Arpa River in Hindi ( अरपा नदी )

HIndi Title: 

अरपा नदी


-अरपा नदी भी महानदी की सहायक नदी है।
-इसका उदगम पेण्ड्रा लोरमी पठार में स्थित खोडरी पहाड़ी से हुआ है।
-इसका प्रवाह छत्तीसगढ़ राज्य बिलासपुर ज़िले में उत्तर-पश्विम में दक्षिण की ओर होते हुए बलौदा बाज़ार में उत्तर में कुछ दूरी पर बरतोरी के समीप ठाकुरदेवा नामक स्थान पर शिवनाथ नदी में मिल जाती है।
-छत्तीसगढ़ प्रदेश में इसकी लम्बाई 100 किमी0 है।
-इसकी सहायक नदी खारून पर रतनपुर के पास खन्दाघाट नामक जलाशय का निर्माण किया गया है।

विकिपीडिया से (From Wikipedia): 
अरपा नदी का उद्गम पेण्ड्रा पठार की पहाड़ी से हुआ है । यह महानदी की सहायक नदी है । यह बिलासपुर तहसील में प्रवाहित होती है और बरतोरी के निकट ठाकुर देवा नामक स्थान पर शिवनाथ नदी में मिल जाती है । इसकी लम्बाई 147 किमी. है ।

अन्य स्रोतों से: 

अरपा :एक नदी चल पड़ी आत्महत्या की ओर !


बिलासपुर : बहती हुई नदी, नाला या फिर कूड़ाघर… छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में कभी जीवन का पर्याय बन चुकी अरपा नदी को देखकर अंदाजा लगाना मुश्किल है कि आखिर यह है क्या? कभी जीवनदायिनी नदी रही अरपा का आज अस्तित्व ही खतरे में है। नदी किनारे किया जा रहा अवैध उत्खनन और नगर निगम की लापरवाही के चलते ही आज नदी की ये हालत है।

नगर निगम ने तो इस नदी को पूरे शहर का कूड़ाघर बना कर रख दिया है।जाहिर है प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल करके हम अपना विकास तो कर सकते हैं लेकिन उसका भयंकर दोहन कहीं न कहीं हमारे अस्तित्व को ही खतरे में डाल रहा है। कम से कम अरपा नदी की हालत को देखकर हमें समय के साथ ये सोचने की जरुरत है।

विकास की दौड़ में बर्बादी के कगार
गुजरात, महाराष्ट्र की सीमा से शुरू करीब 5 राज्यों को छूता हुआ सहयाद्री पर्वत श्रृंखला जो कि कन्याकुमारी तक जाता है। सहयाद्री पर्वत श्रृंखला प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर और भारत में बारिश के लिए सबसे बड़ी वजह है। यही नहीं करीब 5 हजार किस्म के फूल, 508 तरह के पक्षियों और 139 तरह के जीव जंतुओं का बसेरा यहीं है। लेकिन ये इलाका आज विकास की दौड़ में बर्बादी के कगार पर पहुंच गया है।गौरतलब है कि जो इलाका नदियों को जीवन देता है। देश के बड़े हिस्से में पानी की कमी को पूरा करता है, उसे भी हम गंदगी, विकास की अंधाधुंध दौड़ में हम खत्म करते जा रहे हैं। कहीं सरकार विकास के नाम पर पॉवर प्रोजेक्ट, एटॉमिक प्रोजेक्ट लगाकर इस इलाके का दोहन कर रही है तो कहीं लोगों की जगह पाने की भूख इस इलाके से उसकी विविधता छीनती जा रहे है।जाहिर है प्राकृतिक विविधता से भरपूर देश के इस इलाके का विकास के नाम पर दोहन करना इस देश के लोगों पर ही भारी पड़ सकता है। ऐसे में सवाल ये है कि क्या पर्यावरण दिवस के मौके पर इस सवाल पर मंथन करने की जरूरत नहीं है? क्या सरकार को इस मसले पर गंभीरता से सोचने की जरूरत नहीं है? कहीं ऐसा न हो कि इस विकास की हमें और हमारे आने वाली पीढी को बहुत बडी कीमत चुकानी पड़े?

वरदान बन रहा अभिशाप
ओडिशा का तालचेर शहर कोयला उत्पादन के लिए बेहद मशहूर है लेकिन आज इस शहर का वरदान ही इसके लिए अभिशाप बन गया है। कोयला का प्रचुर भण्डार होने के कारण इस शहर पर बड़ी-बड़ी कम्पनियों ने अपने प्रोजेक्ट्स लगाने शुरु कर दिए। इससे आज इस शहर के लोगों का जीना मुहाल हो गया।कोयले की खानों से निकलने वाले जहरीले धुएं, कोयला के जाने और लाने में उड़ने वाली धूल से शहर का बुरा हाल है। पूरे शहर में प्रदूषण का स्तर खतरे के स्तर को पार कर चुका है। यहां तक की पानी भी भयानक तरीके से प्रदूषित हो रहा है।उधर प्रशासन का दावा है कि कोयले से उड़ने वाली धूल को रोकने के लिए 255 करोड़ रुपये का बजट बनाया गया है। इसके तहत हिंगुला और लिंगराज खानों के बीच सड़क का निर्माण किया जाना है लेकिन क्या इतने भर से समस्या खत्म हो जाएगी? क्या आम आदमी को राहत मिल जाएगी? विकास के नाम पर फैलते इस प्रदूषण के लिए जिम्मेदार कौन है और इस समस्या का हल क्या है? इस मसले पर सरकार और आम आदमी को एक साथ काम करने की जरूरत है।

सत्रह साल पहले बौराई थी अरपा नदी
अरपा नदी का उद्गम स्थल पेण्ड्रा रोड क्षेत्र में है। जंगल क्षेत्र में भारी बारिश होने से ही इस नदी में बाढ़ की स्थिति रहती है। करीब डेढ़ दशक पूर्व अरपा नदी बौराई थी जब भारी बारिश की वजह से आई बाढ़ के कारण पुराने और बूढ़े अरपा पुल के उपर कई फीट पानी बह रहा था। उसके बाद अरपा नदी में वैसी बाढ़ अब तक नहीं आई। इसी बीच पता चला अरपा नदी का उद्गम स्थल ही सूख गया है और अतिक्रमण का शिकार हो गया है।

पिछले डेढ़ दशक से अरपा नदी में बाढ़ नहीं आने के कारण बूढ़े अरपा पुल को कई वर्षों का जीवनदान मिल गया है। वरना पुराने अरपा पुल की अवधि तो कई वर्ष पूर्व ही समाप्त हो चुकी है उसके बाद भी पुराना अरपा पुल एसईसीएल द्वारा 16 वर्ष पूर्व 5 करोड़ की लागत से बनवाए इंदिरा सेतु से आज भी मजबूत है। पुराना अरपा पुल अंग्रेजों ने वर्ष 1890 में बनवाया था यानि इस पुल की उम्र 121 वर्ष की हो चुकी है उसके बाद भी यह चट्टान की भांति खड़ा है। पिछले डेढ़ दशक से बाढ़ नहीं आने के कारण भी पुराने अरपा पुल की जिंदगी बढ़ते जा रही है। अरपा पुल निर्माण के बाद अंग्रेजों ने वर्ष 1923 व वर्ष 1928 में खुड़िया बांध (अब संजय गांधी जलाशय) व खारंग जलाशय का निर्माण कराया था।पुराने अरपा पुल में वृहद मरम्मत की नौबत भी नहीं आई हालांकि वर्ष 2001 में एप्रोच रोड के धंसकने की शिकायत पर तत्कालीन कलेक्टर आर पी मण्डल ने एप्रोच रोड में सुधार कार्य करवाया था। तब एक अफवाह यह भी फैली थी कि पुराना अरपा पुल धंसक रहा है।

कवि किशोर दिवसे की नजर में

सूखी अरपा ….

आज सचमुच देखा
अपनी अरपा का सूखा तन
कसक उठी,दुखी हुआ मन
सूखी अरपा ,खोया यौवन धन

आज सचमुच देखा
अरपा की पसरी रेत
दूर तक फैला पाट
बेजान ,नीरव और सपाट

आज सचमुच देखा
चीखती अरपा पहियों के नीचे
छलनी करती लौह मशीनें
उसे बेचकर चांदी कूतते
नराधमों का कुनबा

आज सचमुच देखा
अरपा के पाट का दर्द
हाँ! उसे ही दिखता है दर्द
जो सुनता है नदी की कराह को
और महसूसता है मरू के श्वास

आज सचमुच देखा
अरपा के पाट पर गूंजते
स्वर संकेतों का करुण क्रंदन
पाट गर्भ से गूंजती चीखें
नवजात शिशुओं , अनचीन्हे शवों की
और रेत से निकलती गर्म साँसें
कहाँ है सचमुच की नदी
उसकी खिल-खिल हंसी!!!

आज सचमुच देखा
रेत को बदलते हुए
अनगिनत इंसानी शक्लों में
सुना आपने! सूखी रेत पूछती है
कहाँ है पानी… कहाँ है पानी!!
अरे इंसान बंद कर नादानी
कब तक रौंदेगा मेरी छातियों को?
सूखा है पाट, धधकता है मन
कब भीगेगा मेरा प्यासा तन?
मेरी गहराइयों का अतलांत!
मै गाऊंगी- कल -कल छल- छल
स्वप्नाकांक्षा कब होगी शांत!!!

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