खेतों की उर्वरा क्षमता बढ़ाने के लिए केंचुओं की उपयोगिता जगजाहिर है। लेकिन, अब औद्योगिक जहरीले कचरे को केंचुओं से निर्मित वर्मी कल्चर पद्धति चलन में लाए जाने का सफल प्रयोग अस्तित्व में आया है। अहमदाबाद के निकट मुथिया गांव में एक पायलट परियोजना शुरू की गई है। इसके तहत पिछले एक साल के भीतर जमा 60 हजार टन कचरे में 50 हजार केंचुए छोड़े गए थे। चमत्कारिक ढंग से केंचुओं ने इस कचरे का सफाया कर दिया। नतीजतन यह स्थल पूरी तरह प्राकृतिक ढंग से जहर के प्रदूषण से मुक्त हो गया। नियम यह है कि जहां इस किस्म का कचरा डाला गया है वहां कम से कम पंद्रह साल बाद ही कोई तामीर खड़ी होनी चाहिए। इस अवधि में कचरे के सड़ने की प्रक्रिया पूर्ण होकर लैंडफिल गैसों का उत्सर्जन भी खत्म हो जाता है और जल में घुलनशील तरल पदार्थ लीचेड का बनना भी बंद हो जाता है। लेकिन प्रकृति कि इस नैसर्गिक प्रक्रिया के पूरा होने से पहले ही भवन निर्माता एजेंसियां और कंपनियां इमारतों को वजूद में लाने का सिलसिला शुरू कर देती हैं। फिर नतीजा भुगतना होता है उस क्षेत्र में रहने वाली आबादी और इलेक्ट्रानिक उपकरणों को?

इस औद्योगिक-प्रौद्योगिक कचरे को नष्ट करने के अब प्राकृतिक उपाय भी सामने आ रहे हैं। हालांकि हमारे देश में तो घरेलू कचरे और मानव और पशु मल-मूत्र से ग्रामीण अंचलों में घर के बाहर ही ‘घूरे’ में कूड़े को प्रसंस्कृत कर खाद बनाने की प्राचीन परंपरा रही है। उपयोगिता और ज्ञान की यह ऐसी परंपरा है जिसके तहत कचरा महामारी का रूप धारण कर जानलेवा बीमारियों का पर्याय बनने के बजाय खाद का काम करता रहा है। यह खाद न केवल सस्ती बल्कि उपयोगी होती है।

अब एक ऐसा ही अनूठा प्रयोग औद्योगिक-प्रौद्योगिक जहरीले कचरे को नष्ट करने में सामने आया है। अभी तक हम केंचुओं का इस्तेमाल खेतों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए वर्मी कंपोस्ट खाद के निर्माण में कर रहें हैं। लैंडफिल गैसों से सुरक्षा के लिए कचरे को नष्ट करने के कुछ ऐसे ही प्राकृतिक उपाय अमल में लाने होंगे, जिससे कचरा मैदानों में बसी आबादी और इलेक्ट्रानिक उपकरण सुरक्षित रह सकें।

It's a way of life of

It's a way of life of software and expertise that is going due to which the garbage has been jogging as a fertilizer in preference to turning it into synonyms of lethal sicknesses. Think each my due to Essay Help Dubai the thick rooms within the whole frame, the partner not noted them. Now a similar experiment has come out within the destruction of industrial-technological poisonous waste.

Vanja

The productiveness of the fields. Vanja Thinkers of various fields like technology, humanism, history, governmental troubles this is the primary event when that such talks have to stand up in Hindi

Source

It's for a lifestyle of utility and know-how that below which the garbage has been walking as fertilizer instead of turning into synonyms of lethal illnesses thru taking the form of a virus.  don't forget every simply considered one of my traits. due to thick rooms in the entire body, Online Essay Help the partner omitted them.

REPLY

The productiveness of the fields. Vanja Thinkers of various fields like technology, humanism, history, governmental troubles this is the primary event when that such talks have to stand up in Hindi. Do My Essay for me It's far a tradition of utility and knowledge that beneath which the garbage has been running as fertilizer instead of turning into synonyms of lethal diseases through taking the shape of a plague.

Consider every certainly one

Consider every certainly one of my traits. because of thick rooms in the whole frame, the spouse neglected them. Essay Help Online UK So far, we have been using the earthworms to create vermicompost compost for increasing the productivity of the fields. Vanja Thinkers of various fields like technology, humanism, history, governmental issues this is the primary event when that such talks have to arise in Hindi. Vanja Thinkers of different fields like technology, humanism, records, governmental issues

Post new comment

The content of this field is kept private and will not be shown publicly.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Lines and paragraphs break automatically.

More information about formatting options

CAPTCHA
यह सवाल इस परीक्षण के लिए है कि क्या आप एक इंसान हैं या मशीनी स्वचालित स्पैम प्रस्तुतियाँ डालने वाली चीज
इस सरल गणितीय समस्या का समाधान करें. जैसे- उदाहरण 1+ 3= 4 और अपना पोस्ट करें
2 + 0 =
Solve this simple math problem and enter the result. E.g. for 1+3, enter 4.